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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

About this granth

The Shatapatha Brahmana (शतपथ ब्राह्मण), the Brahmana of the White Yajurveda, is the largest and most important work of Vedic prose. Named for its hundred chapters and linked by tradition to the sage Yajnavalkya, it has fourteen books in the Madhyandina recension. It explains the procedure and meaning of the new- and full-moon offerings, the setting up of the fires, the agnihotra, the soma sacrifice, the building of the fire altar and the horse sacrifice, and its final part contains the Brihadaranyaka Upanishad. The first book includes the well-known story of Manu and the fish in the great flood.

This is the first of three volumes. The text follows Albrecht Weber's edition, with the Hindi translation (Ratnadipika) of Pandit Gangaprasad Upadhyaya, edited by Swami Satyaprakash Saraswati. Introductions on the Brahmanas and on the accent marks, a note on the translation, an English preface and contents precede the text, which runs by kanda, adhyaya and brahmana. This scan is of the 2014 Govindram Hasanand edition, 699 pages.

Page 699Permalink

·कां० ४, अ० ६, ब्रा० ६, कं० १६-२५. शतपथब्राह्मण / ६८१
प्रकार वह मानुषी वाणी के लिए कल्याण चाहता है ॥१६॥
अब वाकोवाक्य के रूप में ब्रह्मोद्य पड़ते हैं। उनको सभी कुछ प्राप्त हो जाता है, सब जीत
लिया जाता है जो सत्र में बैठते हैं। इन्होंने यजुओं से यज्ञ किया, इतना उनको मिल गया, इतना
प्राप्त हो गया। उन्होंने ऋचाएँ पढ़ीं, उनको इतना मिल गया, इतना प्राप्त हो गया। उन्होंने
साम से स्तुति की, उनको इतना मिल गया, इतना प्राप्त हो गया। परन्तु इतना नहीं मिला,
इतना नहीं प्राप्त हुआ अर्थात् वाकोवाक्य या ब्राह्मण, इसको वे इसके द्वारा प्राप्त करते हैं ॥२०॥
औदुम्बरी के पास पहुँचकर वे वाणी को रोक लेते हैं। जो वाणी से यज्ञ करते हैं वे यज्ञ
को दुह लेते या चूस लेते हैं, क्योंकि वाणी यज्ञ है। इससे पहले हर एक वाणी को रोककर बैठता
है अर्थात् उसको प्रबल बनाता है। इस रुकी हुई और प्रबल हुई वाणी के द्वारा वे अन्त के दिन यज्ञ
करते हैं। परन्तु इस वाकोवाक्य में समस्त वाणी थक जाती है। वे सब इस वाणी को चुप होकर
शक्तिशाली करते हैं। इस प्रकार प्रबल और शक्ति-सम्पन्ना वाणी से वे अतिरात्र करते हैं ॥२१॥
औदुम्बरी को छूकर बैठते हैं। अन्न शक्ति है। उदुम्बर शक्ति है। उदुम्बर से ही वे
वाणी को शक्ति देते हैं ॥२२॥
सूर्यास्त पर वे सदस् से पूर्व की ओर बाहर आते हैं, और हविर्धान के सामने आहवनीय
के पीछे बैठते हैं। जब वे चुपचाप बैठे होते हैं तो प्रतिप्रस्थाता उनके चारों ओर वस्तीवरी जलों
को फिराता है। जिस कामना के लिए उन्होंने यह सत्र रचा उसी कामना से उनको इस वाणी को
छोड़ना चाहिए (अर्थात् मौन तोड़ते समय उसी समय बात को कहना चाहिए)। क्योंकि पहले
समय में ऋषियों ने भिन्न-भिन्न कामनाओं से सत्र किये थे अर्थात् यह हमारी इच्छा है, हमको
यह मिले इत्यादि। और यदि उनकी कामनाएँ अनेक हों अर्थात् लोक की कामना, सन्तान की
कामना या पशुओं की कामना, तो—॥२३॥
'भूः भुवः स्वः' कहकर मौन तोड़ना चाहिए। इस प्रकार सत्य के द्वारा वाणी को शक्ति-
शाली बनाते हैं, और इसी शक्तिशाली वाणी से आशीर्वाद देते हैं। "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याम"
(यजु० ८।५३)—"हम सन्तानवाले हों।" इससे सन्तान की प्रार्थना करते हैं। "सुवीराः वीरैः"
(यजु० ८।५३)—"वीर पुरुषों से युक्त हों।" इससे वीर पुरुषों के लिए प्रार्थना करते हैं।
"सुपोषाः पोषैः" (यजु० ८।५३)—"सम्पत्तिशाली हों।" इससे सम्पत्ति के लिए प्रार्थना ॥२४॥
अब गृहपति सुब्रह्मण्या को पढ़ता है, या वह पुरुष जिसको गृहपति नियुक्त कर दें। कुछ
लोग सुब्रह्मण्या को पृथक्-पृथक् पढ़ते हैं, परन्तु गृहपति को ही सुब्रह्मण्या पढ़नी चाहिए या उसको
जिसे गृहपति आज्ञा दे। (अतिरात्र भोज में) निमंत्रण की इच्छा करके वे आग पर समिधाएँ
रख देते हैं ॥२५॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका'
भाषा व्याख्या का ग्रहनाम चतुर्थ काण्ड समाप्त हुआ।
चतुर्थ काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [४. २. १] १३६
द्वितीय [४. ३. ३] १३६
तृतीय [४. ४. ४] १२२
चतुर्थ [४. ५. ८] १२५
पञ्चम [४. ६ ६] १२६
योग ६४८
पूर्व के काण्डों का योग २२४६
पूर्णयोग २८९४