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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

२०८ पैंगलोपनिषद्
ततः पवित्रं परमेश्वराख्यमद्वैतरूपं विमलाम्बराभम्।
यथोदके तोयमनुप्रविष्टं तथात्मरूपो निरुपाधिसंस्थितः ॥ १७॥
इसके पश्चात् वह विमल वस्त्र के समान पवित्र और अद्वैतरूप परमेश्वर को प्राप्त करके उसी प्रकार
अपने आत्म रूप (सत्य स्वरूप) में प्रतिष्ठित हो जाता है, जिस प्रकार जल दूसरे जल में प्रविष्ट होकर
(मिलकर) एकरूप हो जाता है ॥ १७॥
आकाशवत्सूक्ष्मशरीर आत्मा न दृश्यते वायुवदन्तरात्मा।
स बाह्यमभ्यन्तरनिश्चलात्मा ज्ञानोल्कया पश्यति चान्तरात्मा ॥ १८॥
आत्मा आकाश के सदृश सूक्ष्म और वायु के सदृश दिखाई न पड़ने वाली है। वह बाह्य और अन्दर
से भी निश्चल है, जिसे मात्र ज्ञान रूपी उल्का (विद्युत् या मशाल) से ही देखा जा सकता है॥ १८ ॥
यत्र यत्र मृतो ज्ञानी येन वा केन मृत्युना । यथा सर्वगतं व्योम तत्र तत्र लयं गतः ॥ १९ ॥
ज्ञानी कहीं भी और कैसे भी मृत्यु को प्राप्त करे, वह हर स्थिति में ब्रह्म में ही लय हो जाता है, क्योंकि
आकाश के समान ही ब्रह्म भी सर्वव्यापी है ॥ १९ ॥
घटाकाशमिवात्मानं विलयं वेत्ति तत्त्वतः । स गच्छति निरालम्बं ज्ञानालोकं समन्ततः ॥ २०
जिस प्रकार घटाकाश आकाश में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार जो योगी अपने को तत्त्वतः जान लेता
है, वह सभी ओर से निरालम्ब और ज्ञानालोक स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥
तपेद्वर्षसहस्त्राणि एकपादस्थितो नरः । एतस्य ध्यानयोगस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥ २१ ॥
यदि कोई एक पैर पर खड़े होकर एक सहस्र वर्ष तक तप करे, तो भी वह ध्यान योग की षोडश
कलाओं में से एक के बराबर भी नहीं हो सकता ॥ २१ ॥
इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञातुमिच्छति । अपि वर्षसहस्रायुः शास्त्रान्तं नाधिगच्छति ॥ २२ ॥
ज्ञान और ज्ञेय को यदि कोई सम्पूर्णरूप से जानना चाहे, तो सहस्र वर्ष की आयु पर्यन्त शास्त्राध्ययन
करने पर भी उसका पार नहीं पा सकता ॥ २२ ॥
विज्ञेयोऽक्षरन्मात्रो जीवितं वापि चञ्चलम् । विहाय शास्त्रजालानि यत्सत्यं तदुपास्यताम् ॥ २३
मनुष्य को जानना चाहिए कि मात्र अक्षर ब्रह्म ही सत्य है। मनुष्य का जीवन चञ्चल है; इसलिए
शास्त्र-जाल को छोड़कर जो सत्य है, उसी की उपासना करे ॥ २३ ॥
अनन्तकर्म शौचं च जपो यज्ञस्तथैव च । तीर्थयात्राभिगमनं यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥ २४॥
विभिन्न कर्म-शौच, जप, यज्ञ, तीर्थयात्रा आदि की सार्थकता तभी तक है, जब तक तत्त्व की प्राप्ति न हो ॥
अहं ब्रह्मेति नियतं मोक्षहेतुर्महात्मनाम् । द्वे पदे बन्धमोक्षाय न ममेति ममेति च ॥ २५ ॥
'मैं ब्रह्म हूँ' यही भाव महात्मा पुरुषों के मोक्ष का आधार होता है। बन्धन और मोक्ष के कारण रूप ये
ही दो पद हैं, 'यह मेरा है' (बन्धन), 'यह मेरा नहीं है' (मोक्ष) ॥ २५ ॥
ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते । मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ २६ ॥
मेरा है, यह भाव बन्धन में डालता है और मेरा नहीं है, यह भाव मोक्ष प्रदान करता है। जब मन उन्मनी
अवस्था (भाव) को प्राप्त हो जाता है, तब द्वैत भाव समाप्त हो जाता है ॥ २६ ॥
यदा यात्युन्मनीभावस्तदा तत्परमं पदम् । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परं पदम् ॥ २७ ॥

अध्याय ४ मंत्र ३१ २०९

अध्याय ४ मंत्र ३१ २०९
जब उन्मनी भाव प्राप्त हो जाता है, तभी परम पद प्राप्त होता है। उस अवस्था में जहाँ-जहाँ मन जाता
है, वहीं-वहीं परम पद है॥ २७॥
तत्र तत्र परं ब्रह्म सर्वत्र समवस्थितम्। हन्यान्मुष्टिभिराकाशं क्षुधार्तः खण्डयेत्तुषम्।
नाहंब्रह्मेति जानाति तस्य मुक्तिर्न जायते ॥ २८ ॥
परब्रह्म यत्र-तत्र-सर्वत्र अवस्थित है, पर जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि 'मैं ब्रह्म हूँ' उसकी मुक्ति
उसी प्रकार नहीं होती (अथवा मुक्ति के लिए किया गया प्रयास निष्फलं जाता है), जिस प्रकार कोई आकाश
में मुष्टि प्रहार करे या भूखा व्यक्ति चावल प्राप्त करने के लिए भूसी को कूटे॥ २८॥
य एतदुपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति। स वायुपूतो भवति। स आदित्यपूतो
भवति। स ब्रह्मपूतो भवति। स विष्णुपूतो भवति। स रुद्रपूतो भवति। स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो
भवति। स सर्वेषु वेदेष्वधीतो भवति। स सर्ववेदव्रतचर्यासु चरितो भवति। तेनेतिहासपुराणानां
रुद्राणां शतसहस्राणि जप्तानि फलानि भवन्ति। प्रणवानामयुतं जप्तं भवति। दश पूर्वान्दशोत्त-
रान्पुनाति। स पङ्क्तिपावनो भवति। स महान्भवति। ब्रह्महत्यासुरापानस्वर्णस्तेयगुरु-
तल्पगमनतत्संयोगिपातकेभ्यः पूतो भवति॥ २९॥
जो इस उपनिषद् का नित्य पाठ करता है (अध्ययन करता है), वह अग्नि के समान, वायु के समान,
आदित्य के समान, ब्रह्म के समान, विष्णु के समान और रुद्र के समान पवित्र होता है। वह समस्त तीर्थों में
स्नान किए हुए के समान होता है, समस्त वेदों का ज्ञाता होता है, समस्त वेदों में वर्णित व्रतों का पालन करने
वाला होता है। उसे इतिहास-पुराण आदि के अध्ययन तथा एक लक्ष रुद्रमन्त्र के जप का फल प्राप्त होता है।
उसे दस सहस्र 'प्रणव' नाम के जप का फल मिलता है। उसके पूर्व की दस और बाद की दस पीढ़ियाँ पवित्र
हो जाती हैं। वह साथ में बैठने वालों को पवित्र करता है, जिसके कारण 'पंक्ति पावन' हो जाता है। वह महान्
होता है। वह ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरुपत्नी-गमन तथा ऐसे महापातक करने वालों की संगति
से उत्पन्न पातकों से मुक्त (पवित्र) हो जाता है॥ २९॥
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम् ॥ ३० ॥
ज्ञानीजन विश्वव्यापी भगवान् विष्णु के परमपद को द्युलोक में व्याप्त दिव्य प्रकाश की भाँति देखते हैं॥
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यत्परमं पदम्। ॐ सत्यमित्युपनिषद् ॥ ३१ ॥
वे विप्र (ब्रह्मनिष्ठ जीवनयापन करने वाले) आलस्य प्रमादादि से रहित, सदैव श्रेष्ठ कर्म करने वाले
साधक विष्णु (अन्तर्यामी परमेश्वर) के परम पद को प्राप्त करते हैं। यह बात सत्य है-ऐसी यह उपनिषद्
(रहस्यमयी विद्या) है॥ ३१॥
ॐ पूर्णमदः..................... इति शान्तिः ॥
॥ इति पैङ्गलोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ ब्रह्मबिन्दूपनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसका दूसरा नाम 'अमृतबिन्दूपनिषद्' भी है। इसमें कुल
२२ मन्त्र हैं, जिसमें ब्रह्म के अनुसन्धान (साक्षात्कार) का क्रमिक स्वरूप वर्णित हुआ है।
'मन ही मनुष्य के बन्धन एवं मोक्ष का कारणभूत है' - इस शाश्वत तथ्य के उद्घाटन के साथ उपनिषद्
का शुभारम्भ हुआ है। 'मन' को निर्विषय बनाकर मुक्ति की प्राप्ति, निर्विषय बनाने की विधि, स्वर (प्रणव)
तथा अस्वर द्वारा व्यक्त एवं अव्यक्त 'ब्रह्म' का अनुसन्धान, तीनों अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) में एक
ही आत्मतत्त्व की स्थिति, आत्मा का शाश्वत-स्वरूप, माया से जीवात्मा का आवृत होना, अज्ञानान्धकार के
विनष्ट होने पर जीवात्मा-परमात्मा के एकत्व का बोध, दूध में विद्यमान घृत की तरह चिन्तन-मनन रूप
मन्थन द्वारा परमात्मतत्त्व की प्राप्ति और अन्ततः स्वयं के रूप में उस (परमात्मतत्त्व) की अनुभूति-यही सब
वर्ण्य विषय हैं, इस ब्रह्मबिन्दूपनिषद् के ये सभी विषय बड़े सरल ढंग से इस उपनिषद् में प्रतिपादित हुए हैं।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु...........इति शान्तिः ॥ ( द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद )
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च। अशुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविवर्जितम् ॥ १ ॥
मन के दो प्रकार कहे गये हैं, शुद्ध मन और अशुद्ध मन। जिसमें इच्छाओं, कामनाओं के संकल्प उत्पन्न
होते हैं, वह अशुद्ध मन है और जिसमें इन समस्त इच्छाओं का सर्वथा अभाव हो गया है, वही शुद्ध मन है ॥ १ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥ २ ॥
मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का प्रमुख कारण है। विषयों में आसक्त मन बन्धन का और
कामना-संकल्प से रहित मन ही मोक्ष (मुक्ति) का कारण कहा गया है ॥ २ ॥
यतो निर्विषयस्यास्य मनसो मुक्तिरिष्यते । अतो निर्विषयं नित्यं मनः कार्यं मुमुक्षुणा ॥ ३ ॥
निरस्तविषयासङ्गं संनिरुद्धं मनो हृदि। यदा यात्युन्मनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ ४ ॥
विषय-भोगों के संकल्प से रहित होने पर ही इस मन का विलय होता है। अतः मुक्ति की इच्छा रखने
वाला साधक अपने मन को सदा ही विषयों से दूर रखे। इसके अनन्तर जब मन से विषयों की आसक्ति
निकल जाती है तथा वह हृदय में स्थिर होकर उन्मनी भाव को प्राप्त हो जाता है, तब वह उस परमपद को प्राप्त
कर लेता है ॥ ३-४ ॥
तावदेव निरोद्धव्यं यावद्धृदि गतं क्षयम् । एतज्ज्ञानं च मोक्षं च अतोऽन्यो ग्रन्थविस्तरः ॥ ५ ॥
मनुष्य को अपना मन तभी तक रोकने का प्रयास करना चाहिए, जब तक कि वह हृदय में विलीन नहीं
हो जाता। मन का हृदय में लीन हो जाना ही ज्ञान और मुक्ति है, इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी है, वह सब
ग्रन्थ का मात्र विस्तार ही है ॥ ५ ॥
नैव चिन्त्यं न चाचिन्त्यमचिन्त्यं चिन्त्यमेव च। पक्षपातविनिर्मुक्तं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ६ ॥
जब चिन्तनीय और अचिन्तनीय का उस (साधक) के समक्ष कोई अन्तर न रह जाए तथा दोनों में से
किसी के प्रति भी मन का पक्षपात भी न रह जाए, तब साधक ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ ६ ॥

२१२ ब्रह्माबिन्दूपनिषद्
स्वरेण संधयेद्योगमस्वरं भावयेत्परम् । अस्वरेण हि भावेन भावो नाभाव इष्यते ॥ ७॥
(साधक को) स्वर अर्थात् प्रणव के द्वारा व्यक्त ब्रह्म की अनुभूति करनी चाहिए तथा इसके पश्चात्
अस्वर द्वारा (प्रणव से अतीत) अव्यक्त ब्रह्म का चिन्तन करे। प्रणवातीत उस श्रेष्ठ परब्रह्म की प्राप्ति भावना के
माध्यम से भाव-रूप में होती है, अभाव रूप में नहीं॥ ७॥
तदेव निष्कलं ब्रह्म निर्विकल्पं निरञ्जनम् । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा ब्रह्म संपद्यते ध्रुवम् ॥ ८ ॥
वह ब्रह्म कलाओं से रहित (एक रस-प्राणादि कलाओं से ऊपर), निर्विकल्प एवं निरञ्जन अर्थात्
माया और मल से रहित है। 'वह ब्रह्म मैं ही हूँ', इस प्रकार जान करके मनुष्य निश्चित ही ब्रह्ममय हो जाता है॥
निर्विकल्पमनन्तं च हेतुदृष्टान्तवर्जितम् । अप्रमेयमनादिं च यत् ज्ञात्वा मुच्यते बुधः ॥ ९ ॥
निर्विकल्प, अन्तरहित (अनन्त), हेतु और दृष्टान्त से शून्य, प्रपञ्च से रहित, अनादि, परम कल्याणमय
परब्रह्म को जानकर विद्वान् पुरुष स्वयमेव मुक्त हो जाता है॥ ९॥
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षा न मुक्तिश्च इत्येषा परमार्थता ॥ १० ॥
न निरोध (प्रलय) है, न उत्पत्ति है, न बन्धन है और न ही (मोक्ष) साधकता है, न मुक्ति की इच्छा है
और न ही मुक्ति है। इस तरह का निश्चय होना ही परमार्थ बोध अर्थात् वास्तविक ज्ञान है॥ १०॥
एक एवात्मा मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । स्थानत्रयव्यतीतस्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ११ ॥
शरीर की इन तीनों जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में एक ही आत्मतत्त्व का सम्बन्ध मानना
चाहिए। जो भी व्यक्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो गया है, उस व्यक्ति का दूसरा जन्म फिर नहीं होता ॥११॥
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ १२॥
समस्त भूत प्राणियों का एक ही अन्तर्यामी हर एक प्राणी के अन्तःकरण में विद्यमान है। अलग-अलग
जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा की तरह वही एक, अनेक रूपों में दिखाई देता है॥ १२॥
घटसंवृतमाकाशं लीयमाने घटे यथा । घटो लीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः ॥ १३॥
घट (घड़े) में आकाश तत्त्व पूर्णरूप से विद्यमान है; किन्तु जिस प्रकार घड़े के क्षत-विक्षत होने पर
मात्र घड़े का ही विनाश होता है, उसमें भरे हुए आकाश तत्त्व का नहीं, उसी प्रकार शरीर धारण करने वाला
जीव भी आकाश के ही सदृश है। शरीर के विनष्ट होने से आत्मा का विनाश नहीं होता, वह शाश्वत है ॥ १३ ॥
घटवद्विविधाकारं भिद्यमानं पुनः पुनः। तद्गग्रं न च जानाति स जानाति च नित्यशः ॥ १४ ॥
समस्त जीव-प्राणियों का भिन्न-भिन्न शरीर, घट के ही समान है, जो बार-बार टूटता-फूटता या विनाश
को प्राप्त होता रहता है। यह विनाश को प्राप्त होने वाला जड़ शरीर अपने अन्तःकरण में विद्यमान चिन्मय
परब्रह्म को नहीं जानता; किन्तु वह सभी का साक्षी परमात्मा, सभी शरीरों को सदा से जानता रहता है॥ १४॥
शब्दमायावृतो यावत्तावत्तिष्ठति पुष्करे। भिन्ने तमसि चैकत्वमेकमेवानुपश्यति ॥ १५ ॥
जब तक नाम-रूपात्मक अस्तित्व रखने वाली माया के द्वारा (यह) जीवात्मा आवृत रहता है, तब
तक बँधे हुए की भाँति हृदय-कमल में स्थित रहता है, जब अज्ञान रूपी अन्धकार का विनाश हो जाता है, तब
ज्ञान रूपी प्रकाश में विद्वान् पुरुष जीवात्मा एवं परमात्मा के एकत्व का दर्शन प्राप्त कर लेता है॥ १५॥
शब्दाक्षरं परं ब्रह्म तस्मिन्क्षीणे यदक्षरम्। तद्विद्वानक्षरं ध्यायेद्यदीच्छेच्छान्तिमात्मनः ॥ १६ ॥
शब्द ब्रह्म (प्रणव) और परब्रह्म दोनों ही अक्षर हैं। इन दोनों में से जिस किसी एक के क्षीण होने पर
ण्यग जो अक्षय की स्थिति में बना रहता है, वह (परब्रह्म) ही वास्तविक अक्षर (अविनाशी) है। विद्वान्

मन्त्र २२ २१२
पुरुष यदि शान्ति चाहते हों, तो उन्हें उस अक्षर रूप परब्रह्म का ही चिन्तन करना चाहिए ॥ १६ ॥
द्वे विद्ये वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परं च यत्। शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ १७॥
दो विद्याएँ जानने योग्य हैं, प्रथम विद्या को 'शब्द ब्रह्म' और दूसरी विद्या को 'परब्रह्म' के नाम से जाना
जाता है। 'शब्द ब्रह्म' अर्थात् वेद-शास्त्रों के ज्ञान में निष्णात होने पर विद्वान् मनुष्य परब्रह्म को जानने की
सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है ॥ १७॥
ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्त्वतः। पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद्ग्रन्थमशेषतः ॥ १८॥
ज्ञानी मनुष्य को चाहिए कि ग्रन्थ का अभ्यास करने के पश्चात् उसमें निहित ज्ञान-विज्ञान को (मूलतत्त्व
को) ग्रहण कर ले, तदनन्तर ग्रन्थ को त्याग देना चाहिए। ठीक उसी भाँति, जैसे कि धान्य (अन्न) को प्राप्त
करने वाला व्यक्ति अन्न तो प्राप्त कर लेता है और पुआल को खलिहान में ही छोड़ देता है ॥ १८॥
गवामनेकवर्णानां क्षीरस्याप्येकवर्णता। क्षीरवत्पश्यते ज्ञानं लिङ्गिनस्तु गवां यथा ॥१९॥
अनेक रूप-रंगों वाली गौओं का दुग्ध एक ही रंग का होता है। ठीक वैसे ही बुद्धिमान् व्यक्ति अनेक
साम्प्रदायिक चिह्नों को धारण करने वाले मनुष्यों के विवेक को भी गौओं के दूध की तरह ही देखता है। बाहर
के चिह्न-भेद से ज्ञान में किसी भी तरह का अन्तर नहीं आने पाता ॥ १९ ॥
घृतमिव पयसि निगूढं भूते भूते च वसति विज्ञानम्।
सततं मन्थयितव्यं मनसा मन्थानभूतेन ॥ २०॥
जिस प्रकार दूध में घृत (घी) मूल रूप से छिपा रहता है, उसी तरह ही प्रत्येक प्राणी के अन्तः-करण
में विज्ञान (चिन्मय ब्रह्म) स्थित रहता है। जैसे घृत प्राप्ति के लिए दूध का मंथन किया जाता है, वैसे ही विज्ञान
स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति के लिए मन को मथानी रूप में परिणत करके सतत मन्थन (ध्यान एवं विचार) करते
रहना चाहिए ॥ २० ॥
ज्ञाननेत्रं समादाय चोद्धरेद्वह्निवत् परम्। निष्कलं निश्चलं शान्तं तद्ब्रह्माहमिति स्मृतम् ॥ २१॥
इसके पश्चात् ज्ञान दृष्टि प्राप्त करके अग्नि के सदृश तेजःस्वरूप परमात्मा का इस भाँति अनुभव करें कि
वह कला शून्य, निश्चल एवं अतिशान्त परब्रह्म मैं स्वयं ही हूँ। यही विज्ञान कहा गया है ॥ २१ ॥
सर्वभूताधिवासं च यद्भूतेषु वसत्यपि।
सर्वानुग्राहकत्वेन तदस्म्यहं वासुदेवः तदस्म्यहं वासुदेव इति ॥ २२ ॥
जिसमें समस्त भूत प्राणियों का निवास है, जो स्वयं भी सभी भूत प्राणियों के हृदय में स्थित है एवं सभी
पर अहैतुकी कृपा करने के कारण प्रसिद्ध है। वह सभी आत्माओं में स्थित वासुदेव मैं ही हूँ, वह सर्वात्मा
वासुदेव मैं स्वयं ही हूँ। इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥ २२ ॥
ॐ सह नाववतु............. इति शान्तिः ॥
॥ इति ब्रह्मबिन्दूपनिषत्समाप्ता ॥

॥ ब्रह्मविद्योपनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें ब्रह्म की प्राप्ति के उपाय और उसके स्वरूप का
विशद विवेचन किया गया है। सर्वप्रथम ब्रह्मविद्या के रहस्यभूत प्रणव ब्रह्म का उल्लेख करते हुए प्रणव की
चार मात्राओं की विवेचना है। जीव का स्वरूप, बन्ध-मोक्ष का कारण, हंस विद्या द्वारा परमेश्वर की प्राप्ति,
सकल और निष्कल ब्रह्म का स्वरूप, केवल शास्त्रीय ज्ञान एवं आचरण से पाप-पुण्य की प्राप्ति, प्रणव-हंस
का अनुसन्धान ही प्रत्यक्ष यजन, हंस-मंत्र के अभ्यास से समाधि की प्राप्ति, हंस योग का अभ्यास क्रम तथा
हंस योगी द्वारा आत्मा के स्वरूप का चिन्तन इत्यादि विषयों का क्रमशः विवेचन किया गया है। ये सभी विषय
'ब्रह्म' के तात्त्विक स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, इसलिए इस उपनिषद् की 'ब्रह्मविद्या' यह संज्ञा सार्थक ही है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु ............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य अवधूतोपनिषद् )
अथ ब्रह्मविद्योपनिषदुच्यते ।
प्रसादाद्ब्रह्मणस्तस्य विष्णोरद्भुतकर्मणः। रहस्यं ब्रह्मविद्याया ध्रुवाग्निं संप्रचक्षते ॥ १ ॥
अब 'ब्रह्मविद्या' नामक उपनिषद् का वर्णन करते हैं-अद्भुत एवं श्रेष्ठ कर्म करने वाले विष्णु रूप
परब्रह्म की कृपा से ध्रुवाग्नि (अटल अग्नि या ज्ञान) के स्वरूप वाली ब्रह्मविद्या का रहस्य बताया जाता है ॥१ ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म यदुक्तं ब्रह्मवादिभिः। शरीरं तस्य वक्ष्यामि स्थानं कालत्रयं तथा ॥ २ ॥
जिस प्रकार ब्रह्म को प्रणव के एक अक्षर (ॐ) के रूप में ब्रह्मज्ञानियों ने कहा है। उसी प्रकार उस
(ब्रह्मविद्या) के शरीर, स्थान एवं तीन काल का वर्णन करता हूँ॥ २ ॥
[ ब्रह्म की अक्षरात्मक अभिव्यक्ति ॐ से की जाती है, इसलिए ऋषि यहाँ उसको स्पष्ट कर रहे हैं।]
तत्र देवास्त्रयः प्रोक्ता लोका वेदास्त्रयोऽग्नयः। तिस्रो मात्रार्धमात्रा च त्र्यक्षरस्य शिवस्य तु ॥३॥
उस ओंकार में तीन देवता, तीन लोक, तीन वेद (ऋक्, यजुः, साम) और तीन अग्नयाँ हैं। शिव
स्वरूप इस त्र्यक्षर की तीन और आधी मात्राएँ (अकार, उकार, मकार और अनुस्वार) हैं॥ ३ ॥
ऋग्वेदो गार्हपत्यं च पृथिवी ब्रह्म एव च। अकारस्य शरीरं तु व्याख्यातं ब्रह्मवादिभिः ॥ ४ ॥
ब्रह्मज्ञानियों ने 'अ' कार का शरीर ऋग्वेद, गार्हपत्य अग्नि, पृथिवी तत्त्व और ब्रह्मा को बतलाया है ॥४॥
यजुर्वेदोऽन्तरिक्षं च दक्षिणाग्निस्तथैव च। विष्णुश्च भगवान्देव उकारः परिकीर्तितः ॥ ५ ॥
'उ' कार का शरीर यजुर्वेद, दक्षिणाग्नि, आकाशतत्त्व तथा भगवान् विष्णु को बताया है॥ ५॥
सामवेदस्तथा द्यौश्चाहवनीयस्तथैव च। ईश्वरः परमो देवो मकारः परिकीर्तितः ॥ ६ ॥
'म' कार का शरीर सामवेद, आहवनीय अग्नि, द्युलोक, ईश्वर और परमदेव को कहा गया है॥ ६ ॥
सूर्यमण्डलमध्येऽथ ह्यकारः शङ्खमध्यगः। उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः ॥ ७ ॥
मकारस्त्वग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः। तिस्रो मात्रास्तथा ज्ञेयाः सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥८ ॥
शंख के मध्य भाग की तरह 'अ' कार सूर्य मण्डल के मध्य में प्रतिष्ठित है और चन्द्रमा के सदृश 'उ'
कार उसी चन्द्र मण्डल में स्थित है। निर्धूम (धूम रहित) अग्नि और विद्युत् में अग्नि सदृश 'म'कार प्रतिष्ठित
है। इस तरह से तीन मात्राओं को सूर्य, चन्द्र, अग्नि के रूप में जानना चाहिए ॥ ७-८ ॥

२१४ ब्रह्मविद्योपनिषद्
शिखा तु दीपसंकाशा तस्मिन्नुपरि वर्तते। अर्धमात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता ॥ ९ ॥
जिस तरह से दीपक की शिखा (लौ) ऊपर की ओर रहती है, इसी तरह से प्रणव के ऊपर की
अर्द्धमात्रा की स्थिति को जानना चाहिए॥ ९॥
[दीपक की लौ सदा ऊर्ध्वमुखी होती है। अनुस्वार नासिका मूल-मस्तिष्क के उच्च भाग में गुंजरित होता है। इस
मात्रा के कारण अ, उ, म् का संयुक्त स्वर ऊर्ध्वोन्मुख हो उठता है, इसलिए इसे ज्योति के अनुरूप कहा गया है।]
पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखा सा दृश्यते परा। सा नाडी सूर्यसंकाशा सूर्य भित्त्वा तथा परा ॥ १०
द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाडीं भित्त्वा च मूर्धनि। वरदः सर्वभूतानां सर्व व्याप्येव तिष्ठति ॥ ११ ॥
वह शिखा (लौ) पद्म सूत्र के सदृश दृष्टिगोचर होती है। सूर्य सदृश वह नाड़ी सूर्य का भेदन करके
तथा बहत्तर हजार नाड़ियों का भेदन करके मूर्धा में प्रतिष्ठित होने वाली, सभी प्राणियों को वरदान प्रदान करने
वाली एवं सबको व्याप्त करके स्थित रहने वाली है॥ १०-११॥
कांस्यघण्टानिनादस्तु यथा लीयति शान्तये। ओङ्कारस्तु तथा योज्यः शान्तये सर्वमिच्छता ॥१२
काँस्य (ताँबा तथा टीन से मिलकर बनी) धातु निर्मित घण्टे का शब्द जिस प्रकार शान्ति प्रदान करता
हुआ विलीन हो जाता है, उसी प्रकार ॐ कार की साधना द्वारा सभी तरह की इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं ॥१२॥
यस्मिन्विलीयते शब्दस्तत्परं ब्रह्म गीयते। धियं हि लीयते ब्रह्म सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १३॥
जिस (तत्त्व) में शब्द विलीन हो जाता है, उसे परब्रह्म कहा गया है। जो बुद्धि ब्रह्म में विलीन हो जाती
है, वह अमृत स्वरूप-ब्रह्म स्वरूप कही गई है॥ १३॥
वायुस्तेजस्तथाकाशस्त्रिविधो जीवसंज्ञकः। स जीवः प्राण इत्युक्तो वालाग्रशतकल्पितः ॥१४॥
वायु, तेज तथा आकाश इन तीनों में जीव की उपमा दी जाती है। इस जीव का प्रमाण (आकार)
बाल की नोक का सौवाँ भाग (अति सूक्ष्म) कल्पित किया गया है॥ १४॥
नाभिस्थाने स्थितं विश्वं शुद्धतत्त्वं सुनिर्मलम्। आदित्यमिव दीप्यन्तं रश्मिभिश्चाखिलं शिवम्॥
वह (जीव) विश्व (संज्ञक), शुद्ध तत्त्व, निर्मल स्वरूप नाभि प्रदेश (नाभिक-न्यूक्लियस) में प्रतिष्ठित
है। वह सूर्य के सदृश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करने वाला और कल्याणकारी है॥ १५॥
सकारं च हकारं च जीवो जपति सर्वदा। नाभिरन्ध्राद्विनिष्क्रान्तं विषयव्याप्तिवर्जितम् ॥ १६ ॥
जीव (श्वासोच्छ्वास के रूप में) 'स' कार और 'ह' कार (सोऽहं का जप) सर्वदा करता है, इस के
प्रभाव से वह जीव नाभिरंध्र से उत्क्रमण करता रहता है और उसे किसी प्रकार के विषय व्याप्त नहीं करते॥
तेनेदं निष्कलं विद्यात्क्षीरात्सर्पिर्यथा तथा। कारणेनात्मना युक्तः प्राणायामैश्च पञ्चभिः ॥१७॥
दुग्ध से (मथकर निकाले गये) घृत की भाँति उस निष्कल (कला रहित), सबके कारण रूप आत्म
तत्त्व को प्राण के पाँच आयामों द्वारा जाना जाता है। (देह के पाँचों तत्त्वों में प्राण तत्त्व प्रवाहित होते हैं। इन
पाँचों में प्रवाहित प्राण के पाँच आयाम माने गये हैं) ॥ १७॥
चतुष्कलासमायुक्तो भ्राम्यते च हृदि स्थितः। गोलकस्तु यथा देहे क्षीरदण्डेन वाऽहतः ॥१८॥
जिस प्रकार मथने वाले दण्ड से दुग्ध को मथा जाता है, उसी प्रकार चार कलाओं से युक्त हृदय में
स्थित प्राण तत्त्व को (श्वास-प्रश्वास को) शरीर में भ्रमण कराया जाता है॥ १८॥
एतस्मिन्वसते शीघ्रंमविश्रान्तं महाखगः। यावन्निःश्वसितो जीवस्तावन्निष्कलतं गतः॥१९॥
इस (शरीर) में शीघ्रगामी महापक्षी (खग रूपी जीव) विश्राम न करता हुआ निवास करता है। जब
श्वास रुक जाता है, तब जीव निष्कल (कला रहित) हो जाता है॥ १९॥

मन्त्र ३२ २१५
[ ऋषि ने हृदय को चार कलाओं-विभागों वाला कहा है। वर्तमान शरीर विज्ञानी भी इसे बायें एवं दायें ऑरिकल
तथा बायें एवं दायें वेन्ट्रिक इन चार भागों में ही बँटा हुआ मानते हैं। ]
नभस्थं निष्कलं ध्यात्वा मुच्यते भवबन्धनात्। अनाहतध्वनियुतं हंसं यो वेद हृद्गतम् ॥ २० ॥
स्वप्रकाशचिदानन्दं स हंस इति गीयते। रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भकेन स्थितः सुधीः ॥ २१ ॥
नाभिकन्दे समौ कृत्वा प्राणापानौ समाहितः। मस्तकस्थामृतास्वादं पीत्वा ध्यानेन सादरम्॥२२
दीपाकारं महादेवं ज्वलन्तं नाभिमध्यमे। अभिषिच्यामृतेनैव हंसहंसेति यो जपेत्॥ २३॥
जरामरणरोगादि न तस्य भुवि विद्यते। एवं दिने दिने कुर्यादणिमादिविभूतये ॥ २४ ॥
आकाश में स्थित निष्कल तत्त्व का चिन्तन करता हुआ, वह भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। जो पुरुष
हृदय में स्थित इस अनाहत ध्वनि युक्त, प्रकाशयुक्त, चिदानन्द 'हंस' को जानता है, वह हंस कहा जाता है। जो
ज्ञानी पुरुष रेचक और पूरक को त्याग करके कुम्भक में स्थित होकर प्राण एवं अपान को एक करके मस्तक
में प्रतिष्ठित अमृत को ध्यानपूर्वक आदर सहित पीता है तथा जो नाभि के मध्य में दीपक की तरह सुप्रकाशित
महादेव पर अमृत का सिंचन करता हुआ 'हंस-हंस' का जप करता है, उसे पृथ्‍वी पर निवास करते हुए जरा,
मरण, रोग आदि विकार नहीं होते तथा वह अणिमादि सिद्धियों-विभूतियों का अधिकारी हो जाता है ॥२०-२४
[ सोऽहं को उलटने पर हंसः बनता है। हंस उस प्राण रूप जीव को कहा गया है। वह हंस इस परमात्म तत्त्व को
लक्ष्य करके 'सोऽहं' मैं वही हूँ यह भाव करता है, तो वह पदार्थगत विकारों से प्रभावित नहीं होता ]
ईश्वरत्वमवाप्नोति सदाभ्यासरतः पुमान्। बहवो नैकमार्गेण प्राप्ता नित्यत्वमागताः ॥ २५ ॥
जो ज्ञानी पुरुष सदा ही इस (ब्रह्मविद्या) के अभ्यास में लगा रहता है, उसे ईश्वरत्व की प्राप्ति हो जाती
है। अनेक पुरुष इसी एक ही पथ के द्वारा नित्य पद को प्राप्त कर चुके हैं ॥ २५ ॥
हंसविद्यामृते लोके नास्ति नित्यत्वसाधनम्। यो ददाति महाविद्यां हंसाख्यां पारमेश्वरीम्॥२६॥
तस्य दास्यं सदा कुर्यात्प्रज्ञया परया सह। शुभं वाऽशुभमन्यद्वा यदुक्तं गुरुणा भुवि ॥ २७॥
तत्कुर्यादविचारेण शिष्यः संतोषसंयुतः। हंसविद्यामिमां लब्ध्वा गुरुशुश्रूषया नरः ॥ २८॥
हंस रूपी विद्यामृत के सदृश नित्यत्व का इस जगत् में और कोई साधन नहीं है। जो ज्ञानी मनुष्य इस
हंस नाम की परम पावन परमेश्वरी महाविद्या को प्रदान करता है, उसकी सर्वदा ज्ञानपूर्वक प्रजा के सहित सेवा
करनी चाहिए। गुरु जो कुछ शुभ या अशुभ आदेश दे,उसका पालन शिष्य को बिना कुछ विचार किये सन्तोष
वृत्ति से सतत करना चाहिए। इस हंस विद्या को गुरु से प्राप्त करके मनुष्य सदा ही गुरु की शुश्रूषा करे ॥
आत्मानमात्मना साक्षाद्ब्रह्म बुद्ध्वा सुनिश्चलम्। देहजात्यादिसंबन्धान्वर्णाश्रमसमन्वितान् ॥२९
वेदशास्त्राणि चान्यानि पदपांसुमिव त्यजेत्। गुरुभक्तिं सदा कुर्याच्छ्रेयसे भूयसे नरः ॥ ३०॥
गुरु की सहायता से आत्मा द्वारा आत्मा का साक्षात्कार करके तथा ब्रह्म को निश्चयपूर्वक बुद्धि द्वारा जान
करके वर्णाश्रम, जाति आदि के सम्बन्ध एवं वेद तथा शास्त्रों की बातों को निःसंकोच भाव से त्याग कर, गुरु
की सदा ही सेवा-शुश्रूषा करे। इसी से मनुष्य का सच्चा कल्याण होता है ॥ २९-३० ॥
गुरुरेव हरिः साक्षान्नान्य इत्यब्रवीच्छ्रुतिः ॥ ३१ ॥
गुरु ही स्वयं साक्षात् हरि हैं, कोई और अन्य नहीं, ऐसा श्रुति का कथन है ॥ ३१ ॥
श्रुत्या यदुक्तं परमार्थमेव तत्संशयो नात्र ततः समस्तम्।
श्रुत्या विरोधे न भवेत्प्रमाणं भवेदनर्थाय विना प्रमाणम् ॥ ३२ ॥

२१६ ब्रह्मविद्योपनिषद्
श्रुति का कथन संशयरहित परमार्थ रूप ही है। श्रुति का विरोध होने पर अन्य और कुछ भी प्रमाण नहीं
है। जो बिना प्रमाण होगा, वह अनर्थकारी अर्थात् हानिकारक होगा ॥ ३२ ॥
देहस्थः सकलो ज्ञेयो निष्कलो देहवर्जितः । आप्तोपदेशगम्योऽसौ सर्वतः समवस्थितः ॥ ३३ ॥
देह में स्थित (चेतना) को सकल (कला या विभागयुक्त) तथा देहरहित (परम चेतना) को 'निष्कल'
(कलारहित) जानना चाहिए। आप्त गुरु के उपदेश से ज्ञात होने वाला यह तत्त्व सर्वत्र समभाव से प्रतिष्ठित है ॥
हंसहंसेति यो ब्रूयाद्धंसो ब्रह्मा हरिः शिवः। गुरुवक्त्रात्तु लभ्येत प्रत्यक्षं सर्वतोमुखम् ॥ ३४ ॥
जो ज्ञानी पुरुष हंस-हंस बोलता (सोऽहं साधनारत रहता) है, वह ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव का कल्याणकारी
रूप है। वह गुरु के उपदेश से सर्वतोमुख वाले (सर्वत्र व्याप्त) ब्रह्म को जानने में समर्थ हो सकता है ॥ ३४ ॥
तिलेषु च यथा तैलं पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरेऽस्मिन्स बाह्याभ्यन्तरे तथा ॥ ३५ ॥
जिस प्रकार तिलों में तैल एवं पुष्पों में गंध विद्यमान रहता है, उसी प्रकार पुरुष के इस शरीर में बाहर-
भीतर वही ब्रह्म विद्यमान रहता है ॥ ३५ ॥
उल्काहस्तो यथालोके द्रव्यमालोक्य तां त्यजेत् । ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य पश्चाज्ज्ञानं परित्यजेत् ॥३६
जिस प्रकार मशाल के प्रकाश से द्रव्य (वस्तु) को देख करके मशाल का परित्याग कर दिया जाता है,
उसी प्रकार ज्ञान के माध्यम से ज्ञातव्य विषय की प्राप्ति हो जाने पर ज्ञान का परित्याग कर दिया जाता है ॥ ३६ ॥
पुष्पवत्सकलं विद्याद्गन्धस्तस्य तु निष्कलः। वृक्षस्तु सकलं विद्याच्छाया तस्य तु निष्कला ॥३७
'सकल' अर्थात् कलायुक्त को पुष्प की भाँति एवं उसकी गंध को 'निष्कल' (कलारहित) की भाँति
माने अथवा 'सकल' वृक्ष के सदृश है और उसकी छाया निष्कल (कलारहित) है ॥ ३७ ॥
निष्कलः सकलो भावः सर्वत्रैव व्यवस्थितः । उपायः सकलस्तद्वदुपेयश्चैव निष्कलः ॥ ३८ ॥
(ऊपर कहे अनुसार) निष्कल एवं सकल भाव सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। कला सम्पन्न वस्तु उपाय या
साधन है तथा उपेय या साध्य (ब्रह्म) कलारहित है ॥ ३८ ॥
सकले सकलो भावो निष्कले निष्कलस्तथा । एकमात्रो द्विमात्रश्च त्रिमात्रश्चैव भेदतः ॥३९ ॥
अर्धमात्रा परा ज्ञेया तत ऊर्ध्वं परत्परम्। पञ्चधा पञ्चदैवत्यं सकलं परिपठ्यते ॥ ४० ॥
सकल में कलायुक्त भाव तथा निष्कल (अखण्ड-निर्विकार) में निष्कल भाव रहता है। (वह सकल)
एक मात्रा, दो मात्रा एवं तीन मात्रा के भेद वाला अर्धमात्रा को पर मानना चाहिए, उसके ऊपर परात्पर है। (इस
प्रकार) सकल पाँच दैवत वाला पाँच प्रकार का (पंच प्राण एवं पंचभूतात्मक) जानना चाहिए ॥ ३९-४० ॥
ब्रह्मणो हृदयस्थानं कण्ठे विष्णुः समाश्रितः । तालुमध्ये स्थितो रुद्रो ललाटस्थो महेश्वरः ॥४१
ब्रह्मा का स्थान हृदय में है, विष्णु कण्ठ में निवास करते हैं, तालु में भगवान् रुद्र तथा ललाट (मस्तक)
में महेश्वर स्थित हैं ॥ ४१ ॥
नासाग्रे अच्युतं विद्यात्तस्यान्ते तु परं पदम् । परत्वान्तु परं नास्तीत्येवं शास्त्रस्य निर्णयः ॥४२ ॥
नासिका के अग्रभाग में अच्युत (सदाशिव) तथा उसके अन्तिम भाग (भ्रूमध्य) में परम पद को
प्रतिष्ठित जानना चाहिए। (उस) पर (श्रेष्ठ) से पर (श्रेष्ठ) और कुछ भी नहीं है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है ॥
देहातीतं तु तं विद्यान्नासाग्रे द्वादशाङ्गुलम् । तदन्तं तं विजानीयात्तत्रस्थो व्यापयेत्प्रभुः ॥ ४३ ॥
उस देहातीत को नासिका के अग्र भाग से बारह अंगुल ऊपर जानना चाहिए तथा उसके अन्तिम भाग
(सहस्रार चक्र) में व्यापक प्रभु को स्थित जानना चाहिए ॥ ४३ ॥

मन्त्र ५६ २१७
मनोऽप्यन्यत्र निक्षिप्तं चक्षुरन्यत्र पातितम्। तथापि योगिनां योगो ह्यविच्छिन्नः प्रवर्तते ॥४४॥
मन चाहे इधर-उधर चला जाये और चाहे नेत्र अन्यत्र ही देखते रहें, तब भी योगियों का योग
अविच्छिन्न भाव से चलता रहता है ॥४४॥
एतत्तु परमं गुह्यमेतत्तु परमं शुभम्। नातः परतरं किंचिन्नातः परतरं शुभम् ॥४५॥
यह सबसे गूढ़ रहस्य है, यही सर्वाधिक श्रेष्ठ है, इससे बढ़कर तथा इससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है ॥४५
शुद्धज्ञानामृतं प्राप्य परमाक्षरनिर्णयम्। गुह्याद्गुह्यतमं गोप्यं ग्रहणीयं प्रयत्नतः ॥४६॥
शुद्ध ज्ञानामृत को प्राप्त करके परम अक्षर तत्त्व का निर्णय करना चाहिए। यह गुह्य से गुह्य एवं गोपनीय
है, जो प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करने योग्य है ॥४६॥
नापुत्राय प्रदातव्यं नाशिष्याय कदाचन । गुरुदेवाय भक्ताय नित्यं भक्तिपराय च ॥४७॥
प्रदातव्यमिदं शास्त्रं नेतरेभ्यः प्रदापयेत् । दाताऽस्य नरकं याति सिध्यते न कदाचन ॥४८॥
यह ब्रह्मविद्या न तो अपुत्र को देनी चाहिए और न ही अशिष्य को कभी देनी चाहिए। यह विद्या उसी
को देनी चाहिए, जो गुरु का सच्चा भक्त हो। सदा नित्य भक्ति परायण रहे, इस शास्त्र विद्या को किसी अन्य
को नहीं देना चाहिए। यदि कोई देगा भी, तो वह देने वाला नरक को जायेगा और सिद्धि भी नहीं प्राप्त होगी ॥
गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । यत्र तत्र स्थितो ज्ञानी परमाक्षरवित्सदा ॥ ४९ ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी कोई भी हो एवं कहीं भी निवास करता हो, परम अक्षर तत्त्व
को जानने वाला सर्वदा ज्ञानी ही होता है ॥४९॥
विषयी विषयासक्तो याति देहान्तरे शुभम् । ज्ञानादेवाश्य शास्त्रस्य सर्वावस्थोऽपि मानवः ॥५०
यदि कोई मनुष्य विषय-भोगी, विषयों में आसक्त रहने वाला हो, तब भी वह इस शास्त्र के ज्ञान से
देहान्तर (मृत्यु) के पश्चात् शुभ गति को प्राप्त हो जाता है ॥ ५० ॥
ब्रह्महत्याश्वमेधाद्यैः पुण्यपापैनं लिप्यते। चोदको बोधकश्चैव मोक्षदश्च परः स्मृतः ॥ ५१ ॥
इत्येषां त्रिविधो ज्ञेय आचार्यस्तु महीतले । चोदको दर्शयेन्मार्गं बोधकः स्थानमाचरेत् ॥५२॥
मोक्षदस्तु परं तत्त्वं यज्ज्ञात्वा परमश्रुते। प्रत्यक्षयजनं देहे संक्षेपाच्छृणु गौतम ॥५३॥
जो ब्रह्महत्या के पाप तथा अश्वमेधादि के पुण्य में लिप्त नहीं रहते हैं, ऐसे श्रेष्ठ ज्ञानी प्रेरक, बोधक एवं
मोक्षदाता माने गये हैं। संसार में आचार्य इन्हीं तीन श्रेणियों के कहे गये हैं। प्रेरक मार्ग दिखलाता है, बोधक-
यथार्थ बोध (ज्ञान का आचरण) कराता है, मोक्षप्रदाता-परम श्रेष्ठ तत्त्व प्रदान करता है, जिसे जानकर
परमात्मा की प्राप्ति की जा सकती है। हे गौतम! अब तुम शरीर में यजन के सन्दर्भ में श्रवण करो ॥५१-५३॥
तेनेष्ट्वा स नरो याति शाश्वतं पदमव्ययम् । स्वयमेव तु संपश्येद्देहे बिन्दुं च निष्कलम् ॥ ५४ ॥
इस (कृत्य) के करने से मनुष्य शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है तथा स्वयं अपने शरीर (देह)
के अन्दर ही निष्कल (कलारहित) और बिन्दु को देख लेता है ॥५४॥
अयने द्वे च विषुवे सदा पश्यति मार्गवित् । कृत्वा यामं पुरा वत्स रेचपूरककुम्भकान् ॥ ५५ ॥
दोनों अयनों के सदृश दिन-रात्रि के एक-एक प्रहर तक रेचक, पूरक तथा कुम्भक प्राणायाम करे ॥५५॥
पूर्वं चोभयमुच्चार्य अर्चयेत्तु यथाक्रमम् । नमस्कारेण योगेन मुद्रयारभ्य चार्चयेत् ॥ ५६ ॥
सर्वप्रथम दोनों (ॐ तथा हंस) का उच्चारण करके यथाक्रमानुसार पूजन सम्पन्न करे। (हंसः, सोऽहम्-
इस) नमस्कार योग के द्वारा तथा (शाम्भवी, खेचरी आदि) मुद्राओं के माध्यम से अर्चन-पूजन करे ॥ ५६ ॥

२१८ ब्रह्मविद्योपनिषद्
सूर्यस्य ग्रहणं वत्स प्रत्यक्षयजनं स्मृतम्। ज्ञानात्सायुज्यमेवोक्तं तोये तोयं यथा तथा ॥५७॥
हे वत्स ! सूर्य का (पूजन हेतु) ग्रहण प्रत्यक्ष यजन (सोऽहम् साधना रूप में) कहा गया है। जिस प्रकार
जल में जल होता है, उसी प्रकार से सायुज्यपद सद्ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त होता है॥५७॥
एते गुणाः प्रवर्तन्ते योगाभ्यासकृतश्रमैः। तस्माद्योगं समादाय सर्वदुःखबहिष्कृतः ॥५८॥
योग के अभ्यास में जो श्रम किया जाता है, उसमें इतने गुण हैं कि इस क्रिया द्वारा उद्योगपूर्वक सभी
दुःखों को दूर करने की सतत चेष्टा करनी चाहिए॥५८॥
योगध्यानं सदा कृत्वा ज्ञानं तन्मयतां व्रजेत्। ज्ञानात्स्वरूपं परमं हंसमन्त्रं समुच्चरेत् ॥५९॥
सदा ही इस (ब्रह्मविद्या) के मन्त्र का जप करते हुए योग रूपी चिन्तन के द्वारा तन्मयता को प्राप्त करना
चाहिए। ज्ञान के माध्यम से ही (ब्रह्म का) परम स्वरूप (हंस मन्त्र) प्राप्त किया जाता है॥५९॥
प्राणिनां देहमध्ये तु स्थितो हंसः सदाऽच्युतः। हंस एव परं सत्यं हंस एव तु शक्तिकम्॥६०॥
प्राणियों के शरीर में अच्युतरूपी हंस (चेतन जीव) सदा ही प्रतिष्ठित रहता है। हंस ही परम सत्य है
तथा हंस ही शक्ति का स्वरूप है॥६०॥
हंस एव परं वाक्यं हंस एव तु वैदिकम्। हंस एव परो रुद्रो हंस एव परात्परम्॥६१॥
हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है। हंस ही परम रुद्र है और हंस ही परमात्मा है॥६१॥
सर्वदेवस्य मध्यस्थो हंस एव महेश्वरः। पृथिव्यादिशिवान्तं तु अकाराद्याश्च वर्णकाः ॥६२॥
कूटान्ता हंस एव स्यान्मातृकेति व्यवस्थिताः। मातृकारहितं मन्त्रमादिशन्ते न कुत्रचित् ॥६३॥
सभी देवताओं के मध्य में हंस ही परमेश्वर है। पृथिवी से लेकर भगवान् शिव तक तथा 'अकार' से
लेकर 'क्ष' तक हंस ही वर्ण-मात्राओं की तरह से स्थित है। मातृका (वर्ण) विहीन मन्त्र का उपदेश कहीं भी
नहीं दिया जाता है॥६२-६३॥
हंसज्योतिरनूपम्यं देव मध्ये व्यवस्थितम्। दक्षिणामुखमाश्रित्य ज्ञानमुद्रां प्रकल्पयेत् ॥६४॥
सदा समाधिं कुर्वीत हंसमन्त्रमनुस्मरन्। निर्मलस्फटिकाकारं दिव्यरूपमनुत्तमम् ॥६५॥
हंस की अनुपम ज्योति देवताओं के मध्य में प्रतिष्ठित है। दक्षिणामुख (भगवान् शिव) का आश्रय
लेकर ज्ञान मुद्रा करे तथा सर्वदा समाधि अवस्था में हंस का चिन्तन करता रहे और निर्मल स्फटिक के समान
उत्तम दिव्य रूप का ध्यान करे॥६४-६५॥
मध्यदेशे परं हंसं ज्ञानमुद्रात्मरूपकम्। प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः ॥६६॥
पञ्चकर्मेन्द्रियैर्युक्ताः क्रियाशक्तिबलोद्यताः। नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥६७॥
पञ्चज्ञानेन्द्रियैर्युक्ता ज्ञानशक्तिबलोद्यताः। पावकः शक्तिमध्ये तु नाभिचक्रे रविः स्थितः॥६८
मध्य देश में ज्ञान-मुद्रा के स्वरूप वाले परम हंस का सदैव ध्यान करना चाहिए। प्राण, अपान, समान,
उदान, व्यान-ये पाँच वायु (प्राण) तथा पञ्च कर्मेन्द्रियों से सम्पन्न क्रियाशक्ति अधिक बलवती होती है। नाग,
कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय और पञ्च ज्ञानेन्द्रियों से सम्पन्न ज्ञानशक्ति अत्यन्त बलवती होती है। (कुण्डलिनी)
शक्ति के बीच में अग्नि और नाभिचक्र में रवि प्रतिष्ठित रहता है॥६६-६८॥
बन्धमुद्रा कृता येन नासाग्रे तु स्वलोचने। अकारे वह्निरित्याहुरुकारे हृदि संस्थितः॥६९॥
मकारे च ध्रुवोर्मध्ये प्राणशक्त्या प्रबोधयेत्। ब्रह्मग्रन्थिरकारे च विष्णुग्रन्थिर्हृदि स्थितः ॥७०

मन्त्र ८१ २१९
सर्वप्रथम बन्ध एवं मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए। नासाग्र एवं अपने दोनों नेत्रों में 'अ' कार अग्नि,
हृदय में 'उ' कार अग्नि और भृकुटियों के मध्य में 'म' कार अग्नि प्रतिष्ठित कही गयी है। इनमें प्राणशक्ति को
संयुक्त करे। ब्रह्मग्रन्थि ॐकार (नासाग्र एवं नेत्र) में और विष्णुग्रन्थि हृदय में स्थित कही गयी है ॥६९-७०॥
रुद्रग्रन्थिर्भ्रुवोर्मध्ये भिद्यतेऽक्षरवायुना। अकारे संस्थितो ब्रह्मा उकारे विष्णुरास्थितः ॥७१॥
मकारे संस्थितो रुद्रस्ततोऽस्यान्तः परात्परः। कण्ठं संकुच्य नाड्यादौ स्तम्भिते येन शक्तितः॥
रसना पीड्यमानेयं षोडशी वोर्ध्वगामिनी। त्रिकूटं त्रिविधा चैव गोलाखं निखरं तथा ॥७३॥
त्रिशङ्खवज्रमोङ्कारमूर्ध्वनालं भ्रुवोर्मुखम्। कुण्डलीं चालयन्प्राणान्भेदयन्शशिमण्डलम् ॥७४॥
रुद्र ग्रन्थि भृकुटियों के मध्य में स्थित है। यह (तीनों) ग्रन्थि अक्षर वायु (हंस ज्ञान) से भेदन की जाती
है। 'अ' कार में ब्रह्मा का, 'उकार' में विष्णु का तथा 'म' कार में रुद्र का स्थान बताया गया है, उसके अन्त में
परात्पर ब्रह्म है। कण्ठ का संकोचन (जालन्धरबन्ध) करके आदि शक्ति (कुण्डलिनी शक्ति) को स्तम्भित
करे,तत्पश्चात् जिह्वा को दबाकर सोलह आधार वाली, ऊर्ध्वगामिनी, त्रिकूट (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना तीनों के
मिलन स्थल) वाली, तीन प्रकार वाली, ब्रह्मरन्ध्र को जानने वाली अति सूक्ष्म सुषुम्ना नाड़ी को एवं त्रिशंख
(सुख, दुःख, सुख-दुःख तीनों को खाने वाले), वज्र (अयोगी द्वारा दुर्भेद्य), ओंकार युक्त, ऊर्ध्वनाल, भृकुटियों
की ओर गमन करने वाली कुण्डली शक्ति तथा प्राणों को चालित करके शशि मण्डल का भेदन करे ॥७४॥
साधयन्वज्रकुम्भानि नव द्वाराणि बन्धयेत्। सुमनः पवनारूढः सरागो निर्गुणस्तथा ॥ ७५ ॥
नव द्वारों को बन्द करके वज्र कुम्भक (उज्जायी, शीतली आदि प्राणायाम) का साधन करना चाहिए।
मन को प्रसन्न रखकर, सहज स्थिति में निर्गुण होकर पवन पर आरूढ़ (प्राणायाम परायण) होना चाहिए ॥७५॥
ब्रह्मस्थाने तु नादः स्याच्छंखिन्यमृतवर्षिणी। षट्चक्रमण्डलोद्धारं ज्ञानदीपं प्रकाशयेत् ॥ ७६ ॥
इस (ध्यान) से ब्रह्मस्थान में नाद सुनाई पड़ने लगता है तथा शंखिनी नाड़ी से अमृत की वर्षा होने
लगती है और षट्चक्र मण्डल का भेदन होने से ज्ञानरूपी दीपक प्रकाश से युक्त हो जाता है ॥ ७६ ॥
सर्वभूतस्थितं देवं सर्वेशं नित्यमर्चयेत्। आत्मरूपं तमालोक्य ज्ञानरूपं निरामयम् ॥ ७७ ॥
समस्त भूत-प्राणियों में प्रतिष्ठित परम देव का सदा ही पूजन करना चाहिए। वे आत्मस्वरूप, ज्ञानस्वरूप
तथा व्याधि से रहित हैं ॥ ७७ ॥
दृश्यन्तं दिव्यरूपेण सर्वव्यापी निरञ्जनः । हंस हंस वदेद्वाक्यं प्राणिनां देहमाश्रितः ।
स प्राणापानयोर्ग्रन्थिर्जपत्यभिधीयते ॥ ७८ ॥ सहस्रमेकं द्वययुतं षट्शतं चैव सर्वदा ।
उच्चरन्थितो हंसः सोऽहमित्यभिधीयते ॥ ७९ ॥
उन सर्वव्यापी निरञ्जन के दिव्य रूप का दर्शन करके हंस-हंस का निरन्तर जप करते रहना चाहिए।
प्राणियों की देह (शरीर) में स्थित प्राण और अपान की ग्रन्थि को अजपा जप कहा जाता है, इससे नित्य प्रति
इक्कीस हजार छः सौ बार जप करता हुआ हंस 'सोऽहम्' के रूप में परिणत हो जाता है ॥ ७८-७९ ॥
पूर्वभागे ह्यधोलिङ्गं शिखिन्यां चैव पश्चिमम्। ज्योतिर्लिङ्गं भ्रुवोर्मध्ये नित्यं ध्यायेत्सदा यतिः ॥
साधक को सदा ही कुण्डलिनी के पूर्व में अधोलिङ्ग का, शिखा स्थान में पश्चिमलिङ्ग का, भृकुटियों
के मध्य में ज्योतिर्लिङ्ग का ध्यान करना चाहिए ॥ ८० ॥
अच्युतोऽहमचिन्त्योऽहमतर्क्योऽहमजोऽस्म्यहम्। अव्रणोऽहमकायोऽहमनङ्गोऽस्म्यभयोऽस्म्यहम् ॥
मैं अच्युत हूँ, मैं अचिन्त्य अर्थात् चिन्तन से परे हूँ, मैं तर्क की सीमा से बाहर हूँ, मैं अजन्मा हूँ, मैं

२२० ब्रह्मविद्योपनिषद्
व्रणरहित (स्वस्थ) हूँ, मैं काया से विहीन हूँ, मैं अनङ्ग (अंगरहित) एवं भय से रहित हूँ॥ ८१ ॥
अशब्दोऽहमरूपोऽहमस्पर्शोऽस्म्यहमद्वयः। अरसोऽहमगन्धोऽहमनादिरमृतोऽस्म्यहम् ॥८२॥
मैं शब्दरहित हूँ, रूप रहित (आकाररहित), स्पर्श से परे एवं अद्वय हूँ। मैं रस से विहीन (रसरहित)
हूँ, गन्ध से रहित तथा अनादि अमृत का रूप हूँ॥ ८२ ॥
अक्षयोऽहमलिङ्गोऽहमजरोऽस्म्यकलोऽस्म्यहम्।
अप्राणोऽहममूकोऽहमचिन्त्योऽस्म्यकृतोऽस्म्यहम् ॥ ८३ ॥
मैं अक्षय (क्षयरहित) हूँ, लिङ्गरहित हूँ, अजर एवं निष्कल अर्थात् कलारहित हूँ। मैं अमूक (वाक्
शक्तियुक्त) एवं प्राणरहित हूँ, अचिन्त्य (चिन्तन से परे) तथा मैं ही क्रियारहित हूँ॥ ८३ ॥
अन्तर्याम्यहमग्राह्योऽनिर्देश्योऽहमलक्षणः। अगोत्रोऽहमगात्रोऽहमचक्षुष्कोऽस्म्यवागहम् ॥ ८४ ॥
मैं अन्तर्यामी हूँ, अग्राह्य अर्थात् पकड़ने में न आने वाला हूँ, मैं निर्देशरहित एवं लक्षणरहित हूँ। मैं कुल,
गोत्र एवं शरीररहित हूँ, मैं नेत्रेन्द्रिय रहित हूँ तथा वागिन्द्रिय रहित भी हूँ॥ ८४ ॥
अदृश्योऽहमवर्णोऽहमखण्डोऽस्म्यहमद्भुतः। अश्रुतोऽहमदृष्टोऽहमन्वेष्योऽमरोऽस्म्यहम्॥८५॥
मैं अदृश्य हूँ, अवर्ण हूँ, अखण्ड एवं अद्भुत हूँ। मैं अश्रुत हूँ, अदृष्ट हूँ, अन्वेषण योग्य एवं अमर हूँ॥
अवायुरप्यनाकाशोऽतेजस्कोऽव्यभिचार्यहम्। अमतोऽहमजातोऽहमतिसूक्ष्मोऽविकार्यहम् ॥८६
मैं वायुरहित, आकाश तत्त्व से रहित, तेजो विहीन, व्यभिचार (नियमोल्लंघन) से रहित, अज्ञेय, अजन्मा
(जन्मरहित), सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अविकारी (विकार रहित) हूँ॥ ८६ ॥
अरजस्कोऽतमस्कोऽहमसत्त्वोऽस्म्यगुणोऽस्म्यहम्।
अमायोऽनुभवात्माहमन्योऽविषयोऽस्म्यहम् ॥ ८७॥
मैं सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से रहित हूँ। गुणों से अतीत हूँ, मायारहित, अनुभव स्वरूप हूँ, अनन्य
तथा अविषय अर्थात् विषयरहित हूँ॥ ८७ ॥
अद्वैतोऽहमपूर्णोऽहमबाह्योऽहमनन्तरः। अश्रोत्रोऽहमदीर्घोऽहमव्यक्तोऽहमनामयः ॥८८॥
मैं अद्वैत हूँ, पूर्ण हूँ। मैं न बाहर हूँ और न ही भीतर हूँ, मैं श्रोत्ररहित हूँ, अदीर्घ हूँ, अव्यक्त हूँ और मैं
व्याधिरहित भी हूँ ॥ ८८ ॥
अद्वयानन्दविज्ञानघनोऽस्म्यहमविक्रियः। अनिच्छोऽहमलेपोऽहमकर्तास्म्यहमद्वयः ॥८९॥
मैं अद्वय, आनन्दरूप, विज्ञानघन एवं अविकारी अर्थात् विकार रहित हूँ। मैं इच्छा रहित हूँ, अलेप
(लिप्त न रहने वाला) हूँ। मैं ही अकर्ता तथा अद्वैत भी मैं ही हूँ॥ ८९ ॥
अविद्याकार्यहीनोऽहमवाङ्मनसगोचरः। अनल्पोऽहमशोकोऽहमविकल्पोऽस्म्यविज्वलन् ॥ ९०
मैं अविद्यायुक्त कार्य से रहित हूँ, मैं मन एवं वाणी से अगोचर अर्थात् परे हूँ। मैं अनल्प (अल्परहित)
हूँ, शोकरहित हूँ, विकल्परहित एवं विशिष्ट अग्नि से रहित हूँ॥ ९० ॥
आदिमध्यान्तहीनोऽहमाकाशसदृशोऽस्म्यहम्। आत्मचैतन्यरूपोऽहमहमानन्दचिद्धनः ॥ ९१ ॥
मैं आदि, मध्य एवं अन्त से विहीन हूँ। मैं आकाश के समान हूँ। मैं आत्म चैतन्य रूप हूँ तथा आनन्द
चेतन घन के सदृश हूँ॥ ९१ ॥
आनन्दामृतरूपोऽहमात्मसंस्थोऽहमान्तरः। आत्मकामोऽहमकाशात्परमात्मेश्वरोऽस्म्यहम् ॥ ९२ ॥

मन्त्र १०३ २२१
मैं आनन्द रूप, अमृत स्वरूप हूँ, मैं आत्म-संस्थित हूँ, अन्तर (सभी की अन्तरात्मा) भी मैं ही हूँ।
(मैं) आत्मकाम हूँ तथा आकाश से (अधिक व्यापक) परमात्मा स्वरूप परमेश्वर मैं ही हूँ ॥ ९२ ॥
ईशानोऽस्म्यहमीड्योऽहमहमुत्तमपूरुषः। उत्कृष्टोऽहमुपद्रष्टाऽहमुत्तरतरोऽस्म्यहम् ॥ ९३ ॥
मैं ईशान हूँ, पूजनीय हूँ, उत्तम पुरुष हूँ। मैं उत्कृष्ट हूँ, उपद्रष्टा (साक्षीरूप) हूँ तथा परे से परे हूँ॥ ९३ ॥
केवलोऽहं कविः कर्माध्यक्षोऽहं करणाधिपः। गुहाशयोऽहं गोप्ताहं चक्षुषश्चक्षुरस्म्यहम्॥ ९४ ॥
मैं केवल हूँ, कवि हूँ, कर्माध्यक्ष हूँ। मैं ही कारणों का कारण अर्थात् अधिपति हूँ, मैं गुप्त आशय हूँ,
गुप्त रखने वाला हूँ एवं मैं ही नेत्रों का भी नेत्र हूँ॥ ९५ ॥
चिदानन्दोऽस्म्यहं चेता चिद्घनश्चिन्मयोऽस्म्यहम्।
ज्योतिर्मयोऽस्म्यहं ज्यायाञ्ज्योतिषां ज्योतिरस्म्यहम् ॥ ९५ ॥
मैं चिदानन्द हूँ, चेतना प्रदान करने वाला हूँ, चिद्घन एवं चिन्मय स्वरूप हूँ। मैं ज्योतिर्मय हूँ और
ज्योतियों में सर्वश्रेष्ठ ज्योतिरूप मैं ही हूँ॥ ९५ ॥
तमसः साक्ष्यहं तुर्यतुर्योऽहं तमसः परः। दिव्यो देवोऽस्मि दुर्दर्शो दृष्टाध्यायो ध्रुवोऽस्म्यहम् ॥९६
मैं अन्धकार में साक्ष्य स्वरूप हूँ, तुर्य का भी तुर्य हूँ, अन्धकार से परे हूँ, मैं दिव्य देवस्वरूप हूँ, दुर्दर्श
और दृष्टि का आधार ध्रुव (शाश्वत) हूँ॥ ९६ ॥
नित्योऽहं निरवद्योऽहं निष्क्रियोऽस्मि निरञ्जनः।
निर्मलो निर्विकल्पोऽहं निराख्यातोऽस्मि निश्चलः ॥ ९७ ॥
मैं नित्य हूँ, निर्दोष हूँ, क्रियारहित तथा निरञ्जन हूँ। मैं निर्मल, निर्विकल्प, निराख्यात और निश्चल हूँ॥
निर्विकारो नित्यपूतो निर्गुणो निस्पृहोऽस्म्यहम्। निरिन्द्रियो नियन्ताहं निरपेक्षोऽस्मि निष्कलः ॥
मैं निर्विकार (विकार रहित), नित्यपूत (सदैव पवित्र), निर्गुण, निस्पृह हूँ। मैं इन्द्रियों से रहित,
नियन्ता, निरपेक्ष एवं निष्कल (कलारहित) हूँ॥ ९८ ॥
पुरुषः परमात्माहं पुराणः परमोऽस्म्यहम्। परावरोऽस्म्यहं प्राज्ञः प्रपञ्चोपशमोऽस्म्यहम् ॥ ९९ ॥
मैं परमात्म पुरुष हूँ, परम पुराण हूँ। मैं परावर (ज्ञानसमुद्र) हूँ, प्राज्ञ-प्रपञ्च का शमन करने वाला भी हूँ॥
परामृतोऽस्म्यहं पूर्णः प्रभुरस्मि पुरातनः। पूर्णानन्दैकबोधोऽहं प्रत्यगेकरसोऽस्म्यहम् ॥ १०० ॥
मैं परामृत तथा पुरातन पूर्ण प्रभु हूँ। मैं पूर्णानन्द, एक बोध रूप हूँ तथा प्रत्यग् (अन्तरात्मा) एवं एक -
रस (सर्वदा एक रूप) भी मैं ही हूँ॥ १०० ॥
प्रज्ञातोऽहं प्रशान्तोऽहं प्रकाशः परमेश्वरः । एकदा चिन्त्यमानोऽहं द्वैताद्वैतविलक्षणः ॥ १०१ ॥
मैं प्रज्ञाता (विशेष ज्ञाता) हूँ, मैं प्रशान्त हूँ तथा (मैं ही) प्रकाश स्वरूप परमेश्वर हूँ। द्वैत एवं अद्वैत के
लक्षणों से भिन्न मैं ही एक चिन्तन-मनन करने योग्य हूँ ॥ १०१ ॥
बुद्धोऽहं भूतपालोऽहं भारूपो भगवानहम्। महादेवो महानस्मि महाज्ञेयो महेश्वरः ॥ १०२ ॥
मैं बुद्धि हूँ, मैं ही भूतपाल अर्थात् समस्त प्राणियों का पालन करने वाला हूँ, प्रकाश स्वरूप भगवान् भी
मैं हूँ। महादेव, महाज्ञेय एवं महान् महेश्वर भी मैं ही हूँ॥ १०२ ॥
विमुक्तोऽहं विभुरहं वरेण्यो व्यापकोऽस्म्यहम्। वैश्वानरो वासुदेवो विश्वतश्चक्षुरस्म्यहम् ॥ १०३ ॥
मैं विमुक्त हूँ, विभु हूँ, वरण करने योग्य हूँ तथा मैं ही व्यापक हूँ। मैं श्रेष्ठ वैश्वानर एवं वासुदेव हूँ तथा
सम्पूर्ण विश्व का चक्षु रूप भी मैं ही हूँ॥ १०३ ॥

२२२ ब्रह्मविद्योपनिषद्
विश्वाधिकोऽहं विशदो विष्णुर्विश्वकृदस्म्यहम्।
शुद्धोऽस्मि शुक्लः शान्तोऽस्मि शाश्वतोऽस्मि शिवोऽस्म्यहम् ॥१०४॥
मैं विश्व से अधिक हूँ, मैं विश्व का कर्त्ता विशद विष्णु हूँ, मैं शुद्ध, शुक्ल, शान्त स्वरूप हूँ, शाश्वत तथा
शिव भी मैं हूँ॥१०४॥
सर्वभूतान्तरात्माहमहमस्मि सनातनः। अहं सकृद्विभातोऽस्मि स्वे महिम्नि सदा स्थितः ॥१०५॥
मैं समस्त भूत-प्राणियों का अन्तरात्मा हूँ, मैं नित्य एवं सनातन हूँ। मैं अपनी महिमा में स्थित रहकर
सदैव प्रकाशित होता रहता हूँ॥१०५॥
सर्वान्तरः स्वयंज्योतिः सर्वाधिपतिरस्म्यहम्। सर्वभूताधिवासोऽहं सर्वव्यापी स्वराडहम् ॥१०६
मैं सभी के अन्तःकरण में स्वयं ज्योति रूप में स्थित एवं समस्त प्राणियों का अधिपति हूँ। सभी भूत-
प्राणी मुझमें ही निवास करते हैं, मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ तथा सभी का सम्राट् हूँ॥१०६॥
समस्तसाक्षी सर्वात्मा सर्वभूतगुहाशयः। सर्वेन्द्रियगुणाभासः सर्वेन्द्रियविवर्जितः ॥१०७॥
मैं सभी का साक्षी, सर्वात्मा, सब भूतों का गुह्य आशय हूँ, मैं सब इन्द्रियों के गुणों का प्रकाशक हूँ तथा
समस्त इन्द्रियों से रहित भी हूँ॥१०७॥
स्थानत्रयव्यतीतोऽहं सर्वानुग्राहकोऽस्म्यहम्। सच्चिदानन्दपूर्णात्मा सर्वप्रेमास्पदोऽस्म्यहम् ॥१०८
मैं तीन स्थान (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से अतीत (परे) हूँ, सभी पर अनुग्रह-अनुकम्पा करने वाला हूँ।
मैं सच्चिदानन्द पूर्णात्मा हूँ तथा सभी का प्रेमास्पद हूँ॥१०८॥
सच्चिदानन्दमात्रोऽहं स्वप्रकाशोऽस्मि चिद्घनः। सत्त्वस्वरूपसन्मात्रसिद्धसर्वात्मकोऽस्म्यहम् ॥
मैं सच्चिदानन्द मात्र हूँ एवं स्वयं प्रकाशमान चेतन घनस्वरूप हूँ। मैं सत्य स्वरूप, सन्मात्र (सत्यस्वरूप),
सिद्ध तथा सभी की आत्मा हूँ॥१०९॥
सर्वाधिष्ठानसन्मात्रः सर्वबन्धहरोऽस्म्यहम्।
सर्वग्रासोऽस्म्यहं सर्वद्रष्टा सर्वानुभूरहम् ॥११०॥
एवं यो वेद तत्त्वेन स वै पुरुष उच्यते इत्युपनिषत् ॥
समस्त (प्राणियों का) आधार स्वरूप, सत्य स्वरूप, सभी के बन्धन को हरने (काटने) वाला, सबको
अपना ग्रास बनाने वाला, सभी को देखने वाला और सभी का अनुभव रूप मैं ही हूँ। जो इस प्रकार तत्त्व का
ज्ञाता है, वही पुरुष कहा जाता है, इस प्रकार की यह उपनिषद् (रहस्य) विद्या है॥११०॥
ॐ सह नाववतु .........................इति शान्तिः ॥
॥ इति ब्रह्मविद्योपनिषत्समाप्ता ॥

२२४ ब्रह्मोपनिषद्
हृदय में सभी देवगण स्थित हैं, प्राण भी हृदय में निवास करता है और हृदय में ही प्राण तथा ज्योति भी
प्रतिष्ठित है। इस तरह से हृदय में तीन स्वरूपों में परम ब्रह्म का निवास है। (इस तथ्य को प्रकट करने के
लिए) तीन सूत्रों (धागों) से युक्त 'यज्ञ सूत्र' अर्थात् जनेऊ (यज्ञोपवीत) है, ऐसा उसके रहस्य को समझने
वाले मानते हैं। वह अविनाशी परमब्रह्म चेतना के रूप में हृदय में प्रतिष्ठित है ॥ ४ ॥
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ ५ ॥
(यह) परम पवित्र यज्ञोपवीत सर्वप्रथम प्रजापति (ब्रह्माजी) के साथ ही सहज (देहेन्द्रिय की तरह)
प्रादुर्भूत हुआ। वह दीर्घायुष्य प्रदान करने वाला है। (हे मनुष्य !) ऐसा जान करके तुम उत्तम और शुभ्र
यज्ञोपवीत धारण करो। यह यज्ञोपवीत तुम्हारे लिए बल एवं तेज प्रदान करने वाला (सिद्ध) हो ॥ ५ ॥
सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः । यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ ६ ॥
शिखा के सहित मुण्डन करने के पश्चात् (संन्यास धर्म को ग्रहण करके) ज्ञानी जनों को ब्रह्मसूत्र अर्थात्
यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जिस अविनाशी तत्त्व को परब्रह्म कहा गया है, वही इस सूत्र के रूप
में प्रतिष्ठित है। ऐसा जान करके उसी श्रेष्ठ यज्ञोपवीत को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए ॥ ६ ॥
सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रं नाम परं पदम् । तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारगः ॥ ७ ॥
यज्ञोपवीत यह सूचित करता है (कि अविनाशी शाश्वत परब्रह्म हृदय में ही स्थित है), इस कारण से
उसे 'सूत्र' के नाम से जाना जाता है। यह 'सूत्र' ही परम पद है। इस परम पद रूपी सूत्र को जिस मनुष्य ने
जान लिया, वही ब्राह्मण वेद को जानने में समर्थ अर्थात् पारगामी होता है ॥ ७ ॥
येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शिवान् ॥ ८ ॥
जिस प्रकार सूत्र रूपी धागों में माला के रूप में मणियों के दाने पिरोये जाते हैं, उसी तरह अविनाशी
ब्रह्म में यह सम्पूर्ण जगत् गुँथा हुआ है, इसलिए इसे सूत्र कहा गया है। तत्त्वज्ञानी एवं योग में निष्णात मनुष्यों
को इस सूत्र रूप ब्रह्म को हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए ॥ ८ ॥
बहिःसूत्रं त्यजेद्विद्वानयोगमुत्तममास्थितः ।
ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स चेतनः ।
धारणात्तस्य सूत्रस्य नोच्छिष्टो नाशुचिर्भवेत् ॥ ९ ॥
इस श्रेष्ठ योग रूपी ब्रह्मसूत्र को धारण करने वाला विद्वान् मनुष्य ब्रह्मसूत्र का परित्याग कर दे। ब्रह्म
स्वरूप को जानना ही 'सूत्र' समझना चाहिए। इस 'ब्रह्मसूत्र' को जो भी मनुष्य धारण करता है, वह चैतन्य
स्वरूप है। इस ब्रह्मरूपी सूत्र को धारण करने से व्यक्ति न उच्छिष्ट होता है और न ही अशुद्ध होता है ॥ ९ ॥
सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते वै सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः ॥ १० ॥
इस शाश्वत ज्ञान रूपी यज्ञोपवीत को ग्रहण करने वाले मनुष्यों के हृदय में ब्रह्मरूपी सूत्र स्थित रहता है।
इस प्रकार के ही मनुष्य ब्रह्मरूपी सूत्र के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले होते हैं तथा वे ही व्यक्ति वास्तव
में सच्चे यज्ञोपवीतधारी हैं ॥ १० ॥
ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमुच्यते ॥ ११ ॥
जो मनुष्य ज्ञानरूप शिखा वाले, ज्ञान में ही निष्ठा रखने वाले और ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को धारण करने
वाले हैं, ऐसे उन श्रेष्ठ व्यक्तियों को ज्ञान ही परम पवित्र बना देता है ॥ ११ ॥

॥ ब्रह्मोपानिषद् ॥
यह कृष्णयजुर्वेदीय उपनिषद् है। इसमें कुल २३ मन्त्र हैं, जिसमें ब्रह्म का स्वरूप और उसकी प्राप्ति
का उपाय वर्णित होने से इसका नाम 'ब्रह्मोपनिषद्' पड़ा है।
सर्वप्रथम इसमें चतुष्पाद् ब्रह्म का स्वरूप बताया गया है, तत्पश्चात् परब्रह्म की अक्षरता, ब्रह्म और
निर्वाण की एकरूपता, त्रिवृत्सूत्र (ब्रह्म का तीन रूप-देवगण, प्राण और ज्योति-हृदय में विद्यमान) यज्ञोपवीत
का तात्त्विक स्वरूप, शिखा-यज्ञोपवीत आदि का ज्ञान स्वरूप होना ब्राह्मणत्व के लिए आवश्यक है, इत्यादि
विषय बड़े अच्छे ढंग से प्रतिपादित हैं। अन्त में 'ब्रह्म' की प्राप्ति का उपाय-सत्य एवं तप को बताते हुए सिद्ध
किया गया है कि यह 'आत्मा' ही ब्रह्म है, जैसे दूध में घृत विद्यमान रहता है, उसी तरह सर्वत्र ब्रह्म की सत्ता
विद्यमान है। ऐसा अनुभव करने वाला साधक ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु ...........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद् )
अथास्य पुरुषस्य चत्वारि स्थानानि भवन्ति। नाभिर्हृदयं कण्ठं मूर्धेति। तत्र चतुष्पादं
ब्रह्म विभाति। जागरितं स्वप्नं सुषुप्तं तुरीयमिति। जागरिते ब्रह्मा स्वप्ने विष्णुः सुषुप्तौ रुद्रस्तुरीय-
मक्षरम्। स आदित्यो विष्णुश्चेश्वरश्च स्वयममनस्कमश्रोत्रमपाणिपादं ज्योतिर्विदितम्॥ १॥
इस विराट् पुरुष के शरीर में आत्मा के चार विशेष स्थान-नाभि, हृदय, कण्ठ एवं ब्रह्मरन्ध्र बताये गये
हैं। वहाँ इन चारों क्षेत्रों में चतुर्थ चरण से युक्त ब्रह्म प्रकाशित होता है। ऐसे ही आत्मा की चार अवस्थाएँ-जाग्रत्,
स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय कही गयी हैं। इन अवस्थाओं में से जाग्रत् अवस्था में ब्रह्मा, स्वप्नावस्था में विष्णु,
सुषुप्तावस्था में रुद्र तथा चतुर्थ तुरीयावस्था में अक्षर रूप परमात्मा प्रकाशित होता रहता है। यह आत्म तत्त्व स्वयं
मन एवं हाथ-पैर आदि इन्द्रियों से रहित होते हुए भी प्रकाश युक्त कहा गया है॥ १॥
यत्र लोका न लोका देवा न देवा वेदा न वेदा यज्ञा न यज्ञा माता न माता पिता न पिता
स्नुषा न स्नुषा चाण्डालो न चाण्डालः पौल्कसो न पौल्कसः श्रमणो न श्रमणः तापसो न
तापस इत्येकमेव परं ब्रह्म विभाति निर्वाणम्॥ २॥
यहाँ (आत्मा अर्थात् ब्रह्म में) लोक-लोक के रूप में नहीं है, देव-देवरूप में नहीं है, वेद-वेदरूप में
नहीं है, यज्ञ-यज्ञरूप में नहीं है, माता-माता के रूप में नहीं है, पिता-पितारूप में नहीं है, स्नुषा (पुत्रवधू)-स्नुषा
रूप में नहीं है, चाण्डाल-चाण्डालरूप में नहीं है, पौल्कस (भील)-पौल्कस रूप में नहीं है, श्रमण (संन्यासी)-
श्रमण के रूप में नहीं है, और तपस्वी-तपस्वी के रूप में नहीं है; किन्तु वह ब्रह्म सदैव एक निर्वाण स्वरूप
एवं प्रकाश स्वरूप है॥ २॥
न तत्र देवा ऋषयः पितर ईशते प्रतिबुद्धः सर्वविद्येति ॥ ३ ॥
वहाँ (इस ब्रह्म पर) देवगण, ऋषिगण और पितृगण भी शासन करने में समर्थ नहीं हैं। उस अविनाशी
ब्रह्म को ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है, वह सर्वविद्या के स्वरूप वाला है॥ ३॥
हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
हृदि प्राणश्च ज्योतिश्च त्रिवृत्सूत्रं च तद्विदुः। हृदि चैतन्ये तिष्ठति ॥ ४॥

मन्त्र १९ २२५
अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा। स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केशधारिणः ॥१२
जिस मनुष्य के अग्नि की शिखा की भाँति ज्ञान की शिखा होती है, उनके लिए और दूसरी अन्य शिखा
होती ही नहीं है और वे ही सच्चे अर्थों में शिखा को धारण करने वाले तथा विशेष ज्ञानी कहे जाते हैं। इनके
अतिरिक्त जो अन्य मनुष्य बाह्य केशों की चोटी रखते हैं, वे व्यक्ति शिखा को धारण करने वाले नहीं कहे जा
सकते॥ १२॥
कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके ब्राह्मणादयः।
तैः संधार्यमिदं सूत्रं क्रियाङ्गं तद्वि वै स्मृतम् ॥ १३ ॥
ब्राह्मण आदि जो (वर्ण) वैदिक कर्म के अधिकारी हैं, उन्हीं (मनुष्यों) को ही यह ब्रह्मसूत्र धारण
करना चाहिए, क्योंकि यही इसकी कार्य पद्धति का अनिवार्य अङ्ग कहा गया है॥ १३॥
शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्।
ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः ॥ १४ ॥
जिस (ब्राह्मण) की शिखा एवं यज्ञोपवीत दोनों ही ज्ञानस्वरूप हैं, ऐसे उन (ब्राह्मणों) का ब्राह्मणत्व ही
पूर्ण सफल है, ऐसा ब्रह्मपरायण विद्वज्जन कहते हैं॥ १४॥
इदं यज्ञोपवीतं तु पवित्रं यत्परायणम्।
स विद्वान्यज्ञोपवीती स्यात्स यज्ञः तं यज्वानं विदुः ॥ १५ ॥
यह (ज्ञान ही) यज्ञोपवीत है, यही परम पवित्र और परायण अर्थात् कल्याणकारी है। अतः ज्ञानवान्
मनुष्य ही वास्तव में (सच्चे) यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, स्वयं यज्ञरूप हैं और उन्हीं श्रेष्ठ पुरुषों को
'यज्वा' कहते है॥ १५ ॥
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ १६ ॥
एक ही परमात्मा समस्त भूत-प्राणियों में विद्यमान (छिपा हुआ) है, (वह) सर्वव्यापी है। समस्त भूतों
का अन्तरात्मा है, सभी के कर्मों को नियन्त्रित रखने वाला है, सभी भूतों का अधिवास है, साक्षीरूप, चैतन्य
स्वरूप, पवित्र एवं निर्गुण (त्रिगुणातीत) है॥ १६ ॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शांतिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१७॥
वह (परमात्मा) एक होते हुए भी सभी को वश में रखने वाला है, सभी प्राणियों का अन्तरात्मा है तथा
अपने एक ही रूप को विभिन्न रूपों में प्रकट करता है। इस परम तत्त्व को जो बुद्धिमान् व्यक्ति अपने में
प्रतिष्ठित देखते हैं, उन्हें शाश्वत शान्ति की प्राप्ति होती है, दूसरों को इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ १७॥
आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ १८ ॥
आत्मा को नीचे की अरणि और प्रणव को ऊर्ध्व की अरणि बनाकर ध्यान रूपी मंथन के अभ्यास द्वारा
इस अप्रकट आत्मा का साक्षात्कार मनुष्य को करना चाहिए॥ १८॥
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतः स्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ १९ ॥

२२६ ब्रह्मोपनिषद्
जिस प्रकार तिल में तैल, दही में घृत, स्रोत के प्रवाह में जल, काष्ठ में अग्नि अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान
रहती है, उसी प्रकार से आत्मा भी हमारे अन्तःकरण में विद्यमान है। वह आत्मा सत्य एवं तप के द्वारा देखा
जा सकता है ॥ १९ ॥
ऊर्णनाभिर्यथा तन्तून्सृजते संहरत्यपि। जाग्रत्स्वप्ने तथा जीवो गच्छत्यागच्छते पुनः ॥ २० ॥
जिस प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) तन्तु (सूत्र) का सृजन एवं संहार अर्थात् सूत्र का निर्माण करती और
पुनः खींच (निगल) लेती है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था में पुनः-पुनः गमनागमन करता
रहता है ॥ २० ॥
नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्।
सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् ॥ २१ ॥
जाग्रत् अवस्था का वैश्वानर नाम से युक्त आत्मा चक्षु में प्रतिष्ठित रहता है, स्वप्नावस्था का तैजस नामक
आत्मा कण्ठ में निवास करता है, सुषुप्तावस्था का प्राज्ञ नामक आत्मा हृदय में स्थित रहता है और तुरीय अर्थात्
तीनों अवस्थाओं से परे इस तुर्या नामक चौथी अवस्था का आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में निवास करता है, इस प्रकार से
बुद्धिमान् मनुष्य को जानना चाहिए ॥ २१ ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दमेतज्जीवस्य यं ज्ञात्वा मुच्यते बुधः ॥२२ ॥
जहाँ मनुष्य की वाक्शक्ति एवं एकादश इन्द्रिय मन नहीं पहुँच सकते, वहाँ पर उस आत्मा के आनन्द
को जान करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्त हो जाते हैं ॥ २२ ॥
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवान्वितम्।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्पदं तद्ब्रह्मोपनिषत्पदमिति ॥ २३ ॥
दुग्ध में घृत के सदृश सर्वत्र विद्यमान आत्म तत्त्व, आत्म-विद्या एवं तप के द्वारा ही प्राप्त होता है। यह
आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और यही उपनिषदों का परम पद (परब्रह्म) है॥ २३॥
सह नाववतु .........................इति शान्तिः ॥
॥ इति ब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ भिक्षुकोपनिषद् ॥
यह शुक्ल यजुर्वेदीय उपनिषद् है। इसमें आत्मकल्याण एवं लोक कल्याण हेतु भिक्षाचर्या द्वारा
जीवनयापन करने वाले संन्यास धर्म का संक्षिप्त किन्तु प्रभावपूर्ण वर्णन किया गया है। सर्वप्रथम कुटीचक,
बहूदक, हंस एवं परमहंस नामक संन्यासियों के उदाहरण देकर उनके आहार-विहार, शिखा-सूत्र, वस्त्रादि का
उल्लेख किया गया है। अन्त में परमहंस संन्यास के विषय में अपेक्षाकृत विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसके
द्वारा परमहंस संन्यास की महनीय महिमा एवं उसके कठोर अनुशासन का पता चलता है। कलेवर की दृष्टि
से यह उपनिषद् कुल पाँच मन्त्रों की अति लघुकाय स्वरूप वाली है, परन्तु महत्त्व की दृष्टि से अत्यधिक श्रेष्ठ
मानी जाती है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ पूर्णमदः..................... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद्)
ॐ अथ भिक्षूणां मोक्षार्थिनां कुटीचकबहूदकहंसपरमहंसाश्चेति चत्वारः ॥ १ ॥
मोक्षार्थी भिक्षुओं की चार श्रेणियाँ होती हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ॥ १ ॥
[ यहाँ मोक्षार्थी भिक्षुओं के बारे में अनुशासन में बताये जा रहे हैं। भोगार्थी-स्वार्थी भिक्षु वे, जो अपनी असमर्थता
के कारण भिक्षा माँगते हैं। मोक्षार्थी समर्थ होते हुए भी लौकिक बन्धनों से ऊपर उठने के क्रम में भिक्षाजीवी बनते हैं। ]
कुटीचका नाम गौतमभरद्वाजयाज्ञवल्क्यवसिष्ठप्रभृतयोऽष्टौ ग्रासांश्चरन्तो योगमार्गे मोक्षमेव
प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥
कुटीचक-भिक्षु गौतम, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि के समान अष्टग्रास भोजन लेकर
योगमार्ग में (योग के माध्यम से) मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हैं ॥ २ ॥
[ मात्र शरीर रक्षा के लिए न्यूनतम भोजन का एक प्रमाण अष्टग्रास माना गया है। एक ग्रास उतना अंश माना जा
सकता है, जिसे एक साथ मुख में रखकर चबाया जा सके। ऐसे आठ ग्रास खाकर शरीर रक्षा की जा सकती है, ऐसा
अनुभव करके यह नियम बनाया गया प्रतीत होता है। ]
अथ बहूदका नाम त्रिदण्डकमण्डलुशिखायज्ञोपवीतकाषायवस्त्रधारिणो ब्रह्मर्षिगृहे
मधुमांसं वर्जयित्वाऽष्टौ ग्रासान्भैक्षाचरणं कृत्वा योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥ ३ ॥
बहूदक-भिक्षु त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिखा, यज्ञोपवीत और काषाय वस्त्र धारण करते हैं तथा मधु-मांस
को छोड़कर ब्रह्मर्षि (किसी सदाचारी नैष्ठिक) के घर में भिक्षाचरण द्वारा आठ ग्रास भोजन ग्रहण करते हुए
योगमार्ग द्वारा मोक्षानुसंधान करते हैं ॥ ३ ॥
अथ हंसा नाम ग्राम एकरात्रं नगरे पञ्चरात्रं क्षेत्रे सप्तरात्रं तदुपरि न वसेयुः।
गोमूत्रगोमयाहारिणो नित्यं चान्द्रायणपरायणा योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥ ४ ॥
हंस नामक-भिक्षु किसी गाँव में एक रात्रि, नगर में पंचरात्रि तथा (तीर्थ) क्षेत्र में सात रात्रि से अधिक
निवास नहीं करते। वे गोमूत्र और गोमय (गोबर) का आहार ग्रहण करते हुए नित्य चान्द्रायण व्रत परायण
होकर योग मार्ग से मोक्ष की खोज करते हैं ॥ ४ ॥