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शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary

गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा

DevanagariSanskritpublished35 पृष्ठ

१. स्तुति-प्रारम्भ एवं ईश्वर-स्वरूप (श्लोक १-१०)

भाषा-टीका-सहितम् ५
महोक्षः खट्वांगम्परशुरजिनं भस्म फणिनः ।
कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ॥
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्रू प्रणिहिताम् ।
न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति ।८।
हे वरद ! महोक्ष (बैल), खाट का पाया, परशु, गजचर्म, भस्म,
सर्प, कपाल इत्यादि आपकी धारण सामग्रियाँ हैं, परन्तु उन ऋद्धियों
को जो आपकी कृपा से प्राप्त देवता लोग भोगते हैं, आप क्यों नहीं
भोगते ! स्वात्माराम (आत्मज्ञानी) को विषय (रूपरसादि) रूपी
मृगतृष्णा नहीं भ्रमा सकती है ॥ ८ ॥
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध्रुवमिदम् ।
परोध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ॥
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैर्विस्मित इव ।
स्तुवञ्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।६।
हे पुरमथन ! सांख्य मतानुयायी "नह्यसत उत्पत्तिः सम्भवति"
के अनुसार जगत् को ध्रुव (नित्य), बुद्धिमतानुयायी अध्रुव (क्षणिक)
तार्किकजन नित्य (आकाश आदि पञ्च और पृथिव्यादि परमाणु
और अनित्य कार्यद्रव्य) दोनों मानते हैं । इन मतान्तरों से विस्मित
मैं भी आपकी स्तुति करता हुआ लज्जित नहीं होता, क्योंकि वाचा-
लता लज्जा को स्थान नहीं देती ॥ ६ ॥

६ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः ।
परिच्छेत्तुं यातावनलमनिलस्कन्धवपुषः ॥
ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत् ।
स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।१०।
हे गिरीश (गिरि में शयन करने वाले), तेजपुंज आपकी विभूति
को ढूंढने के लिए ब्रह्मा आकाश तक और विष्णु पाताल तक जाकर
भी उसे पाने में असमर्थ रहे, तत्पश्चात् उनकी कायिक, मानसिक
और वाचिक सेवा से प्रसन्न होकर आप स्वयं प्रकट हुए, इससे यह
निश्चित् है कि आपकी सेवा से ही सब सुलभ है ॥ १० ॥
अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम् ।
दशास्यो यद्वाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ॥
शिरः पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबलेः ।
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ।११।
हे त्रिपुरहर ! मस्तकरूपी कमल की माला को जिस रावण ने
आपके कमलवत् चरणों में अर्पणकर के त्रिभुवन को निष्कण्टक
बनाया था तथा युद्ध के लिए सर्वदा उत्सुक रहने वाली भुजाओं को
पाया था, वह आपकी अविरल भक्ति का ही परिणाम था ॥ ११ ॥

भाषा-टीका-सहितम् ७
अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम् ।
बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौविक्रमयतः ॥
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि ।
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितोमुह्यति खलः ॥१२॥
रावण द्वारा उन्हीं भुजाओं से जिन्होंने आपकी सेवा से बल प्राप्त
किया था, आपके घर कैलास को उखाड़ने के लिए हठात् प्रयोग
करते ही आपके अँगूठे के अग्र भाग के संकेत मात्र पाताल में गिरा,
निश्चय ही खल उपकार भूल जाते हैं ॥ १२ ॥
यदृद्धि सुत्राम्णो वरद ! परमोच्चैरपि सती- ।
मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः ॥
नतच्चित्रं तस्मिन्व्रिवसिरित्वच्चरणयोः ।
न कस्याप्युन्नतयै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥
हे वरद ! वाणासुर ने आपको नमस्कार मात्र से इन्द्र की सम्पत्ति
को नीचा दिखलाने वाली सम्पत्ति प्राप्त किया था और त्रिभुवनको
अपना परिजन बना लिया था । यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि
आपके चरणों में नमस्कार करना किस उन्नति का कारण नहीं होता
है ॥ १३ ॥
अकाण्ड : ब्रह्माण्ड क्षयचकितदेवासुरकृपा ।
विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः ॥

८ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपिश्लाघ्यो भुवनभयभंगव्यसनिनः ।१४।
हे त्रिनयन ! सिन्धु विमंथन से उत्पन्न कालकूट से असमय में
ब्रह्माण्ड के नाश से डरे हुए सुर व असुरों पर कृपा करके एवं संसार
को बचाने की इच्छा से उसको (काल कूट को) पान करने से आपके
कण्ठ की कालिमा भी शोभा देती है। ठीक ही है, जगत् के उपकार
की कामना वाले दूषण भूषण समझे जाते हैं ॥ १४ ॥
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे ।
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ॥
स पश्यन्तीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत् ।
स्मरःस्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।१५।
जो विजयी कामदेव अपने बाणों द्वारा जगत् के देव, मनुष्य और
राक्षसों को जीतने में सर्वथा समर्थ रहा, उसी कामदेव अन्य देवों के
समान आपको भी समझा, जिससे वह स्मरण मात्र के लिये ही रह
गया (दग्ध हो गया), जितेन्द्रियों का अनादर करना अहितकारक ही
होता है ॥ १५ ॥
मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदम् ।
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ॥

भाषा-टीका-सहितम् ६
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा ।
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ १६ ॥
हे ईश ! आप जगत् की रक्षा के लिए राक्षसों को मोहित करके
नाश के लिए नृत्य करते हो, तब भी संसार का आपके ताण्डव से दुःख
दूर होता है, क्योंकि आपके चरणों के आघात से पृथ्वी धँसने लगती
है, विशाल बाहुओं के संघर्ष से नक्षत्र आकाश पीड़ित हो जाता है
तथा आपकी चंचल जटाओं से ताड़ित हुआ स्वर्ग लोक भी कम्पाय-
मान हो जाता है । ठीक ही है, उपकार भी किसी के लिए अहितकारक
हो जाता है ॥ १६ ॥
वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः ।
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ॥
जगद्द्दीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि-
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः ॥ १७ ॥
हे ईश ! तारा गणों की कान्ति से अत्यन्त शोभायमान आकाश
में व्याप्त तथा भूलोक को चारों ओर से घेरकर जम्बू द्वीप बनाने वाली
गङ्गा का जल-प्रवाह आपके जटाकपाट में बूँद से भी लघु देखा जाता
है । इतने से ही आपके दिव्य तथा श्रेष्ठ शरीर की कल्पना की जा
सकती है ॥ १७ ॥

१० शिवमहिम्नस्तोत्रम्
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा-
रथांगेचन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ॥
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधि-
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ।१८।
हे ईश ! तृण के समान त्रिपुर को जलाने के लिए पृथ्वी को
रथ, ब्रह्मा को सारथी, हिमालय को धनुष, सूर्य-चन्द्र को रथ का
चक्र तथा विष्णु को विषधर बाण बनाना आपका आडम्बर मात्र
है । विचित्र वस्तुओं से क्रीडा करते हुए समर्थों की बुद्धि स्वतन्त्र
होती है ।। १८ ।।
हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो-
र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ।।१९।।
हे त्रिपुरहर ! विष्णु आपके चरणों में प्रति दिन सहस्र कमलों
का उपहार देते थे । एक दिन एक की कमी होने के कारण उन्होंने
अपने एक कमलवत् नेत्र को निकाल कर पूरा किया । यह भक्ति की
चरम सीमा चक्र के रूप में आज भी संसार की रक्षा किया करती
है ।। १९ ।।
ऋतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् ।
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥

भाषा-टीका-सहितम् ११
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् ।
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥२०॥
हे त्रिपुरहर ! आप ही को यज्ञ के फल का दाता समझ कर, वेद
में दृढ़ विश्वास कर मनुष्य कर्मों का आरम्भ करते हैं । क्रिया रूप
यज्ञ के समाप्त होने पर आपही फल देने वाले रहते हैं । आपकी
आराधना के बिना नष्ट कर्म फलदायक नहीं होता ॥ २० ॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-
मृषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥
हे शरणद ! कर्मकुशल यज्ञपति दक्ष के यज्ञ के ऋषिगण ऋत्विज,
देवता सदस्य थे । फिर भी यज्ञ के फल देने वाले आप की अप्रसन्नता
से वह ध्वंस हो गया । निश्चय है कि आप में श्रद्धा-रहित किया गया
यज्ञ नाश के लिए ही होता है ॥ २१ ॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरम् ।
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ॥
धनुःपाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुम् ।
त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥

१२ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
हे नाथ ! काल से प्रेरित मृगरूप धारण किये ब्रह्मा को भय से
मृगीरूपी धारण करने वाली अपनी कन्या में आसक्त देख, आपका
उनके पीछे छोड़ा गया बाण आर्द्रा आज भी नक्षत्र रूप में मृगशिरा
(ब्रह्मा) के पीछे वर्तमान है ॥ २२ ॥
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत् ।
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वापुरमथन पुष्पायुधमपि ॥
यदिस्त्रैणं देवो यमनिरतदेहार्ध-घटनाद् ।
अवैति त्वामद्धावत वरद मुग्धा युवतयः ॥२३॥
हे यम-नियम वाले त्रिपुरहर ! आपकी कृपा से आपका अर्धस्थान
प्राप्त करने वाली, अपने सौन्दर्य रूपी धनुष को धारण करने वाले
कामदेव को जला हुआ देखकर भी यदि पार्वती आपको अपने अधीन
समझें तो ठीक ही है, क्योंकि प्रायः युवतियाँ ज्ञान-हीन होती
हैं ॥ २३ ॥
स्मशानेष्वाक्रीडारमरहर पिशाचाः सहचरा-
श्चिताभस्मालेपः स्रगपि नृकरोटीपरिकरः ॥
अमंगल्यं शीलं तव भवतु ना मैवमखिलम्
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि ॥ २४ ॥
हे स्मरहर ! आपका स्मशान में क्रीडा करना, भुत-प्रेत पिशा-
चादि को साथ रखना, शरीर में चिता-भस्म का लेपन करना तथा