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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

९६ जाबालदर्शनोपनिषद्
व्याप्त है, शस्त्र आदि के द्वारा वह नष्ट नहीं हो सकता। हाथों या अन्य इन्द्रियों के द्वारा भी आत्मा का ग्रहण होना
असम्भव ही है। अतः इस तरह से जो श्रेष्ठ बुद्धि है, उसे ही वेदान्त के मर्मज्ञ विद्वानों ने श्रेष्ठ अहिंसा कहा है॥
चक्षुरादीन्द्रियैर्दृष्टं श्रुतं घ्रातं मुनीश्वर। तस्यैवोक्तिर्भवेत्सत्यं विप्र तन्नान्यथा भवेत् ॥ ९॥
सर्वं सत्यं परं ब्रह्म न चान्यदिति या मतिः। तच्च सत्यं वरं प्रोक्तं वेदान्तज्ञानपारगैः ॥ १० ॥
अन्यदीये तृणे रत्ने काञ्चने मौक्तिकेऽपि च। मनसा विनिवृत्तिर्या तदस्तेयं विदुर्बुधाः ॥११॥
आत्मन्यानात्मभावेन व्यवहारविवर्जितम् । यत्तदस्तेयमित्युक्तमात्मविद्भिर्महामुने ॥ १२॥
हे सांकृते! चक्षु आदि इन्द्रियों के माध्यम से जो जिस रूप में देखा, सुना, सूँघा और समझा हुआ
विषय है, उसको उसी रूप में वाक्-इन्द्रिय के द्वारा या फिर संकेत आदि के द्वारा कहना ही 'सत्य' है। इसके
अतिरिक्त सत्य का और कोई भी स्वरूप नहीं है। सभी कुछ सत्य रूप परब्रह्म परमात्मा ही है, परमात्मा के
अतिरिक्त अन्य और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। इस तरह का जो दृढ़ निश्चय है, उसी को वेदान्त ज्ञान के
विशेषज्ञों ने सर्वश्रेष्ठ सत्य बताया है। दूसरे (व्यक्ति) के रत्न-आभूषण, सुवर्ण अथवा मणिमुक्तक आदि से
लेकर तृण आदि के लिए मन में भी कभी प्राप्त करने की इच्छा न करना, दूसरों की बड़ी अथवा छोटी वस्तु
के लिए मन में कभी लोभ-लालच न लाना ही अस्तेय है। विद्वज्जनों ने इसी को ही 'अस्तेय' अर्थात्- चोरी
न करना कहा है। हे मुने! इस संसार के समस्त व्यवहारों में अनात्म बुद्धि रखकर आत्मा से दूर रखने का जो
भाव है, उसी को आत्मज्ञानी जनों ने अस्तेय कहा है॥ ९-१२॥
कायेन वाचा मनसा स्त्रीणां परिविवर्जनम्। ऋतौ भार्या तदा स्वस्य ब्रह्मचर्यं तदुच्यते ॥१३॥
ब्रह्मभावे मनश्चारं ब्रह्मचर्यं परन्तप ॥ १४॥ स्वात्मवत्सर्वभूतेषु कायेन मनसा गिरा।
अनुज्ञा या दया सैव प्रोक्ता वेदान्तवेदिभिः ॥ १५॥
मन, वचन एवं शरीर के द्वारा स्त्रियों के सहवास का त्याग और ऋतुकाल में मात्र अपनी ही पत्नी से
सम्बन्ध रखना 'ब्रह्मचर्य' कहा गया है या फिर काम-क्रोधादि रिपुओं को कष्ट पहुँचाने वाले मन को परब्रह्म
अविनाशी परमात्म तत्त्व के ध्यान में लगाये रखना सबसे श्रेष्ठ 'ब्रह्मचर्य' है। समस्त भूतप्राणियों को अपनी ही
भाँति जानकर उनके प्रति मन, वचन एवं शरीर द्वारा आत्मीयता का अनुभव करना (अर्थात् अपनी ही तरह
उनके दुःखों को दूर करने तथा अधिक से अधिक सुख पहुँचाने का प्रयास करना) ही वेदवेत्ता विद्वज्जनों के
द्वारा 'दया' बताई गयी है॥ १३-१५॥
पुत्रे मित्रे कलत्रे च रिपौ स्वात्मनि संततम्। एकरूपं मुने यत्तदार्जवं प्रोच्यते मया ॥ १६॥
पुत्र, मित्र, स्त्री, रिपु एवं स्व-आत्मा में भी सदैव मन का समान भाव रखना ही आर्जव (सरलता) है॥
कायेन मनसा वाचा शत्रुभिः परिपीडिते। बुद्धिक्षोभनिवृत्तिर्या क्षमा सा मुनिपुङ्गव ॥ १७॥
हे श्रेष्ठ मुने! रिपुओं के द्वारा मन, वचन एवं शरीर से कष्ट दिये जाने पर भी बुद्धि में थोड़ा भी क्षोभ न
आने देना ही 'क्षमा' कहलाता है॥ १७॥
वेदादेव विनिर्मोक्षः संसारस्य न चान्यथा। इति विज्ञाननिष्पत्तिर्धृतिः प्रोक्ता हि वैदिकैः ।
अहमात्मा न चान्योऽस्मीत्येवमप्रच्युता मतिः ॥ १८ ॥
वेद-ज्ञान से ही सम्पूर्ण जगत् मोक्ष को प्राप्त होता है और अन्य किन्हीं भी कारणों से नहीं। ऐसा जो दृढ़
संकल्प है, उसी को ही वेदज्ञों ने धृति की उपाधि प्रदान की है या फिर 'मैं आत्मा हूँ,' आत्मा से पृथक् दूसरा
और कुछ भी नहीं हूँ। इस प्रकार से कभी भी विचलित न होने वाली बुद्धि ही श्रेष्ठ-उत्तम 'धृति' है ॥१८॥