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सर्वकोश
शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary

गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा

DevanagariSanskritpublished35 पृष्ठ

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पृष्ठ 12

१० शिवमहिम्नस्तोत्रम्
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा-
रथांगेचन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ॥
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधि-
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ।१८।
हे ईश ! तृण के समान त्रिपुर को जलाने के लिए पृथ्वी को
रथ, ब्रह्मा को सारथी, हिमालय को धनुष, सूर्य-चन्द्र को रथ का
चक्र तथा विष्णु को विषधर बाण बनाना आपका आडम्बर मात्र
है । विचित्र वस्तुओं से क्रीडा करते हुए समर्थों की बुद्धि स्वतन्त्र
होती है ।। १८ ।।
हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो-
र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ।।१९।।
हे त्रिपुरहर ! विष्णु आपके चरणों में प्रति दिन सहस्र कमलों
का उपहार देते थे । एक दिन एक की कमी होने के कारण उन्होंने
अपने एक कमलवत् नेत्र को निकाल कर पूरा किया । यह भक्ति की
चरम सीमा चक्र के रूप में आज भी संसार की रक्षा किया करती
है ।। १९ ।।
ऋतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् ।
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥