श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
२८) (श्री भक्तमाल
निमि अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण।।
कवि हरि करभाजन, भक्ति रतनाकर भारी।
अन्तरिक्ष अरु चमस, अनन्यता पधति उधारी।।
प्रबुध प्रेम की राशि, भूरिदा आबिर होता।
पिप्पल द्रुमिल प्रसिद्ध, भवाब्धि पार के पोता।।
जयन्ती नन्दन जगत के, त्रिविध ताप आमय हरण।
निमि अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण।। १३।।
पद पराग करुणा करौ जे, नियन्ता नवधा भगति के।।
श्रवण परीक्षित सुमति, व्यास सावक सुकीरतन।
सुठि सुमिरन प्रहलाद पृथु पूजा कमला चरनन मन।।
वन्दन सुफलकसुवन, दास्य दीपत्ति कपीश्वर।
सख्यत्वे पारत्थ, समर्पण आतम बलिधर।।
उपजीवी इन नाम के, एते त्राता अगति के।
पद पराग करुणा करो, जे नियन्ता नवधा भगति के।। १४।।
श्रीपरीक्षितजी
श्रवण रसिक कहूँ सुने न परीक्षित से, पानहू करत लागी कोटिगुनी प्यास है।
मुनि मन माँझ क्योहूँ आवत न ध्यावत हूँ, वहीं गर्भमध्य देखि आयो रूपरास है।।
कही शुकदेव जू सौं टेव मेरी लीजै जानि, प्रान लागे कथा नहीं तक्षक को त्रास है।
कीजिये परीच्छ उर आनी मतिसानी अहो ! वानी बिरमानी जहाँ जीवन निरास है।। ६५।।
परमहंस श्रीशुकदेवजी
गर्भ ते निकसि चले वन ही में कियो वास, व्यास से पिता को नहिं उत्तरहु दियो है।
दशम श्लोक सुनि गुनि मति हरि गई, लई नई रीति पढ़ि भागवत लियो है।
रूप गुन भरि सह्यो जात कैसे करि आये, सभा नृप ढरि भीज्यो प्रेमरस हियो है।
पूछे भक्तभूप ठौर-ठौर परे भौंर जाय, गाय उठे जबैं मानो रँग झर कियो है।। ६८।।
28-1
आत्मनिवेदन
सख्य
दास्य
वन्दन
अर्चन
पादसेवन
स्मरण
कीर्तन
श्रवण
भक्तिदेवी
रां
रां श्री सीताराम रां
रां रां
रां
www.malookpeeth.com
श्रीभगवद् प्रसादानिष्ठ भक्त) (२६
श्रीप्रह्लादजी
सुमिरन साँचो कियो लियो देखि सबही में, एक भगवान कैसे काटै तरवार है।
काटिवो खड्ग जल बोरिवो सकति जाकी, ताहि को निहारै चहुँओर सो अपार है।।
पूछे ते बतायो खम्भ तहाँ ही दिखायो रूप, प्रगट अनूप भक्त वानी ही सौं प्यार है।
दुष्ट डार्यो मारि गरे आँतै लई डारि तऊ, क्रोध को न पार कहा कियो यों विचार है।।६६।।
डरे शिव अज आदि देख्यौ नहीं क्रोध ऐसो, आवत न ढिग कोऊ लछिमीहूँ त्रास है।
तबतौ पठायो प्रह्लाद अहलाद महा, अहो ! भक्तिभाव पग्यो आयो प्रभु पास है।।
गोद में उठाइ लियो सीस पर हाथ दियो, हियो हुलसायो कही वानी विनयरास है।
आई जग दया लगि पर्यो श्रीनृसिंह जू को, अर्यो यों छुटावो कर्यो माया ज्ञान नास है।।१००।।
श्रीअक्रूरजी
चले अकरूर मधुपुरी ते बिसूर नैन, चली जलधारा कब देखौं छबि पूर को।
सगुन मनावैं एक देखिवोई भावै देह, सुधि बिसरावैं लोटै लखि पग धूर को।।
वन्दन प्रवीन चाह निपट नवीन भई, दई शुकदेव कहि जीवन की मूर को।
मिले राम कृष्ण झिले पाइकै मनोरथ को, हिले दृगरूप कियो हियो चूर-चूर को।।१०१।।
श्रीबलिजी
दियो सरबसु करि अति अनुराग बलि, पागि गयो हियो प्रह्लाद सुधि आई है।
गुरु भरमावैं नीति कहि समुझावैं बोल, उर में न आवै केती भीति उपजाई है।।
कह्यो जोई कियो साँचो भावपन लियो, अहो दियो डर हरिहूँ ने मति न चलाई है।
रीझे प्रभु रहे द्वार भये वश हारि मानी, श्रीशुक बखानी प्रीति रीति सोई गाई है।।१०२।।
सप्ताह परायण प्रथम विश्राम
श्रीभगवद् प्रसादानिष्ठ भक्त
हरि प्रसाद रस स्वाद के, भक्त इते परमान।।
शंकर शुक सनकादि, कपिल नारद हनुमाना।
विष्वक्सेन प्रह्लाद बलिर, भीषम जग जाना।।
अर्जुन ध्रुव अम्बरीष, विभीषण महिमा भारी।
अनुरागी अक्रूर, सदा उद्धव अधिकारी।।
भगवन्त भुक्त अवशिष्ट की, कीरति कहत सुजान।
हरि प्रसाद रस स्वाद के भक्त इते परमान।।१५।।
३०) (श्री भक्तमाल
ध्याननिष्ठ भक्त
ध्यान चतुर्भुज चित धर्यो, तिन्हें शरण हौं अनुसरौं ।।
अगस्त्य पुलस्त्य पुलह, च्यवन वशिष्ठ सौभरि रिषि।
कर्दम अत्रि रिचीक, गर्ग गौतम सुव्यास शिषि ।।
लोमश भृगु दालभ्य, अंगिरा शृंगि प्रकासी।
माण्डव्य विश्वामित्र, दुर्वासा सहस अठासी ।।
जाबालि यमदग्नि मायादर्श कश्यप परवत पराशर पद रज धरौं।
ध्यान चतुर्भुज चित धर्यो तिन्हें शरण हौं अनुसरौं ।। १६ ।।
अठारह महापुराण
साधन साध्य सत्रह पुरान, फलरूपी श्रीभागवत ।।
ब्रह्म विष्णु शिव लिंग, पद्म स्कन्द विस्तारा।
वामन मीन वाराह अग्नि कूरम ऊदारा ।।
गरुड़ नारदी भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त श्रवण शुचि।
मार्कण्डेय ब्रह्माण्ड कथा, नाना उपजै रुचि ।।
परमधर्म श्रीमुख कथित, चतुःश्लोकी निगम सत।
साधन साध्य सत्रह पुरान फलरूपी श्रीभागवत ।। १७ ।।
अठारह स्मृतियाँ
दश आठ स्मृति जिन उच्चरी, तिन पद सरसिज भाल मो ।।
मनुस्मृति अत्रेय वैष्णवी हारीतक यामी।
याज्ञवल्क्य अंगिरा शनैश्चर साम्बर्तक नामी ।।
कात्यायनि सांख्यल्य, गौतमी वासिष्ठी दाखी।
सुरगुरु आतातापि पराशर क्रतु मुनि भाखी ।।
आशा पास उदारधी, परलोक लोक साधन सो।
दश आठ स्मृति जिन उच्चरी तिन पद सरसिज भाल मो ।। १८ ।।
२. रामानन्द एवं रामानुज सम्प्रदाय के संत (कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना)
नवों नन्दजी) (३१
श्रीराम सचिव
पावैं भक्ति अनपायिनी जे, राम सचिव सुमिरन करैं।
धृष्टी विजय जयन्त, नीति पर शुचि सुविनीता।
राष्ट्र विवर्धन निपुण, सुराष्ट्र परम पुनीता।।
अशोक सदा आनन्द, धर्मपालक तत्ववेत्ता।
मन्त्रीवर्य सुमन्त्र, चतुर्जुग मन्त्री जेता।।
अनायास रघुपति प्रसन्न, भवसागर दुस्तर तरैं।
पावैं भक्ति अनपायिनी जे, राम सचिव सुमिरन करैं।।१९।।
श्रीराम सहचरवर्ग
शुभदृष्टि वृष्टि मो पर करौ, जे सहचर रघुवीर के।।
दिनकर सुत हरिराज, बालिवछ केसरि औरस।
दधिमुख द्विविद मयन्द, रिच्छपति सम को पौरस।।
उल्का सुभट सुषेन, दरीमुख कुमुद नील नल।
सरभ रु गवय गवांच्छ, पनस गन्धमादन अति बल।।
पद्म अठारह यूथपाल, रामकाज भट भीर के।
शुभदृष्टि वृष्टि मो पर करौ, जे सहचर रघुवीर के।।२०।।
नवों नन्दजी
ब्रज बड़े गोप पर्जन्य के, सुत नीके नव नन्द।।
धरानन्द ध्रुवनन्द, तृतीय उपनन्द सुनागर।
चतुर्थ तहाँ अभिनन्द, नन्द सुखसिन्धु उजागर।।
सुठि सुनन्द पशुपाल, निर्मल निश्चय अभिनन्दन।
कर्मा धर्मानन्द अनुज, वल्लभ जग वन्दन।।
आस पास वा बगर के, जहाँ विहरत पशुप सुछन्द।
ब्रज बड़े गोप पर्जन्य के, सुत नीके नव नन्द।। २१।।
३२) (श्री भक्तमाल
समस्त ब्रजवासीगण
बाल वृद्ध नर नारि गोप, हौं अर्थी उन पाद रज।।
नन्द गोप उपनन्द, ध्रुव धरानन्द महरि जसोदा।
कीरतिदा वृषभानु, कुँअरि सहचरि मन मोदा।।
मधुमंगल सुबल, सुबाहु भोज अर्जुन श्रीदामा।
मण्डल ग्वल अनेक, श्याम संगी बहुनामा।।
घोष निवासिन की कृपा, सुर नर बांछत आदि अज।
बाल वृद्ध नर नारि गोप हौं अर्थी उन पाद रज।। २२।।
श्रीकृष्णजी के षोडश सखा
ब्रजराज सुवन संग सदन वन, अनुग सदा तत्पर रहें।
रक्तक पत्रक और पंत्रि, सबही मन भावैं।
मधुकण्ठौ मधुवर्त्त रसाल विशाल सुहावैं।।
प्रेमकन्द मकरन्द, सदा आनन्द चन्द्रहासा।
पयद बकुल रसंदान, सारदां बुद्धि प्रकासा।।
सेवा समय विचारिकै, चारु चतुर चित की लहैं।
ब्रजराज सुवन संग सदन बन अनुग सदा तत्पर रहें।। २३।।
सप्तद्वीप के भक्त
सप्तद्वीप में दास जे, ते मेरे सिरताज।।
जम्बू और पलच्छ, सालमलि बहुत राजरिषि।
कुश पवित्र पुनि क्रौंच, कौन महिमा जानै लिषि।।
साक विपुल विस्तार, प्रसिध नामी अति पुहकर।
पर्वत लोकालोक, ओक टापू कंचनधर।।
हरिभृत्य बसत जे-जे जहाँ, तिनसौँ नित प्रति काज।
सप्तद्वीप में दास जे ते मेरे सिरताज।। २४।।
श्वेतद्वीप के भक्त) (३३
जम्बूद्वीप के भक्त
मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥
इलावर्त्त अधीस संकर्षण, अनुग सदाशिव।
रमनक मछ मनु दास, हिरण्य कूरम अर्जम इव॥
कुरु वराह भूभृत्य, वर्ष हरि सिंह प्रह्लादा।
किंपुरुष राम कपि, भरत नरायन बीना नादा॥
भद्राश्वग्रीवहय भद्रसव केतु काम कमला अनूप।
मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥ २५॥
श्वेतद्वीप के भक्त
श्वेतदीप में दास जे, श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥
श्रीनारायण वदन निरन्तर ताही देखें।
पलक परै जो बीच कोटि जमजातन लेखैं॥
तिनके दरशन काज गये तहँ वीणाधारी।
श्याम दई कर सैन उलटि अब नहिं अधिकारी॥
नारायण आख्यान दृढ़, तहँ प्रसंग नाहिन तथा।
श्वेतदीप में दास जे श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥ २६॥
श्वेतदीपवासी सदा रूप के उपासी गये, नारद विलासी उपदेस आसा लागी है।
दई प्रभु सैन जिनि आवो इहि ऐन दृग, देखें सदा चैन मति गति अनुरागी है।।
फिरे दुख पाइ जाइ कही श्रीवैकुण्ठनाथ, साथ लिये चले लखो भक्ति अँग पागी है।
देख्यो एक सर खग रह्यो ध्यान धरि ऋषि, पूछैं कहो हरि कह्यो बड़ो बड़भागी है।। १०३।।
बरष हजार बीते भये नहीं चितचीते, प्यासोई रहत ऐपै पानी नहीं पीजिये।
पावै जो प्रसाद तब जीभ सौं स्वाद लेत, लेत नहीं और याकी मति रस भीजिये।।
लीजै बात मानि जलपान करि डारि दियो, लियो चोंच भरि दृग भरि बुधि धीजिये।
अचरज देखि चख लगै न निमेष किहूँ, चहुँदिसि फिर्यो अब सेवा याकी कीजिये।। १०४।।
३४) (श्री भक्तमाल
चलो आगे देखौ कोऊ रहै न परेखौ भाव, भक्ति करि लेखौ गये द्वीप हरि गाइये।
आयो एकजन धाय आरती समय विहाय, खैचि लिये प्रान फिरि बधू याकी आइये।।
वही इन कही पति देख्यो नहीं मही पर्यो, हर्यो याको जीव तन गिर्यो मन भाइये।
ऐसे पुत्र आदि आये साँचे हित में दिखाये, फेरिकै जिवाये ऋषि गाये चित लाइये।।१०५।।
अष्टकुल नाग भक्त
उरग अष्टकुल द्वारपाल, सावधान हरिधाम थिति।।
इलापत्र मुख अनन्त, अनन्त कीरति बिसतारत।
पद्म शंकु पन प्रकट, ध्यान उर ते नहिं टारत।।
अश्वकमल वासुकी, अजित आज्ञा अनुवरती।
करकोटक तक्षक सुभट सेवा सिर धरती।।
आगमोक्त शिवसंहिता "अगर" एकरस भजन रति।
उरग अष्टकुल द्वारपाल सावधान हरिधाम थिति।। २७।।
।। इति पूर्वार्ध।।
श्रीसम्प्रदाय) (३५
अथ श्रीभक्तमाल उत्तरार्द्ध
चतुःसम्प्रदायाचार्य
चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।।
• श्रीरामानंद उदार, सुधानिधि अवनि कल्पतरु।
विष्णुस्वामि बोहित्य, सिन्धु संसार पार करु ।।
मध्वाचारज मेघ, भक्ति सर ऊसर भरिया ।
निम्बादित्य आदित्य, कुहर अज्ञान जु हरिया ।।
जनम करम भागवत, धरम सम्प्रदाय थापीं अघट।
चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।। २८ ।।
रमा पद्धति रामानंद विष्णुस्वामि त्रिपुरारी ।
निम्बादित्य सनकादिका मधुकर गुरु मुखचारि ।। २६ ।।
श्रीनिम्बार्काचार्यजी
निम्बादित्य नाम जाते भयो अभिराम कथा, आयो एक दण्डी ग्राम न्योतो करि आये हैं।
पाक को अबार भई सन्ध्या मानि लई जती, 'रतीहूँ न पाऊँ' वेद वचन सुनाये हैं।।
आँगन में नींब तापै आदित दिखायौ ताहि, भोजन करायो पाछे निसि चिह्न पाये हैं।
प्रगट प्रभाव देखि जान्यो भक्तिभाव जग, दाँव पाइ नाव पर्यो हर्यो मन गाये हैं।। १०६ ।।
श्रीसम्प्रदाय
सम्प्रदाय शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्तान ।।
विष्वक्सेन मुनिवर्य, सु पुनि सठकोप पुनीता।
वोपदेव भागवत, लुप्त उधर्यो नवनीता ।।
• पाठान्तर - श्रीरामानुज उदार सुधानिधि अवनि कल्पतरु।
३६) (श्री भक्तमाल
मंगल मुनि श्रीनाथ, पुण्डरीकाक्ष परम जस।
राममिश्र रसरासि, प्रगट परताप परांकुश॥
यामुन मुनि रामानुज, तिमिर हरन उदय भान।
सम्प्रदायं शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्त न॥ ३०॥
स्वामी श्रीरामानुजाचार्यजी
सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत उधारन जतन कियो॥
गोपुर ह्वै आरूढ़, उच्चस्वर मन्त्र उच्चार्यो।
सूते नर परे जागि, बहत्तरि श्रवणनि धार्यो॥
तितनेई गुरुदेव पधति, भई न्यारी न्यारी।
कुरुतारक शिष्य प्रथम, भक्ति वपु मंगलकारी॥
कृपणपाल करुणा समुद्र, रामानुज सम नहिं बियो।
सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत् उधारन जतन कियो॥३१॥
आस्य सो वदन नाम सहस हजार मुख, शेष अवतार जानो वही सुधि आई है।
गुरु उपदेसि मन्त्र कह्यो 'नीके राख्यो' अन्त्र, जपतहिं श्याम जू ने मूरति दिखाई है॥
करुनानिधान कही 'सब भगवान पावें' चढ़ि दरवाजे सो पुकार्यो धुनि छाई है।
सुनि सीखि लियो यों बहत्तरहि सिद्ध भये, नयो भक्ति चोज यह रीति लैके गाई है॥१०७॥
गये नीलाचल जगन्नाथ जू के देखिवे कौं, देख्यो अनाचार सब पण्डा दूरि किये है।
संग लै हजार शिष्य रंग भरि सेवा करें, धरैं हिये भाव गूढ़ मत दरसाये हैं॥
बोले प्रभु 'वेई आवैं' करे अंगीकार मैं तो, प्यार ही को लेत कँभू औगुन न लिये है।
तऊ दृढ़ कीनी फिरि कही नहीं कान दीनी, लीनी वेदवानी विधि कैसे जात छिये हैं॥१०८॥
जोरावर भक्त सौं बसाइ नहीं कही किती, रती हूँ न लावैं मन चोज दरसायौ है।
गरुड़ को आज्ञा दई सोई मानि लई उन, शिष्य नि समेत निज देस छोड़ि आयौ है॥
जागिकै निहारे ठौर और ही मगन भये, दिये यों प्रगट करि गूढ़ भाव पायौ है।
वेई सब सेवा करैं, श्याम मन सदा हरैं, धरें साँचो प्रेम हिये प्रभू जू दिखायौ है॥१०६॥
मास परायण पांचवा विश्राम
श्रीलालाचार्यजी) (३७
चार दिग्गज महन्त
चतुर महन्त दिग्गज चतुर, भक्तिभूमि दाबे रहैं।।
श्रुतिप्रज्ञा श्रुतिदेव, ऋषभ पुहकर इभ ऐसे।
श्रुतिधामा श्रुतिउदधि, पराजित वामन जैसे।।
श्रीरामानुज गुरु बन्धु, विदित जग मंगलकारी।
शिवसंहिता प्रणीत, ज्ञान सनकादिक सारी।।
इन्दिरा पद्धति उदारधी, सभा साखि सारंग कहैं।
चतुर महन्त दिग्गज चतुर भक्तिभूमि दाबे रहैं।। ३२।।
श्रीलालाचार्यजी
आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।।
कोउ मालाधारी मृतक, बह्यो सरिता में आयो।
दाह कृत्य ज्यों बन्धु, न्यौति सब कुटुम्ब बुलायो।।
नाक सकोचहिं विप्र, तबहिं हरिपुर जन आये।
जेंवत देखे सबनि, जात काहू नहिं पाये।।
लालाचारज लक्षधा, प्रचुर भई महिमा जगति।
आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।। ३३।।
आचारज को जामात बात ताकी सुनौ नीके, पायो उपदेस 'सन्त बन्धु करि मानियै'।
कीजै कोटिगुनी प्रीति ऐपै न बनति रीति तातें इति करौ याते घटती न आनिये।।
मालाधारी साधु तनु सरिता में बह्यो आयो, ल्यायो घर फेरिकै विमान सब जानिये।
गावत बजावत लै नीर तीर दाह कियो, हियो दुख पायो सुख पायो समाधानिये।। ११०।।
कियो सो महोच्छो ज्ञाति विप्रन को न्योतो दियो, लियो आये नहिं कियो शंका दुखदाइये।
भये इकठौरे माया कीने सब बौरे कछु, कहैं बात औरे मरी देह बही आइये।।
याते नहीं खात वाकी जानत न जाति-पाँति, बड़ौ उतपात घर ल्याइ जाइ दाहिये।
मग अवलोकि उत पर्यो सुनि शोक हिये, जिये आइ पूछें गुरु कैसे कै निवाहिये।। १११।।
चले श्री आचारज पै बारिज बदन देखि, करि साष्टांग बात कहि सो जनाइयै।
जाओ निहशंक, वे प्रसाद को न जानैं रंक, जानैं जे प्रभाव आवैं वेगि सुखदाइयै।।
३८) (श्री भक्तमाल
देखे नभ-भूमि-द्वार ऐंहैं निरधारजन, वैकुण्ठ-निवासी पाँति ढिग ह्वै कै आइयै।
इन्हें अब जान देवो जनि कछू कहो अहो ! गहो करौ हाँसी जब घर जाय खाइयै।। ११२।।
आये देखि पारषद गयो गिरी भूमि सद, हद करी कृपा यह जानि निज जन को।
पायौ लै प्रसाद स्वाद कहि अह्लाद भयो, नयो लयो मोद जान्यो साँचो सन्तपन को।।
विदा ह्वै पधारे नभ-मग में सिधारे विप्र, देखत विचारे द्वार व्यथा भई मन को।
गयौ अभिमान आनि मन्दिर मगन भये, नये दृग लाज बीनि-बीनि लेत कन को।। ११३।।
पांइ लपटाय अँग धूरि में लुटाय कहैं, करौ मनभायो और दीन बहु भाख्यौ है।
कही भक्तराज तुम कृपा मैं समाज पायो, गायो जो पुरानन में रूप नैन चाख्यौ है।।
छाड़ो उपहास अब करो निज दास हमें, पूजै हिये आस मन अति अभिलाख्यौ है।
किये परशंस मानो हंस ये परम कोऊ, ऐसे जस लाख भाँति घर-घर राख्यो है।। ११४।।
श्रीपादपद्माचार्य जी (गुरु और शिष्य)
श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।।
गुरु गमन कियो परदेश, शिष्य सुरधुनी दृढ़ाई।
इक मंजन इक पान, हृदय वन्दना कराई।।
गुरु गंगा में प्रविशि, शिष्य को वेगि बुलायौ।
विष्णुपदी भय मानि, कमल पत्रन पर धायौ।।
पादपद्म ता दिन प्रगट, सब प्रसन्न मन परम रुचि।
श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।। ३४।।
देवधुनी तीर सो कुटीर बहु साधु रहैं, रहै गुरुभक्त एक न्यारो नहिं ह्वै सकै।
चले प्रभु गाँव ‘जिनि तजो बलि जांव’ करौ कही दास सेवा गंगा में ही कैसें छ्वै सकै।।
क्रिया सब कूप करै विष्णुपदी ध्यान धरै, रोष भरे सन्तश्रेणी भाव नहीं भ्वै सकै।
आये ईश जानि दुखमानि सो बखान कियो, आनि मन जनि बात अंग कैसे ध्वै सकै।। ११५।।
चले लैके न्हान संग गंग में प्रवेस कियो, रंग भरि बोले सो अँगोछा वेगि ल्याइयै।
करत विचार सोच सागर न पारावर, गंगा जू प्रकट कह्यो कजन पै आइये।।
चलेई अधर पग धरै सो मधुर जाइ, प्रभु हाथ दियो लियो तीर भीर छाइये।
निकसत धाय चाय पग लपटाय गये, बड़ौ परताप यह निसिदिन गाइये।। ११६।।
श्रीअनन्तानन्दजी) (३६
श्रीसम्प्रदाय
• श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।।
देवाचारज द्वितीय, महामहिमा हरियानन्द।
तस्य राघवानन्द भये, भक्तन को मानद।।
पत्रावलम्ब पृथिवी करी, व काशी स्थाई।
चारि वरन आश्रम, सबही को भक्ति दृढ़ाई।।
तिनके रामानन्द प्रगट, विश्व मंगल जिन्ह वपु धर्यौ।
श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।। ३५।।
स्वामी श्रीरामानन्दाचार्यजी
श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं, दृतिय सेतु जग तरन कियो।।
अनन्तानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावति नरहरि।
पीपा, भावानन्द, रैदास, धना, सेन सुरसुर की घरहरि।।
औरौ शिष्य प्रशिष्य, एक ते एक उजागर।
जग मंगल आधार, भक्ति दशधा के आगर।।
बहुत काल वपु धारिकै, प्रणत जनन कौं पार दियो।
श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं दृतिय सेतु जग तरन कियो।। ३६।।
श्रीअनन्तानन्दजी
श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।।
योगानन्द, गयेश, करमचन्द, अल्ह, पैहारी।
सारी रामदास श्रीरंग, अवधि गुण महिमा भारी।।
तिनके नरहरि उदित, मुदित मेहा मंगलतन।
रघुवर यदुवर गाइ, विमल कीरति संच्यो धन।।
हरिभक्ति सिन्धु बेला रचे, पानि पद्मजा सिर दये।
श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।। ३७।।
• पाठान्तर - श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।
४०) (श्री भक्तमाल
श्रीरंगजी
द्यौसा एक गाँव, तहाँ श्रीरंग सुनाम हुतो, बनिक सराबगी की कथा लै बखानिये।
रहतो गुलाम गयो धर्मराज धाम उहाँ, भयो बड़ो दूत कही सुनु अरे बानिये।।
आये बनिजारे लैन देख तूँ दिखावैं चैन, बैल शृंगमध्य पैठि मारे पहचानिये।
बिनु हरिभक्ति सब जगत की यही रीति, भयो हरिभक्त श्रीअनन्तपद ध्यानिये।।११७।।
सुत को दिखाई देत भूत नित सूख्यो जात, पूछें कही बात जाइ वाही ठौर सोयो है।
आयो निसि मारिवे को धायो यह रोष भर्यो, देवो गति मोकों उन बोलिकै सुनायो है।।
जाति को सोनार पर नारि लगि प्रेत भयौं, लयौं तेरी सरन मैं ढूँढ़ि जग पायो है।
दियो चरनामृत लै कियो दिव्यरूप वाको, अति ही अनूप सुनो भक्तिभाव गायो है।।११८।।
पयहारी श्रीकृष्णदासजी
निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन्न परिहरि पय पान कियो।।
जाके सिर कर धरयो, तासु कर तर नहिं आँड़यो।
अर्प्यो पद निर्वान, शोक निर्भय करि छाँड़्यो।।
तेजपुंज बल भजन, महामुनि ऊरधरेता।
सेवत चरण सरोज, राय राना भुविजेता।।
दहिमा वंश दिनकर उदय, सन्त कमल हिय सुख दियो।
निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन्न परिहरि पय पान कियो।।३८।।
जाके सिर कर धरयो ता तर न आँड़यो हाथ, दीनो बड़ो वर राजा कुल्हू को जू साखिये।
परवत कन्दरा में दरसन दीयो आनि, दियो भावसाधु हरिसेवाँ अभिलाखिये।।
गिरी जो जलेबी थार माँझ ते उठाई बाल, भयो हियो शाल बिन अरपित चाखिये।
लै करि खड़ग ताहि मारन उपाइ कियो, जियो सन्त ओट फिरि मोल करि राखिये।।११६।।
नृपसुत भक्त बड़ो अबलौं विराजमान, साधु सनमान में न दूसरो बखानिये।
सन्त बधू गर्भ देखि उभै पनवारे दिये, कही अर्भ इष्ट मेरो ऐसी उर आनिये।।
कोऊ भेषधारी सो व्योपारी पगदासिन को, कही कृपा करो कहा जानै और प्रानिये।
ऐपै तजि देवो क्रिया देखि जग बुरो होत, जोति बहु दई दाम राम मति सानिये।।१२०।।
श्रीकील्हदेवजी) (४१
पयहारी के शिष्यगण
पयहारी परसाद तें, शिष्य सबै भये पारकर।।
कील्ह अगर केवल, चरण ब्रतहठी नारायण।
सूरज पुरुषां पृथु, तिपुर हरिभक्ति परायन।।
पद्मनाभ गोपाल, टेक टीला गदाधारी।
देवा हेम कल्यान, गंगा गंगासम नारी।।
विष्णुदास कन्हर रंगा, चाँद सबही गोविन्द पर।
पयहारी परसाद तें शिष्य सबै भये पारकर।।३६।।
श्रीकील्हदेवजी
गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यौं कील्ह करन नहिं कालवश।।
राम चरण चिन्तवनि, रहति निशिदिन लौं लागी।
सर्वभूत सिर नामित, सूर भजनानन्द भागी।।
सांख्ययोग मति सुदृढ़, कियो अनुभव हस्तामल।
ब्रह्मरन्ध्र करि गौन भये, हरि तन करनी बल।।
सुमेरदेव सुत जग विदित, भुवि विस्तार्यो विमल यश।
गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं त्यौं, कील्ह करन नहिं कालवश।।४०।।
श्रीसुमेर देव पिता सूबे गुजरात हुतें, भयो तनु पात सो विमान चढ़ि चले हैं।
बैठे मधुपुरी कील्ह मानसिंह राजा ढिंग, देखे नभ जात उठि कही भले-भले हैं।।
पूछे नृप 'बोले कासौँ?' कैसे के प्रकासौँ, कहौ, कह्यो हठ परे सुनि अचरज रले है।
मानुस पठाये सुधि ल्याये साँच आँच लागी, करी साष्टांग बात मानी भाग फले हैं।।१२१।।
ऐसे प्रभु लीन नहीं काल के अधीन बात, सुनिये नवीन चाहें रामसेवा कीजिये।
धरी ही पिटारी फूल-माला हाथ डार्यो तहाँ, ब्याल कर काट्यो कह्यो फेरि काटि लीजिये।।
ऐसे ही कटायो बार तीनि हुलसायो हियो, कियो न प्रभाव नेकु सदा रस पीजिये।
करिकै समाज साधु मध्य यों विराज प्रान, तजे, दसैँ द्वार योगी थके सुनि जीजिये।।१२२।।
४२) (श्री भक्तमाल)
श्रीअग्रदासजी
(श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।।
सदाचार ज्यौं सन्त, प्राप्त जैसें करि आये।
सेवा सुमिरन सावधान, चरण राघव चित लाये।।
प्रसिध बाग सौं प्रीति, सुहथ कृत करत निरन्तर।
रसना निर्मल नाम, मनहुँ वर्षत धाराधर।।
कृष्णदास(कृपाकरि)भक्तिदत्त, मन वच क्रम करि अटल दयो।
(श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।।४१।।
दरसन काज महाराज मानसिंह आयो, छायो बाग माँझ बैठे द्वार द्वारपाल हैं।
झारिकै पतौवा गये बाहिर लै डारिवे को, देखी भीर भार रहे बैठि ये रसाल हैं।।
आये देखि नाभा जू ने उठि साष्टांग करी, भरी जल आँखे चले अँसुवनि जाल हैं।
राजा मग चाहि हारि आनिकै निहारै नैन, जानी आप जानी भये दासनि दयाल है।।१२३।।
श्रीशंकराचार्यजी
कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।।
उत्शृंखल अज्ञान, जितें अनईश्वरवादी।
बौद्ध कुतर्की जैन, और पाखण्डहिं आदी।।
विमुखनि को दियों, दण्ड ऐंचि सन्मारग आने।
सदाचार की सीव, विश्व कीरतिहिं बखाने।।
ईश्वरांश अवतार महि, मरजादा माँडी अघट।
कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।।४२।।
विमुख समूह लैकें किये सनमुख श्याम, अति अभिराम लीला जग बिसतारी है।
सेवरा प्रबल बास केवरा ज्यौं फैलि रहे, गहे नहीं जाहिं वादी शुचि बात धारी है।।
तजिकै सरीर काहू नृप में प्रवेस कियो, दियो करि ग्रन्थ मोह–मुद्गर सुभारी है।
शिष्यानि सौं कह्यो कँभू देह में आवेस जानो, तबही बखानो आय सुनि कीजै न्यारी है।।१२४।।
जानिकै आवेस तन शिष्य नै प्रवेस कियो, रावले में देखि सो श्लोक लै उच्चार्यो है।
सुनतहिं तज्यो तन निज तन आय लियो, कियो यों प्रमान दासपन पूरो पार्यो है।।
श्रीनामदेवजी) (४३
सेवरा हराये वादी आये नृप पास ऊँचे, छात पर बैठि एक माया फन्द डार्यो है।
जल चढ़ि आयो नाव भाव लै दिखायो कहैं, 'चढ़ौं नहिं बूड़ो' आप कौतुक सौं धार्यो है।।१२५।।
आचारज कही यों चढ़ाओ इन सेवरानि, राजा ने चढ़ाये गिरे टूँक उड़ि गये हैं।
तबतौ प्रसन्न नृप पाँव पर्यो भाव भर्यो, कह्यो जोई कर्यो धर्म भागवत लये हैं।।
भक्ति ही प्रचार पाछे मायावाद डारि दीनौ, कीनौ प्रभु कह्यौ किते विमुखहू भये हैं।
आशय सो गँभीर सन्त धीर वह रीति जाने, प्रीति ही में साने हरिरूप गुन नये हैं।।१२६।।
श्रीनामदेवजी
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं त्रेता नरहरिदास की।।
बालदशा बीठल्य, पानि जाके पै पीयौ।
मृतक गऊ जिवाय, परचौ असुरन कौं दीयौ।।
सेज सलिल तें काढ़ि, पहिल जैसी ही होती।
देवल उलट्यो देखि, संकुचि रहे सबही सोती।।
पण्ढरनाथ कृत अनुग ज्यौं, छानि सुकर छाई घास की।
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं, त्रेता नरहरिदास की।। ४३।।
छीपा वामदेव हरिदेव जू का भक्त बड़ो, ताकी एक बेटी पतिहीन भई जानिये।
द्वादश बरष माँझ भयो तब कही पिता, सेवा सावधान मन नीके करि आनिये।।
तेरे जे मनोरथ हैं पूरन करन येई, जोपै दत्तचित्त ह्वै कैं मेरी बात मानिये।
करत टहल प्रभु वेगि ही प्रसन्न भये कीनी, काम-वासना सो पोषि उन मानिये।। १२७।।
विधवा को गर्भ ताकी बात चली ठौर-ठौर, दुष्ट सिरमौरनि की भई मन भाइयै।
चलत-चलत वामदेव जू के कान परी, करी निरधार प्रभू आप अपनाइयै।।
भयो जू प्रगट बाल नाम नामदेव धर्यौ, कर्यौ मनभायो सब सम्पत्ति लुटाइयै।
दिन-दिन बढ़्यो कछू औरे रंग चढ़यो भक्तिभाव, अंग मढ़यो कढ़यो रूप सुखदाइयै।। १२८।।
खेलत खिलौना रीति-प्रीति सब सेवा ही की, पट पहिरावैं पुनि भोग को लगावहीँ।
घण्टा लै बजावैं नीके ध्यान मन लावैं त्यौं-त्यौं, अति सुख पावैं नैन नीर भरि आवहीँ।।
बार-बार कहैं नामदेव वामदेव जू सौं, 'देवो मोहि सेवा माँझ अति ही सुहावहीं'।
'जाँऊ एक गाँव फिरि आऊँ दिन तीनि मध्य, दूध को पिवावौ मत पीवौ मोहि भावहीँ' ।। १२६ ।।
४४) (श्री भक्तमाल
कौन वह बेर ? जेहि बेर दिन फेर होय, फेर-फेर कहैं वह बेर नहीं आइये? ।
आई वह बेर लै कराही माँझ हेरि दूध, डार्यो युग सेर मन नीके कै बनाइये।।
चोपनि के ढेर लागि निपट औसेर दृग, आयो नीर घेरि जिनि गिरैं घूँटि जाइये।
माता कहै टेरि 'करी बड़ी तैं अबेर अब, करो मति झेर' अजू चित दै औंटाइये।।१३०।।
चल्यो प्रभु पास लै कटोरा छबिरास तामें, दूध सो सुबास मध्य मिसिरी मिलाइयै।
हिये में हुलास निज अज्ञता को त्रास, ऐपै करें जोपै दास मोहि महा सुखदाइयै।।
देख्यौ मृदुहास कोटि चाँदनी की भास कियौ, भाव को प्रकास मति अति सरसाइयै।
प्याइवे की आस करि ओट कछु भर्यो स्वास, देखिकै निरास कह्यो पीवौ जू अघाइयै।।१३१।।
ऐसैं दिन बीते दोय राखी हिये बात गोय, रह्यो निसि सोय ऐपैं नींद नहीं आवही।
भयो जू सवारो फिरि वैसे ही सुधार लियौ, हियौ कियौ गाढ़ौ जाय धर्यौ पियो भावही।।
बार-बार पीवो कहूँ अब तुम पीवो नाहिं, आवै भोर नाना गरे छूरी दै दिखावहीँ।
गहि लीयो 'कर जिनि कर ऐसी पीवौं मैं तो', पीवे कौ लगेई नेकु राखौ सदा पावही।।१३२।।
आये वामदेव पाछैं पूछैं नामदेव जू सौं, दूध को प्रसंग अति रंग भरि भाखियै।
मोसों न पिछाँनि दिन दोय हानि भई तब, मानि डर प्रान तज्यो चाहौं अभिलाषियै।।
पीयो सुख दीयो जब नेकु राखि लीयो मैं तो, जीयो सुनि बातें कही प्यायो कौन साखियै।
धर्यौ पै न पीयैं, अर्यो, प्यायौ सुख पायो नाना, यामें लै दिखायौ भक्तवश रस चाखियै।।१३३।।
नृप सो मलेच्छ बोलि कही 'मिले साहिब को, दीजिये मिलाय करामात दिखराइयै'।
होय करामात तोपै काहे को कसब करैं?, भरैं दिन ऐसैं बाँटि सन्तन सौं खाइयै।।
ताही के प्रताप आप इहाँ लौं बुलायो हमें, दीजिये जिवाय गाय घर चलि जाइयै।
दई लै जिवाय गाय सहज सुभाय ही मैं, अति सुख पाय पाँय पर्यो मन भाइयै।।१३४।।
'लेवो देस गाँव जाते मेरो कछु नांव होय', 'चाहिये न कछु' दई सेज मनिमई है।
धरि लई सीस 'देऊँ संग दस बीस नर,' नाहीं करि आये जल माँझ डारि दई है।।
भूप सुनि चौंकि पर्यो ल्यावो फेरि आये, कहौ कही नेकु आनिकै दिखावो कीजै नई है।
जल तैं निकालि बहु भाँति गहि डारी तट, लीजिये पिछानि देखि सुधि-बुधि गई है।।१३५।।
आनि पर्यो पाँय प्रभु पांश तें बचाय लीजै, 'कीजै एक बात कभूँ साधु न दुखाइये'।
लई यही मानि 'फेरि कीजियै न सुंधि मेरी', लीजियै गुननि गाय मन्दिर लौं जाइये।।
देखि द्वार भीर पगदासी कटि बाँधी धरि, कर सौं उछीर करि चाहै पद गाइये।
देखि लीनी वेई काहू दीनी पाँच सात चोट, कीनी धक्काधकी रिस मन में न आइयै।।१३६।।
श्रीनामदेवजी) (४५
बैठे पिछवारे जाइ कीनी जू उचित यह, लीनी जो लगाइ चोट मेरे मन भाइयै।
कान दै कैं सुनो अब चाहत न और कछु, ठौर मोकौं यही नित नेम पद गाइयै॥
सुनत ही आनि करि करुना विकल भये, फेर्यो द्वार इतै गहि मन्दिर फिराइयै।
जेतिक वे सोती मोती आब-सी उतरि गई, भई हिये प्रीति गहे पाँव सुखदाइयै॥१३७॥
औचक ही घर माँझ साँझ ही अगिनि लागी, बड़ो अनुरागी राहि गई सोऊ डारियै।
कहै अहो नाथ! सब कीजिये जु अंगीकार, हँसे सुकुमार हरि मोही कौं निहारियै॥
तुम्हरौ भवन और सकै कौन आइ इहाँ?, भये यों प्रसन्न छानि छाई आप सारियै।
पूछैं आनि लोग कौने छाई हो? छबाइ दीजै, लीजै जोई भावै 'तन-मन-प्रान वारियै'॥१३८॥
सुनौ और परचै जो आये न कवित्त माँझ, बाँझ भई माता क्यौं न? जौ न मति पागी है।
हुतो एक शाह तुलादान को उछाह भयो, दयो पुर सबै रह्यो नामदेव रागी है॥
'ल्यावौ जू बुलाइ' एक दोई तो फिराइ दिये, तीसरे सौं आये 'कहा कहो? बड़भागी है'।
'कीजिये जु कछु अंगीकार मेरो भलो होय', 'भयो भलो तेरो दीजै जोपै आसा लागी है'॥१३९॥
जाके तुलसी हैं ऐसे तुलसी के पत्र माँझ, लिख्यो आधो राम-नाम यासौँ तोल दीजियै।
कहा परिहास करो? ढरो ह्वै दयाल देखि, होत कैसो ख्याल याकौं पूरो करो रीझियै॥
ल्यायो एक काँटो लै चढ़ायो पात सोना संग, 'भयो' बड़ो रंग सम होत नाहिं छीजियै।
लई सो तराजू जासौँ तुलै मन पाँच सात, जाति-पाँतिहू को धन धर्यो पै न धीजियै॥१४०॥
पर्यो सोच भारी दुख पावें नर-नारी, नामदेव जू विचारी एक और काम कीजिये।
जिते व्रत दान और स्नान किये तीरथ में, करियै संकल्प यापै जल डारि दीजिये॥
करेऊ उपाय पात पला भूमि गाढ़े पाँय, रहे वे खिसाय कह्यो इतनोई लीजियै।
लैवैं कहाँ धरैं? सरवरहू न करें भक्तिभाव सौं लै भरैं हिये मति अति भीजिये॥१४१॥
कियो रूप ब्राह्मन कौं दूबरो निपट अंग, भयो हिये रंग व्रत परिचै को लीजियै।
भई एकादशी अन्न माँगत बहुत भूखो, आजु तो न दैहौं भोर चाहौ जितो लीजिये॥
कर्यो हठ भारी मिलि दोऊ ताको शोर पर्यो, समझवै नामदेव याको कहा खीझिये।
बीते जाम चारि मरि रहे यों पसारि पाँव, भाव पै न जानैं दई हत्या नहीं छीजिये॥१४२।
रचिकै चिता कौं विप्र गोद लैके बैठे जाइ, दियो मुसुकाय मैं परीच्छा लीनी तेरी है।
देखि सो सचाई सुखदाई मनभाई मेरे, भये अन्तर्धान परे पाँय प्रीति हेरी है॥
जागरन माँझ हरि भक्तन को प्यास लगी, गये लैन जल प्रेत आनि कीनी फेरी है।
फेंट तें निकांसी ताल गायो पद ततकाल, बड़ई कृपाल रूप धर्यो छबि ढेरी है॥१४३॥
मास परायण छठवाँ विश्राम