श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीभगवद् प्रसादानिष्ठ भक्त) (२६
श्रीप्रह्लादजी
सुमिरन साँचो कियो लियो देखि सबही में, एक भगवान कैसे काटै तरवार है।
काटिवो खड्ग जल बोरिवो सकति जाकी, ताहि को निहारै चहुँओर सो अपार है।।
पूछे ते बतायो खम्भ तहाँ ही दिखायो रूप, प्रगट अनूप भक्त वानी ही सौं प्यार है।
दुष्ट डार्यो मारि गरे आँतै लई डारि तऊ, क्रोध को न पार कहा कियो यों विचार है।।६६।।
डरे शिव अज आदि देख्यौ नहीं क्रोध ऐसो, आवत न ढिग कोऊ लछिमीहूँ त्रास है।
तबतौ पठायो प्रह्लाद अहलाद महा, अहो ! भक्तिभाव पग्यो आयो प्रभु पास है।।
गोद में उठाइ लियो सीस पर हाथ दियो, हियो हुलसायो कही वानी विनयरास है।
आई जग दया लगि पर्यो श्रीनृसिंह जू को, अर्यो यों छुटावो कर्यो माया ज्ञान नास है।।१००।।
श्रीअक्रूरजी
चले अकरूर मधुपुरी ते बिसूर नैन, चली जलधारा कब देखौं छबि पूर को।
सगुन मनावैं एक देखिवोई भावै देह, सुधि बिसरावैं लोटै लखि पग धूर को।।
वन्दन प्रवीन चाह निपट नवीन भई, दई शुकदेव कहि जीवन की मूर को।
मिले राम कृष्ण झिले पाइकै मनोरथ को, हिले दृगरूप कियो हियो चूर-चूर को।।१०१।।
श्रीबलिजी
दियो सरबसु करि अति अनुराग बलि, पागि गयो हियो प्रह्लाद सुधि आई है।
गुरु भरमावैं नीति कहि समुझावैं बोल, उर में न आवै केती भीति उपजाई है।।
कह्यो जोई कियो साँचो भावपन लियो, अहो दियो डर हरिहूँ ने मति न चलाई है।
रीझे प्रभु रहे द्वार भये वश हारि मानी, श्रीशुक बखानी प्रीति रीति सोई गाई है।।१०२।।
सप्ताह परायण प्रथम विश्राम
श्रीभगवद् प्रसादानिष्ठ भक्त
हरि प्रसाद रस स्वाद के, भक्त इते परमान।।
शंकर शुक सनकादि, कपिल नारद हनुमाना।
विष्वक्सेन प्रह्लाद बलिर, भीषम जग जाना।।
अर्जुन ध्रुव अम्बरीष, विभीषण महिमा भारी।
अनुरागी अक्रूर, सदा उद्धव अधिकारी।।
भगवन्त भुक्त अवशिष्ट की, कीरति कहत सुजान।
हरि प्रसाद रस स्वाद के भक्त इते परमान।।१५।।