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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

४५- भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पातालोंकोंका वर्णन

अध्याय ४५ ] भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पाताललोकोंका वर्णन २०१

तस्माद्धि मुनयो लब्ध्वा तदाज्ञां मुनिपुङ्गवात्।<br>भवभक्तास्तदा चासंस्तस्माद्देवं समर्चयेत्॥ ४७आज्ञासे नन्दीने उन पूजनीय लोगोंके लिये शुभ पाशुपत आज्ञा प्रदान की॥ ४६॥<br><br>तब मुनिश्रेष्ठ (नन्दी)-से उन शिवकी आज्ञा (दीक्षा) पाकर वे मुनिलोग शिवभक्त हो गये। अतः सभीको शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥
नमस्कारविहीनस्तु नाम उद्गिरयेद्द्रवे।<br>ब्रह्मघ्नदशसंतुल्यं तस्य पापं गरीयसम्॥ ४८<br><br>तस्मात्सर्वप्रकारेण नमस्कारादिमुच्चरेत्।<br>आदौ कुर्यान्नमस्कारं तदन्ते शिवतां व्रजेत्॥ ४९यदि कोई मनुष्य बिना नमस्कारके ही शिवके नामका उच्चारण करता है, तो उसे दस ब्रह्महत्याके समान घोर पाप लगता है। अतः सब प्रकारसे नामके आदिमें नमस्कार (नमः)-का उच्चारण करना चाहिये। आदिमें नमः अवश्य लगाना चाहिये, ऐसा करनेवाला शिवत्वको प्राप्त होता है* ॥ ४८-४९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वराभिषेको नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वराभिषेक' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४४॥


पैंतालीसवाँ अध्याय

भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पाताललोकोंका वर्णन

ऋषय ऊचुः<br>सूत सुव्यक्तमखिलं कथितं शङ्करस्य तु।<br>सर्वात्मभावं रुद्रस्य स्वरूपं वक्तुमर्हसि॥ १ऋषिगण बोले—हे सूतजी! आपने शंकरजीके विषयमें सब कुछ स्पष्ट रूपसे कह दिया, अब आप रुद्रके सर्वात्मभाव तथा स्वरूपको बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>भूर्भुवः स्वर्महश्चैव जनः साक्षात्तपस्तथा।<br>सत्यलोकश्च पातालं नरकार्णवकोटयः॥ २<br><br>तारकाग्रहसोमार्कौ ध्रुवः सप्तर्षयस्तथा।<br>वैमानिकास्तथान्ये च तिष्ठन्त्यस्य प्रसादतः॥ ३सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—ये लोक, पाताल, करोड़ों नरक-सागर, तारागण, ग्रहगण, चन्द्र, सूर्य, ध्रुव, सप्तर्षिगण, वैमानिक देवतागण तथा अन्य सभी उन्हीं शिवकी कृपासे प्रतिष्ठित हैं॥ २-३॥
अनेन निर्मितास्त्वेवं तदात्मानो द्विजर्षभाः।<br>समष्टिरूपः सर्वात्मा संस्थितः सर्वदा शिवः॥ ४इन्हींके द्वारा ये सब बनाये गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! ये सब उन्हींके आत्मस्वरूप हैं। वे सर्वात्मा शिव सभीमें सर्वदा समष्टिरूपसे स्थित हैं॥ ४॥
सर्वात्मानं महात्मानं महादेवं महेश्वरम्।<br>न विजानन्ति सम्मूढा मायया तस्य मोहिताः॥ ५<br><br>तस्य देवस्य रुद्रस्य शरीरं वै जगत्त्रयम्।<br>तस्मात्प्रणम्य तं वक्ष्ये जगतां निर्णयं शुभम्॥ ६उन्हींकी मायासे मोहित होकर अज्ञानी लोग सर्वात्मरूप, महात्मा, महादेव तथा महेश्वरको नहीं जानते हैं। उन भगवान् रुद्रका शरीर ही तीनों लोक है, अतः उन्हें प्रणाम करके मैं जगत्के शुभ विस्तारका वर्णन करूँगा॥ ५-६॥

* शिवमन्त्रकी दीक्षा प्राप्तकर विधिपूर्वक जप करनेके लिये यह वचन है। नामजपकी महिमाके अनुसार श्रद्धापूर्वक नामजप भी किया जा सकता है।

२०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुरा वः कथितं सर्वं मयाण्डस्य यथा कृतिः।<br>भुवनानां स्वरूपं च ब्रह्माण्डे कथयाम्यहम्॥ ७<br>पृथिवी चान्तरिक्षं च स्वर्महर्जन एव च।<br>तपः सत्यं च सप्तैते लोकास्त्वण्डोद्भवाः शुभाः॥ ८<br>अधस्तादत्र चैतेषां द्विजाः सप्त तलानि तु।<br>महातलादयस्तेषां अधस्तान्ररकाः क्रमात्॥ ९पहले जैसा मैंने आपलोगोंसे कहा है—अण्डके आकार और ब्रह्माण्ड तथा भुवनोंके स्वरूपको बता रहा हूँ। पृथिवी, अन्तरिक्ष, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—ये सात शुभ लोक अण्डसे प्रादुर्भूत हुए हैं। हे ब्राह्मणो! उनके नीचे महातल आदि सात तल हैं। उनके भी नीचे क्रमसे नरक स्थित हैं॥ ७-९॥
महातलं हेमतलं सर्वरत्नोपशोभितम्।<br>प्रासादैश्च विचित्रैश्च भवस्यायतनैस्तथा॥ १०<br>अनन्तेन च संयुक्तं मुचुकुन्देन धीमता।<br>नृपेण बलिना चैव पातालस्वर्गवासिना॥ ११महातल स्वर्णका बना हुआ है और यह सभी रत्नोंसे सुशोभित है। यह अद्भुत प्रासादों तथा शिवके मन्दिरोंसे युक्त है। यह अनन्त (शेषनाग), बुद्धिमान् मुचुकुन्द और पाताल तथा स्वर्गवासी राजा बलिसे युक्त है॥ १०-११॥
शैलं रसातलं विप्राः शार्कं हि तलातलम्।<br>पीतं सुतलमित्युक्तं वितलं विद्रुमप्रभम्॥ १२<br>सितं हि अतलं तच्च तलं यच्च सितेतरम्।<br>क्षमायास्तु यावद्विस्तारो ह्यधस्तेषां च सुव्रताः॥ १३<br>तलानां चैव सर्वेषां तावत्संख्या समाहिता।<br>सहस्त्रयोजनं व्योम दशसाहस्त्रमेव च॥ १४<br>लक्षं सप्तसहस्त्रं हि तलानां सघनस्य तु।<br>व्योम्नः प्रमाणं मूलं तु त्रिंशत्साहस्त्रकेण तु॥ १५हे विप्रो! रसातल चट्टानोंसे युक्त है, तलातल बालुकामय है, सुतल पीले वर्णका कहा गया है और वितल विद्रुम (मूँगे)-की प्रभावाला है। अतलं श्वेतवर्णका है और तल कालेवर्णका है। हे सुव्रतो! उन नीचेके तलोंका विस्तार पृथ्वीके समान है। सभी तलोंकी जो समाहित संख्या है, उन सभीके अन्तर्वर्ती आकाश ग्यारह हजार योजनके विस्तारवाले हैं। सभी तलोंके मेघाच्छादित अन्तरिक्षभागको तीस हजार योजनवाला माना गया है तथा इन सभी तलोंका भौगोलिक विस्तार एक लाख सात हजार योजन है॥ १२-१५॥
सुवर्णेन मुनिश्रेष्ठास्तथा वासुकिना शुभम्।<br>रसातलमिति ख्यातं तथान्यैश्च निषेवितम्॥ १६<br>विरोचनहिरण्याक्षनरकाद्यैश्च सेवितम्।<br>तलातलमिति ख्यातं सर्वशोभासमन्वितम्॥ १७हे मुनिश्रेष्ठो! शुभ रसातल सुवर्ण, वासुकि तथा अन्य नागोंसे युक्त कहा गया है। सब प्रकारकी शोभासे समन्वित तलातल विरोचन, हिरण्याक्ष, नरक आदिसे सेवित है॥ १६-१७॥
वैनावकादिभिश्चैव कालनेमिपुरोगमैः।<br>पूर्वदेवैः समाकीर्णं सुतलं च तथापरैः॥ १८<br>वितलं दानवाद्यैश्च तारकाग्निमुखैस्तथा।<br>महान्तकाद्यैर्नागैश्च प्रह्लादेनासुरेण च॥ १९सुतल वैनावक आदि देवों तथा कालनेमि आदि अन्य प्रमुख दैत्योंसे परिपूरित है। वितल तारकाग्नि आदि प्रधान दानवों, महान्तक आदि नागों तथा असुर प्रह्लादसे समन्वित है॥ १८-१९॥
अतलं चात्र विख्यातं कम्बलाश्वनिषेवितम्।<br>महाकुम्भेन वीरेण हयग्रीवेण धीमता॥ २०<br>शङ्कुकर्णेन सम्भिन्नं तथा नमुचिपूर्वकैः।<br>तथान्यैर्विविधैर्वीरैस्तलं चैव सुशोभितम्॥ २१अतल कम्बल तथा अश्वतर, वीर महाकुम्भ और बुद्धिमान् हयग्रीवके अधिकारमें कहा गया है। इसी प्रकार शोभासम्पन्न तल शंकुकर्ण, नमुचि आदि विविध वीरोंसे सुशोभित है॥ २०-२१॥