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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
१०६- दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
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| ५५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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एक सौ छठा अध्याय
दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>नृत्यारम्भः कथं शम्भोः किमर्थं वा यथातथम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं श्रुतः स्कन्दाग्रजोद्भवः॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] हमलोगों ने स्कन्दके अग्रजका प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि शम्भुके नृत्यका आरम्भ कैसे तथा किसलिये हुआ?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>दारुकोऽसुरसम्भूतस्तपसा लब्धविक्रमः।<br>सूदयामास कालाग्निरिव देवान् द्विजोत्तमान्॥ २ | **सूतजी बोले—**दारुक नामक एक दैत्य असुरोंमें उत्पन्न हुआ। तपस्यासे पराक्रम प्राप्त करके कालाग्निके समान वह [असुर] देवताओं तथा उत्तम द्विजोंको पीड़ित करने लगा॥ २॥ |
| दारुकेण तदा देवास्ताडिताः पीडिता भृशम्।<br>ब्रह्माणं च तथेशानं कुमारं विष्णुमेव च॥ ३<br>यममिन्द्रमनुप्राप्य स्त्रीवध्य इति चासुरः।<br>स्त्रीरूपधारिभिः स्तुत्यैर्ब्रह्माद्यैर्युधि संस्थितैः॥ ४ | उस समय वह दारुक ब्रह्मा, ईशान, कुमार, विष्णु, यम, इन्द्र आदिके पास पहुँचकर उन देवताओंको सताने लगा, इससे वे देवता बहुत पीड़ित हुए। 'यह असुर स्त्रीवध्य है'—ऐसा सोचकर स्त्रीरूपधारी तथा युद्धके लिये स्थित उन स्तुत्य ब्रह्मा आदिके साथ वह असुर युद्ध करने लगा॥ ३-४॥ |
| बाधितास्तेन ते सर्वे ब्रह्माणं प्राप्य वै द्विजाः।<br>विज्ञाप्य तस्मै तत्सर्वं तेन सार्धमुमापतिम्॥ ५<br>सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वे पितामहपुरोगमाः।<br>ब्रह्मा प्राप्य च देवेशं प्रणम्य बहुधा नतः॥ ६<br>दारुणो भगवान् दारुः पूर्वं तेन विनिर्जिताः।<br>निहत्य दारुकं दैत्यं स्त्रीवध्यं त्रातुमर्हसि॥ ७ | हे द्विजो! तब उसके द्वारा बाधित किये गये वे सभी [देवतागण] ब्रह्माके पास पहुँचकर उनसे सब कुछ निवेदन करके पुनः उन [ब्रह्माके] साथ उमापतिके यहाँ जाकर पितामहको आगे करके [शिवकी] स्तुति करने लगे। इसके बाद देवेशके निकट जाकर अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम करके ब्रह्मा ने कहा—'हे भगवन्! दारुक महाभयंकर है; हमलोग उससे पहले ही पराजित हो चुके हैं। स्त्रीके द्वारा वध्य उस दैत्य दारुकका संहार करके आप हमलोगोंकी रक्षा कीजिये'॥ ५-७॥ |
| विज्ञप्तिं ब्रह्मणः श्रुत्वा भगवान् भगनेत्रहा।<br>देवीमुवाच देवेशो गिरिजां प्रहसन्निव॥ ८<br>भवतीं प्रार्थयाम्यद्य हिताय जगतां शुभे।<br>वधार्थं दारुकस्यास्य स्त्रीवध्यस्य वरानने॥ ९ | ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान् देवेशने देवी गिरिजासे हँसते हुए कहा—'हे शुभे! हे वरानने! मैं सभी लोकोंके हितके लिये इस स्त्रीवध्य दारुकके वधहेतु आज आपसे प्रार्थना करता हूँ'॥ ८-९॥ |
| अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतोऽरणिः।<br>विवेश देहे देवस्य देवेशी जन्मतत्परा॥ १०<br>एकेनांशेन देवेशं प्रविष्टा देवसत्तमम्।<br>न विवेद तदा ब्रह्मा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः॥ ११ | तब उनका वचन सुनकर संसारको उत्पन्न करनेवाली उन देवेश्वरीने जन्मके लिये तत्पर होकर शिवके शरीरमें प्रवेश किया। वे [पार्वती] देवताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वरमें |
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अध्याय १०६] भगवान् शिवद्वारा काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना [५५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गिरिजां पूर्ववच्छम्भोर्दृष्ट्वा पार्श्वस्थितां शुभाम्।<br>मायया मोहितस्तस्याः सर्वज्ञोऽपि चतुर्मुखः॥ १२ | अपने सोलहवें अंशसे प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये। मंगलमयी पार्वतीको पूर्ववत् शम्भुके समीप स्थित देखकर सब कुछ जाननेवाले ब्रह्मा भी उनकी मायासे मोहित हो गये थे॥ १०-१२॥ |
| सा प्रविष्टा तनुं तस्य देवदेवस्य पार्वती।<br>कण्ठस्थेन विषेणास्य तनुं चक्रे तदात्मनः॥ १३ | उन देवदेवके शरीरमें प्रविष्ट हुईं उन पार्वतीने उनके कण्ठमें स्थित विषसे अपने शरीरको बनाया॥ १३॥ |
| तां च ज्ञात्वा तथाभूतां तृतीयेनेक्षणेन वै।<br>ससर्ज कालीं कामारिः कालकण्ठीं कपर्दिनीम्॥ १४ | इसके बाद उन पार्वतीको विषभूता जानकर कामशत्रु [शिव]-ने अपने तीसरे नेत्रसे कालकण्ठी (कृष्णवर्णके कण्ठवाली) कपर्दिनी कालीको उत्पन्न किया॥ १४॥ |
| जाता यदा कालिमकालकण्ठी<br>जाता तदानीं विपुला जयश्रीः।<br>देवेतराणामजयस्त्वसिद्ध्या<br>तुष्टिर्भवान्याः परमेश्वरस्य॥ १५ | जब विषके कारण कृष्णवर्णके कण्ठवाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुई। अब असिद्धिके कारण दैत्योंकी पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [शिव]-को प्रसन्नता हुई॥ १५॥ |
| जातां तदानीं सुरसिद्धसङ्घा<br>दृष्ट्वा भयाद्दुद्रुवुरग्निकल्पाम्।<br>कालीं गरालङ्कृतकालकण्ठी-<br>मुपेन्द्रपद्मोद्भवशक्रमुख्याः॥ १६ | विषसे अलंकृत कृष्णवर्णके कण्ठवाली तथा अग्निके सदृश स्वरूपवाली उस प्रादुर्भूत कालीको देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु-ब्रह्मा-इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भयके कारण भागने लगे॥ १६॥ |
| तथैव जातं नयनं ललाटे<br>सितांशुलेखा च शिरस्युदग्रा।<br>कण्ठे करालं निशितं त्रिशूलं<br>करे करालं च विभूषणानि॥ १७ | उनके ललाटमें शिवकी भाँति [तीसरा] नेत्र था, मस्तकपर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठमें [कालकूट] विष था, हाथमें विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [सर्पोंके हार-कुण्डल आदि] आभूषण धारण किये हुए थीं॥ १७॥ |
| सार्धं दिव्याम्बरा देव्यः सर्वाभरणभूषिताः।<br>सिद्धेन्द्रसिद्धाश्च तथा पिशाचा जज्ञिरे पुनः॥ १८ | कालीके साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणोंसे विभूषित देवियाँ, सिद्धोंके स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए॥ १८॥ |
| आज्ञया दारुकं तस्याः पार्वत्याः परमेश्वरी।<br>दानवं सूदयामास सूदयन्तं सुराधिपान्॥ १९ | तब उन पार्वतीकी आज्ञासे परमेश्वरी [काली]-ने सुराधिपोंको मारनेवाले असुर दारुकका वध कर दिया॥ १९॥ |
| संरम्भातिप्रसङ्गाद्वै तस्याः सर्वमिदं जगत्।<br>क्रोधाग्निना च विप्रेन्द्राः सम्बभूव तदातुरम्॥ २० | हे श्रेष्ठ विप्रो! उनके अतिशय वेग तथा क्रोधकी अग्निसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा। तब |
| भवोऽपि बालरूपेण श्मशाने प्रेतसङ्कुले।<br>रुरोद मायया तस्याः क्रोधाग्निं पातुमीश्वरः॥ २१ | ईश्वर भव भी मायासे बालरूप धारणकर उन कालीकी क्रोधाग्निको पीनेके लिये [काशीमें] श्मशानमें [जाकर] |