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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

५. अर्वाचीन भक्त एवं भक्तमाल उपसंहार

श्रीहरीदासजी) (१५१
श्रीजसवन्तजी
जसवन्त भक्ति जयमाल की, रूड़ा राखी राठवड़॥
भक्तनि सौं अति भाव, निरन्तर अन्तर नाहीं।
करजोरे इक पाँय, मुदित मन आज्ञा माहीं॥
श्रीवृंदावन वास, कुँज क्रीड़ा रुचि भावै।
राधावल्लभलाल, नित्तप्रति ताहि लड़ावै॥
परम धरम नवधा प्रधान सदन साँच निधि प्रेम जड़।
जसवन्त भक्ति जयमाल की रूड़ा राखी राठवड़॥ १५५॥
श्रीहरीदासजी
हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥
अमित महागुन गोप्य, सार वित सोई जानै।
देखत कौ तुलाधार, दूर आसै उनमानै॥
देय दमामौ पैंज, विदित वृन्दावन पायौ।
राधावल्लभ भजन, प्रगट परताप दिखायौ॥
परम धरम साधन सुदृढ़, कलियुग कामधेनु में गन्यौ।
हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥ १५६॥
हरीदास बनिक सो, काशी ढिंग वास जाकौ, ताकौ यह पन, तन त्यागौं ब्रजभूमहीं।
भयौ ज्वर नाड़ी छीन, छोड़ि गये वैद तीन, बोल्यौ यों प्रवीन, वृन्दावन रस झूमहीं।।
बेटी चारि सन्तनि कौ, दई अंगीकार करौ, धरौ डोली माँझ मोको, ध्यान दृग धूमहीं।
चले सावधान राधावल्लभ कौ गान करै, करै अचरज लोग परी गाँव धूमहीं॥ ५७८॥
आवत ही मग माँझ, छूटि गयौ तन पन, साँचौ कियौ स्याम वन, प्रगट दिखायौ है।
आय दरसन कियौ, इष्ट गुरु प्रेम भरि, नेम पर्यौ पूरौ, जाय चीरघाट न्हायौ है।।
पाछें आये लोग, शोक करत भरत नैन, बैन सब कही, कही ताहि दिन आयौ है।
भक्ति कौ प्रभाव यामें, भाव और आनौ जिनि, बिन हरिकृपा यह, कैसे जात पायौ है।। ५७९।।

१५२) (श्री भक्तमाल

श्रीगोपालदासजी, श्रीविष्णुदास जी
भक्ति भार जूड़ैं जुगल, धर्म धुरन्धर जग विदित॥
बाँबोली गोपाल, गुननि गम्भीर गुनारट।
दच्छिन दिसि विष्णुदास, गाँव काशीर भजन भट॥
भक्तनि सो यह भाय, भजै गुरु गोविन्द जैसे।
तिलक दाम आधीन, सुवर सन्तनि प्रति तैसे॥
अच्युतकुल पन एकरस, निबह्यौ ज्यौं श्रीमुख गदित।
भक्ति भार जूड़ैं जुगल, धर्म धुरन्धर जग विदित॥१५७॥

रहैं गुरूभाई, दोऊ भाई, साधुसेवा हिये, ऐसे सुखदाई नई रीति लै चलाइयै।
जायँ जा महोच्छौं में, बुलाये हुलसाये अंग, संग गाड़ी सामा सो, भण्डारी दै मिलाइयै॥
याकौ तात्पर्य्य, सन्त घटती न सही जात, बात वे न जाने, सुखमानै मन भाइयै।
बड़े गुरु सिद्ध, जग-महिमा प्रसिद्ध बोले, विनै कर जोरि, सोई कहिकै सुनाइयै॥५८०॥

चाहत महोत्छौ कियौ, हुलसत हियौ नित, लियौ सुनि बोले, करौ वेगि दै तयारियै।
चहुँदिसि डार्यौ नीर, कर्यौ न्यौतो ऐसे धीर, आवै बहु भीर, सन्त ठौरनि सँवारिये॥
आये हरिप्यारे, चारो खूँट ते निहारे नैन, जाय पगु धारे, सीस विनै लै उचारिये।
भोजन कराय दिन, पाँच लगि छाय रहे, पट पहिराय, सुख दियौ अति भारिये॥५८१॥

आज्ञा गुरु दई, भोर आवौ फिरि आस-पास, महा सुखरासि, नामदेव जू निहारिये।
उज्ज्वल वसन तन, एकले प्रसन्न मन, चले जात वेगि, सीस पाँयनि पै धारिये।
वेई दें बताय, श्रीकबीर अति धीर साधु, चले दोऊ भाई, परदच्छिना विचारियै।
प्रथम निरखि नाम, हरखि लपटि पग, लगि रहे छोड़त न, बोले सुनौ धारियै॥५८२॥

साधु अपराध जहाँ, होत तहाँ आवत न, होय सनमान सब, सन्त तहीं आइयै।
देखि प्रीति रीति, हम निपट प्रसन्न भये, लये उर लाय, जावौ श्री कबीर पाइयै॥
आगें जो निहारैं, भक्तराज दृग धारैं चलीं, बोले हँसि आप, कोऊ मिल्यौ सुखदाइयै।
कह्यौ हाँ जू मान दई, भई कृपा पूरन यों, सेवा कौ प्रताप कहौ, कहाँ लगि गाइयै॥५८३॥

मास परायण सत्तइसवाँ विश्राम

श्रीकरमैतीजी) (१५३
श्री कील्हदेवजी के शिष्यजन
कील्ह कृपा कीरति विशद्, परम पारषद सिष प्रगट।।
आसकरन रिषिराज, रूप भगवान् भक्त गुर।
चतुरदास जग अभय, छाप छीतर जू चतुरवर।।
लाखै अद्भुत रायमल, खेम मनसा क्रम वाचा।
रसिक रायमल गौर, देवा दामोदर हरिरँग राँचा।।
सबै सुमंगल दास दृढ़, धर्म धुरन्धर भजन भट।
कील्ह कृपा कीरति विशद्, परम पारषद सिष प्रगट।।१५८।।
श्रीनाथभट्टजी
रसरास उपासक भक्तराज, नाथभट्ट निर्मल वयन।।
आगम निगम पुरान, सार शास्त्रनि जु विचार्यौ।
ज्यौं पारौ दे पुटहिं, सबनि कौ सार उधार्यौ।।
श्रीरूप-सनातन जीव, भट्ट नारायण भाख्यौ।
सो सर्वसु उर साँच, जतन करि नीके राख्योँ।।
फनीवंश गोपाल सुव, रागा अनुगा कौ अयन।
रसरास उपासक भक्तराज, नाथभट्ट निर्मल वयन।।१५६।।
श्रीकरमैतीजी
कठिन काल कलियुग्ग में, करमैती निकलंक रही।।
नश्वर पति-रति त्यागि, कृष्णपद सौं रति जोरी।
सबै जगत् की फाँसि, तरकि तिनुका ज्यौं तोरी।।
निरमल कुल काँथड्या, धन्य परसा जिहिं जाई।
विदित वृन्दावन वास, सन्त मुख करत बड़ाई।।
संसार स्वाद सुख बांत करि, फेरि नहीं तिन तन चही।
कठिन काल कलियुग्ग में, करमैती निकलंक रही।।१६०।।

१५४) (श्री भक्तमाल
शेषावति नृप के, पुरोहित की बेटी जानौ, वास हो खँड़ेला, करमैती सो बखानियै।
बस्यौ उर स्याम, अभिराम कोटि काम हूँ ते, भूले धाम काम, सेवा मानसी पिछानियै।।
बीत जात जाम, तन बाम अनुकूल भयौ, फूलि-फूलि अंग, गति मति छबि सानियै।।
आयौ पति गौनो लैन, भायौ पितु-मातु हिये, लिये चित चाव पट आभरन आनियै।।५८४।।
पर्यौ सोच भारी, कहा कीजिये विचारी, हाड़-चाम सौं सँवारी देह, रति के न काम की।
तावें देवौ त्यागि, मन सोवै जनि जाग, अरे मिटै उर दाग, एक साँची प्रीति स्याम की।।
लाज कौन काज, जोपै चाहै ब्रजराज सुत, बड़ोई अकाज जोपै, करै सुधि धाम की।
जानी भोर गौनो होत, सानी अनुराग रंग, संग एक वही चली भीजी मति बाम की।।५८५।।
आधी निसि निकसी यों, बसी हिये मूरति सो, पूरति सनेह तन, सुधि बिसराई है।
भोर भये शोर पर्यौ, पर्यौ पितु-मातु सोच, करयौ लै जतन, ठौर-ठौर ढूँढि आई है।।
चारो ओर दौरे नर, आये ढिंग डुरि जानि, ऊँट के करंक मध्य देह जा दुराई है।
जग दुरगन्ध, कोऊ ऐसी बुरी लागी जामें, वह दुरगन्ध सो सुगन्ध-सी सुहाई है।।५८६।।
बीते दिन तीन, वा कंरक ही में शंक नहीं, बंक प्रीति रीति, यह कैसें करि गाइयै।
आयौ कोऊ संग, ताही संग, गंग तीर आई, तहाँ सो अन्हाई, दै भूषन वन आइयै।।
ढूँढ़त परसराम, पिता मधुपुरी आये, पते ले बताये, जाय माथुर मिलाइयै।
सघन विपिन, बह्मकुण्ड पर बर एक, चढ़ि करि देखी, भूमि अँसुवा भिजाइयै।।५८७।।
उतरिकै आय, रोय पाँय लपटाय गयौ, कटी मेरी नाक, जग मुख न दिखाइयै।
चलौ गृह वास करौ, लोक उपहास मिटै, सासु घर जावौ, मत सेवा चित लाइयै।।
कोऊ सिंह व्याघ्र अजू, वपु कौ विनास करै, त्रास मेरे होत, फिरि मृतक जिवाइयै।
बोली कही साँच, बिन भक्ति तन ऐसो जानौ, जोपै जियौ चाहौ, करौ प्रीति जस गाइयै।।५८८।।
कही तुम कटी नाक, कटै जोपै होय कहूँ, नाक एक भक्ति, नाक लोक में न पाइयै।
बरस पचास लगि, विषै ही में वास कियौ, तऊ न उदास भये, चबे को चबाइयै।।
देखे सब भोग, मैं न देखे एक, देखे स्याम, तातें तजि काम, तन सेवा में लगाइयै।
रात तें ज्यौं प्रात होत, ऐसे तम जात भयौ, दयौ लै सरूप, प्रभु गयौ हिये आइयै।।५८६।।
आये निसि घर, हरिसेवा पधराय चाय, मन को लगाय, वही टहल सुहाई है।
कहूँ जात आवत न, भावत मिलाप कहूँ, आप नृप पूछे, द्विज कहाँ? सुधि आई है।।
बोल्यौ कोऊ जन, धाम स्याम संग पागे सुनि, अति अनुरागे वेगि, खबर मँगाई है।
कहौ तुम जाय, ईश इहाँई असीस करौं, कही भूप आयौ हिये, चाह उपजाई है।।५६०।।

श्रीगंगग्वालजी) (१५५
देखी नृप प्रीति, रीति पूछी, सब बात कही, नैन अश्रुपात, वह रँगी स्याम रंग में।
बरजत आयौ भूप, जायके लिवाय ल्याऊँ, पाऊँ जोपै भाग, मेरे बढ़ी चाह अंग मे।।
कालिन्दी के तीर ठाढ़ी, नीर दृग भूप लखी, रूप कछु औरै, कहा कहैं वे उमंग में।
कियौ मने लाख बेर, ऐपै अभिलाष राजा, कीनी कुटी आये, देश भीजे सो प्रसंग में ।।५६१।।
नवाह परायण अष्टम विश्राम
श्रीखंगसेनजी कायस्थ
गोविन्दचन्द गुन ग्रथन को, खर्गसेन वानी विशद्।।
गोपी ग्वाल पितु मातु, नाम निरनै कियौ भारी।
दान केलि दीपक, प्रचुर अति बुद्धि उचारी।।
सखा सखी गोपाल, काल लीला में बितयौ।
कायथकुल उद्धार, भक्ति दृढ़ अनत न चितयौ।।
गोतमी तन्त्र उर ध्यान धरि, तन त्याग्यो मण्डल शरद्।
गोविन्दचन्द गुन ग्रथन को, खर्गसेन वानी विशद् ।। १६१।।
ग्वालियर वास, सदा रास कौ समाज करैं, सरद् उजारी अति, रंग चढ़यौ भारी है।
भाव की बढ़नि, दृग रूप की चढ़नि, ततथेई की रढ़नि, जोरी सुन्दर निहारी है।।
खेलत में जाय मिले, त्यागि तन भावना सौं, झेलत अपार सुख, रीझि देह वारी है।
प्रेम की सचाई, ताकी रीति लै दिखाई भई, भावुकनि सरसाई, बात लागी प्यारी है।।५६२।।
श्रीगंगग्वालजी
सखा श्याम मन भावतौ, गंगग्वाल गम्भीर मति ।।
श्यामा जू की सखी, नाम आगम विधि पायौ।
ग्वाल गाय ब्रज गाँव, पृथक् नीके करि गायौ ।।
कृष्ण केलि सुखसिन्धु, अघट उर अन्तर धरई।
ता रस में नित मगन, असद् आलाप न करई ।।
ब्रजवास आस ब्रजनाथ गुरू, भक्त चरणरज अननि गति।
सखा श्याम मन भावतौ, गंगग्वाल गम्भीर मति ।।१६२।।

१५६) (श्री भक्तमाल
पृथ्वीपति आयौ, वृन्दावन मन चाह, भई सारँग सुनावै कोऊ, जोरावरी ल्यायै हैं।
वल्लभ हूँ संग, सुर भरत ही छायौ रंग, अति ही रिझायौ, दृग अँसुवा बहाये हैं।।
ठाढ़ौ कर जोरि, विनै करी पै न धरी हियै, जियै ब्रजभूमि ही सो, वचन सुनाये हैं।
कैद करि साथ लिये, दिल्ली ते छुटाय दिये, हरीदास तूँवर नै, आये प्रान पाये हैं।। ५६३।।
श्रीसोतीजी
सोती श्लाघ्य सन्तनि सभा, दृतिय दिवाकर जानियो।।
परम भक्ति परताप, धर्मध्वज नेजा धारी।
सीतापति को सुजस, वदन शोभित अति भारी।।
जानकी जीवन चरण, शरण थाती थिर पाई।
नरहरि गुरू परसाद, पूत पोते चलि आई।।
राम उपासक छाप दृढ़, और न कछु उर आनियो।
सोती श्लाघ्य सन्तनि सभा, दृतिय दिवाकर जानियो।। १६३।।
श्रीलालदासजी
जीवत जस पुनि परमपद, लालदास दोनों लही।।
हृदै हरीगुन खानि, सदा सत्संग अनुरागी।
पद्मपत्र ज्यौं रह्यौ, लोभ की लहर न लागी।।
विष्णुरात सम रीति, बघेरै त्यौं तन त्याज्यो।
भक्त बरातीवृन्द, मध्य दूलह ज्यौं राज्यो।।
खरी भक्ति हरिषांपुरे, गुरुप्रताप गाढ़ी गही।
जीवत जस पुनि परमपद, लालदास दोनों लही।। १६४।।
श्रीमाधवग्वालजी
भक्तनि हित भगवत रची, देही माधवग्वाल की।।
निसिदिन यहै विचार, दास जिहि विधि सुख पावैं।
तिलक दाम सौं प्रीति, हृदै अति हरिजन भावैं।।

श्रीप्रेमनिधिजी) (१५७
परमारथ सौं काज, हिये स्वारथ नहीं जानैं।
दशधा मत्त मराल, सदा लीला गुण गानै।।
आरत हरिगुण शील सम, प्रीति रीति प्रतिपाल की।
भक्तनि हित भगवत् रची, देही माधवग्वाल की।। १६५।।
श्रीप्रयागदासजी
“श्रीअगर” सुगुरु परपात ते, पूरी परी प्रयाग की।।
मानस वाचक काय, राम चरणनि चित दीनौ।
भक्तनि सौं अति प्रेम, भावना करि सिर लीनौ।।
रास मध्य निर्जन, देह दुतिदसा दिखाई।
आड़ौ बलियौ अंक, महोच्छौ पूरी पाई।।
क्यारे कलस औली ध्वजा, विदुष श्लाघा भाग की।
“श्रीअगर” सुगुरू परताप तें, पूरी परी प्रयाग की।। १६६।।
श्रीप्रेमनिधिजी
प्रगट अमित गुन प्रेमनिधि, धन्य विप्र जिन नाम धर्यौ।।
सुन्दर शील सुभाव, मधुर वानी मंगल करू।
भक्तनि कौं सुख दैन, फल्यौ बहुधा दसधा तरू।।
सदन बसत निर्वेद, सारभुक जगत् असंगी।
सदाचार ऊदार, नेम हरिदास प्रसंगी।।
दयादृष्टि बसि आगरैं, कथा लोक पावन कर्यौ।।
प्रगट अमित गुन प्रेमनिधि, धन्य विप्र जिन नाम धर्यौ।। १६७।।
प्रेमनिधि नाम, करैं सेवा अभिराम स्याम आगरौ शहर निसि, शेष जल ल्याइयै।
बरखा सु रितु, जित तित अति कीच भई, भई चित चिन्ता, कैसे अपरसि आइयै।।

१५८) (श्री भक्तमाल
जोपै अन्धकार ही मैं, चलौं तो बिगार होत, चले यों विचारि, नीच छुवै न सुहाइयै।
निकसत द्वार, जब देख्यौ सुकुमार एक, हाथ में मशाल याके, पाछे चले जाइयै॥५६४॥
जानी यहै बात, पहुँचाये कहूँ जात यह, अबहीं विलात भले, चैन कोऊ घरी है।
जमुना लौं आयौ, अचरज सो लगायौ मन, तन अन्हवायौ मति, वाही रूप हरी है॥
घट भरि धर्यौ सीस, पट वह आय गयौ, आय गयौ घर, नहीं देखी कहा करी है।
लागी चटपटी-अटपटी न समझि परै, भटभटी भई नई, नैन नीर झरी है॥५६५॥
कथा ऐसी कहैं, जामें गहैं मन भाव भरैं, करैं कृपादृष्टि, दुष्टजन दुख पायौ है।
जायकै सिखायौ, बादशाह उर दाह भयौ, कही तिया भली को, समूह घर छायौ है॥
आये चोबदार कहैं, चलौं एही बार वारि, झारी प्रभु आगे धर्यौ, चाहै शोर लायौ है।
चले तब संग, गये पूछे नृप रंग कहा?, तियनि प्रसंग करौ?, कहिकै सुनायौ है॥५६६॥
कान्ह भगवान् ही की, बात सो बखानि कहौं, आनि बैठैं नारी-नर, लागी कथा प्यारी है।
काहू कौं बिडारैं, झिरकारैं नेकु टारैं, विषैदृष्टि कै निहारैं, ताकौं लागै दोष भारी है॥
कही तुम भली, तेरी गली ही के लोग मोसौँ, आयकै जताई वह, रीति कछु न्यारी है।
बोल्यौ याहि राखौ सब, करौं निरधार नीके, चलै चोबदार लैके, रोके प्रभु धारी है॥५६७॥
सोयौ बादशाह निसि, आयकै सुपन दियौ, कियौ वाकौ इष्टभेष, कही प्यास लागी है।
पीवौ जल कही, आबखाने लै बखाने तब, अति ही रिसाने, को पियावै कोऊ रागी है॥
फेर मारी लात, अरे सुनी नहीं बात मेरी, आप फुरमावै जोई, प्यावै बड़भागी है।
सो तौ तैं कैद कर्यौ, सुनि अरबर्यो डर्यौ, भर्यौ हिये भाव, मति, सोवत तें जागी है॥५६८॥
दौरे नर ताही समै, वेगि दै लिवाय ल्याये, देखि लपटाये पाँय, नृप दृग भीजे हैं।
साहिब तिसाये जाय, अबही पियावौ नीर, और पै न पीवैं, एक तुमही पै रीझे हैं॥
लेवौ देश गाँव सदा, पांव हीं सो लग्यौ रहौं, गहौं नहीं नेकु, धन पाय बहु छीजे हैं।
संग दै मशाल, ताही काल में पठाये यों, कपाट जाल खुले, लाल प्यायो जल धीजे हैं॥५६६॥
श्रीराघवदासजी दूबलो
दूबरो जाहि दुनियाँ कहै, सो भक्त भजन मोटौ महन्त॥
सदाचार गुरु शिष्य, त्याग विधि प्रगट दिखाई।
बाहर भीतर विशद्, लगी नहिं कलियुग काई॥

श्रीकान्हरदासजी) (१५६
राघौ रुचिर सुभाव, असद् आलाप न भावै।
कथा कीर्त्तन नेम, मिलैं सन्तनि गुन गावै॥
ताय तोलि पूरौ, निकष ज्यौं घन, अहरनि हीरौ सहन्त।
दूबरो जाहि दुनियाँ कहै, सो भक्त भजन, मोटौ महन्त॥ १६८॥
दासनि के दासत्व कौ, चौकस चौकी ये मड़ी॥
हरि नारायण नृपति, पद्म बेरछे विराजैं।
गाँव हुसंगाबाद, अटल ऊधौ भल छाजैं॥
भैलै तुलसीदास, भट ख्यात देवकल्याने।
बोहिथवीरा रामदास, सुहेलैं परम सुजाने॥
औली परमानन्द कै, ध्वजा सबल धर्म की गड़ी।
दासनि के दासत्व की, चौकस चौकी ये मड़ी॥ १६६॥
अबला शरीर साधन सबल, ये बाई हरिभजन बल।
देमा प्रगट सब दुनी, रामाबाई वीराँ हीरामनि।
लाली नीरा लक्ष्म, जुगुल पार्वती जगत् धनि॥
खीचनि केसी धना, गोमती भक्त उपासिनी।
बाँदररानी विदित, गंगा जमुना रैदासिनी॥
जेवा हरिषां जोइसिनि, कुँवरिराय कीरति अमल।
अबला शरीर साधन सबल, ये बाई हरिभजन बल॥ १७०॥
श्रीकान्हरदासजी
कान्हरदास सन्तनि कृपा, हरि हिरदै लाहौ लह्यौ॥
श्रीगुरू शरणै आय, भक्ति मारग सत जान्यौ।
संसारी धर्महिं छाँड़ि, झूठ अरु साँच पिछान्यौ॥

१६०) (श्री भक्तमाल
ज्यौं साखा द्रुम चन्द, जगत् सौं इहि विधि न्यारौ।
सर्वभूत समदृष्टि, गुननि गम्भीर अति भारौ॥
भक्त भलाई वदन नित, कुवचन कबहुँ नहीं कह्यौ।
कान्हरदास सन्तनि कृपा, हरि हिरदै लाहौ लह्यौ ॥ १७१॥
श्रीकेशवलटेरा, श्रीपरशुरामजी
लट्यौ लटेरा आन विधि, परम धरम अति पीन तन।।
कहनी रहनी एक, एक प्रभुपद अनुरागी।
जस वितान जग तन्यौ, सन्त सम्मत बड़भागी।।
तैसोइ पूत सपूत, नूत फल जैसोइ परसा।
हरि हरिदासनि टहल, कवित रचना पुनि सरसा।।
(श्री) सुरसुरानन्द सम्प्रदाय दृढ़, केसव अधिक उदार मन।
लट्यौ लटेरा आन विधि, परम धरम अति पीन तन ।। १७२ ।।
श्रीकेवलरामजी
केवलराम कलियुग्ग के, पतित जीव पावन किये।।
भक्ति भागवत विमुख, जगत् गुरू नाम न जानैं।
ऐसे लोक अनेक, ऐंचि सनमारग आनैं।।
निर्मल रति निहकाम, अजा तें सदा उदासी।
तत्वदरसी तमहरन, शील करूना की रासी।
तिलक दाम नवधारतन, कृष्ण कृपा करि दृढ़ दिये।
केवलराम कलियुग्ग के, पतित जीव पावन किये।। १७३ ।।
घर-घर जाय कहैं, यहै दान दीजै मोकौं, कृष्ण सेवा कीजै, नाम लीजै चित लायकै।
देखे भेषधारी, दस बीस कहूँ, अनाचारी दये प्रभु सेवनि कौं, रीति दी सिखायकै।।

श्रीआशकरणजी) (१६१
करुनानिधान कोऊ, सुने नहीं कान कहूँ, बैल के लगायौ साँटौ, लोटे दया आयकै।
उपट्यो प्रगट तन, मन की सचाई अहो, भये तदाकार कहौं, कैसे समुझायकै।। ६०० ।।
श्रीआशकरणजी
(श्री) मोहन मिश्रित पद कमल, आसकरन जस विस्तर्यौ ।।
धर्मशील गुनसींव, महा भागवत राजरिषि।
पृथीराज कुलदीप, भीम सुत विदित कील्ह सिषि।।
सदाचार अति चतुर, विमल वानी रचना पद।
सूरधीर ऊदार, विनै भलपन भक्तनि हद।।
सीतापति राधासुवर, भजन नेम कूरम धर्यौ।
(श्री) मोहन मिश्रित पद कमल, आसकरन जस विस्तर्यौ।। १७४।।
नरवर पुर ताकौ, राजा नरवर जानौ, मोहन जू धरि हियें, सेवा नीके करी है।
घरी दस मन्दिर में रहें, रहै चौकी द्वार, पावत न जान कोऊ, ऐसी मति हरी है।।
पर्यो कोऊ काम, आय अबहि लिवाय ल्यावौ, कहै पृथीपति, लोग कान में न धरी है।
आई फौज भारी, सुधि दीजिये हमारी सुनि, बहू बात टारी, परी अति खरबरी है।।६०१।।
कहिकै पठाई कहौ, कीजियै लराई सुनि, रुचि उपजाई चलि, पृथीपति आयौ है।
पर्यौ सोच भारी, तब बात यों विचारी, कही आप एक जावौ, गयौ अचरज पायौ है।।
सेवा करि सिद्धि, साष्टांग ह्वैकै भूमि परे, देखि बड़ी बेर, पाँव खड्ग लगायौ है।
कटि गई एड़ी, एपै टेढिहू न भौंह करी, करी नित नेम रीति, धीरज दिखायौ है।। ६०२।।
उठि चिक डारि तब, पाछें सो निहारि कियौ, मुजरा विचारि, बादशाह अति रीझे हैं।
हित की सचाई यहै, नेकु न कचाई होत, चरचा चलाई भाव, सुनि-सुनि भीजे हैं।।
बीते दिन कोऊ, नृप भक्त सो समायौ, पृथीपति दुख पायौ, सुनि भोग हरि छीजे हैं।
करैं विप्र सेवा, तिन्हें गाँव लिखि न्यारे दिये, वाके प्रान न्यारे, लाड़ करौ कहि धीजे हैं।।६०३।।
मास परायण अट्ठाईसवाँ विश्राम

१६२) (श्री भक्तमाल
श्रीहरिवंशजी
निहिकिंचन भक्तनि भजैं, हरि प्रतीति हरिवंश के।।
कथा कीर्तन प्रीति, सन्तसेवा अनुरागी।
खरिया खुरपा रीति, ताहि ज्यौं सर्वसु त्यागी।।
सन्तोषी सुठि शील, असद् आलाप न भावै।
काल वृथा नहिं जाय, निरन्तर गोविन्द गावै।।
सिष सपूत श्री रंग को, उदित पारषद अंस के।
निहिकिंचन भक्तनि भजैं, हरि प्रतीति हरवंश के।। १७५।।
श्रीकल्याणजी
हरिभक्ति भलाई गुन गम्भीर, बाँटे परी कल्यान के।।
नवलकिशोर दृढ़व्रत, अनन्य मारग इक धारा।
मधुर वचन मन हरन, सुखद जानत संसारा।।
पर उपकार विचार, सदा करुना की रासी।
मन वच सर्वसु रूप, भक्तपद रेनु उपासी।।
धर्मदास सुत शील सुठि, मन मान्यौ कृष्ण सुजान के।
हरिभक्ति भलाई गुन गम्भीर, बाँटे परी कल्यान के।। १७६।।
श्रीबीठलदासजी
बीठलदास हरिभक्ति के, दुहूँ हाथ लाडू लिये।।
आदि अन्त निर्वाह, भक्तपद रज व्रतधारी।
रह्यौ जगत् सौं ऐंड़, तुच्छ जाने संसारी।।
प्रभुता पति की पधति, प्रगट कुल दीप प्रकासी।
महत् सभा में मान, जगत् जानै रैदासी।।
पद पढ़त भई परलोक गति, गुरू गोविन्द जुग फल दिये।
बीठलदास हरिभक्ति के, दुहूँ हाथ लाडू लिये।। १७७।।

श्रीहरीदासजी) (१६३
भगवन्त रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को।।
क्वाहब श्रीरँग सुमति, सदानन्द सर्वसु त्यागी।
श्यामदास लघुलम्ब, अननि लाखै अनुरागी।।
मारू मुदित कल्यान, परस वंसी नारायन।
चेता ग्वाल गोपाल, शंकर लीला पारायन।।
सन्तसेय कारज किया, तोषत श्याम सुजान को।
भगवन्त रचे भारी भगत, भक्तनि के सनमान को।।१७८।।
श्रीहरीदासजी
तिलक दाम पर काम कौं, हरीदास हरि निर्मयो।।
सरनागत कौं सिविर दान, दधीचि टेक बलि।
परमधर्म प्रहलाद, सीस देन जगदेव कलि।
बीकावत बानैत, भक्तपंन धर्मधुरन्धर।
तूँवर कुलदीपक, सन्तसेवा नित अनुसर।।
पारथपीठ अचरज कौन, सकल जगत् में जस लियो।
तिलक दाम पर काम कौं, हरीदास हरि निर्मयो।।१७६।।
प्रह्लाद आदि भक्त, गाये गुन भागवत, सब, इकठोर आये, देखे हरिदास में।
रीझि जगदेव सो यों, कहिकै बखान कियौ, जानत न कोऊ सुनौ, कर्यौ ले प्रकास में।।
रहै एक नटी, शक्तिरूप गुन जटी गावै, लागै चटपटी, मोह पावै मृदुहास में।
राजा रिझवार, करै देवे को विचार, पै न पावै सार, काटै सीस, राख्यो तेरे पास में।।६०४।।
दियौ कर दाहिनो में, यासौं नहीं जाचौं कहूँ, सुनि एक राजा, भेदभाव सौं बुलाई है।
नृत्य करि गाई, रीझि लेवौ कही, आई देहु ओड्यौ बाँयों हाथ, रिस भरिकै सुनाई है।।
इतौ अपमान, पानि दच्छिन लै दियौ अहो, नृप जगदेव जू कौं, ऐसी कहा पाई है।
तासौं दसगुनी लीजै, मोकौं सो दिखाय दीजै, दई नहीं जाय, काहु मोहिये सुहाई है।।६०५।।
कितौ समुझावै, ल्यावौ कहै यहै जक लागी, गई बड़भागी पास, वस्तु मेरी दीजिये।
काटि दियो सीस, तन रहै ईश शक्ति लखो, ल्याई बकसीस, थार ढाँपि देखि लीजिये।

१६४) (श्री भक्तमाल
खोलिकै दिखायो नृप, मूरछा गिरायो तन, धन की न बात, अब याकौ कहा कीजिये।
मै जु दीनौ हाथ जानि, आनि ग्रीवा जोरि दई, लई वही रीझि पद, तन सुनि जीजिये।।६०६।।
सुनी जगदेव रीति, प्रीति नृपराज सुता, पिता सौं बखानि कही, वाही कौ लै दीजिये।
तबतौ बुलाये, समुझाये बहुभाँति खोलि, वचन सुनाये, अजू बेटी मेरी लीजिये।।
नट्यौ सतबार जब, कही डारौ मारि, चले मारिवे कौं बोली, वह मारौ मत भीजिये।
दृष्टि सौं न देखें, कही ल्यायौ काटि मूँड़ लाये, चाहै सीस आँखिन को, गयौ फिरि रीझियै।।६०७।।
निष्ठा रिझवार रीति, कीनी विसतार यह, सुनौ साधुसेवा, हरीदास जू ने करी है।
परदा न सन्त सौं है, देत हैं अनन्त सुख, रह्यौ सुख जानि, भक्तसुता चित धरी है।।
दोऊ मिलि सोवैं रितु, ग्रीषम की छत पर, गात पर गात सोये, सुधि नही परी है।
दातुन के करिवे को, चढ़े निसि शेष आप, चादर उड़ाय, नीचे आये ध्यान हरी है।।६०८।।
जागि परे दोऊ, अरबरे देखि चादर कौं, पेखि पहिचानी सुता, पिता ही की जानी है।
सन्त दृग नये, चले, बैठे मग पग लये, गये लै एकान्त में, यो, विनती बखानी है।।
नेकु सावधान ह्वैकै, कीजिये निशंक काज, दुष्टराज छिद्र पाय, कहैं कटु वानी है।
तुमको जु नांव धरैं, जरै सुनि हियौ मेरौ, डरैं निन्दा आपनी न, होत सुखदानी है।।६०९।।
इतनी जतावनी में, भक्ति कौं कलंक लगै, ऐपे शंक वही, साधु घटती न भाइयै।
भई लाज भारी, विषै बास धोय डारी, नीके जीके दुखरासि, चाहै कहूँ उठि जाइयै।।
निपट मगन किये, नानाविधि सुख दिये, दिये पै न जान, मिलि लालन लड़ाइयै।
गोविन्द अनुज जाके, बाँसुरी कौ साँचोपन, मन में न ल्यायो नृप इहि विधि गाइयै।।६१०।।
(किसी प्रति में यह एक अतिरिक्त छप्पय भी प्राप्त है)
श्रीगोविन्ददासजी
टेक एक वंशी तनी, जन गोविन्द की निर्वही।।
युगलचन्द किरपाल, तासु को दास कहावै।
बादशाह सौं पैज, हुकुम नहिं वेनु बजावै।।
बीकावत बानैत, भक्त पाण्डव अवतारी।
कपि ज्यौं बीरा लियो, सीस अम्बर कै झारी।।

परमधर्म पोषक संन्यायी भक्त) (१६५
पीठ परीक्षित सारका, सभा शाष सन्तन कही।
टेक एक वंशी तनी, जन गोविन्द की निर्वही॥
श्रीकृष्णदासजी
नन्दकुँवर कृष्णदास कौं, निज पग तें नूपुर दियौ॥
तान मान सुर ताल, सुलय सुन्दरि सुठि सोहै।
सुधा अंग भ्रूभंग, गान उपमा को कोहै॥
रत्नाकर संगीत, रागमाला रँगरासी।
रिझये राधालाल, भक्तपद रेनु उपासी॥
स्वर्णकार खरगू सुवन, भक्त भजनपन दृढ़ लियौ।
नन्दकुँवर कृष्णदास कौं, निज पग तें नूपुर दियौ॥१८०॥
कृष्णदास ये सुनार, राधाकृष्ण सुखसार, लियौ सेवा पाछे, नृत्य-गान बिसतारिये।
ह्वै करि मगन काहू, दिन तन सुधि भूली, एक पग नूपुर सो, गिर्यौ न सँभारिये॥
लाल अति रंग भरे, जानी गति भंग भई, पाँय निज खोलि, आप बाँध्यौ सुख भारिये।
फेरि सुधि आई, देखि धारा लै बहाई नैन, कीरति यों छाई, जग भक्ति लागी प्यारिये॥६११॥
परमधर्म पोषक संन्यासी भक्तजी
परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासी ए मुकुटमनि॥
चित्सुख टीकाकार, भक्ति सर्वोपरि राखी।
श्रीदामोदर तीर्थ, रामअर्चन विधि भाखी॥
चन्द्रोदय हरिभक्ति, नरसिंहारन कीनी।
माधौ मधूसूदन सरस्वती, परमहंस कीरति लीनी॥
प्रबोधानन्द रामभद्र, जगदानन्द कलिजुग्ग धनि।
परमधर्म प्रति पोषकौं, संन्यासी ए मुकुटमनी॥१८१॥

१६६) (श्री भक्तमाल
श्रीप्रबोधानन्दजी
श्रीप्रबोधानन्द बड़े, रसिक आनन्दकन्द, श्रीचैतन्यचन्द्र जू के, पारषद प्यारे हैं।
श्रीराधाकृष्ण कुँजकेलि, निपट नवेिल कही, झेलि रसरूप दोऊ, किये दृग तारे हैं।।
वृन्दावन वास कौ, हुलास लै प्रकास कियौ, दियौ सुखसिन्धु, कर्म धर्म सब टारे हैं।
ताहि सुनि-सुनि कोटि-कोटिजन, रंग पायौ, विपिन सुहायौ बसे, तन मन वारे हैं।।६१२।।
श्रीद्वारकादासजी
अष्टांगयोग तन त्यागियौ, द्वारकादास जानै दुनि।।
सरिता कूकस गाँव, सलिल में ध्यान धर्यौ मन।
राम चरण अनुराग, सुदृढ़ जाके साँचौ पन।।
सुत कलत्र धन धाम, ताहि सौं सदा उदासी।
कठिन मोह कौ फंद, तरकि तोरी कुल फाँसी।।
कील्ह कृपा बल भजन के, ज्ञान खड्ग माया हनी।
अष्टांगयोग तन त्यागियौ, द्वारकादास जानै दुनि।।१८२।।
श्रीपूर्णजी
पूरन प्रगट महिमा अनन्त, करिहै कौन बखान।।
उदै अस्त, परवत गहिर मधि, सरिता भारी।
जोग जुगति विश्वास, तहाँ दृढ़ आसन धारी।।
व्याघ्र सिंघ गुँजैं, खरा कछु शंक न मानै।
अर्द्ध न जातैं पौन, उलटि ऊरध कौं आनै।।
साखि शब्द निर्मल, कहा, कथिया पद निर्वान।
पूरन प्रगट महिमा अनन्त, करिहै कौन बखान।। १८३।।
श्रीलक्ष्मणभट्टजी
श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, भट्ट लक्ष्मन अनुसर्यौ।।

श्रीगदाधरदासजी) (१६७
सदाचार मुनिवृत्ति, भजन भागवत उजागर।
भक्तनि सौं अति प्रीति, भक्ति दशधा कौ आगर॥
सन्तोषी सुठि शील, हृदै स्वारथ नहिं लेसी।
परमधर्म प्रतिपाल, सन्त मारग उपदेसी॥
श्रीभागवत बखानिकै, नीर क्षीर विवरन कर्यो।
श्रीरामानुज पद्धति प्रताप, भट्ट लक्षमन अनुसर्यौ॥१८४॥
स्वामी श्रीकृष्णदासजी पयहारी
दधीचि पाछें दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति॥
कृष्णदास कलि जीति, न्यौति नाहर पल दीयौ।
अतिथि धर्म प्रतिपालि, प्रगट जस जग में लीयौ॥
उदासीनता अवधि, कनक कामिनी नहिं रात्यो।
राम चरण मकरन्द, रहत निसिदिन मद मात्यों॥
गल तें गलित, अमित गुण सदाचार सुठि नीति।
दधीचि पाछें दूसरि करी, कृष्णदास कलि जीति॥१८५॥
बैठे हे गुफा में, देखि सिंह द्वार आय गयौ, लयौ यों विचारि, हो अतिथि आज आयौ है।
दई जाँघ काटि, डारि कीजियै अहार अज, महिमा अपार, धर्म कठिन बतायौ है॥
दियौ दरसन आय, साँच में रह्यौ न जाय, निपट सचाई दुख, जान्यौ न बिलायौ है।
अन्न-जल देवे ही कौ, झींखत जगत् नर, करि कौन सकै, जन मन भरमायौ है॥६१३॥
श्रीगदाधरदासजी
भलीभाँति निर्वही भगति, सदा गदाधरदास की॥
लालविहारी जपत, रहत निसिवासर फूल्यौ।
सेवा सहज सनेह, सदा आनन्द रस झूल्यौ॥
भक्तनि सौं अति प्रीति, रीति सबही मन भाई।
आशय अधिक उदार, रसन हरि कीरति गाई॥

१६८) (श्री भक्तमाल
हरि विश्वास हिय आनिकै, सपनेहुँ आन न आस की।
भलीभाँति निर्वही भगति, सदा गदाधरदास की।। १८६।।
बुरहानपुर ढिंग, बाग तामें बैठे आय, करि अनुराग गृह, त्याग पागे स्याम सौं।
गाँव में न जात लोग, किते हा-हा खात सुख, मानि लियौ गात नहीं, काम और काम सौं।।
पर्यौ अति मेह, देह वसन भिजाय डारे, तब हरिप्यारे बोले, स्वर अभिराम सौं।
रहै एक शाह, भक्त कही जाय ल्यावौ उन्हें, मन्दिर करावौ तेरौ, भर्यौ घर दाम सौं।।६१४।।
नीठि-नीठि ल्याये, हरि वचन सुनाये जब, तब करवायौ ऊँचौ, मन्दिर सँवारिकै।
प्रभु पधराये, नाम लाल औ विहारी स्याम, अति अभिराम रूप, रहत निहारिकै।।
करैं साधुसेवा, जामें निपट प्रसन्न होत, बासी न रहत अन्न, सोवैं पात्र झारिकै।
करत रसोई जोई, राखी ही छिपाय सामा, आयै घर सन्त आप, कही जिंवावौ प्यारिकै।।६१५।।
बोल्यौ प्रभु भूखे रहें, ताके लिये राख्यो कछु, भाष्यो तब आप काढौ, भोर और आवैगौ।
करिकै प्रसाद दियौ, लियौ सुख पायौ सबै, सेवा रीति देखि कही, जग जस गावैगौ।।
प्रात भये भूखे हरि, गये तीन जाम ढरि, रहे क्रोध भरि, कहें कब धौं छुटावैगौ।
आयौ कोऊ ताही समैं, दो सत रूपैया धरे, बोले गुरु सीस, लैकै मारौ कितौ मारैगौ।।६१६।।
डर्यौ वह शाह, मति मोपै कछु कोप कियौ, कियौ समाधान सब, बात समुझाई है।
तबतौ प्रसन्न भयौ, अन्न लगै जितौ जितौ, देत सेवासुख लेत, साधु रूचि उपजाई है।।
रहे कोऊ दिन, पुनि मधुपूरी वास लियो, पियौ ब्रजरस लीला, अति सुखदाई है।
लाल लै लड़ाये, सन्त नीके भुगताये गुन, जाने जिते गये मति सुन्दर लगाई है।। ६१७ ।।
श्रीनारायणदासजी
हरिभजन सींव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ।।
भक्ति जोग जुत सुदृढ़, देह निज वश करि राखी।
हिये स्वरूपानन्द, लाल जस रसना भाखी ।।
परिचै प्रचुर प्रताप, जानमनि रहस सहायक।
श्रीनारायण प्रगट, मनौ लोगनि सुखदायक ।।
नित सेवत सन्तनि सहित, दाता उत्तर देसगति।
हरिभजन सींव स्वामी सरस, श्रीनारायणदास अति ।। १८७ ।।

श्रीकल्याणजी) (१६६
आये बद्रीनाथ जू तें, मथुरा निहारि नैन, चैन भयौ रहें, जहाँ केसौ जू कौ द्वार है।।
आवैं दरसनी लोग, जूतनि कौ सोग हिये, रूप कौ न भोग, होत कियौ यों विचार है।।
करें रखवारी, सुख पावत हैं भारी, कोऊ जानै न प्रभाव, उर भाव सो अपार है।
आयौ एक दुष्ट, पोट पुष्ट सो तौ सीस दई, लई चले मग, ऐसौ धीरज कौ सार है।।६१८।।
कोऊ बड़ौ नर, देखि मग पहिचानि लिये, किये परनाम भूमि, परि भरि नेह कौ।
जानिकै प्रभाव, पाँव लीने महादुष्ट हूँ नै, कष्ट अति पायो, छूट्यौ अभिमान देह कौ।।
बोले आप चिन्ता जिनि, करौ तेरौ काम होत, नैन नीर सोत, मुख देखौं नही गेह कौ।
भयौ उपदेस, भक्ति देस, उन जान्यौ साधु, शक्ति कौ विशेष, इहाँ जानौ भाव मेह कौ।।६१९।।
श्रीभगवानदासजी
भगवानदास श्रीसहित नित, सुहृद् शील सज्जन सरस ।।
भजन भाव आरूढ़, गूढ़ गुन बलित ललित जस।
श्रोता श्रीभागवत, रहसि ज्ञाता अक्षर रस।।
मथुरापुरी निवास, आस पद सन्तनि इक चित।
श्रीजुत खोजी श्याम, धाम सुखकर अनुचर हित।।
अति गम्भीर सुधीर मति, हुलसत मन जाके दरस।
भगवानदास श्री सहित नित, सुहृद शील सज्जन सरस ॥१८८॥
जानिवे कौं पन, पृथीपति मन आई यों, दुहाई लै दिवाई, माला तिलक न धारियै।
मानि आनि प्रान लोभ, केतिकनि त्याग दिये, छिपे नहीं जात, जानी वेगि मारि डारियै।।
भगवानदास उर, भक्ति सुखरासि भर्यौ, कर्यौ लै सुदेश, देश रीति लागी प्यारियै।
रीझ्यौ नृप, देखि रीझि मथुरा निवास पायौ, मन्दिर करायौ, हरिदेव सौं निहारियै ।। ६२० ।।
श्रीकल्याणदासजी
भक्तपक्ष उद्दारता, यह निवही कल्यान की।।
जगन्नाथ कौ दास, निपुन अति प्रभु मन भायौ।
परम पार्षद समुझि, जानि प्रिय निकट बुलायौ ।।

१७०) (श्री भक्तमाल
प्रान पयानौ करत, नेह रघुपति सौं जोर्यौ।
सुत दारा धन धाम, मोह तिनका ज्यौं तोर्यौ॥
कौंधनी ध्यान उर में बस्यौ, राम नाम मुख जानकी।
भक्तपक्ष उद्दारता, यह निवही कल्यान की॥१८६॥
श्रीसन्तदासजी, श्रीमाधवदासजी
सोदर सोभूराम के, सुनौं सन्त तिनकी कथा॥
सन्तदास सद्वृत्ति, जगत् छोई करि डार्यौ।
महिमा महा प्रवीन, भक्तवित धर्म विचार्यौ॥
बहुर्यो माधवदास, भजन बल परचौ दीनौ।
करि जोगिन सौं वाद, श्वसन पावक प्रति लीनौ॥
परम धर्म विस्तार हित, प्रगट भये नाहिन तथा।
सोदर सोभूराम के, सुनौ सन्त तिनकी कथा॥१६०॥
श्रीजसवन्तजी
बूड़िये विदित कन्हर कृपाल, आत्माराम आगम दरसि॥
कृष्ण भक्ति को थम्भ, ब्रह्मकुल परम उजागर।
क्षमा शील गम्भीर, सर्व लच्छन कौ आगर॥
सर्वसु हरिजन जानि, हृदै अनुराग प्रकासै।
असन वसन सनमान, करत अति उज्ज्वल आसै॥
सोभूराम प्रसाद तें, कृपादृष्टि सब पर बरसि।
बूड़िये विदित कन्हर कृपाल, आत्माराम आगम दरसि॥१६१॥
श्रीगोविन्ददासजी ''भक्तमाली''
भक्तरत्न माला सुधन, गोविन्द कण्ठ विकास किय॥