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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

५९- पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन, बारह मासके बारह सूर्योंका नामनिर्देश एवं सूर्यरश्मियोंका वर्णन

२४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

उनसठवाँ अध्याय

पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन, बारह मासके बारह सूर्योंका नामनिर्देश एवं सूर्यरश्मियोंका वर्णन

सूत उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु मुनयः पुनस्तं संशयान्विताः।<br>पप्रच्छुरुत्तरं भूयस्तदा ते रोमहर्षणम्॥ १**सूतजी बोले—**यह सुनकर मुनिलोग संशयमें पड़ गये और उन्होंने उन रोमहर्षण (सूतजी)-से पुनः यह बात पूछी॥ १॥
ऋषय ऊचुः<br>यदेतदुक्तं भवता सूतेह वदतां वर।<br>एतद्विस्तरतो ब्रूहि ज्योतिषां च विनिर्णयम्॥ २**ऋषिगण बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ हे सूतजी! आपने यहाँ जो कहा है, उसे तथा ग्रहोंके निर्णयको विस्तारसे बताइये॥ २॥
श्रुत्वा तु वचनं तेषां तदा सूतः समाहितः।<br>उवाच परमं वाक्यं तेषां संशयनिर्णये॥ ३तब उनका वचन सुनकर उनके सन्देहको दूर करनेके लिये सूतजी एकाग्रचित्त होकर उत्तम बात कहने लगे॥ ३॥
अस्मिन्नर्थे महाप्राज्ञैर्यदुक्तं शान्तबुद्धिभिः।<br>एतद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि सूर्यचन्द्रमसोर्गतिम्॥ ४<br><br>यथा देवगृहाणीह सूर्यचन्द्रादयो ग्रहाः।<br>अतः परं तु त्रिविधमग्नेर्वक्ष्ये समुद्भवम्॥ ५<br><br>दिव्यस्य भौतिकस्याग्नेस्तथोऽग्नेः पार्थिवस्य च।इस विषयमें शान्तबुद्धिवाले महाज्ञानियोंने जो कुछ बताया है, उसे मैं आपलोगोंसे कहूँगा और चन्द्रमा तथा सूर्यकी गतिका वर्णन करूँगा। मैं यह बताऊँगा कि सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह किस प्रकार देवताओंके निवासस्थान हैं, इसके बाद मैं अग्निकी तीन प्रकारकी उत्पत्तिका वर्णन करूँगा। दिव्य अग्नि, भौतिक अग्नि तथा पार्थिव अग्निके विषयमें बताऊँगा॥ ४-५ १/२॥
व्युष्टायां तु रजन्यां च ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ ६<br><br>अव्याकृतमिदं त्वासीन्नैशेन तमसा वृतम्।<br>चतुर्भागावशिष्टेऽस्मिन् लोके नष्टे विशेषतः॥ ७<br><br>स्वयंभूर्भगवान्स्तत्र लोकसर्वार्थसाधकः।<br>खद्योतवत्स व्यचरदाविर्भावचिकीर्षया॥ ८अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माकी रात्रि बीत जानेपर यह दृश्य जगत् अस्पष्ट था और घोर अन्धकारसे आच्छन्न था। इस लोकके विशेष रूपसे नष्ट हो जानेपर तथा इसका चौथाई भाग अवशिष्ट रहनेपर संसारका कार्य सिद्ध करनेवाले वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टिकी कामनासे खद्योतकी भाँति वहाँ विचरण करने लगे॥ ६-८॥
सोऽग्निं सृष्ट्वाथ लोकादौ पृथिवीजलसंश्रितः।<br>संहृत्य तत्प्रकाशार्थं त्रिधा व्यभजदीश्वरः॥ ९<br><br>पवनो यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवो वह्निरुच्यते।<br>यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निस्तु स स्मृतः॥ १०<br><br>वैद्युतोऽब्जस्तु विज्ञेयस्तेषां वक्ष्ये तु लक्षणम्।<br>वैद्युतो जाठरः सौरो वारिगर्भस्त्रयोऽग्नयः॥ ११तदनन्तर पृथ्वी तथा जलमें संश्रित उन जगदीश्वरने लोकके आदिमें अग्निका सृजन करके पृथ्वीके जलका संहरणकर उसके प्रकाशके लिये अग्निको तीन भागोंमें विभक्त किया। इस लोकमें जो पवन है, वह पार्थिव अग्नि कहा जाता है और जो अग्नि सूर्यमें तपती है, उसे शुचि अग्नि कहा गया है। विद्युत्से उत्पन्न अग्निको अब्ज जानना चाहिये। इस प्रकार जलके गर्भसे उत्पन्न वैद्युत, जाठर तथा सौर—ये तीन अग्नियाँ हैं। अब मैं उनके लक्षणोंको बताऊँगा॥ ९-११॥

अध्याय ५९] पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन २४७


श्लोकअर्थ
तस्मादपः पिबन् सूर्यो गोभिर्दीप्यत्यसौ विभुः।<br>जले चाब्जः समाविष्टो नाद्भिरग्निः प्रशाम्यति॥ १२<br><br>मानवानां च कुक्षिस्यो नाद्भिः शाम्यति पावकः।<br>अर्चिष्मान् पवनः सोऽग्निर्निष्प्रभो जाठरः स्मृतः॥ १३<br><br>यश्चायं मण्डली शुक्ली निरूष्मा सम्प्रजायते।<br>प्रभा सौरी तु पादेन ह्यास्तं याते दिवाकरे॥ १४<br><br>अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद्दूरात्प्रकाशते।<br>उद्यन्तं च पुनः सूर्यमौष्ण्यमग्नेः समाविशेत्॥ १५<br><br>पादेन पार्थिवस्याग्नेस्तस्मादग्निस्तपत्यसौ।<br>प्रकाशोष्णस्वरूपे च सौराग्नेये तु तेजसी॥ १६विभु सूर्य अपनी किरणोंसे जलको पीते हुए चमकते हैं। जलसे उत्पन्न अग्नि जलमें समाविष्ट रहती है और वह जलसे नहीं बुझती है। मनुष्योंके उदरमें रहनेवाली अग्नि प्रशान्त नहीं होती। वह पवन अग्नइज्वलायुक्त होती है, किंतु निष्प्रभ होती है, उसे जाठर अग्नि कहा गया है। यह जो अग्नि है, वह एक मण्डलके रूपमें, शुक्ल वर्णवाली तथा ऊष्मारहित होती है। सूर्यके अस्त हो जानेपर उनकी सम्पूर्ण प्रभा एक पाद (चौथाई) रह जाती है। वह प्रभा रात्रिके समय अग्निमें प्रविष्ट हो जाती है, इसलिये वह दूरसे प्रकाश दिया करती है। जब सूर्य पुनः उगता है, तब पार्थिव अग्निकी उष्णता एक चरणसे सूर्यमें प्रवेश कर जाती है, इसलिये अग्नि तपती है॥ १२-१५ १/२॥
परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते परस्परम्।<br>उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यग्निश्च दक्षिणे॥ १७<br><br>उत्तिष्ठति पुनः सूर्यः पुनर्वै प्रविशत्यपः।<br>तस्मात्ताम्रा भवन्त्यापो दिवा रात्रिप्रवेशनात्॥ १८<br><br>अस्तं याति पुनः सूर्यो अहर्वै प्रविशत्यपः।<br>तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला आपो दृश्यन्ति भास्वराः॥ १९<br><br>एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे।<br>उदयास्तमने नित्यमहोरात्रं विशत्यपः॥ २०सूर्य तथा अग्निके तेज प्रकाश एवं उष्ण गुण-स्वरूपवाले हैं, ये दोनों परस्पर अनुप्रवेशके कारण एक-दूसरेको आप्यायित करते हैं। मेरुके दक्षिणी तथा उत्तरी भूम्यर्धमें, जब सूर्य उदित होता है, तब रात्रि जलमें प्रवेश कर जाती है, इसलिये दिनके समय रात्रिके [जलमें] प्रवेश करनेके कारण जल ताम्रवर्ण हो जाता है। जब सूर्य अस्त होता है, तब दिन जलमें प्रवेश कर जाता है, इसलिये रातमें जल पुनः शुक्ल वर्णवाला तथा चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमयोगसे उदय एवं अस्त दोनों समयोंमें दिन और रात दक्षिणोत्तर भूम्यर्धमें जलमें प्रवेश किया करते हैं॥ १६-२०॥
यश्चासौ तपते सूर्यः पिबन्नम्भो गभस्तिभिः।<br>पार्थिवाग्निविमिश्रोऽसौ दिव्यः शुचिरिति स्मृतः॥ २१<br><br>सहस्रपादसौ वह्निर्वृत्तकुम्भनिभः स्मृतः।<br>आदत्ते स तु नाडीनां सहस्रेण समन्ततः॥ २२<br><br>नादेयीश्चैव सामुद्रीः कूपाश्चैव तथा घनाः।<br>स्थावरा जङ्गमाश्चैव वापीकुल्यादिका अपः॥ २३<br><br>तस्य रश्मिसहस्रं तच्छीतवर्षोष्णनिःस्रवम्।<br>तासां चतुःशता नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः॥ २४<br><br>भजनाश्चैव माल्याश्च केतनाः पतनास्तथा।<br>अमृता नामतः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः॥ २५जो यह सूर्य [अपनी] किरणोंसे जलको पीता हुआ तपता रहता है, उसे पार्थिवाग्निमिश्रित दिव्य शुचि (अग्नि) कहा गया है। हजार पाद (किरण)-वाली यह अग्नि वृत्तकुम्भके तुल्य कही गयी है। वह अपनी हजार नाड़ियों (किरणों)-से चारों ओरसे नदियों, समुद्रों, कूपों, बावलियों, नालों आदि स्थावर-जंगमसे जलोंको ग्रहण करती है। उसकी एक हजार नाड़ियाँ हैं; जो शीत, उष्ण और वर्षासे युक्त हैं। उनमेंसे विचित्र रूपोंवाली चार सौ नाड़ियाँ वर्षा करती हैं। वे भजना, माल्या, केतना तथा पतना हैं; अमृता नामवाली ये सभी रश्मियाँ वृष्टि करनेवाली हैं॥ २१-२५॥
२४८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हिमोद्वाहाश्च ता नाड्यो रश्मयस्त्रिशताः पुनः।<br>रेशा मेघाश्च वात्याश्च ह्रादिन्यो हिमसर्जनाः॥ २६<br><br>चन्द्रभा नामतः सर्वाः पीताभाश्च गभस्तयः।<br>शुक्लाश्च ककुभाश्चैव गावो विश्वभृतस्तथा॥ २७<br><br>शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिशतीर्घर्मसर्जनाः।<br>सोमो बिभर्ति ताभिस्तु मनुष्यपितृदेवताः॥ २८<br><br>मनुष्यानौषधेनेह स्वधया च पितॄनपि।<br>अमृतेन सुरान् सर्वांस्तिसृभिस्तर्पयत्यसौ॥ २९तीन सौ हिमवाहिनी नाड़ियाँ हैं। वे रेशा, मेघा, वात्या तथा ह्रादिनी हैं; चन्द्रभा नामवाली वे सभी रश्मियाँ हिमका सर्जन करनेवाली हैं और पीत आभावाली हैं। शुक्ला, ककुभा, गौ तथा विश्वभृत्—ये रश्मियाँ शुक्ला नामवाली हैं; वे सब तीन सौ रश्मियाँ ऊष्मा उत्पन्न करनेवाली हैं। चन्द्रमा उन तीनों किरणोंके द्वारा मनुष्य, पितृगणों तथा देवताओंका भरण करता है। वह मनुष्योंको औषधिसे, पितरोंको स्वधासे और सभी देवताओंको अमृतसे तृप्त करता है॥ २६–२९॥
वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शतैः स तपते त्रिभिः।<br>वर्षास्वथो शरदि च चतुर्भिः सम्प्रवर्षति॥ ३०<br><br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिममुत्सृजते त्रिभिः।<br>इन्द्रो धाता भगः पूषा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा॥ ३१<br><br>अंशुर्विवस्वांस्त्वष्टा च पर्जन्यो विष्णुरेव च।<br>वरुणो माघमासे तु सूर्य एव तु फाल्गुने॥ ३२<br><br>चैत्रे मासि भवेदंशुर्धाता वैशाखतापनः।<br>ज्येष्ठे मासि भवेदिन्द्र आषाढे चार्यमा रविः॥ ३३<br><br>विवस्वान् श्रावणे मासि प्रोष्ठपादे भगः स्मृतः।<br>पर्जन्योऽश्वयुजे मासि त्वष्टा वै कार्तिके रविः॥ ३४<br><br>मार्गशीर्षे भवेन्मित्रः पौषे विष्णुः सनातनः।<br>पञ्चरश्मिसहस्राणि वरुणस्यार्ककर्मणि॥ ३५वह [सूर्य] वसन्त तथा ग्रीष्ममें तीन सौ किरणोंसे तपता है, वर्षा तथा शरदमें चार सौ किरणोंसे वर्षा करता है और हेमन्त तथा शिशिरमें तीन सौ किरणोंसे हिम छोड़ता है। इन्द्र, धाता, भग, पूषा, मित्र, वरुण, अर्यमा, अंशु, विवस्वान्, त्वष्टा, पर्जन्य और विष्णु—ये [बारह] सूर्य हैं। वरुण माघमासमें सूर्य है एवं पूषा फाल्गुनमासमें सूर्य है। अंशु चैत्रमासमें सूर्य होता है और धाता वैशाखमासमें सूर्य होता है। इन्द्र ज्येष्ठमासमें सूर्य होता है और अर्यमा आषाढ़मासमें सूर्य होता है। विवस्वान् श्रावणमासमें और भग भाद्रपदमासमें सूर्य कहा गया है। पर्जन्य आश्विन मासमें सूर्य होता है और त्वष्टा कार्तिकमासमें सूर्य होता है। मित्र मार्गशीर्षमासमें सूर्य होता है और सनातन विष्णु पौषमासमें सूर्य होता है॥ ३०–३४१/२॥
षड्भिः सहस्रैः पूषा तु देवोंऽशुः सप्तभिस्तथा।<br>धाताष्टभिः सहस्रैस्तु नवभिस्तु शतक्रतुः॥ ३६<br><br>विवस्वान् दशभिर्याति यात्येकादशभिर्भगः।<br>सप्तभिस्तपते मित्रस्त्वष्टा चैवाष्टभिः स्मृतः॥ ३७<br><br>अर्यमा दशभिर्याति पर्जन्यो नवभिस्तथा।<br>षड्भी रश्मिसहस्रैस्तु विष्णुस्तपति मेदिनीम्॥ ३८सूर्यसम्बन्धी कर्ममें वरुणकी पाँच हजार रश्मियाँ होती हैं। पूषा छः हजार किरणोंसे, अंशुदेव सात हजार किरणोंसे, धाता आठ हजार किरणोंसे और इन्द्र नौ हजार किरणोंसे सूर्यकर्म करते हैं। विवस्वान् दस हजार किरणोंसे गमन करता है और भग ग्यारह हजार किरणोंसे गमन करता है। मित्र सात हजार रश्मियोंसे तपता है। त्वष्टा आठ हजार किरणोंसे युक्त कहा गया है। अर्यमा दस हजार किरणोंसे तथा पर्जन्य नौ हजार किरणोंसे गमन करता है। विष्णु [नामक सूर्य] छः हजार रश्मियोंसे पृथ्वीपर तपता है॥ ३५–३८॥
वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मे काञ्चनसप्रभः।<br>श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुः शरदि भास्करः॥ ३९सूर्य वसन्त-ऋतुमें कपिल वर्णके और ग्रीष्म-ऋतुमें स्वर्णकी प्रभावाले होते हैं। वे सूर्य वर्षाऋतुमें