१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ ब्रह्मविद्योपनिषद्
श्रुति का कथन संशयरहित परमार्थ रूप ही है। श्रुति का विरोध होने पर अन्य और कुछ भी प्रमाण नहीं
है। जो बिना प्रमाण होगा, वह अनर्थकारी अर्थात् हानिकारक होगा ॥ ३२ ॥
देहस्थः सकलो ज्ञेयो निष्कलो देहवर्जितः । आप्तोपदेशगम्योऽसौ सर्वतः समवस्थितः ॥ ३३ ॥
देह में स्थित (चेतना) को सकल (कला या विभागयुक्त) तथा देहरहित (परम चेतना) को 'निष्कल'
(कलारहित) जानना चाहिए। आप्त गुरु के उपदेश से ज्ञात होने वाला यह तत्त्व सर्वत्र समभाव से प्रतिष्ठित है ॥
हंसहंसेति यो ब्रूयाद्धंसो ब्रह्मा हरिः शिवः। गुरुवक्त्रात्तु लभ्येत प्रत्यक्षं सर्वतोमुखम् ॥ ३४ ॥
जो ज्ञानी पुरुष हंस-हंस बोलता (सोऽहं साधनारत रहता) है, वह ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव का कल्याणकारी
रूप है। वह गुरु के उपदेश से सर्वतोमुख वाले (सर्वत्र व्याप्त) ब्रह्म को जानने में समर्थ हो सकता है ॥ ३४ ॥
तिलेषु च यथा तैलं पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरेऽस्मिन्स बाह्याभ्यन्तरे तथा ॥ ३५ ॥
जिस प्रकार तिलों में तैल एवं पुष्पों में गंध विद्यमान रहता है, उसी प्रकार पुरुष के इस शरीर में बाहर-
भीतर वही ब्रह्म विद्यमान रहता है ॥ ३५ ॥
उल्काहस्तो यथालोके द्रव्यमालोक्य तां त्यजेत् । ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य पश्चाज्ज्ञानं परित्यजेत् ॥३६
जिस प्रकार मशाल के प्रकाश से द्रव्य (वस्तु) को देख करके मशाल का परित्याग कर दिया जाता है,
उसी प्रकार ज्ञान के माध्यम से ज्ञातव्य विषय की प्राप्ति हो जाने पर ज्ञान का परित्याग कर दिया जाता है ॥ ३६ ॥
पुष्पवत्सकलं विद्याद्गन्धस्तस्य तु निष्कलः। वृक्षस्तु सकलं विद्याच्छाया तस्य तु निष्कला ॥३७
'सकल' अर्थात् कलायुक्त को पुष्प की भाँति एवं उसकी गंध को 'निष्कल' (कलारहित) की भाँति
माने अथवा 'सकल' वृक्ष के सदृश है और उसकी छाया निष्कल (कलारहित) है ॥ ३७ ॥
निष्कलः सकलो भावः सर्वत्रैव व्यवस्थितः । उपायः सकलस्तद्वदुपेयश्चैव निष्कलः ॥ ३८ ॥
(ऊपर कहे अनुसार) निष्कल एवं सकल भाव सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। कला सम्पन्न वस्तु उपाय या
साधन है तथा उपेय या साध्य (ब्रह्म) कलारहित है ॥ ३८ ॥
सकले सकलो भावो निष्कले निष्कलस्तथा । एकमात्रो द्विमात्रश्च त्रिमात्रश्चैव भेदतः ॥३९ ॥
अर्धमात्रा परा ज्ञेया तत ऊर्ध्वं परत्परम्। पञ्चधा पञ्चदैवत्यं सकलं परिपठ्यते ॥ ४० ॥
सकल में कलायुक्त भाव तथा निष्कल (अखण्ड-निर्विकार) में निष्कल भाव रहता है। (वह सकल)
एक मात्रा, दो मात्रा एवं तीन मात्रा के भेद वाला अर्धमात्रा को पर मानना चाहिए, उसके ऊपर परात्पर है। (इस
प्रकार) सकल पाँच दैवत वाला पाँच प्रकार का (पंच प्राण एवं पंचभूतात्मक) जानना चाहिए ॥ ३९-४० ॥
ब्रह्मणो हृदयस्थानं कण्ठे विष्णुः समाश्रितः । तालुमध्ये स्थितो रुद्रो ललाटस्थो महेश्वरः ॥४१
ब्रह्मा का स्थान हृदय में है, विष्णु कण्ठ में निवास करते हैं, तालु में भगवान् रुद्र तथा ललाट (मस्तक)
में महेश्वर स्थित हैं ॥ ४१ ॥
नासाग्रे अच्युतं विद्यात्तस्यान्ते तु परं पदम् । परत्वान्तु परं नास्तीत्येवं शास्त्रस्य निर्णयः ॥४२ ॥
नासिका के अग्रभाग में अच्युत (सदाशिव) तथा उसके अन्तिम भाग (भ्रूमध्य) में परम पद को
प्रतिष्ठित जानना चाहिए। (उस) पर (श्रेष्ठ) से पर (श्रेष्ठ) और कुछ भी नहीं है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है ॥
देहातीतं तु तं विद्यान्नासाग्रे द्वादशाङ्गुलम् । तदन्तं तं विजानीयात्तत्रस्थो व्यापयेत्प्रभुः ॥ ४३ ॥
उस देहातीत को नासिका के अग्र भाग से बारह अंगुल ऊपर जानना चाहिए तथा उसके अन्तिम भाग
(सहस्रार चक्र) में व्यापक प्रभु को स्थित जानना चाहिए ॥ ४३ ॥