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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 414 में से

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पृष्ठ 90

९२ क्षुरिकोपनिषद्
जैसा कि स्वयंभू ब्रह्माजी का कथन है और जो भाव वेद के तत्त्वार्थ में सन्निहित है, तदनुसार कोलाहल
रहित स्थान में इसके लिए उचित आसन में स्थित होकर जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने संकल्प से समेट
लेता है, वैसे ही मन और हृदय (के भावों) को निरुद्ध (बिखरने से रोक) करे तथा ॐ कार की बारह
मात्राओं के माध्यम से (उतने समय में) धीरे-धीरे प्राण रूप सर्वात्मा को (पूरक द्वारा) अपने अन्दर पूरित
करे। इस समय (प्राण के) सभी द्वारों को (बन्धों के माध्यम से) रोक करके छाती, मुख, कमर, गर्दन (को
ऊपर की ओर खींचकर सीधा) तथा हृदय को कुछ उन्नत रखे। इस स्थिति में नासिका द्वारा संचरित प्राण को
(कुम्भक के द्वारा) सभी स्थानों में धारण करे। जहाँ-तहाँ प्राणों का संचरण हो जाने पर फिर धीरे-धीरे वायु
को (रेचक क्रिया द्वारा) बाहर छोड़ दे॥ २-५ ॥
[ ॐ कार में तीन मात्राएँ होती हैं। १२ मात्रा का अर्थ हुआ, ४ बार ओंकार के सहज उच्चारण जितना समय
लगाकर पूरक करे। उसी अनुसार कुम्भक एवं रेचक की मात्रा निश्चित करे।]
स्थिरमात्रादृढं कृत्वा अङ्गुष्ठेन समाहितः। द्वे तु गुल्फे प्रकुर्वीत जङ्घे चैव त्रयस्त्रयः ॥ ६ ॥
द्वे जानुनी तथोरुभ्यां गुदे शिश्ने त्रयस्त्रयः। वायोरायतनं चात्र नाभिदेशे समाश्रयेत् ॥ ७ ॥
धारणा युक्त उक्त प्राणायाम का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर, पूरी सावधानी के साथ पैर के अंगूठे सहित
टखनों में दो-दो बार, (टखनों और घुटनों के बीच के भाग) जंघाओं या पिंडलियों में तीन-तीन बार, घुटनों
और ऊरु (जाँघों) में दो-दो बार तथा गुदा एवं जननेन्द्रिय में तीन-तीन बार (प्राणायाम द्वारा) प्राणों के संचार
की धारणा करे। इसके बाद नाभि प्रदेश में प्राणों की धारणा करे॥ ६-७॥
कटि प्रदेश से नीचे का भाग, जो मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्रों से सम्बद्ध है, उसमें प्राण-प्रवाह की धारणा
स्थिर होने के बाद क्रमशः नाभि, हृदय, कण्ठ एवं उससे ऊपर मन-बुद्धि (आज्ञा-सहस्रार आदि) तक प्राण-प्रवाह द्वारा
धारणा को दृढ़ करने का संकेत आगे के मंत्रों में किया गया है-
तत्र नाडी सुषुम्ना तु नाडीभिर्बहुभिर्वृता।
अणुरक्ताश्च पीताश्च कृष्णास्ताम्रविलोहिताः ॥ ८ ॥
वहाँ पर इड़ा, पिङ्गला आदि दस नाड़ियों से आवृत सुषुम्ना नाम की ब्रह्म नाड़ी स्थित है। वहाँ भी
अनेक नाड़ियाँ स्थित हैं, जो अति सूक्ष्म, लाल, पीली, काली एवं ताँबे के रंग की हैं॥ ८॥
अतिसूक्ष्मां च तन्वीं च शुक्लां नाडीं समाश्रयेत्।
ततः संचारयेत्प्राणानूर्णनाभीव तन्तुना ॥ ९ ॥
वहाँ पर जो नाड़ी अति सूक्ष्म, पतली एवं शुक्ल वर्ण की है, उसका आश्रय प्राप्त करना चाहिए। जिस
प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) अपनी लार के तन्तुओं द्वारा गतिशील होती है, उसी प्रकार योगी को उस नाड़ी
मण्डल में प्राणों को संचरित करना चाहिए॥ ९॥
[मकड़ी अपने ही अंश से सूक्ष्म तन्तु पैदा करती है, फिर उन्हीं तन्तुओं के सहारे से इच्छित दिशाओं
में गमन करती है। नाड़ी तन्तु प्राण द्वारा ही सृजित होते हैं और उन्हीं के माध्यम से प्राणशक्ति को काया
तन्त्र में गतिशील किया जाता है।]
ततो रक्तोत्पलाभासं हृदयायतनं महत्।
दहरं पुण्डरीकं तद् वेदान्तेषु निगद्यते ॥ १० ॥
तद्भित्त्वा कण्ठमायाति तां नाडीं पूरयन्यतः।
मनसस्तु परं गुह्यं सुतीक्ष्णं बुद्धिनिर्मलम् ॥ ११ ॥