Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished429 pages

About this granth

Yatharth Geeta (यथार्थ गीता), "the Gita as it truly is", is Swami Adgadanand's Hindi commentary on the Bhagavad Gita, subtitled Manav Dharmashastra, "the scripture of humanity". Its cover presents it as an eternal explanation of the Gita "after a gap of 5,200 years". The author is a disciple of Paramahamsa Parmanand of the Anusuiya ashram at Chitrakoot, and the commentary draws on the meditative practice of that lineage.

The publisher's note describes him as a monk without academic degrees who regarded writing as a distraction from devotion but undertook this commentary as a divine command. The commentary reads the war of the Gita as an inner struggle, and yajna and karma as stages of meditative practice.

That reading shows in its chapter names, such as "Doubt and Despondency", "Inquiry into Action", "Incentive to Destroy the Foe", "Elucidation of the Yajna", "Yoga of Practice" and "Awakening of the Royal Knowledge", closing with a concluding section called Upasham. The scanned edition, from about 2015, is published by the Shri Paramhans Swami Adgadanandji Ashram Trust.

Page 423Permalink

३८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भी परमश्रेय की यथार्थ विधि को सामाजिक व्यवस्था से हटाकर अलग
प्रस्तुत किया।
गीता मनुष्य मात्र के लिये- भगवान ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश
‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’ (गीता, १/२०)- ठीक शस्त्र-सञ्चालन के समय
किया क्योंकि वह भली प्रकार जानते थे कि भौतिक संसार में कभी शान्ति
और सुख होता ही नहीं। अरबों लोगों की आहुति के उपरान्त भी जो विजेता
होंगे, वह भी विफल मनोरथ और अन्ततः उदास ही होंगे, इसलिये उन्होंने ऐसे
शाश्वत युद्ध का परिचय गीता के माध्यम से दिया, जिसमें एक बार विजय हो
जाने पर सदा रहनेवाली विजय, अनन्त विजय और अक्षय धाम है जो मानव
मात्र के लिये सदैव सुलभ है, जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है, प्रकृति और पुरुष
का संघर्ष है, अन्तःकरण में अशुभ का अन्त और शुभ परमात्मस्वरूप की
प्राप्ति का साधन है।
उत्तम अधिकारी के प्रति ही उन्होंने उसे व्यक्त किया। श्रीकृष्ण ने बार-
बार कहा कि तुझ अतिशय प्रीति रखनेवाले भक्त के प्रति हित की इच्छा से
कहता हूँ। यह अति गोपनीय है। अन्त में उन्होंने कहा- जो भक्त नहीं हो तो
प्रतीक्षा करो, उसको रास्ते पर लाओ, फिर उसी के लिये कहो। यही मनुष्य
मात्र के लिये यथार्थ कल्याण का एकमात्र साधन है, जिसका क्रमबद्ध वर्णन
श्रीकृष्णोक्त गीता है।
प्रस्तुत टीका- योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रसारित श्रीमद्भगवद्गीता के
आशय का यथावत् अनुवाद करने के कारण प्रस्तुत टीका का नाम ‘यथार्थ
गीता’ है। यह भगवान् की अन्तस्प्रेरणा पर आधारित है। गीता अपने में पूर्ण
साधन-ग्रन्थ है। सम्पूर्ण गीता में सन्देह का एक भी स्थल नहीं है। जहाँ कहीं
सन्देह है, वह बौद्धिक स्तर पर इसे जाना नहीं जा सकता है, इसलिये प्रतीत
होता है। अतः कहीं समझ में न आये तो किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य
में समझने का प्रयास करें।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

Page 424Permalink

निवेदन
'यथार्थ गीता' योगेश्वर श्रीकृष्ण की परम पुनीत
वाणी श्रीमद्भगवद्गीता का ही अर्थ है। इसमें आपके हृदय
में स्थित परमात्मा की प्राप्ति के विधान का प्राप्ति के
पश्चात् किया गया चित्रण है। अवहेलना की दृष्टि से
इसका उपयोग वर्जित है, अन्यथा हम अपने लक्ष्य की
जानकारी से वंचित रह जायेंगे। इसके श्रद्धापूर्वक अध्ययन
से मानव अपने कल्याण के साधन से भरपूर हो जाता है
और यत्किंचित् भी ग्रहण करेगा तो परमश्रेय को प्राप्त
कर लेगा; क्योंकि इस ईश्वर-पथ में आरम्भ का कभी
नाश नहीं होता।
– स्वामी अड़गड़ानन्द

Page 425Permalink

कैसेट प्रसारण में अध्यायों के पूर्व की भूमिका
१. केवल एक परमात्मा में श्रद्धा और समर्पण का सन्देश देनेवाली गीता सबको
पवित्र करने का खुला आमन्त्रण देती है। सृष्टि में कहीं भी रहनेवाले अमीर
अथवा गरीब, कुलीन तथा आदिवासी, पुण्यात्मा और पापी, स्त्री और पुरुष,
सदाचारी एवं अत्यन्त दुराचारी- सबका उसमें प्रवेश है। विशेषकर गीता
पापियों के ही उद्धार का सुगम पथ बताती है, पुण्यात्मा तो भजते ही हैं।
प्रस्तुत है उसी गीता की अद्वितीय व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ का कैसेट प्रसारण।
२. शास्त्र की रचना दो दृष्टियों से की जाती है- एक तो सामाजिक व्यवस्था और
संस्कृति को कायम रखना, जिससे लोग पूर्वजों के पदचिह्नों का अनुकरण
कर सकें तथा दूसरा यह कि वे शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लें। रामचरितमानस,
बाइबिल, कुरान इत्यादि में दोनों पक्षों का समावेश है; किन्तु भौतिक दृष्टि-
प्रधान होने के कारण मनुष्य समाजोपयोगी व्यवस्था को ही पकड़ पाता है।
आध्यात्मिक सूक्तियों को भी वह सामाजिक व्यवस्था के ही सन्दर्भ में देखने
लगता है। कहता है कि ऐसा तो शास्त्र में लिखा है। इसलिये वेदव्यास ने
दोनों के लिये एक ही ग्रन्थ महाभारत लिखते हुए भी आध्यात्मिक क्रिया का
संकलन गीता के रूप में अलग से किया, जिससे कि लोग इस मूल कल्याण-
पथ में भ्रान्ति का मिश्रण न कर सकें। उन्हीं आध्यात्मिक मूल्यों के साथ
प्रस्तुत है गीता का दिव्य सन्देश।
३. गीता किसी विशेष व्यक्ति, किसी जाति, वर्ग, पन्थ, देश-काल या किसी
रूढ़िग्रस्त सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह सार्वलौकिक तथा सार्वकालिक
धर्मशास्त्र है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति, प्रत्येक आयु के प्रत्येक स्त्री-
पुरुष के लिये, सबके लिये है। सचमुच गीता सम्पूर्ण मानव जाति का
धर्मशास्त्र है। और कितने गौरव की बात है कि गीता आपका धर्मशास्त्र है।
४. पूज्य भगवान महावीर, तथागत भगवान बुद्ध विज्ञ होते हुए भी लोकभाषाओं
में गीता के ही सन्देशवाहक हैं। आत्मा सत्य है और पूर्ण संयम से आत्मस्थिति
का विधान है- यह गीता का ही विचार है। बुद्ध ने उसी तत्त्व को सर्वज्ञ तथा
अविनाशी पद कहकर गीता के ही विचार को पुष्ट किया है। इतना ही नहीं

Page 426Permalink

अपितु विश्व वाङ्मय में धर्म के नाम पर जो कुछ भी सार-सर्वस्व है,
जैसे- एक ईश्वर, प्रार्थना, पश्चाताप, तप इत्यादि गीता के ही उपदेश हैं।
वही उपदेश स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी के मुखाब्ज से निःसृत यथार्थ गीता
कैसेट रूप में मानव की मुक्ति का दिव्य सन्देश बनकर उपस्थित है।
५. भारत की लोकगाथाओं में है कि सुकरात की शिष्य-परम्परा के मनीषी
अरस्तू ने अपने शिष्य सिकन्दर को भारत से गीताज्ञानी गुरु लाने का निर्देश
दिया था। गीता के ही एकेश्वरवाद को विश्व की विविध भाषाओं में मूसा,
ईसा तथा अनेक सूफी महात्माओं ने फैलाया। भाषान्तर होने से ये पृथक्-
पृथक् प्रतीत होते हैं, किन्तु सिद्धान्त गीता के ही हैं। अतः गीता मानव मात्र
का अतर्क्य धर्मशास्त्र है। गीता का आशय ‘यथार्थ गीता’ के रूप में प्रस्तुत
कर स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज ने मानवमात्र को एक अमूल्य
निधि दी है, जिसका कैसेट रूपान्तरण श्री जीतेन भाई के सौजन्य से हुआ
है। गीता के दसियों हजार अनुवादों के बीच देदीप्यमान इस व्याख्या के
आलोक में आप सब परमश्रेय के साधक बनें।
६. संसार में प्रचलित सभी धर्म गीता की दूरस्थ प्रतिध्वनि मात्र हैं। स्वामी श्री
अड़गड़ानन्द जी महाराज द्वारा इसकी व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ को सुनकर
जैन कुलोत्पन्न श्री जीतेन भाई जी ने व्रत ही ले लिया कि कैसेटों के माध्यम
से इसका प्रसारण करूँ; क्योंकि भगवान महावीर, भगवान गौतम बुद्ध, गुरु
नानक, कबीर इत्यादि के श्रद्धापूरित तप-सिद्धान्तों की उच्चतम अभिव्यक्ति
गीता है। गीता के वे ही कैसेट सुमन आप सबके समक्ष आत्म-दर्शनार्थ
प्रस्तुत हैं।
७. गीता के दो हजार वर्ष बाद तक धर्म के नाम पर सम्प्रदाय नहीं बने थे,
इसीलिये गीता मज़हबमुक्त है। उस समय विश्व-मनीषा में एक ही शास्त्र
गूँज रहा था- उपनिषद्-सार गीता ! मोक्ष और समृद्धि की स्रोत गीता ! !
शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा उसका श्रवण अधिक लाभदायक है; क्योंकि उच्चारण
की शुद्धता इत्यादि में एकाग्रता बँट जाती है। इसीलिये सरल भाषा में
रूपान्तरित यथार्थ गीता के ये कैसेट आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। इनके श्रवण

Page 427Permalink

से बच्चे-बच्चे में, पास-पड़ोस में परमात्मा के शुभ संस्कारों का संचार
होगा, आपके घर-आँगन का वायुमण्डल भी तपोभूमि-सा सुरभित हो
उठेगा।
८. वह घर श्मशान है जिसमें प्रभु-चर्चा न हो। आज का मानव इतना व्यस्त है
कि चाहकर भी भजन के लिये समय नहीं निकाल पाता। ऐसी परिस्थिति में
गीता का सन्देश कर्ण-कुहरों तक पहुँच भर जाय तो परमश्रेय और समृद्धि के
संस्कारों का बीजारोपण हो जाता है। भगवान की वाणी के इन कैसेटों से दिन
भर उस परम प्रभु का स्मरण बना रहेगा और यही भजन की आधारशिला है।
९. अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाते हैं कि वह अच्छे संस्कारों का अर्जन
करें। अच्छे संस्कारों का आशय लोग लेते हैं कि वह अपनी रोजी-रोटी,
आवास-विकास की समस्याओं को हल कर ले। ईश्वर की ओर किसी का
ध्यान ही नहीं है। किसी-किसी के पास इतना कुछ है कि प्रभु को पुकारने
की आवश्यकता ही नहीं समझता। किन्तु यह सब कुछ पार्थिव ही तो है। न
चाहते हुए भी सारा वैभव यहीं छोड़कर जाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में
ईश्वर की पहचान ही एकमात्र सम्बल है, जिसे प्रदान कर रहा है यथार्थ
गीता का यह कैसेट प्रसारण।
१०. संसार में जितने भी धार्मिक मत-मतान्तर हैं, वे सब-के-सब किसी महापुरुष
के पीछे श्रद्धालुओं का संगठित समाज है। महापुरुष की एकान्त भजनस्थली
ही कालान्तर में तीर्थ, आश्रम, मठ और मन्दिरों का रूप ले लेते हैं, जहाँ
महापुरुष के नाम पर जीविकोपार्जन से लेकर विलासिता तक के साधन
जुटाये जाते हैं। गद्दियाँ महापुरुष के बाद बनती हैं, गद्दियों से कोई महापुरुष
नहीं बनता। इसीलिये धर्म सदा से ही प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष के क्षेत्र की वस्तु
रहा है। गीता ऐसे ही निर्विवाद महापुरुष योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की
वाणी है, जिसके चिरन्तन सत्यों से आपका साक्षात् करा रहा है 'यथार्थ
गीता' का यह कैसेट प्रसारण।

Page 428Permalink

गीता आपका
धर्मशास्त्र है।
विश्व में प्रचलित सम्पूर्ण
धार्मिक विचारों के आदि
उद्गम स्थल भारत के समस्त
अध्यात्म और आत्मस्थिति
दिलानेवाले सम्पूर्ण शोध के
साधन-क्रम का स्पष्ट वर्णन इस
गीता में है, जिसमें ईश्वर एक,
पाने की क्रिया एक, पथ में
अनुकम्पा एक तथा परिणाम
एक है - वह है प्रभु का दर्शन,
भगवत्स्वरूप की प्राप्ति और
काल से अतीत अनन्त जीवन।
देखें - 'यथार्थ गीता'।

Page 429Permalink

शास्त्र
परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाले क्रियात्मक
अनुशासन के नियमों का संकलन ही शास्त्र है।
इस दृष्टि से भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता सनातन,
शाश्वत धर्म का शुद्ध शास्त्र है; जो चारों वेद,
उपनिषद, समस्त योगशास्त्र, रामचरित मानस
तथा विश्व के सभी दर्शनशास्त्रों का अकेले ही
प्रतिनिधित्व करती है। गीता मानव मात्र के लिए
धर्म का अतर्क्य शास्त्र है।
परमात्मा का निवास
वह सर्वसमर्थ, सदा रहनेवाला परमात्मा मानव
के हृदय में स्थित है। सम्पूर्ण भावों से उसकी
शरण जाने का विधान है, जिससे शाश्वत धाम,
सदा रहनेवाली शान्ति तथा अनन्त जीवन
की प्राप्ति होती है।
सन्देश
सत्य वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है और
असत्य वस्तु का अस्तित्व नहीं है। परमात्मा ही
तीनों कालों में सत्य है, शाश्वत है, सनातन है।

  • स्वामी अड़गड़ानन्द
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    ५२००
    वर्षों के लम्बे
    अन्तराल के बाद
    श्रीमद्भगवद्गीता की
    शाश्वत व्याख्या
    ॥ श्रीमद् भगवद् गीता ॥
    ॥ यथार्थ गीता ॥
    मानव धर्मशास्त्र
    ॐ
    श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट
    न्यू अपोलो एस्टेट, गाला नं 5, मोगरा लेन (रेलवे सबवे के पास), अंधेरी (पूर्व), मुम्बई – 400069
    फोन - (022) 28255300 • ई-मेल - [email protected] • वेबसाइट - www.yatharthgeeta.com