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श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर')

DevanagariHindipublished110 pages

बजरंग बाण, मारुति स्तोत्र एवं श्री हनुमान जी की आरती

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महावीरी व्याख्या चौ. ३८: जो शत बार पाठ कर कोई
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जो शत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥
शब्दार्थ—बंदि ▸ लौकिक तथा पारलौकिक बन्धन।
अर्थ—यदि कोई इसका १०० बार पाठ श्रद्धा एवं भक्तिसे करेगा, उसके
लौकिक एवं पारलौकिक बन्धन छूट जाएँगे एवं उसे महासुखकी प्राप्ति
होगी।
व्याख्या—यहाँ शत शब्द १०८का बोधक है तथा बार शब्द दिन एवं
संख्याका वाचक है। कोई शब्द सर्वसाधारणके लिए अधिकार-समर्पक है,
अर्थात् कोई भी मनुष्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, इतरधर्मी कोई भी)
यदि हनुमान्-चालीसाका १०८ बार प्रतिदिनके क्रमसे १०८ दिन तक पाठ
करे तो निश्चित उसका अनिष्ट बन्धन छूट जाएगा। इस हनुमान्-चालीसाको
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने समस्त प्राणिमात्रको तुलसीदल-प्रसाद-
रूपमें वितरित किया है। यह फलश्रुति है।
७७

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चौ. ३९: जो यह पढ़े हनुमान-चलीसा
महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ ३९ ॥
शब्दार्थ—गौरीसा ▸ भगवान् शिव।
अर्थ—अब गोस्वामीजी भविष्यत्कालमें वर्तमानकालका दर्शन कर
बोल रहे हैं कि जो इस हनुमान्-चालीसाको पढ़ेगा, उसको अवश्य लौकिक
तथा पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होगी। इस विषय-प्रतिज्ञाके साक्षी भगवान्
शिव हैं।
व्याख्या—हनुमान्-चालीसा लौकिक तथा पारलौकिक सिद्धियोंकी
प्रदाता है, इस प्रतिज्ञामें शिवजीका साक्ष्य देते हैं। जैसे विनयपत्रिकामें
श्रीराम-नाम प्रतीत करते समय शिवजीको साक्षी-रूपमें उपस्थित किया
है। यथा—शंकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो (वि.प.
२२६-६)।
७८

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महावीरी व्याख्या चौ. ४०: तुलसीदास सदा हरि-चेरा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुलसीदास सदा हरि-चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥
शब्दार्थ—हरि-चेरा ▸ श्रीरामजीके सेवक।
अर्थ—हे कीशनाथ श्रीहनुमान्‌जी महाराज! आप निरन्तर भगवान्
श्रीरामके कैङ्कर्यमें निरत रहते हैं, अतः उसी कृपालुतावश तुलसीदासके
हृदयमें निवास कीजिए। यद्वा गोस्वामीजी कहते हैं कि आञ्जनेय! आप
निरन्तर भगवद्भक्तके हृदयमें निवास कीजिए। अथवा, मैं तुलसीदास निरन्तर
हरि अर्थात् वानरश्रेष्ठ आपश्रीका सदैव दास हूँ; हे नाथ! आप मेरे हृदयमें
श्रीराम-लक्ष्मण-सीता सहित निवास कीजिए।
व्याख्या—अन्तमें गोस्वामीजी अपने हृदयमें निवास करनेके लिए किंवा
वैष्णवजनोंके लिए हनुमान्‌जीसे प्रार्थना करते हैं। हरि-चेरा शब्दका नाथ,
हृदय, तथा तुलसीदास शब्दसे अन्वय करनेपर उपर्युक्त तीनों अर्थ संगत
हो जाते हैं। अर्थात् नाथ सदा हरि-चेरा तुलसीदास हृदय महँ डेरा
कीजै—इस अन्वयसे प्रथम अर्थ; तथा तुलसीदास नाथ हरि-चेरा हृदय
महँ सदा डेरा कीजै—इस अन्वयसे द्वितीय अर्थकी पुष्टि हो जाती है। यहाँ
(दूसरे अर्थ में) तुलसीदास शब्दके साथ कहत इस बाहरी क्रियाको जोड़ना
पड़ता है, जैसे अन्यत्र। यथा—शरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल
(रा.च.मा. २-२२६)। तुलसीदास सदा हरि-चेरा नाथ हृदय महँ डेरा
कीजै—इस अन्वयसे तृतीय अर्थकी पुष्टि होती है।
७९

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दो.: पवनतनय संकट-हरन महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
पवनतनय संकट-हरन मंगल-मूरति-रूप।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप॥
शब्दार्थ—पवनतनय ▸ पवनके पुत्र। सुर-भूप ▸ देवताओंके राजा।
अर्थ—हे पवनके पुत्र! समस्त संकटोंको हरनेवाले मङ्गलमूर्ति-रूप!!
समस्त देवताओंके अधिष्ठान-स्वरूप श्रीहनुमान्जी महाराज!!! आप श्रीराम,
श्रीलक्ष्मण, एवं माँ मैथिलीके साथ हमारे हृदयमें निवास करें।
व्याख्या—चार विशेषण देकर श्रीहनुमान्जीको ही मन, बुद्धि, अहंकार,
एवं चित्तको शुद्ध करनेमें सहायक सिद्ध करते हैं और पश्चात् राम, लक्ष्मण,
एवं सीताजीके सहित हृदयमें विश्राम करनेकी प्रार्थना करके सर्वतोभावेन
श्रीमन्मारुतिके ही श्रीचरणकमलकी शरणागतिको ही परम पुरुषार्थ बताकर
ग्रन्थको विश्राम दे रहे हैं।
॥ उपसंहारः ॥
सुमिरि राम-सिय-चरन-कमल गुरु-पद-रज शिर धरि।
चऊद्वार उत्कल-थल मारुतसुतहि ध्यान करि॥
संबत नभ-फल-ख-दृग सुमाधव शिव शनिवारा।
शुक्ल दूज हनुमान-चलीसा मति अनुसारा॥
जुगुति-शास्त्र-सिद्धान्तमय वैष्णव-रीति-भगति-भरी।
नाम महावीरी ललित लघु व्याख्या गिरिधर करी॥
॥ श्रीहनुमते नमः ॥
८०

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पद्यार्धानुक्रमणी

इस अनुक्रमणीमें श्रीहनुमान्-चालीसाके सभी ८६ पद्यार्ध (तीन दोहोंके छः दल
और चालीस चौपाइयोंकी अस्सी अर्धालियाँ) अकारादिक्रमसे सूचित हैं। प्रत्येक
पद्यार्धके बाद कोष्ठकमें पद्य-संख्या और पूर्वार्ध/उत्तरार्ध दिए गए हैं। पद्य-संख्याके लिए
मङ्गलाचरण-दोहाको म.दो., चौपाईको चौ., और उपसंहार-दोहाको उ.दो.—इस
प्रकारसे संकेतित किया गया है। तत्तत् पद्यार्धकी प्रस्तुत संस्करणमें महावीरी व्याख्याकी
पृष्ठ-संख्या दाहिनी ओर दिखाई गई है।
अंजनिपुत्र-पवनसुत-नामा (चौ. २, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १९
अंत-काल रघुबर-पुर जाई (चौ. ३४, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७३
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता (चौ. ३१, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं (चौ. १३, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
अस बर दीन्ह जानकी माता (चौ. ३१, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९
असुर-निकंदन राम-दुलारे (चौ. ३०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६८
आपन तेज सम्हारो आपे (चौ. २३, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९
और देवता चित्त न धरई (चौ. ३५, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
और मनोरथ जो कोइ लावै (चौ. २८, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६५
कंचन-बरन बिराज सुबेसा (चौ. ४, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २४
कबि कोबिद कहि सकें कहाँ ते (चौ. १५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३
काँधे मूँज-जनेऊ छाजै (चौ. ५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६
कानन कुंडल कुंचित केसा (चौ. ४, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २४
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा (चौ. ४०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७९
कुमति-निवार सुमति के संगी (चौ. ३, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २१
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं (चौ. ३७, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७६
चारिउ जुग परताप तुम्हारा (चौ. २९, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६६
छूटहिं बंदि महा सुख होई (चौ. ३८, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७

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पद्यार्धानुक्रमणी महावीरी व्याख्या
जनम जनम के दुख बिसरावै (चौ. ३३, उत्तरार्ध) ....................... ७२
जपत निरंतर हनुमत बीरा (चौ. २५, उत्तरार्ध) ....................... ६२
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते (चौ. १५, पूर्वार्ध) ....................... ४३
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर (चौ. १, उत्तरार्ध) ....................... १७
जय जय जय हनुमान गोसाईं (चौ. ३७, पूर्वार्ध) ....................... ७६
जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर (चौ. १, पूर्वार्ध) ....................... १७
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं (चौ. १९, उत्तरार्ध) ................... ५२
जहाँ जन्म हरि-भगत कहाई (चौ. ३४, उत्तरार्ध) ....................... ७३
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू (चौ. १८, पूर्वार्ध) ....................... ४९
जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा (चौ. ३९, पूर्वार्ध) ....................... ७८
जो शत बार पाठ कर कोई (चौ. ३८, पूर्वार्ध) ....................... ७७
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा (चौ. ३६, उत्तरार्ध) ....................... ७५
तासु अमित जीवन फल पावै (चौ. २८, उत्तरार्ध) ....................... ६५
तिन के काज सकल तुम साजा (चौ. २७, उत्तरार्ध) .................... ६४
तीनों लोक हाँक ते काँपे (चौ. २३, उत्तरार्ध) ....................... ५९
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा (चौ. १६, पूर्वार्ध) ....................... ४५
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई (चौ. १२, उत्तरार्ध) .................... ४०
तुम रक्षक काहू को डर ना (चौ. २२, उत्तरार्ध) ....................... ५८
तुम्हरे भजन राम को पावै (चौ. ३३, पूर्वार्ध) ....................... ७२
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना (चौ. १७, पूर्वार्ध) ....................... ४७
तुलसीदास सदा हरि-चेरा (चौ. ४०, पूर्वार्ध) ....................... ७९
तेज प्रताप महा जग-बंदन (चौ. ६, उत्तरार्ध) ....................... २७
दुर्गम काज जगत के जे ते (चौ. २०, पूर्वार्ध) ....................... ५३
नारद सारद सहित अहीशा (चौ. १४, उत्तरार्ध) ....................... ४२
नासै रोग हरै सब पीरा (चौ. २५, पूर्वार्ध) ......................... ६२
पवनतनय संकट-हरन मंगल-मूरति-रूप (उ.दो., पूर्वार्ध) ................. ८०
प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया (चौ. ८, पूर्वार्ध) ....................... ३१
प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं (चौ. १९, पूर्वार्ध) ....................... ५२
बरनउँ रघुबर-बिमल-जस जो दायक फल चारि (म.दो. १, उत्तरार्ध) ......... १२
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार (म.दो. २, उत्तरार्ध) ......... १५
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महावीरी व्याख्या पद्यार्धानुक्रमणी
बिकट रूप धरि लंक जरावा (चौ. ९, उत्तरार्ध) ................................. ३३
बिद्यावान गुणी अति चातुर (चौ. ७, पूर्वार्ध) ................................. २९
बुद्धि-हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार (म.दो. २, पूर्वार्ध) ................. १५
भीम रूप धरि असुर सँहारे (चौ. १०, पूर्वार्ध) ................................. ३५
भूत पिशाच निकट नहिं आवै (चौ. २४, पूर्वार्ध) ................................ ६१
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै (चौ. २६, उत्तरार्ध) .............................. ६३
महाबीर जब नाम सुनावै (चौ. २४, उत्तरार्ध) ................................. ६१
महाबीर बिक्रम बजरंगी (चौ. ३, पूर्वार्ध) ................................... २१
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई (चौ. १२, पूर्वार्ध) ................................ ४०
राम-काज करिबे को आतुर (चौ. ७, उत्तरार्ध) ................................. २९
रामचंद्र के काज सँवारे (चौ. १०, उत्तरार्ध) ................................. ३५
राम-दुआरे तुम रखवारे (चौ. २१, पूर्वार्ध) ................................. ५४
राम-दूत अतुलित-बल-धामा (चौ. २, पूर्वार्ध) ................................ १९
राम मिलाय राज-पद दीन्हा (चौ. १६, उत्तरार्ध) .............................. ४५
राम-रसायन तुम्हरे पासा (चौ. ३२, पूर्वार्ध) ................................. ७१
राम-लखन-सीता-मन-बसिया (चौ. ८, उत्तरार्ध) ................................ ३१
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप (उ.दो., उत्तरार्ध) ................... ८०
लंकेश्वर भए सब जग जाना (चौ. १७, उत्तरार्ध) .............................. ४७
लाय सँजीवनि लखन जियाये (चौ. ११, पूर्वार्ध) .............................. ३९
लील्यो ताहि मधुर फल जानू (चौ. १८, उत्तरार्ध) .............................. ४९
शंकर स्वयं केसरीनंदन (चौ. ६, पूर्वार्ध) ................................... २७
श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज निज-मन-मुकुर सुधारि (म.दो. १, पूर्वार्ध)............... १२
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये (चौ. ११, उत्तरार्ध) ................................ ३९
संकट कटै मिटै सब पीरा (चौ. ३६, पूर्वार्ध) ................................. ७५
संकट तें हनुमान छुड़ावै (चौ. २६, पूर्वार्ध) ................................. ६३
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा (चौ. १४, पूर्वार्ध) ................................ ४२
सब-पर राम राय-सिरताजा (चौ. २७, पूर्वार्ध) ................................ ६४
सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना (चौ. २२, पूर्वार्ध) .............................. ५८
सहसबदन तुम्हरो जस गावैं (चौ. १३, पूर्वार्ध) ................................ ४१
सादर हौ रघुपति के दासा (चौ. ३२, उत्तरार्ध) ................................ ७१
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साधु संत के तुम रखवारे (चौ. ३०, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६८
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते (चौ. २०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५३
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा (चौ. ९, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३३
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई (चौ. ३५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै (चौ. ५, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६
है परसिद्ध जगत-उजियारा (चौ. २९, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६६
होत न आज्ञा बिनु पैसारे (चौ. २१, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५४
होय सिद्धि साखी गौरीसा (चौ. ३९, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७८

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शब्दानुक्रमणी

इस अनुक्रमणीमें श्रीहनुमान्-चालीसामें प्रयुक्त सभी शब्द अकारादिक्रमसे सूचित
हैं। तत्तत् शब्दके अवयवी दोहा अथवा चौपाईकी महावीरी व्याख्याकी प्रस्तुत
संस्करणमें पृष्ठ-संख्या (अथवा पृष्ठ-संख्याएँ) दाहिनी ओर दिखाई गई है (अथवा
गई हैं)। पाठकोंकी सुविधाके लिए रघुबर-बिमल-जस आदि दीर्घ समासोंका प्रायः
विग्रह करके रघुबर, बिमल, और जस आदि घटक पदोंको स्वतन्त्र रूपसे सूचित
किया गया है। जिन समासोंका संज्ञाके रूपमें व्यवहार है अथवा जिनके पश्चात् तद्धित
प्रत्ययका विधान है (यथा रघुबर, बजरंगी, पवनतनय इत्यादि), उन समासोंको प्रायः
यथावत् (समस्त रूपमें) सूचित किया गया है।

अंजनिपुत्र . . . . . . . . . . . . . . . १९    आपे . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९
अंत . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७३    आवै . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६१
अचरज . . . . . . . . . . . . . . . . ५२    उजागर . . . . . . . . . . . . . . . १७
अति . . . . . . . . . . . . . . . . . . २९    उजियारा . . . . . . . . . . . . . . . ६६
अतुलित . . . . . . . . . . . . . . . १९    उपकार . . . . . . . . . . . . . . . ४५
अनुग्रह . . . . . . . . . . . . . . . . ५३    उर . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३९
अमित . . . . . . . . . . . . . . . . . ६५    और . . . . . . . . . . . . . . ६५, ७४
अरु . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६    कंचन . . . . . . . . . . . . . . . . २४
अष्ट . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९    कंठ . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
अस . . . . . . . . . . . . . . ४१, ६९    कटै . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७५
असुर . . . . . . . . . . . . . . ३५, ६८    कपीश . . . . . . . . . . . . . . . . १७
अहीशा . . . . . . . . . . . . . . . . ४२    कबि . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३
आज्ञा . . . . . . . . . . . . . . . . . ५४    कर . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७
आतुर . . . . . . . . . . . . . . . . . २९    करई . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
आपन . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९    करहु . . . . . . . . . . . . . . . . . ७६

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शब्दानुक्रमणी महावीरी व्याख्या
करिबे . . . . . . . . . . . . . . . . . २९ गावैं . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
कलेश . . . . . . . . . . . . . . . . . १५ गुण . . . . . . . . . . . . . . . . १७
कहाँ . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३ गुणी . . . . . . . . . . . . . . . . २९
कहाई . . . . . . . . . . . . . . . . . ७३ गुरुदेव . . . . . . . . . . . . . . . ७६
कहि . . . . . . . . . . . . . ४१, ४३ गोसाईं . . . . . . . . . . . . . . . ७६
काँधे . . . . . . . . . . . . . . . . २६ गौरीसा . . . . . . . . . . . . . . . ७८
काँपे . . . . . . . . . . . . . . . . ५९ चरन . . . . . . . . . . . . . . . . १२
काज . . . . . . . . २९, ३५, ५३, ६४ चरित्र . . . . . . . . . . . . . . . ३१
कानन . . . . . . . . . . . . . . . २४ चलीसा . . . . . . . . . . . . . . ७८
काल . . . . . . . . . . . . . . . . ७३ चातुर . . . . . . . . . . . . . . . २९
काहू . . . . . . . . . . . . . . . . ५८ चारि . . . . . . . . . . . . . . . . १२
की . . . . . . . . . . . . . . . . . ७६ चारिउ . . . . . . . . . . . . . . . ६६
कीजै . . . . . . . . . . . . . . . . ७९ चित्त . . . . . . . . . . . . . . . ७४
कीन्हा . . . . . . . . . . . . . . . ४५ चेरा . . . . . . . . . . . . . . . . ७९
कीन्ही . . . . . . . . . . . . . . . ४० छाजै . . . . . . . . . . . . . . . २६
कुंचित . . . . . . . . . . . . . . . २४ छुड़ावै . . . . . . . . . . . . . . . ६३
कुंडल . . . . . . . . . . . . . . . २४ छूटहिं . . . . . . . . . . . . . . . ७७
कुबेर . . . . . . . . . . . . . . . . ४३ जग . . . . . . . . . . . . . २७, ४७
कुमति . . . . . . . . . . . . . . . २१ जगत . . . . . . . . . . . . . ५३, ६६
कृपा . . . . . . . . . . . . . . . . ७६ जनम . . . . . . . . . . . . . . . ७२
के २१, ३५, ५३, ६४, ६८, ६९, ७१, जनेऊ . . . . . . . . . . . . . . . . २६
७२ जन्म . . . . . . . . . . . . . . . . ७३
केसरीनंदन . . . . . . . . . . . . . २७ जपत . . . . . . . . . . . . . . . ६२
केसा . . . . . . . . . . . . . . . २४ जब . . . . . . . . . . . . . . . ६१
को . . . . . . . . . २९, ३१, ५८, ७२ जम . . . . . . . . . . . . . . . . ४३
कोइ . . . . . . . . . . . . . . . ६५ जय . . . . . . . . . . . . . १७, ७६
कोई . . . . . . . . . . . . . . . ७७ जरावा . . . . . . . . . . . . . . . ३३
कोबिद . . . . . . . . . . . . . . . ४३ जलधि . . . . . . . . . . . . . . ५२
क्रम . . . . . . . . . . . . . . . . ६३ जस . . . . . . . . . . . . . १२, ४१
गये . . . . . . . . . . . . . . . . ५२ जहाँ . . . . . . . . . . . . . ४३, ७३
८८

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महावीरी व्याख्या शब्दानुक्रमणी
जाई . . . . . . . . . . . . . . . ७३ दायक . . . . . . . . . . . . . . १२
जानकी . . . . . . . . . . . . . ६९ दासा . . . . . . . . . . . . . . ७१
जाना . . . . . . . . . . . . . . ४७ दिखावा . . . . . . . . . . . . . ३३
जानिकै . . . . . . . . . . . . . १५ दिगपाल . . . . . . . . . . . . . ४३
जानू . . . . . . . . . . . . . . ४९ दीन्ह . . . . . . . . . . . . . . ६९
जियाये . . . . . . . . . . . . . ३९ दीन्हा . . . . . . . . . . . . . . ४५
जीवन . . . . . . . . . . . . . . ६५ दुआरे . . . . . . . . . . . . . . ५४
जुग . . . . . . . . . . . . . ४९, ६६ दुख . . . . . . . . . . . . . . . ७२
जे . . . . . . . . . . . . . . . . ५३ दुर्गम . . . . . . . . . . . . . . ५३
जो . . . १२, ६३, ६५, ७५, ७७, ७८ दुलारे . . . . . . . . . . . . . . ६८
जोजन . . . . . . . . . . . . . . ४९ दूत . . . . . . . . . . . . . . . १९
ज्ञान . . . . . . . . . . . . . . १७ देवता . . . . . . . . . . . . . . ७४
डर . . . . . . . . . . . . . . . ५८ देहु . . . . . . . . . . . . . . . १५
डेरा . . . . . . . . . . . . . . . ७९ धरई . . . . . . . . . . . . . . ७४
तनु . . . . . . . . . . . . . . . १५ धरि . . . . . . . . . . . . . ३३, ३५
तासु . . . . . . . . . . . . . . ६५ धामा . . . . . . . . . . . . . . १९
ताहि . . . . . . . . . . . . . . ४९ ध्यान . . . . . . . . . . . . . . ६३
तिन . . . . . . . . . . . . . . ६४ ध्वजा . . . . . . . . . . . . . . २६
तिहुँ . . . . . . . . . . . . . . १७ न . . . . . . . . . . . . . . ५४, ७४
तीनों . . . . . . . . . . . . . . ५९ नव . . . . . . . . . . . . . . . ६९
तुम . . ४०, ४५, ५४, ५८, ६४, ६८ नहिं . . . . . . . . . . . . . . . ६१
तुम्हरे . . . . . . . . . . ५३, ७१, ७२ ना . . . . . . . . . . . . . . . ५८
तुम्हरो . . . . . . . . . . . ४१, ४७ नाईं . . . . . . . . . . . . . . . ७६
तुम्हारा . . . . . . . . . . . . . ६६ नाथ . . . . . . . . . . . . . . . ७९
तुम्हारी . . . . . . . . . . . . . ५८ नाम . . . . . . . . . . . . . . . ६१
तुलसीदास . . . . . . . . . . . ७९ नामा . . . . . . . . . . . . . . १९
ते . . . . . . . . . . . . ४३, ५३, ५९ नारद . . . . . . . . . . . . . . ४२
तें . . . . . . . . . . . . . . . . ६३ नासै . . . . . . . . . . . . . . . ६२
तेज . . . . . . . . . . . . . २७, ५९ नाहीं . . . . . . . . . . . . . . ५२
दाता . . . . . . . . . . . . . . ६९ निकंदन . . . . . . . . . . . . . ६८
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शब्दानुक्रमणी महावीरी व्याख्या
निकट . . . . . . . . . . . . . . . . ६१ बरन . . . . . . . . . . . . . . . . २४
निज . . . . . . . . . . . . . . . . १२ बरनउँ . . . . . . . . . . . . . . . . १२
निधि . . . . . . . . . . . . . . . . ६१ बल . . . . . . . . . . . . . . १५, १९
निरंतर . . . . . . . . . . . . . . ६२ बलबीरा . . . . . . . . . . . . . . . ७५
निवार . . . . . . . . . . . . . . . २१ बसहु . . . . . . . . . . . . . . . . ८०
पढ़ै . . . . . . . . . . . . . . . . . ७८ बसिया . . . . . . . . . . . . . . . ३१
पद . . . . . . . . . . . . . . . . . ४५ बहुत . . . . . . . . . . . . . . . . ४०
पर . . . . . . . . . . . . . . ४९, ६४ बार . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७
परताप . . . . . . . . . . . . . . . ६६ बिकट . . . . . . . . . . . . . . . . ३३
परसिद्ध . . . . . . . . . . . . . . ६६ बिकार . . . . . . . . . . . . . . . . १५
पवनकुमार . . . . . . . . . . . . . १५ बिक्रम . . . . . . . . . . . . . . . . २१
पवनतनय . . . . . . . . . . . . . . ८० बिद्या . . . . . . . . . . . . . . . . १५
पवनसुत . . . . . . . . . . . . . . १९ बिद्यावान . . . . . . . . . . . . . . २९
पाठ . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७ बिनु . . . . . . . . . . . . . . . . . ५४
पावै . . . . . . . . . . . . . . ६५, ७२ बिभीषन . . . . . . . . . . . . . . . ४७
पासा . . . . . . . . . . . . . . . . ७१ बिमल . . . . . . . . . . . . . . . . १२
पिशाच . . . . . . . . . . . . . . . ६१ बिराज . . . . . . . . . . . . . . . २४
पीरा . . . . . . . . . . . . . . ६२, ७५ बिराजै . . . . . . . . . . . . . . . २६
पैसारे . . . . . . . . . . . . . . . . ५४ बिसरावै . . . . . . . . . . . . . . . ७२
प्रताप . . . . . . . . . . . . . . . . २७ बीरा . . . . . . . . . . . . . . . . . ६२
प्रभु . . . . . . . . . . . . . . ३१, ५२ बुद्धि . . . . . . . . . . . . . . . . . १५
प्रिय . . . . . . . . . . . . . . . . . ४० बुधि . . . . . . . . . . . . . . . . . १५
फल . . . . . . . . . . . . १२, ४९, ६५ ब्रह्मादि . . . . . . . . . . . . . . . ४२
बंदन . . . . . . . . . . . . . . . . २७ भए . . . . . . . . . . . . . . . . . ४७
बंदि . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७ भगत . . . . . . . . . . . . . . . . ७३
बचन . . . . . . . . . . . . . . . . ६३ भजन . . . . . . . . . . . . . . . . ७२
बजरंगी . . . . . . . . . . . . . . . २१ भरतहिं . . . . . . . . . . . . . . . ४०
बज्र . . . . . . . . . . . . . . . . . २६ भाई . . . . . . . . . . . . . . . . . ४०
बड़ाई . . . . . . . . . . . . . . . . ४० भानू . . . . . . . . . . . . . . . . . ४९
बर . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९ भीम . . . . . . . . . . . . . . . . ३५
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महावीरी व्याख्या शब्दानुक्रमणी
भूत . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६१ रज . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १२
भूप . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ८० रसायन . . . . . . . . . . . . . . . . . ७१
मंगल . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ८० रसिया . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३१
मंत्र . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४७ राज . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४५
मधुर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४९ राम . . १९, २९, ३१, ४५, ५४, ६४,
मन . . . . . . . . . . . . १२, ३१, ६३ ६८, ७१, ७२, ८०
मनोरथ . . . . . . . . . . . . . . . . . ६५ रामचंद्र . . . . . . . . . . . . . . . . . ३५
मम . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४० राय . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६४
महँ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७९ रूप . . . . . . . . . . . . . . . ३३, ३५, ८०
महा . . . . . . . . . . . . . . . . २७, ७७ रोग . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६२
महाबीर . . . . . . . . . . . . . . २१, ६१ लंक . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३३
माता . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९ लंकेश्वर . . . . . . . . . . . . . . . . . ४७
माना . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४७ लखन . . . . . . . . . . . . . . ३१, ३९, ८०
माहीं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५२ लगावँ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
मिटै . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७५ लहहिं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५८
मिलाय . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४५ लाँघि . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५२
मुकुर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १२ लाय . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३९
मुख . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५२ लाये . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३९
मुद्रिका . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५२ लावै . . . . . . . . . . . . . . . . . ६३, ६५
मुनीशा . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४२ लील्यो . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४९
मूँज . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६ लोक . . . . . . . . . . . . . . . . १७, ५९
मूरति . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ८० शंकर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २७
मेलि . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५२ शत . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७
मोहिं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १५ शरना . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५८
यह . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७८ श्रीगुरु . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १२
रक्षक . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५८ श्रीपति . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
रखवारे . . . . . . . . . . . . . . ५४, ६८ श्रीरघुबीर . . . . . . . . . . . . . . . . ३९
रघुपति . . . . . . . . . . . . . . . ४०, ७१ सँजीवनि . . . . . . . . . . . . . . . . ३९
रघुबर . . . . . . . . . . . . . . . . . . १२ सँवारे . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३५
रघुबर-पुर . . . . . . . . . . . . . . . ७३ सँहारे . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३५
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शब्दानुक्रमणी \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad महावीरी व्याख्या
संकट . . . . . . . . . . . . . . ६३, ७५, ८० \qquad\qquad सुधारि . . . . . . . . . . . . . . . . . . १२
संगी . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २१ \qquad\qquad सुनावै . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६१
संत . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६८ \qquad\qquad सुनिबे . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३१
सकल . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६४ \qquad\qquad सुबेसा . . . . . . . . . . . . . . . . . . २४
सकैं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३ \qquad\qquad सुमति . . . . . . . . . . . . . . . . . . २१
सदा . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७९ \qquad\qquad सुमिरै . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७५
सनकादिक . . . . . . . . . . . . . . . ४२ \qquad\qquad सुमिरौं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १५
सब . . . . . ४७, ५८, ६२, ६४, ७५ \qquad\qquad सुर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ८०
सम . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४० \qquad\qquad सूक्ष्म . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३३
सम्हारो . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९ \qquad\qquad सेइ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
सरोज . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १२ \qquad\qquad स्वयं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २७
सर्ब . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४ \qquad\qquad हनुमत . . . . . . . . . . . . ६२, ७४, ७५
सहसबदन . . . . . . . . . . . . . . . . ४१ \qquad\qquad हनुमान . . . . . . . . १७, ६३, ७६, ७८
सहस्त्र . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४९ \qquad\qquad हरन . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ८०
सहित . . . . . . . . . . . . . . . ४२, ८० \qquad\qquad हरषि . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३९
साखी . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७८ \qquad\qquad हरहु . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १५
सागर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १७ \qquad\qquad हरि . . . . . . . . . . . . . . . . ७३, ७९
साजा . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६४ \qquad\qquad हरै . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६२
सादर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७१ \qquad\qquad हाँक . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९
साधु . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६८ \qquad\qquad हाथ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६
सारद . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४२ \qquad\qquad हीन . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १५
सिद्धि . . . . . . . . . . . . . . . ६९, ७८ \qquad\qquad हृदय . . . . . . . . . . . . . . . . ७९, ८०
सियहिं . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३३ \qquad\qquad है . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६६
सिरताजा . . . . . . . . . . . . . . . . . ६४ \qquad\qquad होई . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७
सीता . . . . . . . . . . . . . . . . ३१, ८० \qquad\qquad होत . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५४
सुख . . . . . . . . . . . . ५८, ७४, ७७ \qquad\qquad होय . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७८
सुगम . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५३ \qquad\qquad हौ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७१
सुग्रीवहिं . . . . . . . . . . . . . . . . . ४५
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हनुमान्‌जीकी आरती

रचयिता–हिन्दूधर्मोद्धारक जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य¹
आरति कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट-दलन रघुनाथ-कला की॥ १ ॥
जाके बल गरजे महि काँपै।
रोग सोग जाके सिमाँ न चाँपै॥ २ ॥
अंजनी-सुत महाबल-दायक।
साधु संत पर सदा सहायक॥ ३ ॥
बाएँ भुजा सब असुर सँघारी।
दहिन भुजा सब संत उबारी॥ ४ ॥
लछिमन धरनि में मूर्छि पड़्यो।
पैठि पताल जमकातर तोड़्यो॥ ५ ॥
आनि सजीवन प्रान उबार्यो।
मही सबन कै भुजा उपार्यो॥ ६ ॥
गाढ़ परे कपि सुमिरौं तोहीं।
होहु दयाल देहु जस मोहीं॥ ७ ॥
लंका कोट समुंदर खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥ ८ ॥
¹ इस पदको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ. श्यामसुन्दर दास, सर जॉर्ज ग्रियर्सन, और रामकुमार
वर्मा सदृश अनेक विद्वानोंने रामानन्दाचार्यजीकी रचना माना है।

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हनुमान्‌जीकी आरती महावीरी व्याख्या
लंक प्रजारि असुर सब मार्यो।
राजा राम कै काज सँवार्यो॥ ९ ॥
घंटा ताल झालरी बाजै।
जगमग जोति अवधपुर छाजै॥ १० ॥
जो हनुमान की आरति गावै।
बसि बैकुंठ परम पद पावै॥ ११ ॥
लंक बिधंस कियो रघुराई।
रामानन्द आरती गाई॥ १२ ॥
सुर नर मुनि सब करहिं आरती।
जै जै जै हनुमान लाल की॥ १३ ॥
डॉ. रामाधार शर्मा द्वारा संपादित प्रस्तुत पाठके स्रोत हैं—(१) डॉ. पीताम्बर दत्त
बड़थ्वाल (संपादित) (१९५५ ई.), रामानन्द की हिन्दी रचनाएँ (प्रथम संस्करण),
काशी: नागरी प्रचारिणी सभा, पृष्ठ ७; और (२) डॉ. बदरीनारायण श्रीवास्तव (१९५७
ई.), रामानन्द साहित्य तथा हिन्दी साहित्य पर उसका प्रभाव, प्रयाग: हिन्दी परिषद्
प्रयाग विश्वविद्यालय, पृष्ठ १३९। दोनों स्रोतोंमें कई पाठभेद हैं, यथामति समीचीन पाठ
ही यहाँ डॉ. रामाधार शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया है—संपादक।
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पद्मविभूषण-विभूषित जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य भारतके प्रख्यात
विद्वान्, वैयाकरण, शिक्षाविद्, बहुभाषाविद्, महाकवि, भाष्यकार, दार्शनिक,
रचनाकार, संगीतकार, प्रवचनकार, कथाकार, व धर्मगुरु हैं। वे चित्रकूट-स्थित
श्रीतुलसीपीठके संस्थापक एवं अध्यक्ष और जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग
विश्वविद्यालय चित्रकूटके संस्थापक एवं आजीवन कुलाधिपति हैं। स्वामी
रामभद्राचार्य दो मासकी आयुसे प्रज्ञाचक्षु होते हुए भी २२ भाषाओंके ज्ञाता, अनेक
भाषाओंमें आशुकवि, और शताधिक ग्रन्थोंके रचयिता हैं। उनकी रचनाओंमें चार
महाकाव्य (दो संस्कृत और दो हिन्दीमें), रामचरितमानसपर हिन्दी टीका, अष्टाध्यायीपर
गद्य और पद्यमें संस्कृत वृत्तियाँ, और प्रस्थानत्रयीपर (ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता, और प्रधान
उपनिषदोंपर) संस्कृत और हिन्दी भाष्य प्रमुख हैं। वे तुलसीदासपर भारतके मूर्धन्य
विशेषज्ञोंमें गिने जाते हैं और रामचरितमानसके एक प्रामाणिक संस्करणके संपादक हैं।
प्रस्तुत पुस्तक सनातन धर्मके सर्वाधिक लोकप्रिय स्तोत्र श्रीहनुमान्-चालीसापर
स्वामी रामभद्राचार्यकी महावीरी व्याख्याका तृतीय संस्करण है। ईस्वी सन् १९८३में
मात्र एक दिनमें प्रणीत इस व्याख्याको रामचरितमानसके अंग्रेज़ी व हिन्दी अनुवादक
डॉ. रामचन्द्र प्रसादने श्रीहनुमान्-चालीसाकी 'सर्वश्रेष्ठ व्याख्या' कहा है। अनेक
टिप्पणियों और परिशिष्टों सहित महावीरी व्याख्याका परिवर्धित अंग्रेज़ी अनुवाद भी
Mahāvīrī: Hanumān-Cālīsā Demystified नामसे प्रकाशित हो चुका है।
₹50 विशिष्ट मूल्य
ISBN 978-93-82253-07-5
ज.रा.दि.वि.
www.jrhu.com
9 789382 253075