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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
३६- राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिव-भक्तोंकी महिमाका कथन
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| १५८ | ·श्रीलिङ्गमहापुराण | [·पूर्वभाग |
|---|
| एवमाराध्य देवेशं दधीचो मुनिसत्तमः।<br>प्राप्यावध्यत्वमन्यैश्च वज्रास्थित्वं प्रयत्नतः॥ २८<br><br>अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि।<br>क्षुपो दधीचं वज्रेण जघानोरसि च प्रभुः॥ २९ | परिणामस्वरूप उनकी हड्डियाँ वज्र-तुल्य हो गयीं, वे अवध्य हो गये तथा उनकी सारी दीनता दूर हो गयी॥ २७॥<br><br>इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके मुनिश्रेष्ठ दधीचने वज्रके समान हड्डियाँ हो जाने तथा दूसरोंसे मारे न जा सकनेका वरदान प्राप्तकर चेष्टापूर्वक राजा क्षुपके सिरपर अपने चरण-मूलसे प्रहार किया। इसपर राजा क्षुपने भी अपने वज्रसे उनकी छातीपर आघात किया॥ २८-२९॥ |
| नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मनः।<br>प्रभावात्परमेशस्य वज्रबद्धशरीरिणः॥ ३० | किंतु भगवान् शिवके अनुग्रहसे वज्र-तुल्य शरीरवाले महात्मा दधीचको वह वज्र विनष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सका॥ ३०॥ |
| दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च<br>क्षुपो दधीचस्य तदा प्रभावम्।<br>आराधयामास हरिं मुकुन्द-<br>मिन्द्रानुजं प्रेक्ष्य तदाम्बुजाक्षम्॥ ३१ | दधीचका अवध्यत्व, उनकी अदीनता तथा उनके तपोबलका प्रभाव देखकर राजा क्षुप कमलके सदृश नेत्रवाले उपेन्द्र मुकुन्द श्रीविष्णुकी आराधना करने लगे॥ ३१॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे क्षुपाभिधन्नृपपराभववर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'क्षुपाभिधन्नृपपराभववर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥
छत्तीसवाँ अध्याय
राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन
| नन्द्युवाच<br>पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>श्रीभूमिसहितः श्रीमान् शङ्खचक्रगदाधरः॥ १<br><br>किरीटी पद्महस्तश्च सर्वाभरणभूषितः।<br>पीताम्बरश्च भगवान् देवैर्दैत्यैश्च संवृतः॥ २<br><br>प्रददौ दर्शनं तस्मै दिव्यं वै गरुडध्वजः। | नन्दीश्वर बोले—[हे सनत्कुमारजी!] उन राजा क्षुपकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवताओं तथा दैत्योंसे पूजित, हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये हुए, पीत वस्त्र पहने हुए, सभी आभूषणोंसे सुशोभित एवं मुकुट धारण किये हुए लक्ष्मी तथा भूमिसहित गरुड़ध्वज श्रीमान् भगवान् पुरुषोत्तमने उन क्षुपको दिव्य दर्शन दिया॥ १-२ ½॥ |
| दिव्येन दर्शनेनैव दृष्ट्वा देवं जनार्दनम्॥ ३<br><br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम्। | दिव्य दर्शनके अनन्तर उन गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु देवको प्रणाम करके राजा क्षुप अत्यन्त प्रिय वाणीमें उनकी स्तुति करने लगे॥ ३ ½॥ |
| त्वमादिस्त्वमनादिश्च प्रकृतिस्त्वं जनार्दनः॥ ४<br><br>पुरुषस्त्वं जगन्नाथो विष्णुर्विश्वेश्वरो भवान्।<br>योऽयं ब्रह्मासि पुरुषो विश्वमूर्तिः पितामहः॥ ५ | आप आदि हैं तथा आप आदिरहित भी हैं। आप ही प्रकृति हैं, आप ही जनार्दन हैं, आप ही पुरुष हैं, आप ही जगन्नाथ, आप ही विष्णु तथा आप ही |
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अध्याय ३६ ] राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन १५९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| विश्वेश्वर हैं। जो ये पुरुषरूप विश्वमूर्ति पितामह हैं, वे भी आप ही हैं॥ ४-५॥ | |
| तत्त्वमाद्यं भवानेव परं ज्योतिर्जनार्दन।<br>परमात्मा परं धाम श्रीपते भूपते प्रभो॥ ६ | हे जनार्दन! जो आदि ज्योति है, वह आप ही हैं। हे लक्ष्मीकान्त! हे भूपते! आप ही परमात्मा तथा आप ही परमधाम हैं॥ ६॥ |
| त्वत्क्रोधसम्भवो रुद्रस्तमसा च समावृतः।<br>त्वत्प्रसादाज्जगद्धाता रजसा च पितामहः॥ ७<br><br>त्वत्प्रसादात्स्वयं विष्णुः सत्त्वेन पुरुषोत्तमः।<br>कालमूर्ते हरे विष्णो नारायण जगन्मय॥ ८ | तमोगुणसे संलिप्त भगवान् रुद्र आपके क्रोधसे आविर्भूत हैं तथा आपके ही अनुग्रहसे रजोगुणसे सम्पन्न जगत्के सृजनकर्ता पितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई है। हे कालमूर्ते! हे हरे! हे विष्णो! हे नारायण! हे जगन्मय! सत्त्वगुणयुक्त साक्षात् पुरुषोत्तम विष्णु भी आपके ही अनुग्रहसे अधिष्ठित हैं॥ ७-८॥ |
| महांस्तथा च भूतादिस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च।<br>त्वयैवाधिष्ठितान्येव विश्वमूर्ते महेश्वर॥ ९ | हे विश्वमूर्ते! हे महेश्वर! महत्, पंचमहाभूतादि, पाँच तन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन—ये सब आपके ही द्वारा अधिष्ठित हैं॥ ९॥ |
| महादेव जगन्नाथ पितामह जगद्गुरो।<br>प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर॥ १० | हे महादेव! हे जगन्नाथ! हे पितामह! हे जगद्गुरो! हे देवदेवेश! हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये॥ १०॥ |
| प्रसीद त्वं जगन्नाथ शरण्यं शरणं गतः।<br>वैकुण्ठ शौरे सर्वज्ञ वासुदेव महाभुज॥ ११ | हे शरणागतको शरण प्रदान करनेवाले जगन्नाथ! हे वैकुण्ठ! हे शौरे! हे सर्वज्ञ! हे वासुदेव! हे महाभुज! आप प्रसन्न होइये॥ ११॥ |
| सङ्कर्षण महाभाग प्रद्युम्न पुरुषोत्तम।<br>अनिरुद्ध महाविष्णो सदा विष्णो नमोऽस्तु ते॥ १२ | हे संकर्षण! हे महाभाग! हे प्रद्युम्न! हे पुरुषोत्तम! हे अनिरुद्ध! हे महाविष्णो! हे विष्णो! आपको सदा नमस्कार है॥ १२॥ |
| विष्णो तवासनं दिव्यमव्यक्तं मध्यतो विभुः।<br>सहस्रफणसंयुक्तस्तमोमूर्तिर्धराधरः ॥ १३ | हे विष्णो! हजार फणोंसे युक्त, तमोमूर्तिस्वरूप, पृथ्वीको धारण करनेवाले, ऐश्वर्यसम्पन्न शेषनाग आपके दिव्य तथा अव्यक्त आसनके रूपमें अधिष्ठित हैं॥ १३॥ |
| अधश्च धर्मो देवेश ज्ञानं वैराग्यमेव च।<br>ऐश्वर्यमासनस्यास्य पादरूपेण सुव्रत॥ १४ | हे देवेश! हे सुव्रत! इस आसनके नीचे पादके रूपमें साक्षात् धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य विराजमान हैं॥ १४॥ |
| सप्तपातालपादस्त्वं धराजघनमेव च।<br>वासांसि सागराः सप्त दिशश्चैव महाभुजाः॥ १५<br><br>द्यौर्मूर्धा ते विभो नाभिः खं वायुर्नासिकां गतः।<br>नेत्रे सोमश्च सूर्य्यश्च केशा वै पुष्करादयः॥ १६<br><br>नक्षत्रतारका द्यौश्च ग्रैवेयकविभूषणम्।<br>कथं स्तोष्यामि देवेशं पूज्यश्च पुरुषोत्तमः॥ १७ | हे विभो! सातों पाताल आपके चरणरूपमें, पृथ्वी जाँघके रूपमें, सातों समुद्र वस्त्रके रूपमें, दिशाएँ विशाल भुजाओंके रूपमें, अन्तरिक्ष मस्तकके रूपमें, आकाश नाभिके रूपमें, वायु नासिकाके रूपमें, दोनों नेत्र सूर्य-चन्द्रके रूपमें, बाल मेघोंके रूपमें तथा नक्षत्र-तारे और सम्पूर्ण गगनमण्डल आपके गलेके आभूषणके |
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| १६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रद्धया च कृतं दिव्यं यच्छ्रुतं यच्च कीर्तितम्।<br>यदिष्टं तत्क्षमस्वेश नारायण नमोऽस्तु ते॥ १८ | रूपमें अधिष्ठित हैं। आप पुरुषोत्तम हैं और परम पूज्य हैं। आप देवेश्वरकी स्तुति मैं किस प्रकार करूँ? आपके विषयमें जैसा सुना तथा कहा गया है, उसी दिव्य भावको मैंने श्रद्धापूर्वक स्तुतिरूपमें कह दिया। हे ईश! हे नारायण! मेरी अभिलाषाके लिये मुझे क्षमा कीजिये। आपको नमस्कार है॥ १५-१८॥ |
| शैलादिरुवाच<br>इदं तु वैष्णवं स्तोत्रं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षुपेण परिकीर्तितम्॥ १९<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या विष्णुलोकं स गच्छति॥ २० | नन्दीश्वर बोले— जो मनुष्य क्षुपके द्वारा की गयी सर्वपापनाशिनी इस विष्णु-स्तुतिको भक्तिपूर्वक पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह विष्णु-लोकको प्राप्त होता है॥ १९-२०॥ |
| सम्पूज्य चैवं त्रिदशेश्वराद्यैः<br>स्तुत्वा स्तुतं देवमजेयमीशम्।<br>विज्ञापयामास निरीक्ष्य भक्त्या<br>जनार्दनाय प्रणिपत्य मूर्ध्ना॥ २१ | इस प्रकार इन्द्र आदिके द्वारा स्तुत किये जानेवाले अपराजेय परमेश्वर विष्णुकी भक्तिपूर्वक स्तुति करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनकी ओर कातर दृष्टिसे देखते हुए क्षुपने कहा॥ २१॥ |
| राजोवाच<br>भगवन् ब्राह्मणः कश्चिद्दधीच इति विश्रुतः।<br>धर्मवेत्ता विनीतात्मा सखा मम पुरातवत्॥ २२<br><br>अवध्यः सर्वदा सर्वैः शङ्करार्चनतत्परः।<br>सावज्ञं वामपादेन स मां मूर्ध्नि सदस्यथ॥ २३<br><br>ताडयामास देवेश विष्णो विश्वजगत्पते।<br>उवाच च मदाविष्टो न बिभेमीति सर्वतः॥ २४ | राजा बोले— हे भगवन्! दधीच नामसे लोकप्रसिद्ध एक धर्मज्ञ तथा विनीत आत्मावाले ब्राह्मण हैं, जो पहले मेरे मित्र थे। शिवजीकी आराधनामें सदा तत्पर रहनेके कारण उनकी कृपासे वे सभीसे अवध्य हैं। हे देवेश! हे विष्णो! हे जगत्पते! उन्होंने सभामें मेरा तिरस्कार करते हुए अपने बायें पैरसे मेरे सिरपर प्रहार कर दिया और उन मदोन्मत्तने कहा कि मैं किसीसे भी नहीं डरता हूँ॥ २२-२४॥ |
| जेतुमिच्छामि तं विप्रं दधीचं जगदीश्वर।<br>यथा हि तं तथा कर्तुं त्वमर्हसि जनार्दन॥ २५ | हे जगदीश्वर! मैं उन विप्र दधीचको जीतना चाहता हूँ। हे जनार्दन! मैं उन्हें जिस भी तरहसे जीत सकूँ; आप वैसा उपाय कीजिये॥ २५॥ |
| शैलादिरुवाच<br>ज्ञात्वा सोऽपि दधीचस्य ह्यवध्यत्वं महात्मनः।<br>सस्मार च महेशस्य प्रभावमतुलं हरिः॥ २६<br><br>एवं स्मृत्वा हरिः प्राह ब्रह्मणः क्षुतसम्भवम्।<br>विप्राणां नास्ति राजेन्द्र भयमेत्य महेश्वरम्॥ २७<br><br>विशेषाद्रुद्रभक्तानामभयं सर्वदा नृप।<br>नीचानामपि सर्वत्र दधीचस्यास्य किं पुनः॥ २८ | नन्दीश्वर बोले— इस प्रकार उन विष्णुने भी महात्मा दधीचके अवध्यत्वको जानकर तथा भगवान् शिवके अतुलित प्रभावका स्मरण करके ब्रह्माकी छींकसे उत्पन्न क्षुपसे कहा—हे राजेन्द्र! महेश्वरकी भक्तिको प्राप्त विप्रोंको किसी प्रकारका भय नहीं रहता। हे राजन्! विशेषरूपसे रुद्रके भक्त सर्वदा भयसे मुक्त रहते हैं, चाहे वे परम नीच ही क्यों न हों; फिर इन दधीचमुनिकी तो बात ही क्या?॥ २६-२८॥ |
| तस्मात्तव महाभाग विजयो नास्ति भूपते।<br>दुःखं करोमि विप्रस्य शापार्थं ससुरास्य मे॥ २९ | हे महाभाग! हे भूपते! अतः अब आपके विजयकी आशा नहीं है। देवताओंसहित अपनेको शापित होनेके |
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अध्याय ३६] राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन १६१
| लिये मैं अब विप्र दधीचको क्रोधित करूँगा॥ २९॥ | |
|---|---|
| भविता तस्य शापेन दक्षयज्ञे सुरैः समम्।<br>विनाशो मम राजेन्द्र पुनरुत्थानमेव च॥ ३० | हे राजेन्द्र! उनके शापसे दक्षके यज्ञमें सभी देवताओंसहित मेरा विनाश होगा और पुनः उत्थान होगा॥ ३०॥ |
| तस्मात्समेत्य विप्रेन्द्र सर्वयत्नेन भूपते।<br>करोमि यत्नं राजेन्द्र दधीचविजयाय ते॥ ३१ | हे भूपते! हे राजेन्द्र! समस्त देवताओंसहित मैं विप्रेन्द्र दधीचमुनिसे आपकी विजयके लिये पूरे मनसे प्रयास करूँगा॥ ३१॥ |
| शैलादिरुवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं क्षुपः प्राह तथास्त्विति जनार्दनम्।<br>भगवानपि विप्रस्य दधीचस्याश्रमं ययौ॥ ३२ | नन्दीश्वर बोले— भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर क्षुपने उनसे कहा—आप वैसा ही कीजिये। इधर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारणकर दधीचमुनिके आश्रम पहुँचे। जगद्गुरु विष्णुने ब्रह्मर्षि दधीचको प्रणामकर उनसे कहा॥ ३२-३३॥ |
| आस्थाय रूपं विप्रस्य भगवान् भक्तवत्सलः।<br>दधीचमाह ब्रह्मर्षिमभिवन्द्य जगद्गुरुः॥ ३३ | |
| श्रीभगवानुवाच<br>भो भो दधीच ब्रह्मर्षे भवार्चनरताव्यय।<br>वरमेकं वृणे त्वत्तस्तं भवान् दातुमर्हति॥ ३४ | श्रीभगवान् बोले— हे शिवाराधनमें तत्पर निर्विकार ब्रह्मर्षि दधीच! मैं आपसे एक वरकी याचना करता हूँ। आप मुझे वह वर देनेकी कृपा कीजिये॥ ३४॥ |
| याचितो देवदेवेन दधीचः प्राह विष्णुना।<br>ज्ञातं तवेप्सितं सर्वं न बिभेमि तवाप्यहम्॥ ३५ | देवदेव विष्णुके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दधीचने कहा—मैं आपके सभी भावों तथा मनोरथोंको समझ गया हूँ। मुझे आपसे भी कोई भय नहीं है॥ ३५॥ |
| भवान् विप्रस्य रूपेण आगतोऽसि जनार्दन।<br>भूतं भविष्यं देवेश वर्तमानं जनार्दन॥ ३६ | हे जनार्दन! आप यहाँ ब्राह्मणका रूप धारणकर आये हुए हैं। हे देवेश! हे जनार्दन! भगवान् शिवकी कृपासे मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमान सब कुछ जानता हूँ। हे सुव्रत! आप यह विप्ररूप छोड़ दीजिये। हे देवेश! हे मधुसूदन! क्षुपने अपनी कार्य-सिद्धिके लिये आपकी आराधना की है॥ ३६-३७॥ |
| ज्ञातं प्रसादाद् रुद्रस्य द्विजत्वं त्यज सुव्रत।<br>आराधितोऽसि देवेश क्षुपेण मधुसूदन॥ ३७ | |
| जाने तवैनां भगवन् भक्तवत्सलतां हरे।<br>स्थाने तवैषा भगवन् भक्तवात्सल्यता हरे॥ ३८ | हे भगवन्! हे हरे! आपकी यह भक्तवत्सलता मुझे पूर्ण रूपसे विदित है। हे भगवन्! हे हरे! आज यहाँ भी आपकी वही भक्तवत्सलता विद्यमान है॥ ३८॥ |
| अस्ति चेद्भगवन् भीतिर्भवार्चनरतस्य मे।<br>वक्तुमर्हसि यत्नेन वरदाम्बुजलोचन॥ ३९ | हे भगवन्! हे वरदाता! हे कमलनयन! यदि आपका ऐसा भक्तवात्सल्य है तो आप सोच-समझकर यह बताइये कि मुझ शिवाराधनतत्पर व्यक्तिको आपसे क्या भय हो सकता है?॥ ३९॥ |
| वदामि न मृषा तस्मान्न बिभेमि जनार्दन।<br>न बिभेमि जगत्यस्मिन् देवदैत्यद्विजादपि॥ ४० | हे जनार्दन! मैं मिथ्या-भाषण नहीं करता; इसीलिये इस जगत्में देवता, दैत्य तथा ब्राह्मण किसीसे भी मैं भयभीत नहीं रहता हूँ॥ ४०॥ |
| नन्द्युवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं दधीचस्य तदास्थाय जनार्दनः।<br>स्वरूपं सस्मितं प्राह सन्त्यज्य द्विजतां क्षणात्॥ ४१ | नन्दी कहते हैं— [हे सनत्कुमार!] दधीचका वह |
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| १६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वचन सुनकर उसी क्षण ब्राह्मणरूप छोड़कर विष्णुने अपना रूप धारण कर लिया और हँसकर दधीचसे कहा॥ ४१॥ | |
| श्रीभगवानुवाच<br>भयं दधीच सर्वत्र नास्त्येव तव सुव्रत।<br>भवार्चनरतो यस्माद्भवान् सर्वज्ञ एव च॥ ४२ | श्रीभगवान् बोले— हे सुव्रत ! हे दधीच ! क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं तथा शिवार्चनमें रत रहनेवाले हैं, इसलिये आपको सभी स्थानोंपर किसी भी प्रकारका भय व्याप्त नहीं कर सकता॥ ४२॥ |
| बिभेमीति सकृद्वक्तुं त्वमर्हसि नमस्तव।<br>नियोगान्मम विप्रेन्द्र क्षुपं प्रति सदस्यथ॥ ४३ | हे विप्रवर ! आपको नमस्कार है। मेरा आग्रह है कि आप एक बार सभामें क्षुपसे बोल दीजिये कि 'मैं आपसे डरता हूँ'॥ ४३॥ |
| एवं श्रुत्वापि तद्वाक्यं सान्त्वं विष्णोर्महामुनिः।<br>न बिभेमीति तं प्राह दधीचो देवसत्तमम्॥ ४४<br><br>प्रभावाद्देवदेवस्य शम्भोः साक्षात्पिनाकिनः।<br>शर्वस्य शङ्करस्यास्य सर्वज्ञस्य महामुनिः॥ ४५ | इस प्रकार विष्णुभगवान्का वह विनय तथा प्रीतियुक्त वचन सुनकर महामुनि दधीचने देवोंमें श्रेष्ठ उन विष्णुसे कहा—मैं साक्षात् पिनाकधारी सर्वज्ञ शर्व देवदेव महादेव शिवके अनुग्रहसे किसीसे भी नहीं डरता॥ ४४-४५॥ |
| ततस्तस्य मुनेः श्रुत्वा वचनं कुपितो हरिः।<br>चक्रमुद्यम्य भगवान् दिधक्षुर्मुनिसत्तमम्॥ ४६ | तत्पश्चात् उन मुनि दधीचका वचन सुनकर भगवान् विष्णु क्रोधित हो उठे और उन्होंने मुनिश्रेष्ठ दधीचको दग्ध करनेकी इच्छासे अपना चक्र उठाया॥ ४६॥ |
| अभवत्कुण्ठिताग्रं हि विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम्।<br>प्रभावाद्धि दधीचस्य क्षुपस्यैव हि सन्निधौ॥ ४७ | क्षुपके सामने ही मुनि दधीचके प्रभावसे विष्णुका सुदर्शन चक्र कुण्ठित हो गया॥ ४७॥ |
| दृष्ट्वा तत्कुण्ठिताग्रं हि चक्रं चक्रिणमाह सः।<br>दधीचः सस्मितं साक्षात्सदसद्व्यक्तिकारणम्॥ ४८ | कुण्ठित अग्रभागवाले सुदर्शन चक्रको देखकर वे दधीच मुसकराकर सत्-असत्के अवभासक चक्रधारी [विष्णु]-से कहने लगे॥ ४८॥ |
| भगवन् भवता लब्धं पुरातीव सुदारुणम्।<br>सुदर्शनमिति ख्यातं चक्रं विष्णो प्रयत्नतः॥ ४९<br><br>भवस्यैतच्छुभं चक्रं न जिघांसति मामिह।<br>ब्रह्मास्त्राद्यैस्तथान्यैर्हि प्रयत्नं कर्तुमर्हसि॥ ५० | हे भगवन्! हे विष्णो! पूर्वकालमें आपको भी अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक शिवकृपासे ही यह अति भयावह सुदर्शन नामक शुभ चक्र प्राप्त हुआ है। अतः यह चक्र मुझ शिवभक्तको नहीं मार सकता। अब आप ब्रह्मास्त्र आदि अन्य अस्त्रोंसे मुझे मारनेका प्रयास कीजिये॥ ४९-५०॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दृष्ट्वा निर्वीर्यमायुधम्।<br>ससर्ज च पुनस्तस्मै सर्वास्त्राणि समन्ततः॥ ५१ | नन्दीश्वर बोले— [हे सनत्कुमार !] दधीचका वह वचन सुनकर तथा अपने अस्त्रको निस्तेज देखकर विष्णुजीने समस्त प्रकारके अस्त्र उत्पन्न किये और वे चारों ओरसे उनके ऊपर प्रहार करने लगे॥ ५१॥ |
| चक्रुर्देवास्ततस्तस्य विष्णोः साहाय्यमव्ययाः।।<br>द्विजेनैकेन योद्धुं हि प्रवृत्तस्य महाबलाः॥ ५२ | महान् बलशाली शाश्वत देवता लोग भी उस एकमात्र ब्राह्मणसे युद्ध करनेमें प्रवृत्त उन विष्णुकी सहायता करनेमें तत्पर हो गये॥ ५२॥ |
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अध्याय ३६ ] राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन १६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुशमुष्टिं तदादाय दधीचः संस्मरन् भवम्।<br>ससर्ज सर्वदेवेभ्यो वज्रास्थिः सर्वतो वशी॥ ५३ | तब वज्रतुल्य हड्डियोंवाले इन्द्रियजित् दधीचने एक मुट्ठी कुश लेकर भगवान् शिवका स्मरण करते हुए सभी देवताओंके ऊपर फेंक दिया॥ ५३॥ |
| दिव्यं त्रिशूलमभवत्कालाग्निसदृशप्रभम्।<br>दग्धुं देवान् मतिं चक्रे युगान्ताग्निरिवापरः॥ ५४ | वह कुश कालाग्निके तेजके समान दिव्य त्रिशूल बन गया। उस समय दूसरी प्रलयाग्निके तुल्य प्रतीत होनेवाले दधीचने सभी देवताओंको भस्म कर देनेका निश्चय कर लिया॥ ५४॥ |
| इन्द्रनारायणाद्यैश्च देवैस्त्यक्तानि यानि तु।<br>आयुधानि समस्तानि प्रणेमुस्त्रिशिखं मुने॥ ५५ | हे मुने! इन्द्र तथा विष्णु आदि देवताओंने जो-जो अस्त्र दधीचके ऊपर छोड़े थे, वे सब उस त्रिशूलको प्रणाम करने लगे॥ ५५॥ |
| देवाश्च दुद्रुवुः सर्वे ध्वस्तवीर्या द्विजोत्तम।<br>ससर्ज भगवान् विष्णुः स्वदेहात्पुरुषोत्तमः॥ ५६<br><br>आत्मनः सदृशान् दिव्यान् लक्षलक्षायुतान् गणान्।<br>तानि सर्वाणि सहसा ददाह मुनिसत्तमः॥ ५७ | हे द्विजश्रेष्ठ! यह देखकर सभी देवता पराक्रमशून्य हो गये तथा व्याकुल होकर पलायन करने लगे। तब पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपने शरीरसे अपने ही तुल्य करोड़ों दिव्य गण उत्पन्न किये। मुनिवर दधीचने क्षण-भरमें उन सभीको भस्मसात् कर दिया॥ ५६-५७॥ |
| ततो विस्मयनार्थाय विश्वमूर्तिरभूद्धरिः।<br>तस्य देहे हरेः साक्षादपश्यद् द्विजसत्तमः॥ ५८<br><br>दधीचो भगवान् विप्रः देवतानां गणान् पृथक्।<br>रुद्राणां कोटयश्चैव गणानां कोटयस्तदा॥ ५९ | तदनन्तर दधीचको विस्मित करनेके निमित्त भगवान् विष्णुने विश्वरूप धारण किया। विप्रेन्द्र दधीचने उन विष्णुके शरीरमें साक्षात् देवताओंके पृथक्-पृथक् गणोंको देखा। उस समय विश्वमूर्ति विष्णुके शरीरमें करोड़ों रुद्र, करोड़ों रुद्रगण तथा करोड़ों ब्रह्माण्ड विद्यमान थे॥ ५८-५९१/२॥ |
| अण्डानां कोटयश्चैव विश्वमूर्तेस्तनौ तदा।<br>दृष्टैतदखिलं तत्र च्यावनिर्विस्मितं तदा॥ ६०<br><br>विष्णुमाह जगन्नाथं जगन्मयमजं विभुम्।<br>अम्भसाभ्युक्ष्य तं विष्णुं विश्वरूपं महामुनिः॥ ६१ | तब च्यवन-पुत्र महामुनि दधीच वह सब कुछ देखकर विस्मित हो गये और वे विश्वरूप धारण किये हुए उन जगत्पति, लोकव्याप्त, ऐश्वर्यसम्पन्न विष्णुके ऊपर जलका छींटा मारकर उनसे कहने लगे—॥ ६०-६१॥ |
| मायां त्यज महाबाहो प्रतिभासा विचारतः।<br>विज्ञानानां सहस्राणि दुर्विज्ञेयानि माधव॥ ६२ | हे महाबाहो! मायाका परित्याग कीजिये। हे माधव! पदार्थोंकी भ्रमात्मक सत्तापर विचार करनेसे प्रतीत होता है कि इस मायाके हजारों प्रकारके दुर्विज्ञेय क्रिया-कलाप हुआ करते हैं॥ ६२॥ |
| मयि पश्य जगत्सर्वं त्वया सार्धमनिन्दित।<br>ब्रह्माणं च तथा रुद्रं दिव्यां दृष्टिं ददामि ते॥ ६३ | हे अनिन्द्य! अब आप अपने सहित ब्रह्मा, रुद्र तथा सम्पूर्ण जगत्को मुझमें देखिये। इसके लिये मैं आपको दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ॥ ६३॥ |
| इत्युक्त्वा दर्शयामास स्वतनौ निखिलं मुनिः।<br>तं प्राह च हरिं देवं सर्वदेवभवोद्भवम्॥ ६४ | ऐसा कहकर मुनि दधीचने अपने शरीरमें उन्हें सम्पूर्ण जगत् दिखा दिया और फिर सभी देवताओं तथा विश्वके रचयिता भगवान् विष्णुसे उन्होंने कहा॥ ६४॥ |
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| १६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मायया ह्यनया किं वा मन्त्रशक्त्याथ वा प्रभो।<br>वस्तुशक्त्याथ वा विष्णो ध्यानशक्त्याथ वा पुनः॥ ६५<br><br>त्यक्त्वा मायामिमां तस्माद्योद्धुमर्हसि यत्नतः। | हे प्रभो! हे विष्णो! इस मायासे अथवा मन्त्रशक्तिसे अथवा पदार्थशक्तिसे अथवा ध्यानशक्तिसे क्या लाभ? अतएव इस मायाको छोड़कर आप मेरे साथ यत्नपूर्वक युद्ध कीजिये॥ ६५ १/२॥ |
| एवं तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा माहात्म्यमद्भुतम्॥ ६६<br><br>देवाश्च दुद्रुवुर्भूयो देवं नारायणं च तम्।<br>वारयामास निश्चेष्टं पद्मयोनिर्जगद्गुरुः॥ ६७ | उन दधीचका यह वचन सुनकर तथा उनका अद्भुत प्रभाव देखकर देवगण व्याकुल होकर पुनः भागने लगे। तदनन्तर जगद्गुरु ब्रह्माजीने उन निश्चेष्ट भगवान् विष्णुको युद्ध करनेसे रोका॥ ६६-६७॥ |
| निशम्य वचनं तस्य ब्रह्मणस्तेन निर्जितः।<br>जगाम भगवान् विष्णुः प्रणिपत्य महामुनिम्॥ ६८ | इसके बाद उन ब्रह्माजीका वचन सुनकर दधीचसे पराजित हुए भगवान् विष्णु उन महामुनिको प्रणाम करके अपने लोकको चले गये॥ ६८॥ |
| क्षुपो दुःखातुरो भूत्वा सम्पूज्य च मुनीश्वरम्।<br>दधीचमभिवन्द्याशु प्रार्थयामास विह्वलः॥ ६९ | इधर अत्यन्त दुःखित तथा व्याकुलचित्त राजा क्षुप मुनीश्वर दधीचकी विधिवत् पूजा करके उन्हें बार-बार प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ६९॥ |
| दधीच क्षम्यतां देव मयाज्ञानात्कृतं सखे।<br>विष्णुना हि सुरैर्वापि रुद्रभक्तस्य किं तव॥ ७० | हे दधीच! हे देव! मेरे द्वारा अज्ञानवश किये गये अपराधको आप क्षमा करें। हे सखे! आप-सदृश रुद्रभक्तका विष्णु तथा अन्य देवता भला क्या कर सकते हैं?॥ ७०॥ |
| प्रसीद परमेशाने दुर्लभा दुर्जनैर्द्विज।<br>भक्तिर्भक्तिमतां श्रेष्ठ मद्विधैः क्षत्रियाधमैः॥ ७१ | हे द्विज! आप प्रसन्न हो जाइये। हे भक्तोंमें श्रेष्ठ! मुझ-सदृश दुर्जन तथा अधम क्षत्रियोंके लिये परमेश्वर महादेवकी भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है॥ ७१॥ |
| श्रुत्वानुगृह्य तं विप्रो दधीचस्तपतां वरः।<br>राजानं मुनिशार्दूलः शशाप च सुरोत्तमान्॥ ७२<br><br>रुद्रकोपाग्निना देवाः सदेवेन्द्रा मुनीश्वरैः।<br>ध्वस्ता भवन्तु देवेन विष्णुना च समन्विताः॥ ७३<br><br>प्रजापतेर्मखे पुण्ये दक्षस्य सुमहात्मनः। | तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर दधीचने राजा क्षुपकी वाणी सुनकर उसके ऊपर अनुग्रह कर दिया तथा श्रेष्ठ देवताओंको शाप दे दिया कि विष्णुदेव, इन्द्र एवं मुनीश्वरोंसहित सभी देवता महान् आत्मावाले दक्षप्रजापतिके पवित्र यज्ञमें रुद्रकी कोपाग्निमें दग्ध हो जायँ॥ ७२-७३ १/२॥ |
| एवं शप्त्वा क्षुपं प्रेक्ष्य पुनराह द्विजोत्तमः॥ ७४<br><br>देवैश्च पूज्या राजेन्द्र नृपैश्च विविधैर्गणैः।<br>ब्राह्मणा एव राजेन्द्र बलिनः प्रभविष्णवः॥ ७५ | इस प्रकार देवताओंको शाप देकर द्विजश्रेष्ठ दधीचने क्षुपकी ओर देखते हुए कहा—हे राजेन्द्र! ब्राह्मण सभी देवताओं, राजाओं तथा विविध गणोंके पूज्य हैं। अतः हे नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मण ही सबसे अधिक बलशाली एवं परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न होते हैं॥ ७४-७५॥ |
| इत्युक्त्वा स्वोटजं विप्रः प्रविवेश महाद्युतिः।<br>दधीचमभिवन्द्यैव जगाम स्वं नृपः क्षयम्॥ ७६ | ऐसा कहकर महातेजस्वी मुनि दधीच अपनी कुटीमें चले गये तथा राजा क्षुप दधीचको प्रणामकर अपने घरको प्रस्थित हुए॥ ७६॥ |