१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय २ मन्त्र १०३ ३१७
अध्याय २ मन्त्र १०३ ३१७
आज्यं रुधिरमिव त्यजेदेकत्रान्नं पललमिव गन्धलेपनमशुद्धलेपनमिव क्षारमन्त्यजमिव
वस्त्रमुच्छिष्टपात्रमिवाभ्यङ्गं स्त्रीसङ्गमिव मित्राह्लादकं मूत्रमिव स्पृहां गोमांसमिव ज्ञातचरदेशं
चण्डालवाटिकामिव स्त्रियमहिमिव सुवर्णं कालकूटमिव सभास्थलं श्मशानस्थलमिव राज-
धानीं कुम्भीपाकमिव शवपिण्डवदेकत्रान्नं न देवतार्चनम्। प्रपञ्चवृत्तिं परित्यज्य जीवन्मुक्तो
भवेत्॥ ९७॥
घृत (आज्य) को रुधिर के समान तथा इकट्ठा किये हुए अन्न को मांस की भाँति त्याग देना चाहिए।
गन्ध एवं लेपन को गन्दी वस्तु के समान, नमक को अन्त्यज के समान, वस्त्र को जूठे पात्र के सदृश, तेल
मालिश को स्त्री प्रसंग की भाँति, मित्रों की हँसी-मजाक को मूत्र के समान, घमण्ड को गौ-मांस के समान,
परिचित-मित्रों के घर की भिक्षा को चण्डाल के सदृश, स्त्री को सर्पिणी के समान, सुवर्ण (सोने) को
कालकूट के समान, सभा आदि को श्मशानवत्, राजधानी को कुम्भीपाक नरक के समान, एक ही घर के
भोजन को मृतक-पिण्ड के समान जानकर इनका परित्याग कर देना चाहिए। देवताओं का पूजन-अर्चन कभी
न करे। सांसारिक प्रपञ्चों को त्यागकर उसे जीवन्मुक्त बनना चाहिए॥ ९७॥
आसनं पात्रलोपश्च संचयः शिष्यसंचयः। दिवास्वापो वृथालापो यतेर्बन्धकराणि षट् ॥ ९८ ॥
आसन, पात्रलोप (बर्तन की चाह), सञ्चय, शिष्य बनाना, दिन में शयन करना तथा बेकार की बातें
करना इत्यादि ये छः प्रकार के कार्य संन्यासी को बन्धन में डालने वाले हैं ॥ ९८ ॥
वर्षाभ्योऽन्यत्र यत्स्थानमासनं तदुदाहृतम्। उक्तालाब्वादिपात्राणामेकस्यापीह संग्रहः ॥ ९९ ॥
यतेः संव्यवहाराय पात्रलोपः स उच्यते। गृहीतस्य तु दण्डादेर्द्वितीयस्य परिग्रहः ॥ १०० ॥
वर्षा (पानी) के अलावा जो स्थान है, उसे आसन कहा जाता है। कहे हुए पात्रों के संग्रह में से एक ही
तुम्बी आदि पात्र को ग्रहण करना चाहिए। संन्यासी के व्यवहार के लिए जो तुम्बी आदि पात्र कहे गये हैं,
उनके खो जाने पर दूसरे के पात्रों को ले लेना ही पात्र-लोप है। अपना दण्ड खो जाने पर दूसरे का दण्ड ग्रहण
कर लेना ही परिग्रह है ॥ ९९-१०० ॥
कालान्तरोपभोगार्थं संचयः परिकीर्तितः। शुश्रूषालाभपूजार्थं यशोऽर्थं वा परिग्रहः ॥ १०१ ॥
कालान्तर (भविष्य) में भोगार्थ के लिए संग्रह करके रखना ही सञ्चय कहा जाता है। शुश्रूषा लाभ,
पूजा एवं यश के लिए चेष्टा करना भी परिग्रह है ॥ १०१ ॥
शिष्याणां नतु कारुण्याच्छिष्यसंग्रह ईरितः। विद्या दिवा प्रकाशत्वादविद्या रात्रिरुच्यते ॥१०२॥
(जो शिष्य) आत्मकल्याण के लिए करुणा से युक्त होकर आये, उसे ही शिष्य बनाये। उसके
अतिरिक्त अन्य किसी को शिष्य बनाना ही शिष्य संग्रह कहा जाता है। संन्यास में विद्या को दिन और अविद्या
को रात्रि जाना जाता है ॥ १०२ ॥
विद्याभ्यासे प्रमादो यः स दिवास्वाप उच्यते। आध्यात्मिकीं कथां मुक्त्वा भिक्षावार्तां विना
तथा। अनुग्रहं परिप्रश्नं वृथाजल्पोऽन्य उच्यते ॥ १०३ ॥
इस कारण से विद्या के अभ्यास में प्रमाद बरतना दिन में शयन करना कहा जाता है। आध्यात्मिक कथा
को छोड़कर भिक्षा की बात, अनुग्रह-परिप्रश्न (का उत्तर देने) के अतिरिक्त और जो बात की जाये, वह बेकार
का बोला जाना समझा जाता है ॥ १०३ ॥
३१८ संन्यासोपनिषद्
एकान्नं मदमात्सर्यं गन्धपुष्पविभूषणम्। ताम्बूलाभ्यञ्जने क्रीडा भोगाकाङ्क्षा रसायनम्॥
१०४ ॥ कत्थनं कुत्सनं स्वस्ति ज्योतिश्च क्रयविक्रयम्। क्रिया कर्मविवादश्च गुरुवाक्य-
विलङ्घनम्॥ १०५॥ संधिश्च विग्रहो यानं मञ्चकं शुक्लवस्त्रकम्। शुक्रोत्सर्गो दिवास्वापो
भिक्षाधारस्तु तैजसम् ॥१०६॥ विषं चैवायुधं बीजं हिंसां तैक्ष्ण्यं च मैथुनम्। त्यक्तं संन्यासयोगेन
गृहधर्मादिकं व्रतम् ॥ १०७॥ गोत्रादिचरणं सर्वं पितृमातृकुलं धनम्। प्रतिषिद्धानि चैतानि
सेवमानो व्रजेदधः ॥ १०८॥
एकान्न, घमण्ड और मत्सरता, गन्ध, पुष्प, आभूषण, पान खाना, तेल लगाना, क्रीड़ा, भोग की
आकांक्षा, रसायन, खुशामद करना, निन्दा, कुशल, प्रश्न, खरीदने-बेचने की बातें, क्रियाकर्म, वाद-विवाद,
गुरु के वाक्य का उल्लंघन, सन्धि विग्रह की बातें, पलङ्ग, सफेद वस्त्र, वीर्य त्याग, दिन में शयन करना, भिक्षा
पात्र, स्वर्ण, विष, शस्त्र, जीव, हिंसा, क्रोध तथा मैथुन-इन सभी का संन्यासी पूर्णरूप से परित्याग कर दे। जो
गृहस्थियों के धर्म, व्रत, गोत्रादि के आचरण, पिता तथा माता के कुल की सम्पत्ति आदि निषिद्ध कहे गये हैं,
इन सभी का सेवन करने से नीच गति की प्राप्ति होती है ॥ १०४-१०८॥
सुजीर्णोऽपि सुजीर्णासु विद्वांस्त्रीषु न विश्वसेत्। सुजीर्णास्वपि कन्थासु सज्जते जीर्णमम्बरम् ॥१०९
स्थावरं जङ्गमं बीजं तैजसं विषमायुधम्। षडेतानि न गृह्णीयाद्यतिर्मूत्रपुरीषवत् ॥ ११०॥
वृद्धावस्था को प्राप्त विद्वान् संन्यासी को वृद्धा स्त्री पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए; क्योंकि पुरानी
गुदड़ी (कथरी) में पुराना वस्त्र ही लगाया जाता है। स्थावर (जड़), जंगम, बीज, सुवर्ण, विष, आयुध आदि
इन छः वस्तुओं को संन्यासी मूत्र एवं विष्ठा के समतुल्य त्याज्य समझ करके कभी ग्रहण न करे ॥ १०९-११०
नैवाददीत पाथेयं यतिः किंचिदनापदि। पक्वमापत्सु गृह्णीयाद्यावदन्नं न लभ्यते॥ १११॥
आपत्ति कालीन समय के अतिरिक्त रास्ते के लिए संन्यासी को अपने पास कुछ भी नहीं रखना
चाहिए। कुयोग वश यदि अन्न न प्राप्त हो, तो पक्वान्न (पका हुआ अन्न) प्राप्त कर लेना चाहिए ॥ १११॥
नीरुजश्च युवा चैव भिक्षुर्नावसथे वसेत्। परार्थं न प्रतिग्राह्यं न दद्याच्च कथंचन॥ ११२॥
स्वस्थ तथा युवावस्था को प्राप्त हुए संन्यासी को कभी भी किसी के घर में नहीं रुकना चाहिए। दूसरे
किसी की कोई भी वस्तु न लेनी चाहिए और न ही किसी को अपनी वस्तु देनी चाहिए ॥ ११२ ॥
दैन्यभावात्तु भूतानां सौभागाय यतिश्चरेत्। पक्वं वा यदि वाऽपक्वं याचमानो व्रजेदधः ॥ ११३ ॥
संन्यासी को दूसरे अन्य भूत-प्राणियों के कल्याण हेतु दीनता (दया) का आचरण करना चाहिए। पका
हुआ या फिर बिना पका हुआ अन्न माँगने से संन्यासी निम्न गति को प्राप्त करता है ॥ ११३ ॥
अन्नपानपरो भिक्षुर्वस्त्रादीनां प्रतिग्रही। आविकं वानाविकं वा तथा पट्टपटानपि ॥ ११४ ॥
प्रतिगृह्य यतिश्चैतान्यतत्येव न संशयः। अद्वैतं नावमाश्रित्य जीवन्मुक्तत्वमाप्नुयात् ॥ ११५ ॥
खाने-पीने वाले पदार्थों की सतत इच्छा रखने वाला एवं वस्त्रों में ऊनी वस्त्रों अथवा बिना ऊन से
निर्मित वस्त्र, रेशमी वस्त्रादि वस्तुओं को स्वीकार करने से संन्यासी का निश्चित रूप से अधःपतन हो जाता है।
उसे तो अद्वैतरूपी नौका में आसीन होकर जीवन-मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर लेनी चाहिए ॥ ११४-११५॥
वाग्दण्डे मौनमातिष्ठेत्कायदण्डे त्वभोजनम्। मानसे तु कृते दण्डे प्राणायामो विधीयते ॥११६
यदि वाणी को दण्ड देना हो, तो (संन्यासी को) मौन रहना चाहिए, काया (शरीर) को दण्ड देना हो,
तो भोजन नहीं करना चाहिए अर्थात् व्रत-उपवास रखे और यदि मन को दण्ड देने की इच्छा हो, तो फिर
प्राणायाम करना चाहिए ॥ ११६ ॥