सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary

गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा

DevanagariSanskritpublished35 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 35 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

भाषा-टीका-सहितम् ११
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् ।
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥२०॥
हे त्रिपुरहर ! आप ही को यज्ञ के फल का दाता समझ कर, वेद
में दृढ़ विश्वास कर मनुष्य कर्मों का आरम्भ करते हैं । क्रिया रूप
यज्ञ के समाप्त होने पर आपही फल देने वाले रहते हैं । आपकी
आराधना के बिना नष्ट कर्म फलदायक नहीं होता ॥ २० ॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता-
मृषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥
हे शरणद ! कर्मकुशल यज्ञपति दक्ष के यज्ञ के ऋषिगण ऋत्विज,
देवता सदस्य थे । फिर भी यज्ञ के फल देने वाले आप की अप्रसन्नता
से वह ध्वंस हो गया । निश्चय है कि आप में श्रद्धा-रहित किया गया
यज्ञ नाश के लिए ही होता है ॥ २१ ॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरम् ।
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ॥
धनुःपाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुम् ।
त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥