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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
३३- मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश
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${\Hugeश्रीलिङ्गमहापुराण}$
१५० | [ पूर्वभाग
| कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहो दम्भ उपद्रवः।<br>यानि चान्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ १२<br><br>दह्यन्ते प्राणिनस्ते तु त्वत्समुत्थेन वह्निना।<br>अस्माकं दह्यमानानां त्राता भव सुरेश्वर॥ १३ | सभी ओरसे आच्छादित हो गये। इसीलिये ये काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ आदि विक्षोभात्मक विकृत अग्नियाँ अग्नितुल्य ही हैं। इस जगत्में जो भी स्थावर-जंगम जीव एवं पदार्थ हैं, वे सब आपद्वारा उत्पादित अग्निसे दग्ध हो रहे हैं। अतएव हे सुरेश्वर! उस अग्निसे दग्ध हो रहे हम सभीकी आप रक्षा कीजिये॥ ११-१३॥ |
| त्वं च लोकहितार्थाय भूतानि परिषिञ्चसि।<br>महेश्वर महाभाग प्रभो शुभनिरीक्षक॥ १४<br><br>आज्ञापय वयं नाथ कर्तारो वचनं तव।<br>भूतकोटिसहस्रेषु रूपकोटिशतेषु च॥ १५<br><br>अनन्तं गन्तुं न शक्ताः स्म देवदेव नमोऽस्तु ते॥ १६ | हे महेश्वर! हे महाभाग! हे प्रभो! हे शुभ निरीक्षक! आप लोक-कल्याणके लिये जीवोंको अमृतरूपी जलसे सींचते हैं। हे नाथ! आज्ञा दीजिये; हमलोग आपके वचनोंका पालन करनेके लिये तत्पर हैं। अनन्त पदार्थों एवं उनके नाम-रूपोंके मध्य आप व्याप्त हैं, आपका पार हम पा नहीं सके हैं। हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार है॥ १४-१६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे 'शिवस्तुतिवर्णनं' नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवस्तुतिवर्णन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥
तैंतीसवाँ अध्याय
मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश
| नन्द्युवाच<br>ततस्तुतोष भगवाननुगृह्य महेश्वरः।<br>स्तुतिं श्रुत्वा स्तुतस्तेषामिदं वचनमब्रवीत्॥ १ | नन्दीश्वर बोले— उन मुनियोंके द्वारा संस्तुत भगवान् महेश्वर उनकी स्तुति सुनकर उनके प्रति अनुग्रहशील होकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनसे यह वचन बोले॥ १॥ |
| यः पठेच्छृणुयाद्वापि युष्माभिः कीर्तितं स्तवम्।<br>श्रावयेद्वा द्विजान् विप्रो गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २ | जो विप्र आप लोगोंद्वारा की गयी स्तुतिको पढ़ेगा अथवा सुनेगा अथवा द्विजोंको सुनायेगा, वह मेरे गणोंमें मुख्य स्थान प्राप्त करेगा॥ २॥ |
| वक्ष्यामि वो हितं पुण्यं भक्तानां मुनिपुङ्गवाः।<br>स्त्रीलिङ्गमखिलं देवी प्रकृतिर्मम देहजा॥ ३<br><br>पुंल्लिङ्गं पुरुषो विप्रा मम देहसमुद्भवः।<br>उभाभ्यामेव वै सृष्टिर्मम विप्रा न संशयः॥ ४ | हे मुनिश्रेष्ठो! आप भक्तोंके हितार्थ अब मैं शुभ उपदेश करता हूँ। इस जगत्में समस्त स्त्रीलिङ्ग-समुदाय मेरे शरीरसे उत्पन्न प्रकृतिदेवीका ही रूप है और हे विप्रो! सभी पुंल्लिङ्ग-समुदाय मेरी देहसे उत्पन्न पुरुषका रूप है। हे विप्रो! यह सृष्टि मुझसे प्रादुर्भूत पुरुष-प्रकृति (नर-नारी) इन्हीं दोनोंसे हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ३-४॥ |
| न निन्देद्यतिनं तस्माद्दिग्वाससमनुत्तमम्।<br>बालोन्मत्तविचेष्टं तु मत्परं ब्रह्मवादिनम्॥ ५ | सभी शिवरूप हैं, अतएव किसीकी भी निन्दा न |
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अध्याय ३३ ] मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश १५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये हि मां भस्मनिरता भस्मना दग्धकिल्बिषाः।<br>यथोक्तकारिणो दान्ता विप्रा ध्यानपरायणाः॥ ६ | करें। विशेष रूपसे मेरी भक्तिमें तत्पर उत्तम, दिगम्बर, ब्रह्मवादी, बालस्वभाववाले, उन्मत्त तथा चेष्टारहित यतिकी तो कभी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ ५॥ |
| महादेवपरा नित्यं चरन्तो ह्यूर्ध्वरेतसः।<br>अर्चयन्ति महादेवं वाङ्मनःकायसंयताः॥ ७ | भस्मसे विभूषित होकर दग्ध पापोंवाले, इन्द्रियजित्, ध्यानपरायण, नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले तथा महादेवकी भक्तिमें तत्पर जो विप्र मन-वाणी एवं शरीरसे संयत होकर मुझ महादेवकी यथोक्त रीतिसे पूजा-आराधना करते हैं, वे रुद्रलोकको प्राप्त होते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। अतएव व्यक्त लिङ्गवाले शिवका यह [पाशुपत] व्रत परम दिव्य तथा अव्यक्त है॥ ६-८॥ |
| रुद्रलोकमनुप्राप्य न निवर्तन्ति ते पुनः।<br>तस्मादेतद् व्रतं दिव्यमव्यक्तं व्यक्तलिङ्गिनः॥ ८ | |
| भस्मव्रताश्च मुण्डाश्च व्रतिनो विश्वरूपिणः।<br>न तान् परिवदेद्विद्वान्न चैतानाभिलङ्घयेत्॥ ९ | विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि भस्म धारण किये तथा मुण्डित सिर जो शिवरूप व्रती हैं, उनकी न तो निन्दा करे तथा न तो उनकी बातोंका उल्लंघन करे। लोक एवं परलोकमें अपना हित चाहनेवालेको ऐसे महात्माओंपर न तो हँसना चाहिये और न तो उनके प्रति अप्रिय वचन बोलना चाहिये॥ ९^१/_२॥ |
| न हसेनाप्रियं ब्रूयादमुत्रेह हितार्थवान्।<br>यस्तान्निन्दति मूढात्मा महादेवं स निन्दति॥ १० | जो मनुष्य इनकी निन्दा करता है, वह मन्दबुद्धि साक्षात् महादेवकी निन्दा करता है तथा जो इनकी नित्य पूजा करता है, वह महादेवजीकी पूजा करता है॥ १०^१/_२॥ |
| यस्त्वेतान् पूजयेन्नित्यं स पूजयति शङ्करम्।<br>एवमेष महादेवो लोकानां हितकाम्यया॥ ११ | इस प्रकार ये महायोगी शिवजी भस्म-भूषित होकर लोक-कल्याणकी कामनासे युग-युगमें नानाविध क्रीड़ाएँ करते हैं। आपलोग भी ऐसा ही आचरण कीजिये; उससे आपलोगोंका कल्याण होगा तथा आपलोग सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ ११-१२॥ |
| युगे युगे महायोगी क्रीडते भस्मगुण्ठितः।<br>एवं चरत भद्रं वस्ततः सिद्धिमवाप्स्यथ॥ १२ | |
| अतुलमिह महाभयप्रणाशहेतुं<br>शिवकथितं परमं पदं विदित्वा।<br>व्यपगतभवलोभमोहचित्ताः<br>प्रणिपतिताः सहसा शिरोभिरुग्रम्॥ १३ | महाभयका नाश करनेवाले शिव-कथित अतुलनीय तथा परमपदको जानकर उन मुनियोंका चित्त सांसारिक लोभ एवं मोहसे रहित हो गया और उन्होंने शंकरजीके चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया॥ १३॥ |
| ततः प्रमुदिता विप्राः श्रुत्वैवं कथितं तदा।<br>गन्धोदकैः सुशुद्धैश्च कुशपुष्पविमिश्रितैः॥ १४ | इस प्रकार शिवकी बातें सुनकर प्रसन्न मनवाले उन मुनियोंने गन्ध, पुष्प तथा कुशसे मिश्रित शुद्ध जलसे परिपूर्ण विशाल घड़ोंसे महेश्वरको स्नान कराया और पुनः वे गूढ़ तथा हुंकारयुक्त सुन्दर स्वरोंसे महादेवजीका स्तुति-गान करने लगे॥ १४-१५॥ |
| स्नापयन्ति महाकुम्भैरद्भिरेव महेश्वरम्।<br>गायन्ति विविधैर्गूढैर्हुङ्कारैश्चापि सुस्वरैः॥ १५ | |
| नमो देवाधिदेवाय महादेवाय वै नमः।<br>अर्धनारीशरीराय सांख्ययोगप्रवर्तिने॥ १६ | देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है। अर्धनारीश्वर |