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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 572 में से

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पृष्ठ 200

१६२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ शिखिब्राह्मणोपनिषत्
नष्ट नहीं होता। वह विकारों में भी सदैव शिव ( ब्रह्मभाव ) के दर्शन
करता है। ऐसा विज्ञान-योगी सर्व विकारों से रहित ब्रह्म का अनन्य
भाव से ध्यान करे। जिसको इस प्रकार ज्ञानयोग नहीं होता उसको
सिद्धि प्राप्त नहीं होती ॥२०--२१॥
तस्मादभ्यासयोगेन मनःप्राणान्निरोधयेत् ।
योगी निशितधारेण क्षुरेणेव निकृन्तयेत् ॥२२
शिखा प्राणमयी वृत्तिर्माहष्टाङ्गसाधनैः ।
ज्ञानयोगः कर्मयोग इति योगो द्विधा मतः ॥२३
क्रियायोगमथेदानीं शृणु ब्राह्मणसत्तम ।
अव्याकुलस्य चित्तस्य बन्धनं विषये क्वचित् ॥२४
इस प्रकार योग के अभ्यास द्वारा प्राणों से मन का निरोध करे
मानो छुरी की पैनी धार से उसको काट दे। यम-नियम आदि अष्टांग
-योगसाधन से ज्ञानमयी शिखा उत्पन्न होती है। योग की दो श्रेणियां
हैं-ज्ञानयोग और कर्मयोग ॥ २२--२३ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ! अब क्रिया
(कर्म) योग के विषय में बतलाते हैं कि जिसका चित्त व्याकुलता रहित
होता है वह विषयों के बन्धन में नहीं पड़ता ॥ २४ ॥
यत्संयोगो द्विजश्रेष्ठ स च द्वैविध्यमश्नुते ।
कर्म कर्तव्यमित्येव विहितेष्वेव कर्मसु ॥२५
बन्धनं मनसो नित्यं कर्म योगः स उच्यते ।
यत्तु चित्तस्य सततमर्थे श्रेयसि बन्धनम् ॥२६
ज्ञानयोगः स विज्ञेयः सर्वसिद्धिकरः शिवः ।
यस्योक्तलक्षणे योगे द्विविधेऽप्यव्ययं मनः ॥२७
स याति परमं श्रेयो मोक्षलक्षणमञ्जसा ।