१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
कर्तापन का अहङ्कार तत्व पाया जाता है ॥ ७ ॥ इसका मोह रूपी
तमोगुण का पिण्ड अज्ञान कण्ठ के आश्रय से रहता और समस्त जगत
में व्याप्त है ॥ ८ ॥ प्रत्येक आनन्दरूपी आत्मा परमपद मूर्धा स्थान में
अनन्त शक्तियों से संयुक्त होकर जगत स्वरूप में प्रकाशित हो रहा है
॥ ६ ॥ जाग्रत सर्वत्र विद्यमान है, स्वप्न जाग्रित में रहता है। सुषुप्ति
और तुरीय अवस्थायें अन्य अवस्थाओं में नहीं पायी जातीं ॥१०॥
सर्वदेशेष्वनुस्यूतश्चतूरूपः शिवात्मकः ।
यथा महाफले सर्वे रसाः सर्वप्रवर्तकाः ॥११॥
तथैवान्नमये कोशे कोशास्तिष्ठन्ति चान्तरे ।
यथा कोशस्तथा जीवो यथा जीवस्तथा शिवः ॥१२
सविकारस्तथा जीवो निर्विकारस्तथा शिवः ।
कोशास्तस्य विकारस्ते ह्यवस्थासु प्रवर्तकाः ॥१३
यथा रसाशये फेनं मथनादेव जायते ।
मनोनिर्मथनादेव विकल्पा बहवस्तथा ॥१४
कर्मणा वर्तते कर्मो तत्त्यागाच्छान्तिमाप्नुयात् ।
अयने दक्षिणे प्राप्ते प्रपञ्चाभिमुखं गतः ॥१५
सब स्थानों में शिव स्वरूप चार रूपों में वर्तमान है जैसे उत्तम
फलों में रस सर्वत्र व्याप्त रहता है ॥ ११ ॥ वहां अन्नमय-कोश के
भीतर अन्य कोश रहते हैं। जैसे-जैसे कोश हैं वैसा ही जीव है और
जैसा जीव है वैसा ही शिव ( परमात्मा ) है ॥१२॥ अन्तर इतना ही है
कि जीव विकार सहित है और शिव विकारों से रहित है। कोश ही
जीव के विकार हैं जो सब अवस्थाओं में प्रवर्तक हैं ॥ १३ ॥ जैसे दूध
को मथने से फेन की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार मन के मथे जाने से