सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

श्रीगंगग्वालजी) (१५५
देखी नृप प्रीति, रीति पूछी, सब बात कही, नैन अश्रुपात, वह रँगी स्याम रंग में।
बरजत आयौ भूप, जायके लिवाय ल्याऊँ, पाऊँ जोपै भाग, मेरे बढ़ी चाह अंग मे।।
कालिन्दी के तीर ठाढ़ी, नीर दृग भूप लखी, रूप कछु औरै, कहा कहैं वे उमंग में।
कियौ मने लाख बेर, ऐपै अभिलाष राजा, कीनी कुटी आये, देश भीजे सो प्रसंग में ।।५६१।।
नवाह परायण अष्टम विश्राम
श्रीखंगसेनजी कायस्थ
गोविन्दचन्द गुन ग्रथन को, खर्गसेन वानी विशद्।।
गोपी ग्वाल पितु मातु, नाम निरनै कियौ भारी।
दान केलि दीपक, प्रचुर अति बुद्धि उचारी।।
सखा सखी गोपाल, काल लीला में बितयौ।
कायथकुल उद्धार, भक्ति दृढ़ अनत न चितयौ।।
गोतमी तन्त्र उर ध्यान धरि, तन त्याग्यो मण्डल शरद्।
गोविन्दचन्द गुन ग्रथन को, खर्गसेन वानी विशद् ।। १६१।।
ग्वालियर वास, सदा रास कौ समाज करैं, सरद् उजारी अति, रंग चढ़यौ भारी है।
भाव की बढ़नि, दृग रूप की चढ़नि, ततथेई की रढ़नि, जोरी सुन्दर निहारी है।।
खेलत में जाय मिले, त्यागि तन भावना सौं, झेलत अपार सुख, रीझि देह वारी है।
प्रेम की सचाई, ताकी रीति लै दिखाई भई, भावुकनि सरसाई, बात लागी प्यारी है।।५६२।।
श्रीगंगग्वालजी
सखा श्याम मन भावतौ, गंगग्वाल गम्भीर मति ।।
श्यामा जू की सखी, नाम आगम विधि पायौ।
ग्वाल गाय ब्रज गाँव, पृथक् नीके करि गायौ ।।
कृष्ण केलि सुखसिन्धु, अघट उर अन्तर धरई।
ता रस में नित मगन, असद् आलाप न करई ।।
ब्रजवास आस ब्रजनाथ गुरू, भक्त चरणरज अननि गति।
सखा श्याम मन भावतौ, गंगग्वाल गम्भीर मति ।।१६२।।