१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१४ ब्रह्मविद्योपनिषद्
शिखा तु दीपसंकाशा तस्मिन्नुपरि वर्तते। अर्धमात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता ॥ ९ ॥
जिस तरह से दीपक की शिखा (लौ) ऊपर की ओर रहती है, इसी तरह से प्रणव के ऊपर की
अर्द्धमात्रा की स्थिति को जानना चाहिए॥ ९॥
[दीपक की लौ सदा ऊर्ध्वमुखी होती है। अनुस्वार नासिका मूल-मस्तिष्क के उच्च भाग में गुंजरित होता है। इस
मात्रा के कारण अ, उ, म् का संयुक्त स्वर ऊर्ध्वोन्मुख हो उठता है, इसलिए इसे ज्योति के अनुरूप कहा गया है।]
पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखा सा दृश्यते परा। सा नाडी सूर्यसंकाशा सूर्य भित्त्वा तथा परा ॥ १०
द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाडीं भित्त्वा च मूर्धनि। वरदः सर्वभूतानां सर्व व्याप्येव तिष्ठति ॥ ११ ॥
वह शिखा (लौ) पद्म सूत्र के सदृश दृष्टिगोचर होती है। सूर्य सदृश वह नाड़ी सूर्य का भेदन करके
तथा बहत्तर हजार नाड़ियों का भेदन करके मूर्धा में प्रतिष्ठित होने वाली, सभी प्राणियों को वरदान प्रदान करने
वाली एवं सबको व्याप्त करके स्थित रहने वाली है॥ १०-११॥
कांस्यघण्टानिनादस्तु यथा लीयति शान्तये। ओङ्कारस्तु तथा योज्यः शान्तये सर्वमिच्छता ॥१२
काँस्य (ताँबा तथा टीन से मिलकर बनी) धातु निर्मित घण्टे का शब्द जिस प्रकार शान्ति प्रदान करता
हुआ विलीन हो जाता है, उसी प्रकार ॐ कार की साधना द्वारा सभी तरह की इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं ॥१२॥
यस्मिन्विलीयते शब्दस्तत्परं ब्रह्म गीयते। धियं हि लीयते ब्रह्म सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १३॥
जिस (तत्त्व) में शब्द विलीन हो जाता है, उसे परब्रह्म कहा गया है। जो बुद्धि ब्रह्म में विलीन हो जाती
है, वह अमृत स्वरूप-ब्रह्म स्वरूप कही गई है॥ १३॥
वायुस्तेजस्तथाकाशस्त्रिविधो जीवसंज्ञकः। स जीवः प्राण इत्युक्तो वालाग्रशतकल्पितः ॥१४॥
वायु, तेज तथा आकाश इन तीनों में जीव की उपमा दी जाती है। इस जीव का प्रमाण (आकार)
बाल की नोक का सौवाँ भाग (अति सूक्ष्म) कल्पित किया गया है॥ १४॥
नाभिस्थाने स्थितं विश्वं शुद्धतत्त्वं सुनिर्मलम्। आदित्यमिव दीप्यन्तं रश्मिभिश्चाखिलं शिवम्॥
वह (जीव) विश्व (संज्ञक), शुद्ध तत्त्व, निर्मल स्वरूप नाभि प्रदेश (नाभिक-न्यूक्लियस) में प्रतिष्ठित
है। वह सूर्य के सदृश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करने वाला और कल्याणकारी है॥ १५॥
सकारं च हकारं च जीवो जपति सर्वदा। नाभिरन्ध्राद्विनिष्क्रान्तं विषयव्याप्तिवर्जितम् ॥ १६ ॥
जीव (श्वासोच्छ्वास के रूप में) 'स' कार और 'ह' कार (सोऽहं का जप) सर्वदा करता है, इस के
प्रभाव से वह जीव नाभिरंध्र से उत्क्रमण करता रहता है और उसे किसी प्रकार के विषय व्याप्त नहीं करते॥
तेनेदं निष्कलं विद्यात्क्षीरात्सर्पिर्यथा तथा। कारणेनात्मना युक्तः प्राणायामैश्च पञ्चभिः ॥१७॥
दुग्ध से (मथकर निकाले गये) घृत की भाँति उस निष्कल (कला रहित), सबके कारण रूप आत्म
तत्त्व को प्राण के पाँच आयामों द्वारा जाना जाता है। (देह के पाँचों तत्त्वों में प्राण तत्त्व प्रवाहित होते हैं। इन
पाँचों में प्रवाहित प्राण के पाँच आयाम माने गये हैं) ॥ १७॥
चतुष्कलासमायुक्तो भ्राम्यते च हृदि स्थितः। गोलकस्तु यथा देहे क्षीरदण्डेन वाऽहतः ॥१८॥
जिस प्रकार मथने वाले दण्ड से दुग्ध को मथा जाता है, उसी प्रकार चार कलाओं से युक्त हृदय में
स्थित प्राण तत्त्व को (श्वास-प्रश्वास को) शरीर में भ्रमण कराया जाता है॥ १८॥
एतस्मिन्वसते शीघ्रंमविश्रान्तं महाखगः। यावन्निःश्वसितो जीवस्तावन्निष्कलतं गतः॥१९॥
इस (शरीर) में शीघ्रगामी महापक्षी (खग रूपी जीव) विश्राम न करता हुआ निवास करता है। जब
श्वास रुक जाता है, तब जीव निष्कल (कला रहित) हो जाता है॥ १९॥