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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

About this granth

The Siddha Siddhanta Paddhati (सिद्धसिद्धान्तपद्धति) is a principal Sanskrit text of the Nath tradition, ascribed to Guru Gorakhnath (Goraksha). It sets out the philosophy of the Nath yogis in systematic form, centred on the idea that the body (pinda) and the cosmos are two forms of one reality, so that the yogi can realise the highest state within his own body.

It has six teachings (upadeshas): the origin of the body, tracing the unfolding of Shakti from the supreme state; reflection on the body; awareness of the holy places and deities within it; its supports, namely nine chakras, sixteen adharas, three lakshyas and five voids; the harmony of body and the supreme; and the marks of the avadhuta yogi.

This edition with Hindi translation is published by the Gorakhnath Temple, Gorakhpur. It opens with a picture of the perpetual flame in the temple's sanctum, believed to have been lit by Gorakhnath, followed by a verse in praise of Ganapati from the sixth teaching with its Hindi meaning. The translator is not named in the opening pages. It runs to 222 pages.

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प्रथमेत्वरोगतासिद्धिः सर्वलोकप्रियो भवेत् ।
कांक्षन्ति दर्शनं तस्य स्वात्मारूढ़स्य नित्यशः ॥३६॥
कृतार्थः स्याद् द्वितीये वै कुरुते सर्वभाषणम् ।
तृतीये दिव्यदेहस्तु व्यालैर्व्याघ्रैर्न बाध्यते ॥३७॥
चतुर्थे क्षुतृषानिद्राशीतातपविवर्जितः ।
जायते दिव्य योगीशो दूरश्रावी न संशयः ॥३८॥
वाक्‌सिद्धिः पञ्चमे वर्षे परकायप्रवेशनम् ।
षष्ठे न च्छिद्यते शस्त्रैर्वज्रपातैर्न भिद्यते ॥३६॥
वायुवेगो क्षितित्यागी दूरदर्शी स सप्तमे ।
अणिमादिगुणोपेतस्त्वष्टमे वत्सरे भवेत् ॥४०॥
नवमे वज्रकायः स्यात् खेचरो दिक्चरो भवेत् ।
दशमे पवनाद् वेगी यत्रेच्छा तत्र धावति ॥४१॥
सम्यगेकादशे वर्षे सर्वज्ञः सिद्धिभाग्भवेत् ।
द्वादशे शिवतुल्योऽसौ कर्त्ता हर्त्ता स्वयं भवेत् ॥४२॥
त्रैलोक्ये पूज्यते सिद्धः सत्यं श्रीभैरवो यथा ॥४३॥
सद्गुरु से दीक्षित होकर सदुपदेशग्रहणपूर्वक योगसाधना में तत्पर होने पर
साधक पहले वर्ष में शरीर के मलादि दोषों से निर्मल होकर नीरोग हो जाता
है और सभी लोगों के लिये समानरुप से प्रिय होता है । योग-साधना में तत्पर
उस साधक के दर्शन की सब लोग इच्छा करते हैं । वह दूसरे वर्ष में (संकल्प-
रहित होकर ) सफलमनोरथ हो जाता है और उसे सभी भाषाओं में बातचीत
करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है । तीसरे वर्ष में वह देहसिद्ध हो जाता हैं,
उसका शरीर दिव्यतेज से सम्पन्न हो जाता है, और सर्प-व्याघ्र आदि पशु उसके
समक्ष अहिंसक हो जाते हैं, उसे किसी भी तरह की बाधा नहीं पहुँचाते हैं ।
चौथे वर्ष में वह योगसाधक भूख-प्यास, जाड़ा-गरमी आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठ
जाता है और दूर स्थान पर होने वाले शब्दों को सुनने लगता है, इसमें तनिक
भी सन्देह नहीं है । पाँचवें वर्ष में वह वाक्‌सिद्ध हो जाता है—वह जो कुछ
भी कहता है, वह सत्य होता है और वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३१

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सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है—दूसरे के मृतशरीर में प्रवेश कर उसे प्राणान्वित
कर देता है। छठें वर्ष में उसका शरीर इतना पुष्ट हो जाता है कि किसी भी
प्रकार के शस्त्र तथा वज्रपात आदि से प्रभावित नहीं होता है। वह आसन पर
बैठे-बैठे पृथ्वीतल से ऊपर उठ जाता है और वायुके समान वेग धारण कर इस
तरह सातवें वर्ष में आसमान में उड़ने लगता है। आठवें वर्ष में वह अणिमा
आदि सभी सिद्धियों से सम्पन्न हो उठता है और नौवें वर्ष में उसका शरीर वज्र
के समान हो जाता है, वह आकाश और अनेक दिशाओं में भ्रमण करने में समर्थ
होता है। दशवें वर्ष में वह स्वेच्छा से पवन के वेग के समान अभीष्ट स्थान में
शीघ्रातिशीघ्र पहुँच जाता है। ग्यारहवें वर्ष में वह सर्वज्ञ और समस्त सिद्धियों
का स्वामी हो जाता है। बारहवें वर्ष में वह साक्षात् शिव के समान जगत्
को रचने और उसका संहार करने की सामर्थ्य से युक्त होता है। वह योगसिद्ध
पुरुष भैरव के समान तीनो लोकों में पूज्य होता है ॥ ३६-४३ ॥
एवं द्वादशवर्षैस्तु सिद्धयोगी महाबलः ।
जायते सद्गुरोः पादप्रभावान्नात्र संशयः ॥४४॥
बारह वर्षों में सद्गुरु के शरणापन्न होकर योगाभ्यास करने से साधक
सिद्धयोगी होकर शिवस्वरूप हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४४ ॥
अनुबुभूषितयोनिजविश्रमं स गुरुपादसरोरुहमाश्रयेत् ।
तदनुससरणात्परमं पदं, समरसोकरणं न च दूरतः ॥४५॥
जो योगसाधक शान्ति-मुक्ति चाहता है, जो मोक्ष का अनुभव करना
चाहता है, उसे गुरु के चरण-कमल का आश्रय ग्रहण करना चाहिये । सद्गुरु
के अनुग्रह से योगसाधन में तत्पर होने से उसे पिण्डसिद्धि ( अपने पिण्ड में
परपिण्ड-परमात्मरूप की अखण्ड व्यापकता की अनुभूति ) और परम पद
की प्राप्ति सहज सुलभ हो जाती है ॥ ४५ ॥
गुरुकुलसन्तान
गुरुकुलसन्तानं पञ्चधा प्रोक्तम् । आईसन्तानं विलेश्वर
सन्तानं, विभूतिसन्तानं, नाथसन्तानं. योगेश्वरसन्तानञ्चे
त्येषामपि सन्तानानां पृथक् पृथक् वैशिष्ट्यं वर्तते ॥ ४६ ॥
१३२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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योगमहाज्ञान के उपदेष्टा सिद्धगुरुओं की सन्तान ( वंश ) -परम्परा का
वर्णन किया जाता है । यह पाँच प्रकार का वर्णन किया जाता है । यह पांच
प्रकार की है । आई नाम विमला शक्ति का है, यह आईनाथ या उदयनाथ से
सम्बद्ध है, आई शिष्य को ही आईसन्तान-परम्परा से अभिहित किया जाना है ।
दूसरी परम्परा विलेश्वर गुरु की है । ( यद्यपि इस परम्परा में दीक्षित शिष्य
दिगम्बर होते हैं—वस्त्र तक नहीं धारण करते तथापि अपने उपदेशामृत से
श्रद्धालु अधिकारी व्यक्तियों को दीक्षित करते हैं । तीसरी परम्परा उन सिद्ध
गुरुओं की है, जो विभूति धारण करते हैं, उनके द्वारा दीक्षित शिष्य विभूति-
सन्तान कहे जाते हैं । चौथी परम्परा नाथयोग के सिद्ध गुरुओं की है, समस्त
प्रपंचों से अतीत नाथतत्व की दीक्षा से दीक्षित शिष्य नाथसन्तान कहे जाते
हैं । पाँचवीं परम्परा योगीश्वर सन्तान के रूप में विख्यात है । व्यापक, असंग
अलख-निरञ्जन तत्वस्वरूप में लय को प्राप्त योगीगुरु शिष्यों की योग्यता के
अनुरूप सदुपदेश प्रदान करते हैं । ऐसे शिष्य योगीश्वर-सन्तान के रूप में प्रसिद्ध
हैं । इन पाँचों परम्पराओं की पृथक्-पृथक् विशेषताएं हैं ॥ ४६ ॥
परमार्थतः सर्वं पाञ्चभौतिकं न जाताः पुरुषाः
सम्बोधमात्रैकरूपः शिवस्तदितरत्सर्वमज्ञानमव्यक्तं भवति
तत्र शिवस्तु ज्ञानम् ॥ ४७ ॥
परमार्थ के स्तर पर विचार करने से पता चलता हैं कि संसार की समस्त
वस्तुएँ पाञ्चभौतिक हैं, पाँच तत्वों से उत्पन्न हैं । ( इस तरह गुरुप्रणाली भी
पाँच रूपों में विभक्त है । ) जीवात्मा—पुरुष आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती
( क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका नाश भी होता है ), यह आत्मा
सद्ज्ञानस्वरूप शिव है, शिव से इतर सब कुछ अज्ञान है, अज्ञान-अव्यक्त माया
से बोधित यह जगत् प्रपञ्च मात्र है । एक मात्र शिव ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप
व्यापक परमात्मा हैं ॥ ४७ ॥
एतेषामपि सन्तानानां केचित्स्वपराङ्मुखा वेशमात्रसम्पन्नाः
क्रयविक्रयादिकं कुर्वन्ति सन्तानभेदं प्रत्यन्योन्यमधः कुर्वन्ति
योगमार्गं द्वेषयन्ति ॥ ४८ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३३

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इन योगी-सन्तानों में अनेक आत्मविमुख होकर जगत् के व्यापार ( लेन-
देन, संग्रह, त्याग आदि प्रपंच ) में तत्पर रहते हैं, केवल वेशमात्र धारण कर योगी
कहलाते हैं। इस तरह परस्पर एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं और योगमार्ग से
द्वेष करते हैं ॥ ४८ ॥
रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अतिमन्यवः ।
दाम्भिका मानिनः पापाधिककुर्वन्तीश्वरप्रियान् ॥ ४६ ॥
साधुसङ्गमसच्छास्त्रपरमानन्दलक्षितान् ।
स्वेच्छाचारविहारैकज्ञानविज्ञानसंयुतान् ॥ ५० ॥
यूयं शिष्टा वयं दुष्टा दुष्टा यूयं वयं तथा ।
एव वदन्ति चान्योन्यं प्रमोहेन निरन्तरम् ॥ ५१ ॥
इस तरह सन्मार्ग—योगमार्ग से भ्रष्ट योगी रजोगुणी होते हैं और भयानक
से-भयानक संकल्पों की पूर्ति और कामनाओं की सिद्धि में लगे रहते हैं, वे बड़े
क्रोधी, दाम्भिक और अभिमानी होते हैं, ऐसे पापात्मा परमात्मा के शरणागत,
संत के संग और सच्छास्त्रों के अध्ययन में आनन्द लेने वाले, अखण्ड आत्मस्वरूप
में रमण करने वाले आत्मज्ञानी और परमात्मतत्त्व के विज्ञानियों की निन्दा करते
हैं कि आप अपने को शिष्ट और हमें दुष्ट समझते हैं, पर वास्तव में ( सज्जन
के वेष में ) आप ही दुष्ट और हम लोग शिष्ट हैं; इस तरह अज्ञानी की तरह
वे आपस में एक-दूसरे की निन्दा करते रहते हैं ॥ ४६-५१ ॥
पृथ्विजलं तथा वह्निर्वायुराकाशमेव च ।
एते सन्तानोदयास्तु सम्यगेव प्रकीर्तिताः ॥ ५२ ॥
शक्तिसम्वलित शिव की स्वप्रकृति से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-
रूप में पाँच सन्तानों की उत्पत्ति का ही वर्णन उपलब्ध होता है ॥ ५२ ॥
काठिन्यं चार्द्रता तेजो धावनं स्थिरता खलु ।
गुणा एते च पञ्चैव सन्तानानां क्रमात्स्मृताः ॥ ५३ ॥
ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः ।
एताश्च देवताः प्रोक्ता सन्तानानां क्रमेणु तु ॥ ५४ ॥
१३४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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पृथ्वी का गुण कठोरता है, जल का गुण आर्द्रता है, अग्नि का गुण तेज है,
वायु का गुण सञ्चरण है और आकाश का गुण अचलता स्थिरता है। ब्रह्मा,
विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ही इनके पाँच अधिष्ठातृ देवता हैं । ये पाँच
गुरुसन्तान के रूप में यथाक्रम ( उपास्यरूप में ) वर्णित हैं । ( आदिनाथ शिव
ही परम गुरु हैं, उन्हीं की सन्तान के रूप में इन पाँच गुरुवंश-परम्परा का वर्णन
किया गया है । ) यही पाँचों गुरुसन्तानों का यथार्थ रूप में अवस्थाभेद से
वर्णन है ॥ ५४ ॥
स्थूलसूक्ष्मकारणतुर्यं तुर्यातीतमिति पञ्चावस्थाः क्रमेण
लक्ष्यन्ते । एतेषामपि सर्वेषां विज्ञाता यः स योगी सिद्ध
पुरुषः स योगीश्वरेश्वर इति परमरहस्यं प्रकाशितम् ॥ ५५ ॥
स्थूल, सूक्ष्म, कारण, तुर्य और तुर्यातीत पाँच अवस्थायें हैं । ( इन्हें योग
की सात भूमिकाएँ कही गयी हैं, नित्यानित्य वस्तु के विवेकपूर्वक तीव्र मुमुक्षारूप
शुभेच्छा पहली भूमिका है । गुरुमन्त्र प्राप्त कर उपनिषद् तथा योगशास्त्र के
अध्ययन में प्रवृत्तिमूलक विचारणा दूसरी अवस्था है । आसन, प्राणायाम तथा
निदिध्यासनपूर्वक आत्मस्वरूप में प्रवृत्ति तनुमानसा नाम की तीसरी अवस्था
है । समस्त जगत् में आत्मरूपता का ग्रहण सत्त्वापत्ति नाम की चौथी अवस्था
है । विश्वप्रपञ्च में सम्पूर्ण अनासक्ति और अद्वैत स्वरूप में स्थिति असंसक्ति नाम
की पाँचवीं अवस्था है । स्वरूपानन्द की प्राप्ति पदार्थाभाविनी नाम की छठी
भूमिका है, कैवल्यावस्था की प्राप्ति तुर्यगा नाम की सातवीं भूमिका है । )
इन पाँचों अवस्थाओं का मर्मज्ञ योगी, सिद्धपुरुष, योगीश्वरेश्वर कहलाता है ।
इस तरह परम रहस्य का प्रकाशन किया गया ॥ ५५ ॥
अतएव सम्यग् निजविश्रान्तिकारकं महासिद्धयोगिनं
सद्गुरुं सेवयित्वा सम्यक् सावधानेन परं पदं सम्पाद्य
तस्मिन्निजपिण्डे च समरसभावं कृत्वात्यन्तनिरुत्थानेन
सर्वानन्दत्वे निश्चलं स्थातव्यं ततः स्वयमेव महासिद्धो भवतीति
सत्यम् ॥ ५६ ॥
योगसाधक को चाहिये कि वह मोक्षस्वरूप-प्रदान करने वाले महासिद्धयोगी
सद्गुरु से सदुपदेश ग्रहण कर अत्यन्त सावधान होकर परमपद का ज्ञान प्राप्त करे
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३५

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और उस परमपदरूप में अपने व्यष्टि-पिण्ड में व्याप्त आत्मा का सामरस्य—
ऐक्य स्थापित कर उस अद्वैत स्वरूप में सच्चिदानन्दघन अखण्ड परमात्मा में
स्थित हो जाय । इस तरह परमपद में स्वरूपावस्था की प्रतिष्ठा से वह स्वयं
महासिद्ध—परमतत्वज्ञ योगी हो जाता है ।। ५६ ।।
न विधिर्नैव वर्णश्च न वर्ज्यावर्ज्यकल्पना ।
न भेदौनिधनं किञ्चिन्नाशौचं नोदकक्रिया ।। ५७ ।।
योगीश्वरेश्वरस्यैव नित्यतृप्तस्य योगिनः ।
वित्स्वात्मसुखविश्रान्तिभावलब्धस्य पुण्यतः ।। ५८ ।।
सम्यक्स्वभावविज्ञानात् क्रमाभ्यासान्नचासनात् !
न वैराग्यान्ननैराश्यान्नाहारात्प्राणधारणात् ।। ५६ ।।
न मुद्राधारणाद्योगान्मौनकर्मसमाश्रयात् ।
न विरक्तौ वृथायासान्न कायक्लेशधारणात् ।। ६० ।।
न देवार्चनाश्रयाद् भक्त्यानाश्रमाणाञ्च पालनात् ।
न षड्दर्शनकेशादिधारणान्न च मुण्डनात् ।। ६१ ।।
न जपान्न तपोध्यानान्न यज्ञतीर्थसेवनात् ।
नानन्तोपाययत्नेभ्यः प्राप्यते परम पदम् ।। ६२ ।।
योगीश्वर, आत्मस्वरूपानन्द में स्वस्थ योगी को मोक्षरूप स्वरूपावस्थिति
विश्रान्ति के पुण्य से आत्मस्वभावपरक सूक्ष्म ज्ञान से परमपद की प्राप्ति होती
है, उसके लिये विधि—शास्त्रनिर्दिष्ट नियमपालन, वर्ण की मर्यादा और संकल्प
(यह करना चाहिये, यह नहीं करना चाहिये ) अशौच, तर्पण-क्रिया, जन्म-
मरण के संस्कार आदि की आवश्यकता नहीं होती है । क्रमपूर्वक योगाभ्यास,
आसन, वैराग्य, अनासक्तिभाव (नैराश्य), आहार, प्राणायाम, मुद्रा-धारणा-
योग, मौन के अभ्यास, विशेष कर्म के आचरण, वैराग्य, व्यर्थ परिश्रम, शरीर को
उपवास आदि से संयमित करने, इष्ट देव की अर्चना, भक्ति और आश्रम धर्म के
पालन, छः दर्शन, केशादिधारण, मुण्डन, जप, तप, ध्यान, यज्ञ, तीर्थसेवन,
अनन्त-असंख्य उपायों से भी परमपद की प्राप्ति नहीं होती है ।। ५७-६२ ।।
एतानि साधनानि सर्वाणि दैहिकानि परित्यज्य परम-
पदेऽदैहिके स्थीयते सिद्धपुरुषैरिति ।। ६३ ।।
१३६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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( उपर्युक्त ) ये सभी सधान देह से साध्य हैं । इनमें आसक्त न होकर सिद्ध
पुरुष आत्मस्वरूप परम पद में ही स्थित रहते हैं ॥ ६३ ॥
विशेष—स्वरूपावस्थिति के लिये इन दैहिक साधनों का अभ्यास सार्थक
है अन्यथा ये सब-के-सब निरर्थक हो जाते हैं ।
गुरु की प्रसन्नता और परमपद
तत् कथं गुरुदृक्पातात् प्रायो दृढानां सत्यवादिनां सा
स्थितिर्जायते ॥ ६४ ॥
कथनाच्छक्तिपाताद्वा यद्वापादावलोकनात्
प्रसादात्स्वगुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ॥ ६५ ॥
उस अखण्ड आत्मस्वरूप परम पद की प्राप्ति किस तरह होती है ।
सत्योन्मुख--सत्स्वरूप के इच्छुक दृढ़—योगाभ्यासमें विधिपूर्वक स्थित योगसाधकों
में—प्रायः योग्यपात्रों में परम पद की स्थिति उत्पन्न होती है । गुरु के उपदेशामृत
से, गुरुद्वारा सूक्ष्म धरातल पर शिष्य में शक्ति के संचार ( शक्तिपात ) से तथा शिष्य
के प्रति गुरुकी सर्वांग में करुणामयी दृष्टि ( अवलोकन ) से उन्हीं के प्रसाद
( अनुग्रह ) से परमपद की प्राप्ति होती है ६४-६५
अतएव शिवेनोक्तम् । न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं
न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं शिवशासनतः शिवशासनतः
शिवशासनतः शिवशासनतः ॥ ६६ ॥
शिवका कथन है कि परम पद की प्राप्ति में गुरु के अनुग्रह से बढ़ कर दूसरा
कोई उपाय नहीं है, नहीं है । यह साक्षात् शिवका आदेश है, शिवका-आदेश है,
शिवका आदेश है, शिवका आदेश है ॥ ६६ ॥
वाङ्मात्राद्वाथदृक्पाताद् य करोतिच तत्क्षणात् ।
प्रस्फुटं शाम्भवं वेद्यं स्वसंवेद्यं परं पदम् ॥ ६७ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३७

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करुणाखण्डपातेनच्छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः ।
सम्यगानन्दजनकः सद्गुरुः सोऽभिधीयते ॥ ६८ ॥
जो केवल उपदेश मात्र से अथवा.कृपामयी दृष्टि से करुणा की अखण्ड वृष्टि
करते हुए शिवस्वरूप ( शाम्भव ) स्वसंवेद्य परम पद को प्रकाशित कर शिष्य के
आठ पाशों ( जरा, जन्म, मृत्यु, व्याधि, काम, क्रोध, मोह, अविद्या—अहंकार )
का नाश कर देता है और स्वरूपानन्द में प्रतिष्ठित कर देता है, वही सद्गुरु कहा
जाता है ॥ ६७-६८ ॥
निमिषार्धार्धपाताद् वा यद्वापादावलोकनात् ।
स्वात्मानं स्थिरमाधत्ते तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६९ ॥
जो केवल निमिष के लेशमात्र से ही शक्तिपात के द्वारा अथवा
करुणापूर्वक अवलोकन कर शिष्य को आत्मस्वरूप—परमपद में स्थिर (अधिष्ठित)
कर देता है, उस गुरु को नमस्कार है ॥ ६६ ॥
नानाविकल्पविश्रान्ति - कथया कुरुते तु यः ।
सद्गुरुः स तु विज्ञेयो न तु मिथ्याविडम्बकः ॥
अतएव परमपदप्राप्त्यर्थं स सद्गुरुः सदा वन्दनीयः ॥ ७० ॥
जो अपने सद्ज्ञानामृत से ( साधक के अथवा शिष्यके हृदय में स्थित )
विश्वप्रपंचरूपविश्रान्ति—सांसारिक मोहजालका नाश कर देता है, वही सद्गुरु
है । संसारके रमणीय विषयभोग में शिष्य को व्यामोहित कर असत्स्वरूप में
स्थित करने वाला गुरु नहीं हो सकता है । अतएव परमपद को प्राप्त करानेवाले
सद्गुरु की ही वन्दना करनी चाहिये ॥ ७० ॥
गुरुरिति गृणाति शं सम्यक् चैतन्यविश्रान्तिमुपदिशति
विश्रान्त्या स्वयमेव परात्परं परमपदमेव प्रस्फुटं भवति
तत्क्षणात् साक्षात्कारो भवति ॥ ७१ ॥
गुरु ( शिष्य के अज्ञान-अन्धकार का नाश कर उसे ) कल्याण प्रदान
करता है । चैतन्यस्वरूप में प्रतिष्ठित होने का, परमपद में स्थित होने का
१३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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सदुपदेश प्रदान करता है। इस तरह चैतन्यस्वरूप में विश्रान्ति के फलस्वरूप
परमपद प्रस्फुटित प्रकाशित—होता है और शिष्य ( गुरु के अनुग्रहसे ) अखण्ड
अनन्त, अलख-निरञ्जन परमशिव का साक्षात्कार करता है ॥ ७१ ॥
अतएव महासिद्धानां मते प्रोक्तं वाङ्मात्रेण
सम्यगवलोकनेन वा तत्क्षणान्मुहुर्विश्रान्तियुक्तं करोतीति
यः स सद्गुरुर्भवति । नोचेन्निजविश्रान्ति विना पिण्डपदयोः
समरसकरणं न भवतोति सिद्धान्तस्तस्मान्निजविश्रान्तिकारकः
सद्गुरुरभिधीयते नान्यः । पुनर्वागादिशास्त्रदृष्ट्यनुमानतर्क
मुद्रया भ्रामको गुरुस्त्याज्यः ॥ ७२ ॥
योगज्ञान में सन्निष्ठ महासिद्धों के मत में कहा गया है कि केवल
सदुपदेशमात्र से अथवा कृपामय कटाक्षपात से तत्काल ही सद्गुरु अपने शिष्य
को स्वरूपावस्थिति—परमात्मनिष्ठा से संयुक्त कर देता है, अन्यथा बिना
परमात्मनिष्ठा के पिण्डपद ( व्यष्टिशरीर में व्याप्त अखण्ड ज्ञानस्वरूप
आत्मा और सकल ब्रह्माण्ड में व्याप्त परमात्मा ) से सामरस्य—अभेदतानुभूति
सम्भव ही नहीं है, यह सिद्धान्त है । अतएव जो स्वरूपावस्थिति--परमात्मनिष्ठा
( निजविश्रान्ति ) से शिष्य को कृतार्थ कर देता है, वही सद्गुरु कहलाता है ।
वाग्जाल—शास्त्र की दृष्टि से तर्क, अनुमान आदि मुद्रा से भ्रमित कर शिष्य को
सांसारिक विषय-प्रपञ्च में व्यामोहित करनेवाले गुरु का त्याग कर देना चाहिये,
ऐसा गुरु निजस्वरूपस्थिति नहीं प्रदान कर सकता है ॥ ७२ ॥
ज्ञानहीनो गुरुस्त्याज्यो मिथ्यावादीविडम्बकः ।
स्वविश्रान्तिं न जानाति परेषां स करोति किम् ॥ ७३ ॥
जिसे योगविषयक ज्ञान नहीं है, जो शिष्यों को वाग्जाल में उलझा कर
उन्हें दिग्भ्रमित करता है, जो आत्मप्रवञ्चक ( विडम्बनायुक्त ) है, वह गुरु नहीं
है, वह त्याज्य है ( उससे दीक्षा नहीं ग्रहण करनी चाहिये ) । वह स्वयं जब
अपनी स्वरूपस्थिति—परमात्म निष्ठा से अनभिज्ञ है तो दूसरों को किस तरह
सन्मार्ग-दर्शन करा सकता है—आत्मज्ञान प्रदान कर सकता है ॥ ७३ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३६

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शिलया किं परं पारं शिलासंघः प्रतार्यते ।
स्वयंतीर्णो भवेद्योऽसौ परान्निस्तारयत्यलम् ॥ ७४ ॥
जिस तरह (नदी के प्रवाह में) पड़ी शिला (धारामें प्रवाहित) अन्य शिलाओं
को वहाकर उस पार उन्हें नहीं उतार सकती, उसी तरह जो स्वयं पार होने में ,
असमर्थ है, वह दूसरों को पार नहीं कर सकता है अथवा तारने में असमर्थ है ।
जो स्वयं तर जाने में समर्थ है, वही दूसरों को भी पार उतार सकता है ॥ ७४ ॥
विकल्पसागराद् घोराच्चिन्ताकल्लोलदुस्तरात् ।
प्रपञ्चवासन!दुष्टग्रहजालसमाकुलात् ॥ ७५ ॥
वासनालहरीवेगान्न स्वं तारयितुं क्षमः ।
स्वस्थेनैवोपदेशेन निरुत्थानेन तत्क्षणात् ॥ ७६ ॥
तारयत्येवदृक्पातात् कथनाद्वा विलोकनात् ।
तारिते स्वपदं धत्ते स्वस्वमध्ये स्थिरो भवेत् ॥ ७७ ॥
यह संसार एक दुस्तर सागर है, विषयवासनारूप संकल्प-विकल्पस्वरूप
चञ्चलता से उद्वेलित है, यह बड़ा भीषण है, चिन्ता की लहरियाँ इसमें निरन्तर
उठती रहती हैं, यह दुष्ट ग्राहों से पूर्ण जालरूप ममता-मोह आदि से आकुल है,
विषय-वासनायें ही इसमें लहरियाँ हैं । इस संसार-सागर को जो तैर कर पार
उतरने में समर्थ नहीं है, वह किस तरह दूसरों को पार उतार सकता है । जो
अपने अखण्ड आत्मस्वरूपमें स्थित है, वही निरुत्थान ( जीवात्मा—परमात्मा में
सामरस्य ) स्थापित कर शिष्य को सदुपदेश प्रदान कर कृपामयी दृष्टिपात कर
अथवा ज्ञान प्रदान कर तारने में--भवसागर से पार उतारने में समर्थ है । वह
स्वरूपस्थिति से परम पद में अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाता है,
शिष्यको भवसागर से पार उतार देता है ॥ ७७ ॥
ततः स मुच्यते शिष्यो जन्मसंसारबन्धनात् ।
परानन्दमयोभूत्वा निष्कलः शिवतां व्रजेत् । ७८ ॥
कुलानां कोटिकोटीनां तारयत्येव तत्क्षणात् ।
अतस्तु सद्गुरुं साक्षात् त्रिकालमभिवन्दयेत् ॥ ७६ ॥
१४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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सर्वाङ्गप्रणिपातेन स्तुवन्नित्यं गुरुं व्रजेत् ।
स जनः स्थैर्यमाप्नोति स्वस्वरूपमयो भवेत् ।। ८० ।।
निरुत्थान के द्वारा परमपद में स्वस्थ गुरु के अनुग्रह से शिष्य जन्ममरण
दुःखरूप ( यातनामय ) संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है, वह अपने सच्चिदानन्द
स्वरूप में स्थित होकर इन्द्रियादि के व्यामोह से मुक्त होकर शिवस्वरूप में
प्रतिष्ठत हो जाता है । ऐसा गुरु करोड़ों कुल की सन्तानों ( योगियों ) का
उद्धार कर देता है । इसलिये सदा-नित्यदण्डवत् प्रणामपूर्वक स्तवन करते हुए
गुरु का ( विधिपूर्वक ) अभिवन्दन करना चाहिये । ऐसा शिष्य ( समर्थ सद्गुरु
के शरणागत होकर ) परमात्मपद में अखण्ड स्वरूप में स्थित हो जाता
है ।। ८० ।।
किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतेन च ।
दुर्लभा चित्तविश्रान्तिर्विना गुरुकृपां पराम् ।। ८१ ।।
चित्तविश्रान्तिलब्धानां योगिनां दृढ़चेतसाम् ।
स्वस्वरूपे निमग्नानां निरुत्थानं विशेषतः ।। ८२ ।।
निमिषात् प्रस्फुटं भाति दुर्लभं परमं पदम् ।
यस्मिन् पिण्डो भवेल्लीनः सहसा नात्र संशयः ।। ८३ ।।
इस सम्बन्ध में अधिक क्या कहा जाय । करोड़ों-करोड़ों शास्त्रका अध्ययन
करने से भी विना गुरुकी कृपा प्राप्त किये चित्तवृत्तिनिरोधपूर्वक आत्मशान्ति
( विश्रान्ति ) दुर्लभ है । चित्तविश्रान्ति प्राप्त होने पर ही दृढ़ योगसाधन में
तत्पर आत्मस्वरूप में निमग्न योगी को निरुत्थान—स्वबोध ( जागरण ) सुलभ
होता है । निरुत्थान के परिणामस्वरूप तत्काल ही दुर्लभ परमपद प्रकाशित
( प्रत्यक्ष ) हो जाता है । इस परमपद में व्यष्टि-पिण्ड और परमात्म
पिण्ड—ब्रह्माण्ड में सामरस्य स्थापित होता है । इसमें तनिक भी संशय नहीं
है ।। ८१-८३ ।।
संवित्क्रियाविकरणोदयचिद्विलासो
विश्रान्तिमेव भजतां स्वयमेव भाति ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४१

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ग्रस्ते स्ववेगनिचये पदपिण्डमैक्यं
सत्यं भवेत्समरसं गुरुवत्सलानाम् ॥ ८४ ॥
बुद्धिवृत्ति के विस्तार के उदयस्वरूप चिद्विलास-आत्मप्रकाश में ही गुरु के
अनुग्रहप्राप्त शिष्यों में मानसव्यापार के निरुद्ध होने पर विश्रान्ति की स्थिति सम्भव
होती है, उस विश्रान्ति में समष्टि-व्यष्टिरूप पदपिण्ड का ऐक्य-सामरस्य स्थापित
होता है । जीवात्मारूप शिष्य परमात्मपद में गुरु की कृपा से अभेद-अभिन्न हो
जाते हैं, उन्हें अखण्ड परमात्मस्वरूप-परमात्मपद अथवा परमपद की प्राप्ति
हो जाती है ८४ ॥
इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ पञ्चमोपदेशः ॥
卐
१४२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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छठा उपदेश
[ अवधूत योगी ]
अथ कोऽवधूतयोगिनामेत्यपेक्षायामाह । यः सर्वान्
प्रकृतिविकारानवधुनोतीत्यवधूत योगी । योगोऽस्यास्तीति
धूञ्कम्पने धूजिति धातुः कम्पनार्थे वर्तते । कम्पनं चालनं
देहदैहिकप्रपञ्चादिषु विषयेषु सङ्गतं मनः परिगृह्य तेभ्यः
प्रत्याहृत्य स्वधाममहिम्नि परलीनचेताः प्रपञ्चशून्य
आदिमध्यान्तनिधनभेदवर्जितः ॥ १ ॥
( सद्गुरु से सदुपदेशामृत प्राप्त कर व्यष्टि-पिण्ड और ब्रह्माण्ड में
जीवात्मा-परमात्मा का सामरस्य स्थापित कर सिद्धि प्राप्त करने पर नित्य
अवधूत स्वरूप की प्राप्ति होती है । ) अवधूत योगी का स्वरूप क्या है, इस
जिज्ञासा के समाधान के लिये अवधूत के लक्षण का वर्णन किया जाता है । जो
समस्त प्रकृति-विकार-देह, इन्द्रिय, मन और अनात्मसम्बन्धरूप विषयप्रपञ्चादि
मलों का अवधूनन-त्याग कर निर्मल स्वरूप में संस्थित हो जाता है, वही
अवधूत योगी है । धूञ् धातु 'कम्पन, चालन' अर्थ में प्रयुक्त होता है, जिसका
आशय यह है कि दैहिक प्रपञ्चादिविषयों में आसक्त मन को निगृहीत कर उन
विषयों से प्रत्याहारित कर-हटाकर प्रपञ्चरहित होकर तथा जन्म-मरण आदि
दुःखों से-द्वन्द्वात्मक परिस्थितियों से छुटकारा पाकर अपने अखण्ड ज्ञानस्वरूप
परम शिव में ( सामरस्य के द्वारा ) तल्लीनचित्त योगी ही नित्य
अवधूत है ॥ १ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४३

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यकारो वायुबीजं स्याद्रकारो वह्निबीजकम् ।
तयोरभेद्योंकारश्चिदाकारः प्रकीर्तितः ॥ २ ॥
'य' वायु का बीज है, 'र' अग्नि का बीज है, दोनों का ऐक्य—सामरस्य
ही चिद्रूप ओंकार 'ॐ कहा जाता है ॥ २ ॥
विशेष—तन्त्र में शिव को बिन्दु और शक्ति को बीज कहा गया है ।
इस तरह महायोगी गोरखनाथ ने अपने योगग्रन्थों में जहाँ पाँच भूत-तत्त्व, पृथ्वी,
जल, अग्नि, वायु और आकाश की धारणा का निर्देश किया है, वहीं उनके बीज
का भी क्रमश 'ल' 'व', 'र' 'य' और ह' का वर्णन किया है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति
के उपर्युक्त दूसरे श्लोक में 'य' और 'र' बीज के कथनका आशय है सभी तत्त्वों
के 'बीज' का ग्रहण । पाँच भूतों का लय अपने 'बीज' में स्थापित होता है और
चिद्रूप बीज का लय ऊंकार-प्रणव में होता है । ओंकार-ॐकार ही समस्त बीज
मन्त्र और शब्दों का उपादान कारण है । इस तरह चिद्रूपा शक्ति से ऊंकार
प्रणव का तादात्म्य ही शक्ति और शिव की अभेदता—एकता अथवा समरसता
है । इस सामरस्यसे योगी दिव्य शरीर वाला हो जाता है । भगवान् शिव का
प्रकारान्तर से कथन है ।
अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा ।
योगिनां साधनावस्था भवेद् दिव्यं वपुस्तदा ॥
( शिवसंहिता ४ । ८७ )
तदेतद् व्यक्तमुच्यते—
क्लेशपागत रङ्गाणां कृन्तनेन विमुण्डनम् ।
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ३ ॥
जो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, पंचक्लेशरूपी जाल के
वेग का उच्छेद कर देता है और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में प्रपञ्च
से मुक्त हो जाता है, वही (आत्मस्वरूप में स्थित ) योगी अवधूत कहा
जाता है ॥ ३ ॥
निजस्मरविभूतिर्यो योगी स्वाङ्गे विभूषितः ।
आधारे यस्य वा रूढिः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ४ ॥
१४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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अविद्यादि पंच क्लेश के स्मरण से परे होकर जो योगी अपने स्वरूप को
इन पाँचों क्लेश के नाशरूप भस्म से समलंकृत करता है और आचार्य ( गुरु )
द्वारा निर्दिष्ट योगमार्ग में नित्य आरूढ—दृढ़ रहता है, वही अवधूत कहा
जाता है ।। ४ ।।
लोकमध्ये स्थिरासीनः समस्तकलनोज्झितः ।
कौपीनं खर्परोऽदैन्यं सोऽवधूतोऽभिधीयते । ५ ।
( अपने स्वरूप का स्मरण कराने वाले विभूतिरूप अलंकार से शोभित )
विषयप्रपञ्चरूप संसार ( लोक ) में अखण्ड आत्मस्वरूप में दृढ़भाव से स्थित
रहनेवाला, समस्त संकल्पविकल्परूप भेद-भाव से विमुक्त, कटि में ( वस्त्ररूप )
केवल मात्र कौपीन, हाथ में ( जल पीने के लिये तथा भिक्षा-ग्रहण के उद्देश्य से )
खर्पर मात्र धारण कर ( लोक में ) दैन्यरहित—सर्वसमर्थ रूप में विचरण करने
वाला अभय योगी ही अवधूत कहलाता है ।। ५ ।।
अवधूत के वेष और चिह्न
शं सुखं खं परं ब्रह्म शङ्खं सङ्घट्टनाद् भवेत् ।
सिद्धान्तो धारितो येन सोऽवधूतोऽभिधीयते । ६ ।
'शं' शब्द सुख ( लोककल्याण ) का वाचक है और 'ख' शब्द ( अपने
अखण्ड ज्ञानस्वरूप-परमात्मा ) परब्रह्म का वाचक है ।। दोनों के मेल—ऐक्य
अथवा योग से 'शंख' शब्द सिद्ध होता है । अपने आत्मस्वरूप में स्थित होकर
अपने ज्ञानरूप उपदेशामृत और योगसाधन से जगत् के प्राणियों को सन्मार्ग पर
लगा कर उनका कल्याण सम्पादन करने वाला ही अवधूत है । वह शंख धारण
करता है —यही सिद्धान्त है । ( शंख को बाह्य चिह्न भी परिलक्षित किया जा
सकता है ।) अतएव शंख धारण करने वाला अवधूत कहा जाता है ।। ६ ।।
पादुका पदसंवित्तिर्मृगत्वक् स्यादनाहता ।
शेली यस्य परासंवित् सोऽवधूतोऽभिधीयते । ७ ।
मेखला निवृत्तिर्नित्यं स्वस्वरूपं कटासनम् ।
निवृत्तिः षड्विकारेभ्यः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ८ ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४५

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चित्प्रकाशपरानन्दौ यस्य वै कुण्डलद्वयम् ।
जपमालाक्षविश्रान्तिः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ६ ।
यस्य धैर्यमयोदण्डः पराकाशञ्च खर्परम् ।
योगपट्टो निजा शक्तिः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १० ।
पादुका परमात्म-ज्ञान का स्वरूप है, जिसने पैर में पादुका को धारण किया
है, (आन्तरिक लक्षण के रूप में ) जो परमात्म-ज्ञान के आश्रय में स्थित है,
जिसने मृगचर्म धारण किया है अथवा (मृगचर्मरूप) अनाहत नाद से जो
विशोभित है, पराशक्तिरूप (चिद्रूप) ज्ञान से जो युक्त है अथवा परासंवित्
रूप शेली जिसने गले में धारण की है, वह अवधूत कहा जाता है। जिसने कटि में
मेखला पहनी है अथवा जो मेखलारूप (प्रापंचिक विषयों में) निवृत्ति को धारण
करने वाला है, जो स्थिर आसन पर स्थित है अथवा स्थितआसनरूपी आत्म-
स्वरूप में ही जो संस्थित है, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—छः
विकारों से निवृत्त—परे है, वही अवधूत है। जिसने कानों में दो कुण्डल धारण
किये हैं अथवा चित्प्रकाश और परमानन्द से जो सम्पन्न है, जपमाला धारण कर
(मन्त्रजापपूर्वक) जो आत्मसत्ता का स्मरण करता है अथवा जिसकी दृष्टि में
विषय-प्रपंचों से उपरति ही चित्त-विश्रान्ति है, वही अवधूत कहा जाता है। जो दण्ड
धारण करता है अथवा धैर्य धारण करना जिसके लिये (योगसाधना में) दण्डरूप
है, जो हाथ में खर्पर (खप्पर) धारण करता है या पराकाश ही जिसके लिये
खर्पर है और जो योगपट्टधारण करता है अथवा निजाशक्ति ही जिसके लिये
योगपट्ट है, वही अवधूत कहा जाता है ॥ ७–१० ॥
भेदाभेदौ स्वयं भिक्षां कृत्वा स्वास्वादने रतः ।
जारणातन्मयो भावः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ११ ।
अचिन्त्ये निजदिग्देशे स्वान्तरं वस्तु गच्छति ।
एकदेशान्तरीयो यः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १२ ।
स्वपिण्डममरीकर्तुमनन्ताममरीं च यः ।
स्वयमेवपिबेदेतां सोऽवधूतोऽभिधीयते । १३ ।
अचिन्त्यावज्ज्रवद्गाढ़ा वासनामलसंकुला ।
१४६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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सा वज्री भक्षिता येन सोऽवधूतोऽभिधीयते । १४ ।
आवर्तयति यः सम्यक् स्वस्वमध्ये स्वयं सदा ।
समत्वेन जगद् वेत्ति सोऽवधूतोऽभिधीयते । १५ ।
जो भेद, अभेद, द्वैत और अद्वैत से अतीत होकर द्वैताद्वैतविलक्षण
स्वसंवेद्य, अखण्ड ज्ञानस्वरूप आत्मरस के आस्वादन में तत्पर है और जागरण—
रागद्वेष भाव में पूर्ण वैराग्यभाव से तन्मय है अथवा सच्चिदानन्दस्वरूप में स्वस्थ
है, वह अवधूत कहा जाता है । जो देश-काल से अतीत सर्वव्यापक अपने ही में
असीम परमात्मा को प्राप्त कर लेता है और ( दूसरों की दृष्टि में ) एकान्त वास
में रहते हुए भी जो अपने स्वसंवेद्य स्वरूप में सब जगह विद्यमान है, वही अवधूत
कहा जाता है । जिसने पार्थिव—भौतिक शरीर को अमर—मृत्युरहित करने के लिये
( खेचरी मुद्रा की सिद्धि के द्वारा ) सहस्रार से द्रवित चन्द्रामृत का ( विपरीत
करणी से ) स्वयं पान कर लिया है अथवा जो पान कर लेता है, वह अवधूत कहा
जाता है । जिसने मल से दूषित वज्रनाड़ी को (प्राणायाम आदि की सिद्धि से) मल
रहित कर लिया है अथवा वज्रोली के अभ्यास द्वारा जिसने शरीर में वीर्य को
ऊर्ध्वमुख कर जीर्ण कर दिया है, पचा लिया है, वह अवधूत कहलाता है । जो
अपने आत्मस्वरूप में परमात्मा की अभेदानुभूति करता है अथवा आत्मा-परमात्मा
में सामरस्य की सिद्धि कर आत्मपद में प्रतिष्ठित हो जाता है, वही सर्वत्र व्यापक
योगी अवधूत कहा जाता है ॥ ११–१५ ॥
अवधूत की अवस्था ( स्थिति )
स्वात्मानमवगच्छेद्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते ।
अनुत्थानमयः सम्यक् सोऽवधूतोऽभिधीयते । १६ ।
अनुत्थाधारसम्पन्नः परविश्रान्तिपारगः ।
धृतिचिन्मयतत्वज्ञः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १७ ।
अव्यक्तं व्यक्तमाधत्ते व्यक्तं सर्वं ग्रसत्यलम् ।
स सत्यं स्वान्तरे सन्न सोऽवधूतोऽभिधीयते । १८ ।
अवभासात्मको भासः प्रकाशे सुखसंस्थितः ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४७

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लीलयारमते लोके सोऽवधूतोऽभिधीयते ।
क्वचिद् भोगी क्वचित्त्यागी क्वचिन्नग्नोदिगम्बरः ।
क्वचिद्राजा क्वचाचारी सोऽवधूतोऽभिधीयते । १९ ।
जो अपने अखण्ड आत्मस्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभवी—साक्षात्कार करने वाला
है और अपने उस स्वरूप में स्थित है और अनुत्थान ( आत्मा-परमात्मा के ऐक्य )
भाव में तल्लीन है, वही अवधूत कहलाता है । जो परमात्मा-आत्मा के एक
स्वरूपमय तादात्म्य में स्वाश्रित—आत्माभिव्यक्त है और सत्स्वरूप में स्थिति
( विश्रान्ति ) का स्वामी है और धैर्यपूर्वक सच्चिदानन्द—परमात्मतत्व में स्थित
है—व्यक्त है तथा स्व में भी लीन ( अव्यक्त ) हो जाता है अथवा व्यक्त को
अव्यक्त और अव्यक्त परमात्मा को व्यक्त करता है, वह ( अपने भीतर सत्स्वरूप
में विद्यमान ) अवधूत कहा जाता है। जो समस्त चराचररूप जगन्मात्र का
प्रकाशक है और अपनी ही अन्तर्ज्योति—अखण्डपरमात्म प्रकाश में आनन्द का
अनुभव करता है और इस लोक में—लोकव्यवहार में स्वस्थ है, वह अवधूत
कहलाता है। जो भोगी, योगी, नग्न दिगम्बर, योगिराज तथा गुरु—सभी रूपों
में अखण्ड स्वरूप में प्रतिष्ठित रह कर जीवन धारण करता है, वही अवधूत
कहलाता है ॥ १६-१९ ॥
एवं विध नानासंकेतसूचको नित्यप्रकाशे वस्तुनि निजस्व-
रूपी सर्वेषां सिद्धान्तदर्शनानां स्वस्वरूपदर्शने सम्यक् सद्-
बोधकोऽवधूत योगीत्यभिधीयते स सद्गुरुर्भवति । यतः सर्व-
दर्शनानां स्वस्वरूपदर्शने समन्वयं करोति सोऽवधूतयोगो
स्यात् । २० ।
इस तरह नित्य प्रकाश—शुद्ध, बुद्ध, व्यापक आत्मस्वरूप में ही अनेक
( विभिन्न ) सिद्धान्त-दर्शनों का स्वरूप-दर्शन में ही सद्बोध सिद्ध ( प्रकाशित )
करने वाला अवधूत कहा जाता है, वह योगी अवधूत सद्गुरु होता है; क्योंकि वह
सभी दर्शनों ( अभेदात्मदर्शी मतों ) का स्वरूप में ही समन्वय ( आत्मानुभव )
करता है। वास्तव में सर्वत्र आत्मदर्शन करने वाला योगी ही अवधूत है ॥ २० ॥
१४८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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अवधूत की सर्वस्वरूपता
अत्याश्रमी च योगी च ज्ञानी सिद्धश्च सुव्रतः ।
ईश्वरश्च तथा स्वामी धन्यः श्रीसाधुरेव च । २१ ।
जितेन्द्रियश्च भगवान् स सुधी कोविदो बुधः ।
चार्वाकश्चार्हंतश्चेति तथा बौद्धः प्रकाशवित् । २२ ।
तार्किकश्चेति सांख्यश्च तथा मीमांसको विदुः ।
देवतेत्यादि विद्वद्भिः कीर्तितः शास्त्रकोटिभिः । २३ ।
आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति पुनः स्वयं ।
अस्तितत्त्वं परं साक्षाच्छिवरुद्रादिसंज्ञितम् । २४ ।
अवधूत अपने स्वसंवेद्य, द्वैताद्वैतविलक्षण, अखण्ड आत्मस्वरूप में आत्मस्थित
रहता है, इसलिये वह आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) की
अवस्थाओं से परे होने से अत्याश्रमी कहा जाता है, वह (स्वरूप-) ज्ञानी-
तत्वविद्, सिद्ध और योगसाधना-व्रत में—जगन्मात्र को परमात्मस्वरूप समझने में
दृढ़ होता है। वह सृष्टि, पालन (स्थिति) और संहार में (शक्तियुक्त होने से
साक्षात्) ईश्वर होता है, वह स्वामी (आत्मनिग्रही) होता है, वह सर्वदा
कृतार्थ और साधु होता है। वह जितेन्द्रिय, आत्मज्ञ, सद्बोधयुक्त, तत्वचिन्तक
और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र साकार-सगुण भगवान् (सर्वसमर्थ) होता है। वह समस्त
नास्तिक-आस्तिक दर्शन में आत्मबुद्धि रखने के कारण सब में अखण्ड आत्मस्वरूप
में समाहित रहने वाला, चार्वाक (सांसारिक विषय-भोग-प्रवृत देहात्म-
वादी), आत्मस्वरूप को प्राप्त अर्हंत (जैन), स्वात्मप्रकाश में प्रबुद्ध होकर
भी (बुद्धिवृत्तरूपक्षणिक आत्मविज्ञानवादीसुगत) बौद्ध, न्यायवैशेषिक दर्शनाव-
लम्बी परिणामवादी, सांख्यवादी (तत्त्वनिष्ठ) ज्ञानी, कर्मकाण्ड को ही
परमफल प्राप्ति कराने वाले साधन में निष्ठ पूर्वमीमांसक, संसार का कारण देवता,
स्वभाव, काल, कर्म समझने वाले अनेकानेक शास्त्रों और विद्वानों के विचार का
समर्थक, वह योगी अवधूत आत्मदर्शन में स्वस्थ होने से सर्वस्वरूप होता है।
आत्मा, परमात्मा, जीवात्मा, स्वस्वरूप, शिवरुद्र-नामयुक्त साक्षात् सर्वात्मा ही
अवधूत योगी होता है ॥ २१-२४ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४६

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विशेष—सांख्यदर्शन ने आत्म की असंगता का प्रतिपादन किया है—असंगता
का तात्पर्य है सर्वात्मस्वरूपावस्थान, जो सिद्धसिद्धान्त है। महर्षि कपिल का
वचन है :
असङ्गोऽयं पुरुष इति ॥
( सांख्यदर्शन १ । १५ )
न्यायदर्शन में दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति अथवा अभाव ही स्वरूपस्थिति-
अपवर्ग अथवा निःश्रेयस या ब्रह्मप्राप्ति है, जड़ तथा चेतन का विवेक (तत्त्वज्ञान)
ही दुःखनिवृत्ति का साधन है, जिससे स्वरूप-स्थिति सिद्ध होती है।
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदन्तराभा-
वादपवर्गः ।'
( न्यायदर्शन १ । १ । २ )
जयन्त भट्ट ने भी न्यायवादी महर्षि गौतम के मत की पुष्टि की है।
स्वरूपेण व्यवस्थानमतो मोक्ष :
( न्यायमञ्जरी )
वैशेषिक-दर्शन में आत्मा के शाश्वत अखण्ड स्वरूप का ही प्रतिपादन किया
गया है। महर्षि कणाद का कथन है।
सदकारणवन्नित्यम्
( वैशेषिकदर्शन ४ । १ । १ )
पूर्वमीमांसक महर्षि जैमिनि ने एक परमात्मा को ही सर्वोपरि कहा है।
'एकत्वेऽपि परम् ।'
( पूर्वमीमांसासूत्र २ । ४ । १३ )
इसी तरह वेदान्तदर्शन में महर्षि व्यास ने आत्मा के स्वरूप-प्रतिपादन में
कहा है।
तस्य च नित्यत्वात् ।
( वेदान्तसूत्र २ । ४ । १६ )
इस तरह अत्याश्रमी योगी अवधूत सर्वथा आत्मस्वरूप में स्वस्थ होता है।
१५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति