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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

अध्याय ४ मन्त्र १९ ८९

अध्याय ४ मन्त्र १९ ८९
बनाने के लिए अपने पास बुलाये। अतः आप आयें (एकान्त स्थान की ओर चलें), वहाँ आपको निश्चय ही
मैं स्वयं विराट् ब्रह्म का बोध कराऊँगा।' ऐसा कहकर राजा (अजातशत्रु) बलाका-तनय गार्ग्य का हाथ पकड़
करके वहाँ से चल दिये। वे दोनों (राजा एवं गार्ग्य) एक सोये हुए व्यक्ति के पास आये। वहाँ पर राजा
अजातशत्रु ने उस सोये हुए व्यक्ति को जगाने का प्रयास करते हुए बुलाया-'हे ब्रह्मन् ! हे पाण्डरवास ! हे सोम
राजन् ! इस तरह से सम्बोधन करने पर भी जब वह व्यक्ति सोया ही रहा, तब उस व्यक्ति के शरीर में छड़ी से
प्रहार किया। जैसे ही उसके शरीर में प्रहार किया गया, वह सोया हुआ व्यक्ति उस छड़ी की चोट से उठकर
खड़ा हो गया। ऐसा दृश्य देखकर बलाका-पुत्र गार्ग्य से राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे बलाके! यह व्यक्ति इस
तरह अचेत सा रहकर कहाँ शयन करता था ? किस प्रदेश में इसका शयन हुआ था ? तथा इस जाग्रत्-अवस्था
में यह कहाँ से आ गया है?' ॥ १८ ॥
तं होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतद्बालाके पुरुषोऽशयिष्ट यत्रैतदभूद्यत एतदागादिति । हिता
नाम हृदयस्य नाड्यो हृदयात्पुरीततमभिप्रतन्वन्ति तद्यथा सहस्रधा केशो विपाटितस्तावदण्व्यः
पिङ्गलस्याणिम्ना तिष्ठन्ति। शुक्लस्य कृष्णस्य पीतस्य लोहितस्येति तासु तदा भवति। यदा
सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यस्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सवैर्नामभिः सहाप्येति
चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा
प्रतिबुध्यते यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नैवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा
यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः तद्यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात्।
विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाय एवमेवैष प्रज्ञ आत्मेदं शरीरमात्मानमनुप्रविष्ट आलोमभ्य
आनखेभ्यः ॥ १९ ॥
गार्ग्य इस रहस्य को न समझ पाये, तब पुनः उनसे राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे बलाका-तनय ! यह
पुरुष इस तरह से अचेत-सा होकर जहाँ सोता था, जहाँ शयन करता था और इस जाग्रत्-अवस्था में इसका
जहाँ से आगमन हुआ है, वह स्थान इस प्रकार से जाना जाता है। 'हिता' नाम से प्रसिद्ध बहुत-सी नाड़ियाँ
हैं, जो कि हृदय-कमल से सम्बन्ध रखने वाली हैं। वे (नाड़ियाँ) हृदय-कमल से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में
विस्तृत होकर फैली हुई हैं। इन नाड़ियों का परिमाण इस तरह से है-एक बाल के हजारवें भाग के बराबर ही
सूक्ष्मातिसूक्ष्म वे सभी नाड़ियाँ हैं। पिङ्गल अर्थात् विभिन्न तरह के रंगों का जो अति सूक्ष्मतम रस है, इससे वे
पूर्ण हैं। शुक्ल, कृष्ण, पीत एवं रक्त आदि इन सभी रंगों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंशों से वे सम्पन्न हैं। उन्हीं समस्त
नाड़ियों में यह पुरुष सुषुप्तावस्था के समय विद्यमान रहता है।
जिस समय यह सोया हुआ पुरुष किसी भी तरह का स्वप्न नहीं देखता, तब उस समय यह इस मुख्य
प्राण तत्त्व में ही एकात्मभाव को प्राप्त कर लेता है। उस समय वाणी अपने समस्त नामों सहित इस प्राणतत्त्व
में विलीन हो जाती है। चक्षु भी अपने सभी रूपों के साथ इस प्राण में ही मिल जाता है। कर्णेन्द्रिय अपने सभी
शब्दों के साथ इस प्राण में विलीन हो जाती है और मन भी सभी चिन्तनयुक्त विषयों के सहित इस प्राण-तत्त्व
में विलीन हो जाता है। यह पुरुष जब जाग जाता है, तब उस समय जैसे जलती हुई अग्नि से सभी दिशाओं की
तरफ चिनगारियाँ प्रस्फुटित होती हैं, वैसे ही इस प्राण स्वरूप आत्मा से सभी वाणी आदि प्राणतत्त्व बहिर्गमन
कर अपने-अपने भोग्य-स्थल की तरफ गमन कर जाते हैं। तत्पश्चात् प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि
देवों का प्रादुर्भाव होता है एवं साथ ही देवताओं से लोक अर्थात् नाम आदि विषयों का प्राकट्य होता है। उस

श्रेष्ठ आत्मा की प्राप्ति का उदाहरण इस तरह से है-जैसे क्षुरधान (अर्थात् छुरा रखने हेतु निर्मित की हुई
चर्मयुक्त पेटी) में छुरा रखा रहता है, वैसे ही शरीर के अन्दर हृदय-कमल में अङ्गुष्ठ-मात्र पुरुष के रूप में
परमात्म सत्ता की स्थिति होती है एवं जिस तरह अग्नि अपने नीड-भूत अरणी आदि काष्ठ में सभी जगह फैली
रहती है, उसी प्रकार यह प्रज्ञावान् आत्मा इस 'आत्मा' नाम से सम्बोधित किये जाने वाले शरीर में नख से
शिखा तक व्याप्त है॥ १९ ॥

तमेतमात्मानमेत आत्मानोऽन्ववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वाः। तद्यथा श्रेष्ठी स्वर्भुङ्क्ते यथा
वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते। एवं वै तमात्मानमेत आत्मानो
भुञ्जन्ति। स यावद्ध वा इन्द्र एतमात्मानं न विजज्ञे तावदेनमसुरा अभिबभूवुः। स यदा
विजज्ञेऽथ हत्वाऽसुरान्विजित्य सर्वेषां देवानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं परीयाय तथो एवैवं
विद्वान्सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद य एवं
वेद॥ २०॥

उसी साक्षीरूप आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा (इन्द्रियाँ) अनुगत सेवक की भाँति ठीक वैसे ही
अनुसरण करती हैं, जैसे श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न धनी का, उसके आश्रय में जीवन-व्यतीत करने वाले स्वजन
अनुवर्तन करते हैं। जिस तरह धनी अपने आत्मीय जनों के साथ भोजन करता है और स्वजन जैसे उस धनी
का ही उपभोग करते हैं, उसी प्रकार यह प्रज्ञा सम्पन्न आत्मा इन वाणी आदि आत्माओं के सहित उपभोग
करता है और अवश्य ही इस आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा उपभोग करते हैं।
वे प्रख्यात देवराज इन्द्र जब तक इस आत्मा को नहीं जान पाये थे, तब तक उन्हें समस्त दैत्य समूह
पराजित करते रहते थे; किन्तु जैसे ही उन्होंने अपनी आत्मा को जाना, वैसे ही देवराज इन्द्र ने उन समस्त दैत्यों
को विनष्ट कर, उन्हें परास्त करके सम्पूर्ण देवों में श्रेष्ठता का पद, स्वर्ग का राज्य एवं त्रिलोकी का अधिकार
प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार आत्मा को जानने वाला ज्ञानी अपने समस्त पापों को मिटाकर सभी भूत-प्राणियों
में श्रेष्ठ होकर स्वाराज्य और प्रभुता को प्राप्त कर सभी का स्वामी बन जाता है। जो भी उपासक इस प्रकार से
उसे जानता है, उसे ऊपर कहे हुए सम्पूर्ण फलों की प्राप्ति हो जाती है॥ २०॥

वाङ्मे मनसि ....................इति शान्तिः ॥
॥ इति कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ क्षुरिकापनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २५ मन्त्र हैं। यह उपनिषद् तत्त्व-ज्ञान के प्रति-
बन्धक घटकों को काटने में क्षुरिका (छुरी-चाकू) सदृश समर्थ है। योग के अष्टांगों (यम, नियम, आसन,
प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) में से धारणा की सिद्धि और उसके प्रतिफल की यहाँ
विशेष रूप से चर्चा है।
इस उपनिषद् में कहा गया है कि सर्वप्रथम योग साधना के लिए दृढ़ आसन पर बैठकर प्राणायाम की
विशेष क्रियाओं का अभ्यास करते हुए शरीर के सभी मर्म स्थानों में प्राण का संचार उसी प्रकार करे, जिस
प्रकार मकड़ी अपने द्वारा निर्मित अति सूक्ष्म तन्तुओं पर गतिशील रहती है। तत्पश्चात् क्रमशः नीचे से ऊपर
की ओर बढ़ते हुए हृदय कमल स्थित सुषुम्ना नाड़ी से प्राण तत्त्व का संचार करते हुए तथा अन्य ७२ हजार
नाड़ियों का छेदन करते हुए उस परब्रह्म स्थान तक पहुँचा जा सकता है, जहाँ पहुँचने पर जीव (हंस) समस्त
बन्धनों को काट डालने में समर्थ हो जाता है। उस समय वह अपने समस्त कर्म बन्धनों को जलाकर परम
तत्त्व में उसी प्रकार लय को प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार दीपक निर्वाण (बुझने) के समय तेल-बाती सभी
को जलाकर परम ज्योति में विलीन हो जाता है। इस प्रकार वह (जीव) पुनः कर्म बन्धन में नहीं बँधता-
जीवन मुक्त हो जाता है। यही इस उपनिषद् का सार है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु.....................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद्)
क्षुरिकां संप्रवक्ष्यामि धारणां योगसिद्धये।
यां प्राप्य न पुनर्जन्म योगयुक्तस्य जायते ॥१॥
योग की सिद्धि हेतु मैं धारणा रूपी क्षुरिका के सम्बन्ध में यहाँ वर्णन करता हूँ, जिसे प्राप्त करके योग
युक्त हो जाने वाले मनुष्य को पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता अर्थात् वह आवागमन के बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥१॥
[ सुझाई गयी धारणा का उपयोग करके मनुष्य बन्धन मुक्त होता है, इसलिए उसे बन्धन काटने वाली छुरी कहा
गया है। संसारी व्यक्ति लौकिक कामनाओं के वशीभूत होकर भव-बन्धनों में बँधते हैं। योगी जन अष्टांग योग के अन्तर्गत
यम, नियम, आसन, प्राणायाम एवं प्रत्याहार की साधना करते हुए धारणा तक पहुँचते हैं, तो आत्म सत्ता, परमात्म सत्ता
और दोनों के बीच आदान-प्रदान, इन तीन में अपने चित्त को बाँध लेते हैं। इस धारणा के प्रभाव से सांसारिक बन्धन
छिन्न हो जाते हैं। ]
मन्त्र क्र० २ से ५ तक निर्धारित धारणा के पूर्व प्राणायाम का वर्णन है—
वेदतत्त्वार्थविहितं यथोक्तं हि स्वयंभुवा। निःशब्दं देशमास्थाय तत्रासनमवस्थितः॥ २॥
कूर्मोऽङ्गानीव संहृत्य मनो हृदि निरुध्य च। मात्राद्वादशयोगेन प्रणवेन शनैः शनैः ॥ ३॥
पूरयेत्सर्वमात्मानं सर्वद्वारं निरुध्य च। उरोमुखकटिग्रीवं किंचिद्धृदयमुन्नतम् ॥ ४॥
प्राणान्संधारयेत्तस्मिन्नासाभ्यन्तरचारिणः। भूत्वा तत्र गतप्राणः शनैरथ समुत्सृजेत् ॥ ५॥

९२ क्षुरिकोपनिषद्
जैसा कि स्वयंभू ब्रह्माजी का कथन है और जो भाव वेद के तत्त्वार्थ में सन्निहित है, तदनुसार कोलाहल
रहित स्थान में इसके लिए उचित आसन में स्थित होकर जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने संकल्प से समेट
लेता है, वैसे ही मन और हृदय (के भावों) को निरुद्ध (बिखरने से रोक) करे तथा ॐ कार की बारह
मात्राओं के माध्यम से (उतने समय में) धीरे-धीरे प्राण रूप सर्वात्मा को (पूरक द्वारा) अपने अन्दर पूरित
करे। इस समय (प्राण के) सभी द्वारों को (बन्धों के माध्यम से) रोक करके छाती, मुख, कमर, गर्दन (को
ऊपर की ओर खींचकर सीधा) तथा हृदय को कुछ उन्नत रखे। इस स्थिति में नासिका द्वारा संचरित प्राण को
(कुम्भक के द्वारा) सभी स्थानों में धारण करे। जहाँ-तहाँ प्राणों का संचरण हो जाने पर फिर धीरे-धीरे वायु
को (रेचक क्रिया द्वारा) बाहर छोड़ दे॥ २-५ ॥
[ ॐ कार में तीन मात्राएँ होती हैं। १२ मात्रा का अर्थ हुआ, ४ बार ओंकार के सहज उच्चारण जितना समय
लगाकर पूरक करे। उसी अनुसार कुम्भक एवं रेचक की मात्रा निश्चित करे।]
स्थिरमात्रादृढं कृत्वा अङ्गुष्ठेन समाहितः। द्वे तु गुल्फे प्रकुर्वीत जङ्घे चैव त्रयस्त्रयः ॥ ६ ॥
द्वे जानुनी तथोरुभ्यां गुदे शिश्ने त्रयस्त्रयः। वायोरायतनं चात्र नाभिदेशे समाश्रयेत् ॥ ७ ॥
धारणा युक्त उक्त प्राणायाम का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर, पूरी सावधानी के साथ पैर के अंगूठे सहित
टखनों में दो-दो बार, (टखनों और घुटनों के बीच के भाग) जंघाओं या पिंडलियों में तीन-तीन बार, घुटनों
और ऊरु (जाँघों) में दो-दो बार तथा गुदा एवं जननेन्द्रिय में तीन-तीन बार (प्राणायाम द्वारा) प्राणों के संचार
की धारणा करे। इसके बाद नाभि प्रदेश में प्राणों की धारणा करे॥ ६-७॥
कटि प्रदेश से नीचे का भाग, जो मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्रों से सम्बद्ध है, उसमें प्राण-प्रवाह की धारणा
स्थिर होने के बाद क्रमशः नाभि, हृदय, कण्ठ एवं उससे ऊपर मन-बुद्धि (आज्ञा-सहस्रार आदि) तक प्राण-प्रवाह द्वारा
धारणा को दृढ़ करने का संकेत आगे के मंत्रों में किया गया है-
तत्र नाडी सुषुम्ना तु नाडीभिर्बहुभिर्वृता।
अणुरक्ताश्च पीताश्च कृष्णास्ताम्रविलोहिताः ॥ ८ ॥
वहाँ पर इड़ा, पिङ्गला आदि दस नाड़ियों से आवृत सुषुम्ना नाम की ब्रह्म नाड़ी स्थित है। वहाँ भी
अनेक नाड़ियाँ स्थित हैं, जो अति सूक्ष्म, लाल, पीली, काली एवं ताँबे के रंग की हैं॥ ८॥
अतिसूक्ष्मां च तन्वीं च शुक्लां नाडीं समाश्रयेत्।
ततः संचारयेत्प्राणानूर्णनाभीव तन्तुना ॥ ९ ॥
वहाँ पर जो नाड़ी अति सूक्ष्म, पतली एवं शुक्ल वर्ण की है, उसका आश्रय प्राप्त करना चाहिए। जिस
प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) अपनी लार के तन्तुओं द्वारा गतिशील होती है, उसी प्रकार योगी को उस नाड़ी
मण्डल में प्राणों को संचरित करना चाहिए॥ ९॥
[मकड़ी अपने ही अंश से सूक्ष्म तन्तु पैदा करती है, फिर उन्हीं तन्तुओं के सहारे से इच्छित दिशाओं
में गमन करती है। नाड़ी तन्तु प्राण द्वारा ही सृजित होते हैं और उन्हीं के माध्यम से प्राणशक्ति को काया
तन्त्र में गतिशील किया जाता है।]
ततो रक्तोत्पलाभासं हृदयायतनं महत्।
दहरं पुण्डरीकं तद् वेदान्तेषु निगद्यते ॥ १० ॥
तद्भित्त्वा कण्ठमायाति तां नाडीं पूरयन्यतः।
मनसस्तु परं गुह्यं सुतीक्ष्णं बुद्धिनिर्मलम् ॥ ११ ॥

मन्त्र २१ ९३

उस (नाभि) के बाद वेदान्त में जिसे दहर या पुण्डरीक कहा गया है, वह महत् आयतन वाला हृदय
क्षेत्र है। वह क्षेत्र रक्त कमल की तरह सदा प्रकाशित रहता है। उस (हृदयक्षेत्र) के बाद नाड़ियों को पूरित
करता हुआ (प्राण-प्रवाह) कण्ठ में आता है। उसके बाद मनःक्षेत्र और उससे परे गुह्य, निर्मल और तीक्ष्ण
बुद्धि का स्थान है॥ १०-११॥
पादस्योपरि यन्मर्म तद्रूपं नाम चिन्तयेत्। मनोद्वारेण तीक्ष्णेन योगमाश्रित्य नित्यशः ॥१२॥
इन्द्रवज्र इति प्रोक्तं मर्मजङ्घानुकृन्तनम्। तद्ध्यानबलयोगेन धारणाभिर्निकृन्तयेत्॥१३॥
ऊर्वोर्मध्ये तु संस्थाप्य मर्मप्राणविमोचनम्। चतुरभ्यासयोगेन छिन्देदनभिशङ्कितः॥१४॥
इस प्रकार पैरों के ऊपर जो मर्म स्थान हैं, उनके नाम-रूप का चिन्तन करे। नित्य योगाभ्यास का
आश्रय लेकर तीक्ष्ण मन के द्वारा जंघाओं से लगा हुआ जो 'इन्द्रवज्र' नामक क्षेत्र है, उसका छेदन करे। वहाँ
उरुओं के बीच मर्म स्थलों का विमोचन करने वाले प्राण को ध्यान बल और धारणा के योग से स्थापित
करके योगाभ्यास द्वारा मन की तीक्ष्ण धारणा रो, निःशंक होकर (मूलाधार से हृदय पर्यन्त) चारों मर्म स्थलों
का छेदन (भेदन) करे॥ १२-१४॥
ततः कण्ठान्तरे योगी समूहं नाडिसंचयम्। एकोत्तरं नाडिशतं तासां मध्ये परा स्थिरा ॥१५॥
सुषुम्ना तु परे लीना विरजा ब्रह्मरूपिणी। इडा तिष्ठति वामेन पिङ्गला दक्षिणेन च ॥१६॥
इसके बाद योगी कण्ठ के अन्दर स्थित नाड़ी समूह में प्राणों को संचरित करे। उस नाड़ी समूह में एक
सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनके मध्य में पराशक्ति स्थित है। सुषुम्ना नाड़ी परम तत्त्व में लीन रहती है और विरजा
नाड़ी ब्रह्ममय है। इड़ा का निवास बायीं ओर है और पिङ्गला दाहिनी ओर स्थित है॥ १५-१६॥
तयोर्मध्ये वरं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित्। द्वासप्ततिसहस्राणि प्रति नाडीषु तैतिलम् ॥ १७॥
इन (इड़ा एवं पिङ्गला) दोनों नाड़ियों के मध्य में जो श्रेष्ठ स्थान है, उसे जो जानता है, वह वेद (अर्थात्
शाश्वत ज्ञान) को जानने में समर्थ होता है। सभी सूक्ष्म नाड़ियों की संख्या बहत्तर हजार बतायी गयी है, जिन्हें
तैतिल कहा गया है॥ १७॥
छिन्द्यते ध्यानयोगेन सुषुम्नैका न छिद्यते। योगनिर्मलधारेण क्षुरेणानलवर्चसा ॥१८॥
छिन्देन्नाडीशतं धीरः प्रभावादिह जन्मनि। जातीपुष्पसमायोगैर्यथा वास्यति वै तिलम्॥१९॥
ध्यान योग के द्वारा समस्त नाड़ियों का छेदन किया जा सकता है; किन्तु एक सुषुम्ना ही ऐसी है,
जिसका कि छेदन नहीं किया जाता। धीर पुरुष को इस जन्म में आत्मा के प्रभाव से अग्निवत् तेजोमयी एवं
योग रूपी निर्मल धार से युक्त (धारणा रूपी) छुरी से सैकड़ों (सभी) नाड़ियों का छेदन करना चाहिए। इससे
नाड़ियाँ उसी तरह से सुवास युक्त हो जाती हैं, जिस तरह जाती (चमेली) के पुष्प से तिल (का तैल)
सुवासित हो जाते हैं॥ १८-१९॥
एवं शुभाशुभैर्भावैः सा नाडी तां विभावयेत्। तद्भाविताः प्रपद्यन्ते पुनर्जन्मविवर्जिताः॥२०॥
इस प्रकार योगी को चाहिए कि वह शुभाशुभ भावों से युक्त विभिन्न नाड़ियों को समझे। उनसे परे
सुषुम्ना नाड़ी में धारणा स्थिर करने से योगी पुनर्जन्म से रहित होकर शाश्वत परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है॥ २०
तपोविजितचित्तस्तु निःशब्दं देशमास्थितः। निःसङ्गस्तत्त्वयोगज्ञो निरपेक्षः शनैः शनैः ॥२१॥
जिस व्यक्ति ने तप के द्वारा अपने चित्त को जीत लिया है, वह व्यक्ति शब्दरहित, एकान्त, निर्जन स्थान
में स्थित होकर निःसङ्ग तत्त्व के योग का अभ्यास करे तथा शनैः-शनैः निरपेक्ष हो जाए॥ २१॥

९४ क्षुरिकोपनिषद्
पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कः खमुत्क्रमेत्। छिन्नपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा ॥२२॥
जिस प्रकार बन्धन-जाल को काटकर हंस निःशंक होकर आकाश में गमन कर जाता है, उसी प्रकार
योगी मनुष्य इस योग के अभ्यास द्वारा सभी बन्धनों के कट जाने के पश्चात् बन्धन-मुक्त होकर संसार-सागर
से सदा के लिए पार हो जाता है॥ २२॥
यथा निर्वाणकाले तु दीपो दग्ध्वा लयं व्रजेत्।
तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत्॥ २३॥
जिस प्रकार निर्वाण काल में (बुझने के समय) दीप ज्योति (दीपक की तेल-बाती) सभी को
जलाकर स्वयं परम प्रकाश में लीन हो जाती है, वैसे ही योगी मनुष्य अपने सभी कर्मों को योगाग्नि से भस्म
करके अविनाशी परमात्म तत्त्व में लीन हो जाता है॥ २३॥
प्राणायामसुतीक्ष्णेन मात्राधारेण योगवित्।
वैराग्योपलगृष्टेन छित्त्वा तं तु न बध्यते॥ २४॥
वैराग्य रूपी पत्थर पर ॐकार युक्त प्राणायाम से घिसकर तीक्ष्ण की गयी धारणा रूपी छुरी से संसार
के (विषयादि) सूत्रों के काटने वाले योगी को सांसारिक बन्धन बाँध नहीं पाते॥ २४॥
अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामात्प्रमुच्यते। सर्वैषणाविनिर्मुक्तश्छित्त्वा तन्तुं न बध्यते
छित्त्वा तन्तुं न बध्यते। इत्युपनिषत्॥ २५॥
जब वह (योगी मनुष्य) कामनाओं से छूट जाता है तथा एषणाओं से रहित हो जाता है, तभी (वह)
अमृतत्व को प्राप्त कर सकता है और पुनः बन्धनों में नहीं बँधता। क्षुरिकोपनिषद् का यही रहस्य है॥ २५॥
ॐ सह नाववतु ............इति शान्तिः॥
॥ इति क्षुरिकोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ जाबालदर्शनापानषद् ॥
यह उपनिषद् सामवेदीय है। इसे 'दर्शनोपनिषद्' भी कहा जाता है। इसमें कुल दस खण्ड हैं, जिसमें
भगवान् विष्णु के अवतार दत्तात्रेय जी और उनके शिष्य सांकृति का 'अष्टांगयोग' के विषय में विस्तृत प्रश्नोत्तर
रूप में वर्णन हुआ है।
प्रथम खण्ड में योग के आठ अंगों तथा दस यमों का उल्लेख हुआ है। द्वितीय खण्ड में दस नियमों का
वर्णन है। तृतीय खण्ड में नौ प्रकार के यौगिक आसन बताए गये हैं। चतुर्थ खण्ड में नाड़ियों का परिचय तथा
आत्मतीर्थ और आत्मज्ञान की महिमा वर्णित की गई है। पंचम खण्ड में नाड़ी शोधन की प्रक्रिया एवं
आत्मशोधन की विधियों का वर्णन है। छठे खण्ड में प्राणायाम की विधि, उसके प्रकार, फल तथा प्रयोग का
उल्लेख किया गया है। सातवें में प्रत्याहार के विविध प्रकारों तथा उसके फल का विवरण है। आठवें एवं नवें
में धारणा तथा ध्यान का वर्णन है। दोनों के दो-दो प्रकारों का भी उल्लेख किया गया है। अन्तिम दसवें खण्ड
में समाधि अवस्था का वर्णन हुआ है। साथ ही उसके फल का भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार इस
उपनिषद् को पूर्णतया 'योगपरक' कहा जा सकता है।
ॐ आप्यायन्तु...................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद् )
॥ प्रथमः खण्डः ॥
दत्तात्रेयो महायोगी भगवान्भूतभावनः। चतुर्भुजो महाविष्णुर्योगसाम्राज्यदीक्षितः ॥ १ ॥
तस्य शिष्यो मुनिवरः सांकृतिर्नाम भक्तिमान् । पप्रच्छ गुरुमेकान्ते प्राञ्जलिर्विनयान्वितः ॥२ ॥
भगवन्ब्रूहि मे योगं साष्टाङ्गं सप्रपञ्चकम् । येन विज्ञातमात्रेण जीवन्मुक्तो भवाम्यहम् ॥३ ॥
समस्त भूत-प्राणियों के पालक चतुर्भुज भगवान् विष्णु, योगिराज भगवान् दत्तात्रेय के रूप में प्रादुर्भूत
हुए। भगवान् दत्तात्रेय जी योग-साम्राज्य (के अधिपति रूप) में दीक्षित हैं। उनके शिष्य मुनिश्रेष्ठ साङ्कृति
नाम से प्रख्यात हैं। वे गुरु के परम भक्त हुए। उन्होंने एक दिन एकान्त में अपने गुरुदेव से विनयावनत होकर
पूछा-'हे भगवन्! अष्टांगयोग का मेरे लिए सविस्तार वर्णन कीजिए ,जिसे जानकर मैं जीवन्मुक्त हो सकूँ' ॥
सांकृते शृणु वक्ष्यामि योगं साष्टाङ्गदर्शनम्। यमश्च नियमश्चैव तथैवासनमेव च ॥ ४ ॥
प्राणायामस्तथा ब्रह्मन्प्रत्याहारस्ततः परम्। धारणा च तथा ध्यानं समाधिश्चाष्टमं मुने ॥ ५ ॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयार्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चैव यमा दश ॥ ६ ॥
महायोगी दत्तात्रेय जी ने अपने शिष्य से कहा- 'हे साङ्कृते ! मैं अष्टांग योग दर्शन का वर्णन करता हूँ।
तुम उसका श्रवण करो। हे ब्रह्मन् ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि ही
योग के आठ अंग हैं। इनमें यम के दस भेद बताये गये हैं। वे इस प्रकार हैं- १. अहिंसा, २. सत्य, ३. अस्तेय,
४.ब्रह्मचर्य, ५. दया, ६. क्षमा, ७. सरलता, ८. धृति, ९. मिताहार एवं १०. बाह्याभ्यन्तर की पवित्रता॥ ४-६॥
वेदोक्तेन प्रकारेण विना सत्यं तपोधन। कायेन मनसा वाचा हिंसा हिंसा न चान्यथा ॥ ७ ॥
आत्मा सर्वगतोऽच्छेद्यो न ग्राह्य इति या मतिः। सा चाहिंसा वरा प्रोक्ता मुने वेदान्तवेदिभिः ॥
हे तपोधन ! वेद में वर्णित विधि के अतिरिक्त मन, वाणी एवं शरीर के द्वारा यदि किसी को किसी भी
तरह से पीड़ित किया जाता है अथवा उससे प्राणों को शरीर से अलग कर दिया जाता है, तो वही वास्तविक
हिंसा कही गयी है। इससे भिन्न और कोई हिंसा नहीं है। हे मुने ! यह भाव रखना चाहिए कि आत्म तत्त्व सर्वत्र

९६ जाबालदर्शनोपनिषद्
व्याप्त है, शस्त्र आदि के द्वारा वह नष्ट नहीं हो सकता। हाथों या अन्य इन्द्रियों के द्वारा भी आत्मा का ग्रहण होना
असम्भव ही है। अतः इस तरह से जो श्रेष्ठ बुद्धि है, उसे ही वेदान्त के मर्मज्ञ विद्वानों ने श्रेष्ठ अहिंसा कहा है॥
चक्षुरादीन्द्रियैर्दृष्टं श्रुतं घ्रातं मुनीश्वर। तस्यैवोक्तिर्भवेत्सत्यं विप्र तन्नान्यथा भवेत् ॥ ९॥
सर्वं सत्यं परं ब्रह्म न चान्यदिति या मतिः। तच्च सत्यं वरं प्रोक्तं वेदान्तज्ञानपारगैः ॥ १० ॥
अन्यदीये तृणे रत्ने काञ्चने मौक्तिकेऽपि च। मनसा विनिवृत्तिर्या तदस्तेयं विदुर्बुधाः ॥११॥
आत्मन्यानात्मभावेन व्यवहारविवर्जितम् । यत्तदस्तेयमित्युक्तमात्मविद्भिर्महामुने ॥ १२॥
हे सांकृते! चक्षु आदि इन्द्रियों के माध्यम से जो जिस रूप में देखा, सुना, सूँघा और समझा हुआ
विषय है, उसको उसी रूप में वाक्-इन्द्रिय के द्वारा या फिर संकेत आदि के द्वारा कहना ही 'सत्य' है। इसके
अतिरिक्त सत्य का और कोई भी स्वरूप नहीं है। सभी कुछ सत्य रूप परब्रह्म परमात्मा ही है, परमात्मा के
अतिरिक्त अन्य और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। इस तरह का जो दृढ़ निश्चय है, उसी को वेदान्त ज्ञान के
विशेषज्ञों ने सर्वश्रेष्ठ सत्य बताया है। दूसरे (व्यक्ति) के रत्न-आभूषण, सुवर्ण अथवा मणिमुक्तक आदि से
लेकर तृण आदि के लिए मन में भी कभी प्राप्त करने की इच्छा न करना, दूसरों की बड़ी अथवा छोटी वस्तु
के लिए मन में कभी लोभ-लालच न लाना ही अस्तेय है। विद्वज्जनों ने इसी को ही 'अस्तेय' अर्थात्- चोरी
न करना कहा है। हे मुने! इस संसार के समस्त व्यवहारों में अनात्म बुद्धि रखकर आत्मा से दूर रखने का जो
भाव है, उसी को आत्मज्ञानी जनों ने अस्तेय कहा है॥ ९-१२॥
कायेन वाचा मनसा स्त्रीणां परिविवर्जनम्। ऋतौ भार्या तदा स्वस्य ब्रह्मचर्यं तदुच्यते ॥१३॥
ब्रह्मभावे मनश्चारं ब्रह्मचर्यं परन्तप ॥ १४॥ स्वात्मवत्सर्वभूतेषु कायेन मनसा गिरा।
अनुज्ञा या दया सैव प्रोक्ता वेदान्तवेदिभिः ॥ १५॥
मन, वचन एवं शरीर के द्वारा स्त्रियों के सहवास का त्याग और ऋतुकाल में मात्र अपनी ही पत्नी से
सम्बन्ध रखना 'ब्रह्मचर्य' कहा गया है या फिर काम-क्रोधादि रिपुओं को कष्ट पहुँचाने वाले मन को परब्रह्म
अविनाशी परमात्म तत्त्व के ध्यान में लगाये रखना सबसे श्रेष्ठ 'ब्रह्मचर्य' है। समस्त भूतप्राणियों को अपनी ही
भाँति जानकर उनके प्रति मन, वचन एवं शरीर द्वारा आत्मीयता का अनुभव करना (अर्थात् अपनी ही तरह
उनके दुःखों को दूर करने तथा अधिक से अधिक सुख पहुँचाने का प्रयास करना) ही वेदवेत्ता विद्वज्जनों के
द्वारा 'दया' बताई गयी है॥ १३-१५॥
पुत्रे मित्रे कलत्रे च रिपौ स्वात्मनि संततम्। एकरूपं मुने यत्तदार्जवं प्रोच्यते मया ॥ १६॥
पुत्र, मित्र, स्त्री, रिपु एवं स्व-आत्मा में भी सदैव मन का समान भाव रखना ही आर्जव (सरलता) है॥
कायेन मनसा वाचा शत्रुभिः परिपीडिते। बुद्धिक्षोभनिवृत्तिर्या क्षमा सा मुनिपुङ्गव ॥ १७॥
हे श्रेष्ठ मुने! रिपुओं के द्वारा मन, वचन एवं शरीर से कष्ट दिये जाने पर भी बुद्धि में थोड़ा भी क्षोभ न
आने देना ही 'क्षमा' कहलाता है॥ १७॥
वेदादेव विनिर्मोक्षः संसारस्य न चान्यथा। इति विज्ञाननिष्पत्तिर्धृतिः प्रोक्ता हि वैदिकैः ।
अहमात्मा न चान्योऽस्मीत्येवमप्रच्युता मतिः ॥ १८ ॥
वेद-ज्ञान से ही सम्पूर्ण जगत् मोक्ष को प्राप्त होता है और अन्य किन्हीं भी कारणों से नहीं। ऐसा जो दृढ़
संकल्प है, उसी को ही वेदज्ञों ने धृति की उपाधि प्रदान की है या फिर 'मैं आत्मा हूँ,' आत्मा से पृथक् दूसरा
और कुछ भी नहीं हूँ। इस प्रकार से कभी भी विचलित न होने वाली बुद्धि ही श्रेष्ठ-उत्तम 'धृति' है ॥१८॥

खण्ड २ मन्त्र ४ ९७
अल्पमृष्टाशनाभ्यां च चतुर्थांशावशेषकम्। तस्माद्योगानुगुण्येन भोजनं मितभोजनम् ॥ १९ ॥
अल्प मात्रा में शुद्ध-सात्त्विक भोजन ग्रहण करना,पेट के दो भाग भोजन से,तृतीय भाग को जल से तथा
चौथे भाग को वायु केलिए खाली छोड़ना ही योगमार्ग के अनुकूल भोजन है,वही मिताहार कहलाता है ॥ १९ ॥
स्वदेहमलनिर्मोक्षो मृज्जलाभ्यां महामुने। यत्तच्छौचं भवेद्बाह्यं मानसं मननं विदुः। अहं शुद्ध
इति ज्ञानं शौचमाहुर्मनीषिणः ॥ २० ॥
हे महामुने ! अपने शरीर के मल को मिट्टी एवं जल से परिमार्जित किया जाता है, इस कृत्य को 'बाह्य
शौच' कहते हैं और मन के माध्यम से श्रेष्ठ, पवित्र भावों का जो चिन्तन-मनन किया जाता है, उसे 'मानसिक
शौच' कहा गया है। इसके अतिरिक्त विद्वज्जन 'मैं विशुद्ध आत्मा हूँ,' इस श्रेष्ठ ज्ञान को ही शौच कहते हैं ॥ २०
अत्यन्तमलिनो देहो देही चात्यन्तनिर्मलः। उभयोरन्तरं ज्ञात्वा कस्य शौचं विधीयते ॥ २१ ॥
यह शरीर अन्तः एवं बाह्य दोनों ओर से ही अत्यन्त मलिन है और शरीर को धारण करने वाला आत्मा
अत्यन्त पवित्र, मलरहित है। इस प्रकार देह एवं आत्मा के अन्तर का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर फिर किसको
पवित्रतम बनाया जाये ॥ २१ ॥
ज्ञानशौचं परित्यज्य बाह्ये यो रमते नरः। स मूढः काञ्चनं त्यक्त्वा लोष्टं गृह्णाति सुव्रत ॥ २२ ॥
ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। न चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित् ॥२३ ॥
हे श्रेष्ठव्रती मुने ! ज्ञानरूप पवित्रता को भुलाकर जो साधक केवल बाहरी पवित्रता में ही रमा रहता है,
वह सुवर्ण का त्याग करके मिट्टी के ढेलों का संग्रह करने वाले मूर्ख की ही भाँति है। जो योगी ज्ञानरूप अमृत
से तृप्त एवं कृतार्थ हो जाता है, उसके लिए इस जगत् में कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता है और यदि रह जाता
है, तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है ॥ २२-२३ ॥
लोकत्रयेऽपि कर्तव्यं किंचिन्नास्त्यात्मवेदिनाम् ॥ २४॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मुनेऽहिंसादि साधनैः।
आत्मानमक्षरं ब्रह्म विद्धि ज्ञानात्तु वेदनात् ॥ २५ ॥
आत्मज्ञानी महान् आत्माओं के लिए तीनों लोकों में भी कहीं कोई कर्तव्य नहीं है। अतः हे मुनीश्वर !
तुम सभी तरह से प्रयत्न करके अहिंसा आदि साधनों के माध्यम से अनुभवयुक्त ज्ञान को प्राप्त करके आत्मा
को अविनाशी ब्रह्म के रूप में जानो ॥ २४-२५ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
तपः संतोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम्। सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ॥ १ ॥
एते च नियमाः प्रोक्तास्तान्वक्ष्यामि क्रमाच्छृणु ॥ २ ॥
तप, संतोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर की पूजा, लज्जा, जप, मति, व्रत एवं सिद्धान्त श्रवण करना-ये दस
नियम बताये गये हैं। नीचे क्रमानुसार इनका उल्लेख करता हूँ ॥ १-२ ॥
वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः। शरीरशोषणं यत्तत्तपं इत्युच्यते बुधैः ॥३॥
वेद में वर्णित कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रतों के द्वारा शरीर क्षीण करने को ही विद्वज्जन तप कहते हैं ॥ ३ ॥
को वा मोक्षः कथं तेन संसारं प्रतिपन्नवान्। इत्यालोकनमर्थज्ञास्तपः शंसन्ति पण्डिताः ॥४॥

९८ जाबालदर्शनापानिषद्
मोक्ष क्या है और आत्मा कैसे तथा किस कारण से संसार-बन्धन को प्राप्त हुआ है, इन सभी बातों के विचार
को ही तत्त्वज्ञानी जन 'तप' कहते हैं ॥ ४ ॥
यदृच्छालाभतो नित्यं प्रीतिर्या जायते नृणाम्। तत्संतोषं विदुः प्राज्ञाः परिज्ञानैकतत्पराः ॥५॥
ब्रह्मादिलोकपर्यन्ताद्विरक्त्या यल्लभेतप्रियम्। सर्वत्र विगतस्नेहः संतोषं परमं विदुः। श्रौते स्मार्ते
च विश्वासो यत्तदास्तिक्यमुच्यते ॥ ६ ॥
दैव-इच्छा से जो भी कुछ प्राप्त हो जाए, उतने मात्र से ही हृदय में जो प्रसन्नता सदैव बनी रहती है, ज्ञानी
जन उसी को 'संतोष' मानते हैं अथवा सर्वत्र अनासक्त रहकर ब्रह्मा आदि देवताओं के लोक तक के सुखों से
विरक्त होने के कारण मन में जो प्रसन्नता बनी रहती है, महान् पुरुष उसी को श्रेष्ठ संतोष मानते हैं। वेदों एवं
स्मृति-ग्रन्थों में कहे हुए धर्म में दृढ़ आत्मविश्वास होने को ही 'आस्तिकता' कहते हैं ॥ ५-६॥
न्यायार्जितधनं श्रान्ते श्रद्धया वैदिके जने। अन्यद्वा यत्प्रदीयन्ते तद्दानं प्रोच्यते मया ॥ ७॥
न्यायोपार्जित जो धन संकटग्रस्त, क्लेश आदि से पीड़ित वेदज्ञ पुरुषों अथवा श्रेष्ठ आचरण वालों को
श्रद्धापूर्वक दिया जाता है, उसी धन को मैं 'दान' की श्रेणी में मानता हूँ ॥ ७ ॥
रागाद्यपेतं हृदयं वाग्दुष्टानृतादिना। हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वरपूजनम् ॥८॥
राग आदि विकारों से मुक्त हृदय, असत्य भाषण आदि दोषों से परे वाणी एवं हिंसा आदि दोषों से मुक्त
(श्रेष्ठ भगवत्-प्रीत्यर्थ) कर्म ही 'ईश्वर-पूजन' है ॥ ८ ॥
सत्यं ज्ञानमनन्तं च परानन्दं परं ध्रुवम्। प्रत्यगित्यवगन्तव्यं वेदान्तश्रवणं बुधाः ॥ ९॥
यह सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त, सर्वोत्कृष्ट एवं नित्य है। अविचल एवं परमानन्द स्वरूप यही अन्तर्यामी
आत्मा है। इस सिद्धान्त को बारम्बार श्रवण कर उसके अनुकूल विश्वास करना ही 'सिद्धान्त-श्रवण' है॥ ९॥
वेदलौकिकमार्गेषु कुत्सितं कर्म यद्भवेत्। तस्मिन्भवति या लज्जा हीः सैवेति प्रकीर्तिता।
वैदिकेषु च सर्वेषु श्रद्धा या सा मतिर्भवेत् ॥ १० ॥
वैदिक एवं लौकिक मार्गों में जो निन्दित कार्य कहे गये हैं, उनको करने में जो स्वभावतः संकोच होता
है, उसे ही लज्जा के रूप में जाना जाता है। वेदोक्त उपदेशों में पूर्णतः श्रद्धा रखना ही मति है॥ १० ॥
गुरुणा चोपदिष्टोऽपि तत्र संबन्धवर्जितः। वेदोक्तेनैव मार्गेण मन्त्राभ्यासो जपः स्मृतः ॥११॥
गुरुजनों के द्वारा अनुमति मिल जाने पर भी वेद के विरुद्ध मार्ग का अवलम्बन न प्राप्त कर वेदोक्त
विधि से मन्त्रों का बारम्बार उच्चारण करना ही 'जप' कहा गया है॥ ११ ॥
कल्पसूत्रे तथा वेदे धर्मशास्त्रे पुराणके। इतिहासे च वृत्तिर्या स जपः प्रोच्यते मया ॥ १२॥
जपस्तु द्विविधः प्रोक्तो वाचिको मानसस्तथा ॥१३॥
वेद, कल्पसूत्र, धर्मशास्त्र, पुराण एवं इतिहास आदि में मन की वृत्तियों को लगाये रखना, मेरे विचार से
'जप' है। जप के दो प्रकार कहे गये हैं, प्रथम वाचिक जप एवं द्वितीय मानसिक जप ॥ १२-१३
वाचिकोपांशुरुच्चैश्च द्विविधः परिकीर्तितः। मानसो मननध्यानभेदाद्वैविध्यमाश्रितः ॥ १४॥
वाचिक जप के दो प्रकार माने गये हैं, प्रथम 'उच्चस्वरयुक्त' और द्वितीय 'उपांशु' (फुसफुसाहट
युक्त)। इसी तरह से मानसिक जप भी 'मनन' एवं 'ध्यान' के भेद से दो प्रकार का है॥ १४॥
उच्चैर्जपादुपांशुश्च सहस्त्रगुणमुच्यते । मानसश्च तथोपांशोः सहस्त्रगुणमुच्यते ॥ १५ ॥
उच्चैर्जपश्च सर्वेषां यथोक्तफलदो भवेत्। नीचैः श्रोत्रेण चेन्मन्त्रः श्रुतश्चेत्रिष्फलं भवेत् ॥१६ ॥