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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
४२- सुवर्णगजदानविधि
पृष्ठ 729स्थायी लिंक
अध्याय ४१ ] सुवर्णगजदानविधि [ ७२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वृषाङ्कं कारयेत्तत्र किङ्किणीवलयावृतम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले तु वेदिकोपरिमण्डले॥ ५<br><br>वृषेन्द्रं स्थापयेत्तत्र पश्चिमामुखमग्रतः।<br>ईश्वरं पूजयेद्भक्त्या वृषारूढं वृषध्वजम्॥ ६ | उसकी ग्रीवामें रत्नजटित घण्टियोंकी माला पहनाये। इसके बाद छोटी-छोटी घण्टियोंकी मालासे आवृत करके शिवकी एक मूर्ति बनाये। तत्पश्चात् पूर्वमें कही गयी रीतिसे स्थान तथा कालमें वेदिकाके ऊपर मण्डलमें उस वृषेन्द्रको पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करे॥ ३-५ १/२॥ |
| वृषेन्द्रं पूज्य गायत्र्या नमस्कृत्य समाहितः।<br>तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि।<br>तन्नो वृषः प्रचोदयात्॥ ७<br><br>मन्त्रेणानेन सम्पूज्य वृषं धर्मविवृद्धये।<br>होमयेच्च घृचान्नाद्यैर्यथाविभवविस्तरम्॥ ८<br><br>वृषभः पूज्य दातव्यो ब्राह्मणेभ्यः शिवाय वा।<br>दक्षिणा चैव दातव्या यथावित्तानुसारतः॥ ९<br><br>एतद्यः कुरुते भक्त्या वृषदानमनुत्तमम्।<br>शिवस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते॥ १० | तदनन्तर उस वृषभपर आरूढ़ उन वृषध्वज शिवजीकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः नमस्कार करके समाहितचित्त होकर वृषगायत्रीमन्त्रसे वृषेन्द्रकी पूजा करे। 'तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि। तन्नो वृषः प्रचोदयात्'—इस मन्त्रसे वृषभकी विधिपूर्वक पूजा करके धर्मकी अभिवृद्धिके लिये अपने सामर्थ्यके अनुसार घृत-अन्न आदिसे हवन करे। इस प्रकार सम्यक् पूजन करके उस वृषभको शिवजीको अथवा ब्राह्मणोंको अर्पित कर दे। अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अत्युत्तम वृषदानको करता है, वह शिवका अनुचर होकर उन्हींके साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ६-१०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सुवर्णवृषदानं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सुवर्णवृषदान' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय
सुवर्णगजदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>गजदानं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः।<br>द्विजाय वा शिवायाथ दातव्यः पूज्य पूर्ववत्॥ १ | सनत्कुमार बोले—अब मैं क्रमके अनुसार सुवर्णगजदानका यथावत् वर्णन करूँगा। पूर्वकी भाँति उसका विधिवत् पूजन करके उसे शिवजीको अथवा ब्राह्मणको अर्पित कर देना चाहिये॥ १॥ |
| गजं सुलक्षणोपेतं हैमं वा रजतं तु वा।<br>सहस्रनिष्कमाश्रेण तदर्धेनापि कारयेत्॥ २<br><br>तदर्धार्धेन वा कुर्यात्सर्वलक्षणभूषितम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले च देवाय विनिवेदयेत्॥ ३ | शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सुवर्ण अथवा चाँदीका गज एक हजार निष्क परिमाणसे अथवा उसके आधे अर्थात् पाँच सौ निष्कसे बनवाना चाहिये; अथवा उसके आधेके भी आधे परिमाणसे सभी लक्षणोंसे युक्त गजका निर्माण कराना चाहिये और पूर्वोक्त देश तथा कालमें उसे महादेवको अर्पित करना चाहिये। |
| अष्टम्यां वा प्रदातव्यं शिवाय परमेष्ठिने।<br>ब्राह्मणाय दरिद्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये॥ ४ | [पूर्वोक्त देशकालके अभावमें] उसे परमेष्ठी शिवको अष्टमी तिथिमें अर्पण |