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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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प्रथमेत्वरोगतासिद्धिः सर्वलोकप्रियो भवेत् ।
कांक्षन्ति दर्शनं तस्य स्वात्मारूढ़स्य नित्यशः ॥३६॥
कृतार्थः स्याद् द्वितीये वै कुरुते सर्वभाषणम् ।
तृतीये दिव्यदेहस्तु व्यालैर्व्याघ्रैर्न बाध्यते ॥३७॥
चतुर्थे क्षुतृषानिद्राशीतातपविवर्जितः ।
जायते दिव्य योगीशो दूरश्रावी न संशयः ॥३८॥
वाक्‌सिद्धिः पञ्चमे वर्षे परकायप्रवेशनम् ।
षष्ठे न च्छिद्यते शस्त्रैर्वज्रपातैर्न भिद्यते ॥३६॥
वायुवेगो क्षितित्यागी दूरदर्शी स सप्तमे ।
अणिमादिगुणोपेतस्त्वष्टमे वत्सरे भवेत् ॥४०॥
नवमे वज्रकायः स्यात् खेचरो दिक्चरो भवेत् ।
दशमे पवनाद् वेगी यत्रेच्छा तत्र धावति ॥४१॥
सम्यगेकादशे वर्षे सर्वज्ञः सिद्धिभाग्भवेत् ।
द्वादशे शिवतुल्योऽसौ कर्त्ता हर्त्ता स्वयं भवेत् ॥४२॥
त्रैलोक्ये पूज्यते सिद्धः सत्यं श्रीभैरवो यथा ॥४३॥
सद्गुरु से दीक्षित होकर सदुपदेशग्रहणपूर्वक योगसाधना में तत्पर होने पर
साधक पहले वर्ष में शरीर के मलादि दोषों से निर्मल होकर नीरोग हो जाता
है और सभी लोगों के लिये समानरुप से प्रिय होता है । योग-साधना में तत्पर
उस साधक के दर्शन की सब लोग इच्छा करते हैं । वह दूसरे वर्ष में (संकल्प-
रहित होकर ) सफलमनोरथ हो जाता है और उसे सभी भाषाओं में बातचीत
करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है । तीसरे वर्ष में वह देहसिद्ध हो जाता हैं,
उसका शरीर दिव्यतेज से सम्पन्न हो जाता है, और सर्प-व्याघ्र आदि पशु उसके
समक्ष अहिंसक हो जाते हैं, उसे किसी भी तरह की बाधा नहीं पहुँचाते हैं ।
चौथे वर्ष में वह योगसाधक भूख-प्यास, जाड़ा-गरमी आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठ
जाता है और दूर स्थान पर होने वाले शब्दों को सुनने लगता है, इसमें तनिक
भी सन्देह नहीं है । पाँचवें वर्ष में वह वाक्‌सिद्ध हो जाता है—वह जो कुछ
भी कहता है, वह सत्य होता है और वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की
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