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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

शिलया किं परं पारं शिलासंघः प्रतार्यते ।
स्वयंतीर्णो भवेद्योऽसौ परान्निस्तारयत्यलम् ॥ ७४ ॥
जिस तरह (नदी के प्रवाह में) पड़ी शिला (धारामें प्रवाहित) अन्य शिलाओं
को वहाकर उस पार उन्हें नहीं उतार सकती, उसी तरह जो स्वयं पार होने में ,
असमर्थ है, वह दूसरों को पार नहीं कर सकता है अथवा तारने में असमर्थ है ।
जो स्वयं तर जाने में समर्थ है, वही दूसरों को भी पार उतार सकता है ॥ ७४ ॥
विकल्पसागराद् घोराच्चिन्ताकल्लोलदुस्तरात् ।
प्रपञ्चवासन!दुष्टग्रहजालसमाकुलात् ॥ ७५ ॥
वासनालहरीवेगान्न स्वं तारयितुं क्षमः ।
स्वस्थेनैवोपदेशेन निरुत्थानेन तत्क्षणात् ॥ ७६ ॥
तारयत्येवदृक्पातात् कथनाद्वा विलोकनात् ।
तारिते स्वपदं धत्ते स्वस्वमध्ये स्थिरो भवेत् ॥ ७७ ॥
यह संसार एक दुस्तर सागर है, विषयवासनारूप संकल्प-विकल्पस्वरूप
चञ्चलता से उद्वेलित है, यह बड़ा भीषण है, चिन्ता की लहरियाँ इसमें निरन्तर
उठती रहती हैं, यह दुष्ट ग्राहों से पूर्ण जालरूप ममता-मोह आदि से आकुल है,
विषय-वासनायें ही इसमें लहरियाँ हैं । इस संसार-सागर को जो तैर कर पार
उतरने में समर्थ नहीं है, वह किस तरह दूसरों को पार उतार सकता है । जो
अपने अखण्ड आत्मस्वरूपमें स्थित है, वही निरुत्थान ( जीवात्मा—परमात्मा में
सामरस्य ) स्थापित कर शिष्य को सदुपदेश प्रदान कर कृपामयी दृष्टिपात कर
अथवा ज्ञान प्रदान कर तारने में--भवसागर से पार उतारने में समर्थ है । वह
स्वरूपस्थिति से परम पद में अपने अखण्ड आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाता है,
शिष्यको भवसागर से पार उतार देता है ॥ ७७ ॥
ततः स मुच्यते शिष्यो जन्मसंसारबन्धनात् ।
परानन्दमयोभूत्वा निष्कलः शिवतां व्रजेत् । ७८ ॥
कुलानां कोटिकोटीनां तारयत्येव तत्क्षणात् ।
अतस्तु सद्गुरुं साक्षात् त्रिकालमभिवन्दयेत् ॥ ७६ ॥
१४० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति