श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३५- महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महा-मृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा
अध्याय ३५ ] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५५
| भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गा बभूवुर्विगतस्पृहाः।<br>रुद्रलोकाय कल्पान्ते संस्थिताः शिवतेजसा॥ २६ | वसिष्ठ आदि वे सभी मुनि अपने अंगोंमें पीताभ-श्वेत भस्म लगाने लगे और इच्छारहित वे मुनिगण कल्पके अन्तमें शिवजीके तेजके प्रभावसे रुद्रलोकके लिये प्रस्थित हुए॥ २५-२६॥ |
| तस्मान्न निन्द्याः पूज्याश्च विकृता मलिना अपि।<br>रूपान्विताश्च विप्रेन्द्राः सदा योगीन्द्रशङ्कया॥ २७ | [नन्दी कहते हैं—हे सनत्कुमारजी!] अतः मलिन, विकृत, रूपसम्पन्न चाहे जिस रूपमें हों, महान् योगीकी शंका करके उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये, अपितु उनकी सदा पूजा करनी चाहिये॥ २७॥ |
| बहुना किं प्रलापेन भवभक्ता द्विजोत्तमाः।<br>सम्पूज्याः सर्वयत्नेन शिववन्नात्र संशयः॥ २८ | अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता; दृढ़ व्रतवाले भगवान् शिवके द्विजश्रेष्ठ भक्त चाहे वे मलिन ही क्यों न हों, पूरे प्रयत्नसे शिवकी ही भाँति उनकी पूजा करनी चाहिये, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ २८^{१}/_{२}॥ |
| मलिनाश्चैव विप्रेन्द्रा भवभक्ता दृढव्रताः।<br>दधीचस्तु यथा देवदेवं जित्वा व्यवस्थितः॥ २९ | इसी भाँति मुनि दधीच शिवकी भक्तिसे देवदेव नारायणको जीतकर लोकमें प्रतिष्ठित हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है॥ २९^{१}/_{२}॥ |
| नारायणं तथा लोके रुद्रभक्त्या न संशयः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भस्मदिग्धतनूरुहाः॥ ३० | अतएव भस्मसे लिप्त शरीरवाले, जटाधारी, मुण्डित सिरवाले तथा दिगम्बर वेशवाले अनेक प्रकारके महात्माओंकी मन, वचन एवं कर्मसे पूर्ण प्रयत्नके साथ महादेवकी भाँति विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ३०-३१॥ |
| जटिनो मुण्डिनश्चैव नग्ना नानाप्रकारिणः।<br>सम्पूज्याः शिववन्नित्यं मनसा कर्मणा गिरा॥ ३१ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगिप्रशंसा नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'योगिप्रशंसा' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा
| सनत्कुमार उवाच<br>कथं जघान राजानं क्षुपं पादेन सुव्रत।<br>दधीचः समरे जित्वा देवदेवं जनार्दनम्॥ १<br><br>वज्रास्थित्वं कथं लेभे महादेवान् महातपाः।<br>वक्तुमर्हसि शैलादे जितो मृत्युस्त्वया यथा॥ २ | सनत्कुमार बोले— हे सुव्रत! मुनि दधीचने समरमें देवदेव नारायणको जीतकर राजा क्षुपके ऊपर अपने पैरसे प्रहार क्यों किया? और उन महातपस्वीने महादेवजीसे अपनी हड्डियाँ वज्रतुल्य होनेका वरदान किस प्रकार प्राप्त किया और हे नन्दीश्वर! जिस प्रकार आपने मृत्युपर विजय प्राप्त की, वह भी आप कृपा करके बताइये॥ १-२॥ |
| शैलादिरुवाच<br>ब्रह्मपुत्रो महातेजा राजा क्षुप इति स्मृतः।<br>अभून्मित्रो दधीचस्य मुनीन्द्रस्य जनेश्वरः॥ ३ | नन्दी कहते हैं— ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजवाले क्षुप नामक एक राजा हुए हैं। उन लोकपति क्षुपकी मुनीश्वर दधीचसे मित्रता थी॥ ३॥ |
| १५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| चिरात्तयोः प्रसङ्गाद्वै वादः क्षुपदधीचयोः।<br>अभवत् क्षत्रियश्रेष्ठो विप्र एवेति विश्रुतः॥ ४ | कालान्तरमें उन क्षुप तथा दधीचके मध्य किसी बातके सन्दर्भमें विवाद हो गया। क्षुपका कथन था कि क्षत्रिय श्रेष्ठ होता है और दधीचका कथन था कि ब्राह्मण ही श्रेष्ठ होता है॥ ४॥ |
| अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः।<br>तस्मादिन्द्रो ह्यहं वह्निर्यमश्च निर्ऋतिस्तथा॥ ५<br><br>वरुणश्चैव वायुश्च सोमो धनद एव च।<br>ईश्वरोऽहं न सन्देहो नावमन्तव्य एव च॥ ६ | राजा आठ लोकपालोंका विग्रहस्वरूप होता है। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्र, कुबेर तथा ईश्वर मैं ही हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं है, अतः तुम्हें मेरी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये॥ ५-६॥ |
| महती देवता या सा महतश्चापि सुव्रत।<br>तस्मात्त्वया महाभाग च्यावनेय सदा ह्यहम्॥ ७<br><br>नावमन्तव्य एवेह पूजनीयश्च सर्वथा।<br>श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुपस्य मुनिसत्तमः॥ ८ | हे सुव्रत! वह राजा महान् देवता होता है। अतः हे च्यवनपुत्र! हे महाभाग! तुम्हें मेरा अपमान कभी नहीं करना चाहिये, अपितु सर्वथा मेरी पूजा करनी चाहिये॥ ७ १/२॥<br><br>उन क्षुपका वह वचन सुनकर च्यवनपुत्र मुनिश्रेष्ठ द्विज दधीचने आत्मगौरवसे प्रेरित होकर अपने बाँयें हाथसे क्षुपके सिरपर तेज मुष्टिका-प्रहार किया॥ ८ १/२॥ |
| दधीचश्च्यावनिश्चोग्रो गौरवादात्मनो द्विजः।<br>अताडयत्क्षुपं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टिना।<br>चिच्छेद वज्रेण च तं दधीचं बलवान् क्षुपः॥ ९<br><br>ब्रह्मलोके पुरासौ हि ब्रह्मणः क्षुतसम्भवः।<br>लब्धं वज्रं च कार्यार्थं वज्रिणा चोदितः प्रभुः॥ १० | बलशाली क्षुपने भी वज्रसे उन दधीचपर प्रहार किया। पूर्वकालमें राजा क्षुप ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी छींकसे उत्पन्न हुए थे। भगवान्की प्रेरणासे असुरोंके पराजयरूप कार्यके निमित्त इन्द्रसे उन्होंने वज्र प्राप्त किया था॥ ९-१०॥ |
| स्वेच्छयैव नरो भूत्वा नरपालो बभूव सः।<br>तस्माद्राजा स विप्रेन्द्रमजयद्वै महाबलः॥ ११ | अपनी इच्छासे ही नर होकर वे राजा बने थे। श्रीयुक्त, बलवान् तथा तमोगुणयुक्त इन्द्रकी भाँति राजा क्षुप भी बलशाली थे, इसीलिये वे विप्रेन्द्र दधीचको जीतनेमें समर्थ हो गये॥ ११ १/२॥ |
| यथा वज्रधरः श्रीमान् बलवांस्तमसान्वितः।<br>पपात भूमौ निहतो वज्रेण द्विजपुङ्गवः॥ १२ | राजा क्षुपके वज्र-प्रहारसे निहत द्विजश्रेष्ठ दधीच भूमिपर गिर पड़े। फिर अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने भृगु-पुत्र मुनि शुक्राचार्यका स्मरण किया॥ १२ १/२॥ |
| सस्मार च तदा तत्र दुःखार्तो भार्गवं मुनिम्।<br>शुक्रोऽपि सन्धयामास ताडितं कुलिशेन तम्॥ १३ | देहधारियोंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने भी वहाँ पहुँचकर दधीचमुनिके वज्र-ताड़ित शरीरको अपने योगबलसे यथावत् जोड़ दिया॥ १३ १/२॥ |
| योगादेत्य दधीचस्य देहं देहभृतांवरः।<br>सन्धाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः॥ १४<br><br>भो दधीच महाभाग देवदेवमुमापतिम्।<br>सम्पूज्य पूज्यं ब्रह्माद्यैर्देवदेवं निरञ्जनम्॥ १५ | दधीचके शरीरको पूर्वकी भाँति ठीककर भार्गव शुक्राचार्यने कहा—हे महाभाग दधीच! हे विप्रवर! ब्रह्मा आदि देवताओंसे पूजित निरंजन देवाधिदेव उमापति शिवकी सम्यक् पूजा करके उन त्र्यम्बक महादेवके अनुग्रहसे अवध्य हो जाओ॥ १४-१५ १/२॥ |
| अवध्यो भव विप्रर्षे प्रसादात्त्र्यम्बकस्य तु।<br>मृतसञ्जीवनं तस्माल्लब्धमेतन्मया द्विज॥ १६ | हे द्विज! उन्हीं महादेवजीसे मैंने भी मृतसंजीवनी |
अध्याय ३५] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नास्ति मृत्युभयं शम्भोर्भक्तानामिह सर्वतः।<br>मृतसञ्जीवनं चापि शैवमद्य वदामि ते॥ १७ | विद्या प्राप्त की है। शिवजीके भक्तोंको मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं होता है। उसी शैवी मृतसंजीवनी विद्याको अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ॥ १६-१७॥ |
| त्रियम्बकं यजामहे त्रैलोक्यपितरं प्रभुम्।<br>त्रिमण्डलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम्॥ १८<br><br>त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः।<br>त्रिदेवस्य महादेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ १९ | तीनों लोकोंके पिता; सोम-चन्द्र-अग्नि-इन तीनों मण्डलोंके जनक; सत-रज-तम-तीनों गुणोंके महेश्वर; तीन तत्त्वों (बुद्धि-अहंकार-मन), तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन देवों (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र) तथा जगत्के सभी तीन प्रकारके पदार्थोंके स्वामी, सुगन्धिरूप पुष्टिवर्धन परमेश्वर महादेवका यजन करना चाहिये॥ १८-१९॥ |
| सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणे प्रकृतौ तथा।<br>इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च॥ २० | सुगन्धिरूप वह सूक्ष्म परमेश्वर सभी जगह, समस्त जीवधारियोंमें, त्रिगुणात्मिका प्रकृतिमें, इन्द्रियोंमें, अन्य देवताओं तथा गणोंमें उसी प्रकार अधिष्ठित है, जैसे पुष्पोंमें गन्ध विद्यमान रहती है॥ २० १/२॥ |
| पुष्पेषु गन्धवत्सूक्ष्मः सुगन्धिः परमेश्वरः।<br>पुष्टिश्च प्रकृतिर्यस्मात्पुरुषस्य द्विजोत्तम॥ २१<br><br>महदादिविशेषान्तविकल्पस्यापि सुव्रत।<br>विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने॥ २२ | हे द्विजश्रेष्ठ! चूँकि पुरुषरूप परमेश्वरकी पुष्टि प्रकृतिरूप है। हे सुव्रत! हे महामुने! अतएव वही परमेश्वर महत् आदिसे लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच, विष्णु, ब्रह्मा, मुनियों तथा इन्द्र आदि सभी देवताओंका पुष्टिवर्धन करता है॥ २१-२२ १/२॥ |
| इन्द्रस्यापि च देवानां तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः।<br>तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसा तथा॥ २३ | कर्म, तपस्या, स्वाध्याय, योग तथा ध्यानके द्वारा उन अमृतरूप महादेवका यजन करना चाहिये॥ २३ १/२॥ |
| स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च यजामहे।<br>सत्येनानेन मुक्षीयान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम्॥ २४<br><br>बन्धमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः।<br>मृतसञ्जीवनो मन्त्रो मया लब्धस्तु शङ्करात्॥ २५ | जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्ति प्रदान करनेवाले प्रभु शिव इस सत्यके द्वारा जीवको मृत्युके पाशसे छुटकारा प्रदान करते हैं। सूर्यकी किरणोंसे पककर अपने मूलबन्धसे स्वयं मुक्त हुए उर्वारुक (ककड़ी)-की भाँति वह जीव शिवाराधनके द्वारा सांसारिक बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ २४ १/२॥ |
| जप्त्वा हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पीत्वा दिवानिशम्।<br>लिङ्गस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं द्विज॥ २६ | मैंने भी शिवजीसे ही मृतसंजीवनी मन्त्र प्राप्त किया है। हे द्विज! जप करने, हवन करने, अभिमन्त्रित जलका पान करने तथा दिन-रात शिवलिङ्गके सांनिध्यमें बैठकर उनका ध्यान करनेसे मृत्युका भय नहीं रह जाता॥ २५-२६॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तपसाराध्य शङ्करम्।<br>वज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं च लब्धवान्॥ २७ | उन शुक्राचार्यका वह वचन सुनकर मुनि दधीचने घोर तपस्या करके शिवकी आराधना की, जिसके |