श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३९- सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन, द्वापरमें वेदसंहिताके विभाजनका एवं कल्पभेदसे विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन
| १७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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उनतालीसवाँ अध्याय
सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन, द्वापरमें वेदसंहिताके विभाजनका एवं कल्पभेदसे विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शैलादिरुवाच<br>श्रुत्वा शक्रेण कथितं पिता मम महामुनिः।<br>पुनः पप्रच्छ देवेशं प्रणम्य रचिताञ्जलिः॥ १ | नन्दीश्वर बोले— [हे सनत्कुमार!] इन्द्रका कथन सुनकर मेरे पिता महामुनि शिलादने दोनों हाथ जोड़कर देवेश इन्द्रको प्रणाम करके उनसे पुनः पूछा॥ १॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् शक्र सर्वज्ञ देवदेवनमस्कृत।<br>शचीपते जगन्नाथ सहस्त्राक्ष महेश्वर॥ २<br>युगधर्मान् कथं चक्रे भगवान् पद्मसम्भवः।<br>वक्तुमर्हसि मे सर्वं साम्प्रतं प्रणताय मे॥ ३ | शिलाद बोले— हे भगवन्! हे शक्र! हे सर्वज्ञ! हे सर्वदेवनमस्कृत! हे शचीपते! हे जगन्नाथ! हे सहस्राक्ष! हे महेश्वर! भगवान् पद्मयोनिने युगधर्म किस प्रकार कल्पित किये? आप इस विषयमें सब कुछ मुझ शरणागतको बतानेकी कृपा करें॥ २-३॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिलादस्य महात्मनः।<br>व्याजहार यथादृष्टं युगधर्मं सुविस्तरम्॥ ४ | शैलादि बोले— [हे सनत्कुमार!] महात्मा शिलादका वह वचन सुनकर इन्द्रने जैसा देखा था, उन युगधर्मोंका विस्तारसे वर्णन करना प्रारम्भ किया॥ ४॥ |
| शक्र उवाच<br>आद्यं कृतयुगं विद्धि ततस्त्रेतायुगं मुने।<br>द्वापरं तिष्यमित्येते चत्वारस्तु समासतः॥ ५ | इन्द्र बोले— हे मुने! आदिमें सत्ययुग, फिर त्रेतायुग, द्वापर तथा कलियुग—ये ही चार युग होते हैं; ऐसा आप संक्षेपमें जान लीजिये॥ ५॥ |
| सत्त्वं कृतं रजस्त्रेता द्वापरं च रजस्तमः।<br>कलिस्तमश्च विज्ञेयं युगवृत्तिर्युगेषु च॥ ६ | सत्ययुगको सत्त्वगुणरूप, त्रेतायुगको रजोगुणरूप, द्वापरयुगको रज-तमगुणरूप और कलियुगको तमोगुणरूप जानना चाहिये। इस प्रकार विभिन्न युगोंमें अलग-अलग युग-वृत्ति होती है॥ ६॥ |
| ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां यज्ञ उच्यते।<br>भजनं द्वापरे शुद्धं दानमेव कलौ युगे॥ ७ | सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतायुगमें यज्ञ, द्वापरमें भजन तथा कलियुगमें विशुद्ध दानको श्रेष्ठ कहा गया है॥ ७॥ |
| चत्वारि च सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः॥ ८ | वह सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षोंके प्रमाणवाला है। उसकी सन्ध्या चार सौ दिव्य वर्षोंकी होती है तथा उसका सन्ध्यांश भी उसी प्रकार चार सौ दिव्य वर्षोंका होता है॥ ८॥ |
| चत्वारि च सहस्राणि मानुषाणि शिलाशन।<br>आयुः कृतयुगे विद्धि प्रजानामिह सुव्रत॥ ९ | हे शिलाद! हे सुव्रत! इस सत्ययुगमें प्रजाओंकी आयु चार हजार मनुष्य वर्षके बराबर जानिये॥ ९॥ |
| ततः कृतयुगे तस्मिन् सन्ध्यांशे च गते तु वै।<br>पादावशिष्टो भवति युगधर्मस्तु सर्वतः॥ १० | सत्ययुग तथा इसके सन्ध्यांश बीत जानेपर समग्र युग-धर्मका एक चरण घट जाता है। पुनः उत्तम त्रेतायुग प्रवृत्त होता है, जो तीन हजार दिव्य वर्षोंका होता है। |
| चतुर्भागैकहीनं तु त्रेतायुगमनुत्तमम्।<br>कृतार्धं द्वापरं विद्धि तदर्धं तिष्यमुच्यते॥ ११ | सत्ययुगके आधे प्रमाणके बराबर द्वापरको जानिये तथा उसके (द्वापरके) आधेके बराबर कलियुगका प्रमाण |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन...विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन [१७१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्रिंशती द्विशती सन्ध्या तथा चैकशती मुने।<br>सन्ध्यांशकं तथाप्येवं कल्पेष्वेवं युगे युगे॥ १२ | कहा जाता है। हे मुने! उसी तरह त्रेतायुगकी सन्ध्या तीन सौ दिव्य वर्ष, द्वापरकी सन्ध्या दो सौ दिव्य वर्ष तथा कलियुगकी सन्ध्या एक सौ दिव्य वर्षकी होती है। सभीका सन्ध्यांश भी सन्ध्याकालके समान ही जानना चाहिये। प्रत्येक कल्पमें आनेवाले युगोंमें यही स्थिति होती है॥ १०-१२॥ |
| आद्ये कृतयुगे धर्मश्चतुष्पादः सनातनः।<br>त्रेतायुगे त्रिपादस्तु द्विपादो द्वापरे स्थितः॥ १३<br><br>त्रिपादहीनस्तिष्ये तु सत्तामात्रेण धिष्ठितः। | सनातन धर्म आरम्भके सत्ययुगमें चार चरणोंवाला, त्रेतामें तीन चरणोंवाला, द्वापरमें दो चरणोंवाला तथा कलियुगमें मात्र एक चरणवाला होकर अधिष्ठित रहता है॥ १३ १/२॥ |
| कृते तु मिथुनोत्पत्तिः वृत्तिः साक्षाद्रसोल्लसा॥ १४<br><br>प्रजास्तृप्ताः सदा सर्वाः सर्वानन्दाश्च भोगिनः।<br>अधमोत्तमता तासां न विशेषाः प्रजाः शुभाः॥ १५ | सत्ययुगमें स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पत्ति होती है तथा उनकी वृत्ति मधुर रसोंसे सम्पन्न होती है। उस युगमें समस्त प्रजाएँ सभी प्रकारके आनन्दों एवं भोगोंसे पूर्ण तृप्त रहती हैं। उनमें अधमता तथा उत्तमताका कोई भेद नहीं रहता है और सभी प्रजाएँ शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न रहती हैं॥ १४-१५॥ |
| तुल्यमायुः सुखं रूपं तासां तस्मिन् कृते युगे।<br>तासां प्रीतिर्न च द्वन्द्वं न द्वेषो नास्ति च क्लमः॥ १६ | उस सत्ययुगमें वे प्रजाएँ समान आयु, सुख तथा रूपवाली होती हैं। उनमें परस्पर द्वेष, द्वन्द्व एवं अवसाद नहीं रहता है, अपितु वे एक-दूसरेसे प्रेम करती हैं॥ १६॥ |
| पर्वतोदधिवासिन्यो ह्यनिकेताश्रयास्तु ताः।<br>विशोकाः सत्त्वबहुला एकान्तबहुलास्तथा॥ १७ | सत्ययुगमें वे प्रजाएँ घरका आश्रय न लेकर पर्वतों तथा समुद्रोंके सान्निध्यमें निवास करती हैं। सभी लोग शोकरहित, पराक्रमसम्पन्न एवं एकान्तप्रिय होते हैं॥ १७॥ |
| ता वै निष्कामचारिण्यो नित्यं मुदितमानसाः।<br>अप्रवृत्तिः कृतयुगे कर्मणोः शुभपापयोः॥ १८<br><br>वर्णाश्रमव्यवस्था च तदासीन्न च सङ्करः। | कृतयुगमें वे प्रजाएँ निष्काम कर्मोंमें प्रवृत्त रहनेवाली तथा सदा प्रसन्न मनवाली होती हैं। वे कर्मोंके पाप और पुण्यकी भावनासे रहित होती हैं। उस समय वर्णाश्रम-व्यवस्था रहती है, किंतु वर्णसंकर दोष विद्यमान नहीं रहता है॥ १८ १/२॥ |
| रसोल्लासः कालयोगात् त्रेताख्ये नश्यते द्विज॥ १९<br><br>तस्यां सिद्धौ प्रनष्टायामन्या सिद्धिः प्रजायते। | हे द्विज! कालयोगसे त्रेतायुगमें रसोंका प्रादुर्भाव समाप्त होने लगता है। उस युगमें सिद्धिके नष्ट हो जानेपर अन्य सिद्धि उत्पन्न होती है॥ १९ १/२॥ |
| अपां सौक्ष्म्ये प्रतिगते तदा मेघात्मना तु वै॥ २०<br><br>मेघेभ्यः स्तनयित्नुभ्यः प्रवृत्तं वृष्टिसर्जनम्।<br>सकृदेव तया वृष्ट्या संयुक्ते पृथिवीतले॥ २१<br><br>प्रादुरासंस्तदा तासां वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः।<br>सर्ववृत्त्युपभोगस्तु तासां तेभ्यः प्रजायते॥ २२ | जलकी अल्पता हो जानेपर भगवान् मेघात्मा गर्जनयुक्त मेघोंके माध्यमसे जल बरसाते हैं और एक बारमें ही उस वृष्टिसे पृथ्वीतलके संयुक्त हो जानेपर वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं; इस प्रकार वे वृक्ष ही प्रजाओंके |
| १७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| वर्तयन्ति स्म तेभ्यस्तास्त्रेतायुगमुखे प्रजाः।<br>ततः कालेन महता तासामेव विपर्ययात्॥ २३ | गृहरूप बन जाते हैं। उन प्रजाओंकी सम्पूर्ण वृत्ति तथा उपभोग उन्हीं वृक्षोंपर आश्रित रहता है। इस प्रकार त्रेतायुगके आरम्भमें प्रजाएँ जीवनयापन-सम्बन्धी सभी व्यवहार उन्हीं वृक्षोंपर आश्रित होकर करती हैं॥ २०—२२^१/_२॥ |
| रागलोभात्मको भावस्तदा ह्याकस्मिकोऽभवत्।<br>विपर्ययेण तासां तु तेन तत्कालभाविना॥ २४ | पश्चात् अधिक समय बीतनेपर उनके [बुद्धि]-विपर्ययसे उन प्रजाओंमें अकस्मात् राग तथा लोभसे युक्त भाव उत्पन्न हो जाते हैं॥ २३^१/_२॥ |
| प्रणश्यन्ति ततः सर्वे वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः।<br>ततस्तेषु प्रणष्टेषु विभ्रान्ता मैथुनोद्भवाः॥ २५ | उन प्रजाओंमें उस समय उत्पन्न उस विपर्ययके कारण उनके गृहसंज्ञक सभी वृक्ष नष्ट हो जाते हैं॥ २४^१/_२॥ |
| अपि ध्यायन्ति तां सिद्धिं सत्याभिध्यायिनस्तदा।<br>प्रादुर्बभूवुस्तासां तु वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः॥ २६ | तब उन वृक्षोंके नष्ट हो जानेपर मैथुनसे उत्पन्न वे प्रजाएँ भ्रमित हो जाती हैं। इसके बाद सत्यका चिन्तन करनेवाले वे प्रजागण उस सिद्धिका फिरसे ध्यान करते हैं॥ २५^१/_२॥ |
| वस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलान्याभरणानि च।<br>तेष्वेव जायते तासां गन्धवर्णरसान्वितम्॥ २७ | इस प्रकार ध्यानके फलस्वरूप उनके गृहसंज्ञक वे वृक्ष फिरसे उत्पन्न हो जाते हैं। वे वृक्ष प्रजाओंके लिये वस्त्र, भूषण तथा नानाविध फल उत्पन्न करते हैं॥ २६^१/_२॥ |
| अमाक्षिकं महावीर्यं पुटके पुटके मधु।<br>तेन ता वर्तयन्ति स्म सुखमायुः सदैव हि॥ २८ | उनके लिये उन वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें गन्ध-वर्ण-रससे युक्त, शक्तिवर्धक तथा अमाक्षिक (मक्षिकारहित) मधु पैदा होता है॥ २७^१/_२॥ |
| हृष्टपुष्टास्तया सिद्ध्या प्रजा वै विगतज्वराः।<br>ततः कालान्तरेणैव पुनर्लोभावृतास्तु ताः॥ २९ | उसी मधुसे प्रजाएँ सुखपूर्वक सदा जीवनयापन करती हैं और वे उसी सिद्धिसे सन्तापरहित होकर सर्वदा हृष्ट-पुष्ट रहती हैं॥ २८^१/_२॥ |
| वृक्षांस्तान् पर्यगृह्णन्ति मधु वा माक्षिकं बलात्।<br>तासां तेनोपचारेण पुनर्लोभकृतेन वै॥ ३० | तत्पश्चात् कालान्तरमें वे प्रजाएँ पुनः लोभके वशीभूत होकर बलपूर्वक उन वृक्षों अथवा माक्षिक मधुका हरण करती हैं॥ २९^१/_२॥ |
| प्रणष्टा मधुना सार्धं कल्पवृक्षाः क्वचित्क्वचित्।<br>तस्यामेवाल्पशिष्टायां सिद्ध्यां कालवशात्तदा॥ ३१ | लोभमें पड़कर उनके द्वारा किये गये इस अनाचारपूर्ण कृत्यसे मधुके साथ-साथ कहीं-कहीं वे कल्पवृक्ष भी नष्ट हो जाते हैं॥ ३०^१/_२॥ |
| आवर्तनात्तु त्रेतायां द्वन्द्वान्यभ्युत्थितानि वै।<br>शीतवर्षातपैस्तीव्रैस्ततस्ता दुःखिता भृशम्॥ ३२ | पुनः उस त्रेतामें कालयोगसे अवशिष्ट सिद्धियोंमें आवर्तन हो जानेसे द्वन्द्व उत्पन्न होने लगते हैं॥ ३१^१/_२॥ |
| द्वन्द्वैः सम्पीज्यमानाश्च चक्रुरावरणानि तु।<br>कृतद्वन्द्वप्रतीघाताः केतनानि गिरौ ततः॥ ३३ | पुनः तीव्र शीत, वर्षा तथा आतपसे प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित हो जाती हैं और इन द्वन्द्वोंसे पीड़ित प्रजाएँ अपने आवरणका उपाय करने लगती हैं॥ ३२^१/_२॥ |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन...विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७३
| पूर्वं निकामचारास्ता ह्यनिकेता अथावसन्।<br>यथायोगं यथाप्रीति निकेतेष्ववसन् पुनः॥ ३४ | द्वन्द्वोंसे निरन्तर प्रतिहत प्रजाएँ पर्वतोंपर घर बनाने लगती हैं। इसलिये पूर्वमें स्वेच्छाचारितापूर्ण वे प्रजाएँ, जो बिना घरके रहती थीं, पुनः अपने अनुकूल तथा सुविधाजनक घरोंमें रहने लगती हैं॥ ३३-३४॥ |
| कृत्वा द्वन्द्वोपघातांस्तान् वृत्त्युपायमचिन्तयन्।<br>नष्टेषु मधुना सार्धं कल्पवृक्षेषु वै तदा॥ ३५ | मधुके साथ उन कल्पवृक्षोंके भी नष्ट हो जानेपर पुनः उन द्वन्द्वोंके प्रति उपघात करती हुई वे प्रजाएँ जीविकोपार्जनका उपाय सोचने लगती हैं॥ ३५॥ |
| विवादव्याकुलास्ता वै प्रजास्तृष्णाक्षुधार्दिताः।<br>ततः प्रादुर्बभौ तासां सिद्धिस्त्रेतायुगे पुनः॥ ३६ | वे प्रजाएँ पुनः जब विवादसे व्याकुल तथा भूख एवं प्याससे पीड़ित हो जाती हैं, तब त्रेतायुगमें उनमें सिद्धिका प्रादुर्भाव पुनः होता है॥ ३६॥ |
| वार्तायाः साधिकाप्यन्या वृष्टिस्तासां निकामतः।<br>तासां वृष्ट्युदकादीनि ह्यभवन्निम्नगानि तु॥ ३७ | उनके लिये कृषि-कार्यको पूर्णतः सिद्ध करनेवाली दूसरी अन्य वृष्टि होती है। वृष्टिजनित वे जल आदि नदियोंके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं॥ ३७॥ |
| अभवन् वृष्टिसन्तत्या स्रोतस्थानानि निम्नगाः।<br>एवं नद्यः प्रवृत्तास्तु द्वितीये वृष्टिसर्जने॥ ३८ | सतत वृष्टि होनेसे नदियाँ तथा जलके अन्य उद्गमस्थान हो गये। इस प्रकार दूसरे वृष्टि-सर्जनमें नदियोंका प्रादुर्भाव हो गया॥ ३८॥ |
| ये पुनस्तदपां स्तोकाः पतिताः पृथिवीतले।<br>अपां भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदाभवन्॥ ३९<br><br>अथाल्पकृष्टाश्चानुप्ता ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश।<br>ऋतुपुष्पफलाश्चैव वृक्षगुल्माश्च जज्ञिरे॥ ४०<br><br>प्रादुर्भूतानि चैतानि वृक्षजात्यौषधानि च।<br>तेनौषधेन वर्तन्ते प्रजास्त्रेतायुगे तदा॥ ४१ | इस प्रकार पृथवीतलपर जो जल-बिन्दु गिरे; उन जलों तथा भूमिके संयोगसे अल्प-कृष्ट एवं बिना बोये चौदह प्रकारकी वन्य तथा ग्राम्य (वन एवं ग्रामीण क्षेत्रोंमें उगनेवाली) औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं। ऋतुसम्बन्धी विभिन्न पुष्प, फल, वृक्ष एवं पौधे उग गये। इस प्रकार ये विभिन्न जातिके वृक्ष तथा औषध उत्पन्न हो गये और उस त्रेतायुगमें प्रजाएँ उन्हीं औषधियोंसे ही अपना जीवन-निर्वाह करने लगीं॥ ३९—४१॥ |
| ततः पुनरभूत्तासां रागो लोभश्च सर्वशः।<br>अवश्यं भाविनाथेन त्रेतायुगवशेन च॥ ४२<br><br>ततस्ताः पर्यगृह्णन्त नदीक्षेत्राणि पर्वतान्।<br>वृक्षगुल्मौषधीश्चैव प्रसह्य तु यथाबलम्॥ ४३<br><br>विपर्ययेण चौषध्यः प्रनष्टास्ताश्चतुर्दश।<br>मत्वा धरां प्रविष्टास्ता इत्यौषध्यः पितामहः॥ ४४ | इसके बाद उन प्रजाओंमें हर प्रकारसे राग तथा लोभका उदय हुआ और त्रेतायुगके प्रभावसे होनेवाली अवश्यम्भाविताके कारण वे प्रजाएँ नदीक्षेत्रों तथा पर्वतोंका अतिक्रमण करने लगीं और वृक्ष, गुल्मों एवं औषधियोंका बलपूर्वक पुनः हरण करने लगीं। उनके इस विपरीत आचरणसे चौदहों प्रकारकी औषधियाँ विनष्ट हो गयीं॥ ४२-४३ १/२॥ |
| दुदोह गां प्रयत्नेन सर्वभूतहिताय वै।<br>तदाप्रभृति चौषध्यः फालकृष्टास्त्वितस्ततः॥ ४५ | अब वे औषधियाँ पृथ्वीमें समा गयीं—ऐसा मानकर भगवान् विष्णुने राजा पृथुके रूपमें होकर सभी प्राणियोंके कल्याणार्थ पृथ्वीरूप गायका दोहन किया। उसी समयसे हलके फालसे जुती हुई भूमिमें यहाँ-वहाँ |
| १७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| औषधियाँ उत्पन्न होने लगीं ॥ ४४-४५ ॥ | |
|---|---|
| वार्ता कृषिं समायाता वर्तुकामाः प्रयत्नतः ।<br>वार्तावृत्तिः समाख्याता कृषिकामप्रयत्नतः ॥ ४६ | इस तरह अब जीनेकी इच्छा रखनेवाली प्रजाएँ प्रयत्नपूर्वक कृषि कार्य करने लग गयीं। कृषिमें प्रयत्नपूर्वक इच्छा रखनेके कारण इसे 'वार्तावृत्ति' कहा गया ॥ ४६ ॥ |
| अन्यथा जीवितं तासां नास्ति त्रेतायुगात्यये ।<br>हस्तोद्भवा ह्यापश्चैव भवन्ति बहुशस्तदा ॥ ४७ | त्रेतायुगके उस अन्तिम कालमें इस कृषिको छोड़कर आजीविकाका कोई अन्य उपाय नहीं था। उस समय [खनित्र आदिके उपयोग बिना ही] हाथसे ही खोदकर पर्याप्त जल प्राप्त हो जाता था ॥ ४७ ॥ |
| तत्रापि जगृहुः सर्वे चान्योन्यं क्रोधमूर्च्छिताः ।<br>सुतदारधनाद्यांस्तु बलाद्युगबलेन तु ॥ ४८ | उस समय सभी लोग युग-प्रभावके कारण क्रोधके वशीभूत होकर बलपूर्वक एक-दूसरेके पुत्र, स्त्री, धन आदिका हरण कर लेते थे ॥ ४८ ॥ |
| मर्यादायाः प्रतिष्ठार्थं ज्ञात्वा तदखिलं विभुः ।<br>ससर्ज क्षत्रियांस्त्रातुं क्षतात्कमलसम्भवः ॥ ४९ | वह सम्पूर्ण स्थिति देखकर मर्यादाकी प्रतिष्ठा करनेके लिये तथा दुःखसे रक्षा करनेके लिये भगवान् कमलयोनिने क्षत्रियोंकी उत्पत्ति की ॥ ४९ ॥ |
| वर्णाश्रमप्रतिष्ठां च चकार स्वेन तेजसा ।<br>वृत्तेन वृत्तिना वृत्तं विश्वात्मा निर्ममे स्वयम् ॥ ५० | विश्वात्मा भगवान्ने अपने तेजसे वर्णाश्रम-व्यवस्था स्थापित की तथा उन्होंने स्वधर्मानुसार जीविकाद्वारा जीवनका निर्माण (परिपालन) स्वयं किया ॥ ५० ॥ |
| यज्ञप्रवर्तनं चैव त्रेतायामभवत्क्रमात् ।<br>पशुयज्ञं न सेवन्ते केचित्तत्रापि सुव्रताः ॥ ५१ | इसी प्रकार त्रेतायुगमें क्रमसे यज्ञ-अनुष्ठान आदि आरम्भ हुआ। सभीकी व्रतोंमें निष्ठा थी तथा कोई भी मनुष्य पशु-यज्ञ नहीं करते थे ॥ ५१ ॥ |
| बलाद्विष्णुस्तदा यज्ञमकरोत्सर्वदृक् क्रमात् ।<br>द्विजास्तदा प्रशंसन्ति ततस्त्वहिंसकं मुने ॥ ५२ | उस समय व्यापक दृष्टिवाले भगवान् विष्णुने अपने सामर्थ्यसे क्रमपूर्वक यज्ञ सम्पन्न किये। हे मुने! उस समय द्विज लोग हिंसा न करनेवालेकी प्रशंसा करते थे ॥ ५२ ॥ |
| द्वापरेष्वपि वर्तन्ते मतिभेदास्तदा नृणाम् ।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृच्छाद्वार्ता प्रसिध्यति ॥ ५३ | द्वापरमें भी लोगोंमें मन-वचन-कर्मसे बुद्धि-भेद उत्पन्न होते हैं। कष्टपूर्वक कृषिकार्य भी सम्पन्न होते हैं ॥ ५३ ॥ |
| तदा तु सर्वभूतानां कायक्लेशवशात्क्रमात् ।<br>लोभो भृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः ॥ ५४ | उस समय शारीरिक क्लेशवश सभी लोगोंमें लोभ, भृति, वाणिज्य कर्मोंमें विवाद तथा चित्त-कालुष्यके कारण यथार्थ वस्तुओंके प्रति सन्देह उत्पन्न होने लगता है ॥ ५४ ॥ |
| वेदशाखाप्रणयनं धर्माणां सङ्करस्तथा ।<br>वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च ॥ ५५ | उस समय शाखाओंके रूपमें वेदोंका विभाग होता है तथा धर्मोंके संकर अर्थात् अन्य धर्मकी प्रवृत्ति होने लगती है। उस द्वापरमें ब्राह्मण आदि वर्णों एवं |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन⋯विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| द्वापरे तु प्रवर्तन्ते रागो लोभो मदस्तथा।<br>वेदो व्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥ ५६<br><br>एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते।<br>सङ्क्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु सः ॥ ५७ | ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका लगभग विनाश हो जाता है। लोगोंमें वासना, द्वेष, राग, लोभ तथा मद प्रवृत्त हो जाते हैं। द्वापर आदि कालोंमें व्यासोंके द्वारा एक वेद चार भागोंमें विभक्त किया जाता है। ऋक् आदि चार पादोंसे युक्त एक वेद-संहिताका इस भूलोकमें त्रेता आदि कालोंमें अध्ययन किया जाता है; वही वेद द्वापर आदि कालोंमें आयुसंख्याके कारण विभाजित कर दिया जाता है॥ ५५-५७॥ |
| ऋषिपुत्रैः पुनर्भेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः।<br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥ ५८<br><br>संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते मनीषिभिः।<br>सामान्या वैकृताश्चैव दृष्टिभिस्तैः पृथक्पृथक् ॥ ५९ | इसके आगे ऋषिपुत्रोंके द्वारा अपनी दृष्टिसे विभाजन पुनः किया जाता है। दृष्टिविभ्रम (अलग-अलग विचार रखनेवाले) मनीषियोंने समानरूपसे विभाजित की गयी ऋक्, यजुः तथा साम नामक संहिताओंको स्वर-वर्णोंके भेदसे मन्त्र और ब्राह्मणभागके स्वरूपमें पुनः अलग-अलग विभाजित किया॥ ५८-५९॥ |
| ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मन्त्रप्रवचनानि च।<br>अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः ॥ ६० | इस प्रकार मनीषियोंने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा मीमांसा-न्यायके सूत्रोंकी रचना की। कुछ मनीषी इतने विभाजनको पर्याप्त मानकर इसीपर स्थिरमति हो गये, किंतु अन्य मनीषी इस विभाजनको न्यून मानकर इसके विस्तारमें प्रवृत्त हुए॥ ६०॥ |
| इतिहासपुराणानि भिद्यन्ते कालगौरवात्।<br>ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा ॥ ६१<br><br>भविष्यं नारदीयं च मार्कण्डेयमतः परम्।<br>आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं लैङ्गं वाराहमेव च ॥ ६२<br><br>वामनाख्यं ततः कूर्मं मात्स्यं गारुडमेव च।<br>स्कान्दं तथा च ब्रह्माण्डं तेषां भेदः प्रकथ्यते ॥ ६३ | अनेक कल्पोंके भेदसे इतिहास, पुराण आदिके भी विशिष्ट भेद होते हैं। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण—ये उन पुराणोंके भेद कहे जाते हैं। इनमें ग्यारहवाँ पवित्र लिङ्गपुराण द्वापरमें विभक्त किया गया है॥ ६१—६३ १/२ ॥ |
| लैङ्गमेकादशविधं प्रभिन्नं द्वापरे शुभम्।<br>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ॥ ६४<br><br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती।<br>पाराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ ॥ ६५<br><br>शातातपो वसिष्ठश्च एवमाद्यैः सहस्रशः। | मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वसिष्ठ आदि बहुत-से मुनि धर्मशास्त्रोंका विस्तार करनेवाले हैं॥ ६४—६५ १/२ ॥ |
| अवृष्टिर्मरणं चैव तथा व्याध्याद्युपद्रवाः ॥ ६६<br><br>वाङ्मनःकर्मजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते ततः।<br>निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ॥ ६७ | अवृष्टि, अकालमरण, रोग, विघ्न एवं मन-वचन-कर्मजनित दुःखोंसे निर्वेद उत्पन्न होता है। निर्वेदसे उन प्रजाओंके मनमें दुःखोंसे छूटनेका विचार |