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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 222 में से

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पृष्ठ 186

यकारो वायुबीजं स्याद्रकारो वह्निबीजकम् ।
तयोरभेद्योंकारश्चिदाकारः प्रकीर्तितः ॥ २ ॥
'य' वायु का बीज है, 'र' अग्नि का बीज है, दोनों का ऐक्य—सामरस्य
ही चिद्रूप ओंकार 'ॐ कहा जाता है ॥ २ ॥
विशेष—तन्त्र में शिव को बिन्दु और शक्ति को बीज कहा गया है ।
इस तरह महायोगी गोरखनाथ ने अपने योगग्रन्थों में जहाँ पाँच भूत-तत्त्व, पृथ्वी,
जल, अग्नि, वायु और आकाश की धारणा का निर्देश किया है, वहीं उनके बीज
का भी क्रमश 'ल' 'व', 'र' 'य' और ह' का वर्णन किया है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति
के उपर्युक्त दूसरे श्लोक में 'य' और 'र' बीज के कथनका आशय है सभी तत्त्वों
के 'बीज' का ग्रहण । पाँच भूतों का लय अपने 'बीज' में स्थापित होता है और
चिद्रूप बीज का लय ऊंकार-प्रणव में होता है । ओंकार-ॐकार ही समस्त बीज
मन्त्र और शब्दों का उपादान कारण है । इस तरह चिद्रूपा शक्ति से ऊंकार
प्रणव का तादात्म्य ही शक्ति और शिव की अभेदता—एकता अथवा समरसता
है । इस सामरस्यसे योगी दिव्य शरीर वाला हो जाता है । भगवान् शिव का
प्रकारान्तर से कथन है ।
अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा ।
योगिनां साधनावस्था भवेद् दिव्यं वपुस्तदा ॥
( शिवसंहिता ४ । ८७ )
तदेतद् व्यक्तमुच्यते—
क्लेशपागत रङ्गाणां कृन्तनेन विमुण्डनम् ।
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ३ ॥
जो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, पंचक्लेशरूपी जाल के
वेग का उच्छेद कर देता है और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में प्रपञ्च
से मुक्त हो जाता है, वही (आत्मस्वरूप में स्थित ) योगी अवधूत कहा
जाता है ॥ ३ ॥
निजस्मरविभूतिर्यो योगी स्वाङ्गे विभूषितः ।
आधारे यस्य वा रूढिः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ ४ ॥
१४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति