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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages
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( ६४ ) तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्‍घाटन
कीय ( जो उस लोकमें उत्पन्न हुआ है-) शरीर के द्वारा उस
के स्वर्ग नरक आदि रूप फलोंका उपभोग होता है ।
सब आत्माओंके समान देश होने परभी लिङ्ग या स्थूल
शरीर किसी एकही आत्मासे सम्बन्ध किस प्रकार करता है ?
और किस रीति पर भिन्न २ शरीर पृथक् २ आत्माओंको
कृतकर्म या कर्म सम्बंधी बना देते हैं ? तथा किस चाल पर
अलग २ आत्मा, फलों का उपभोग कर लेते हैं ? इन विचित्र
प्रश्नोंका उत्तर यही देते हैं कि-पृथक् २ मनों या लिङ्ग शरी-
रोंका सम्बन्ध, पृथक् आत्माओंके साथ अनादि कालसे चला
आता है,एक मन या लिङ्ग शरीरका सभी आत्माओंसे समान
रूप से संयोग होने परभी अपने आत्मा से उसका विलक्षण
सम्बंध है, उसी के कारण उसके द्वारा अपने ही नियत आत्म-
मा को फलोपभोग करता है,अन्य आत्माभी उसी प्रकार से
भिन्न २ देशीय अपने २ लिङ्ग शरीरोंके द्वारा उपभोग करते हैं
मोक्षके पश्चात् लिङ्ग शरीरका नाश होजाता है, उसकी
स्थिति का काल आत्माको संसारके सम्बन्धके आरम्भसे मोक्ष
होने तक ही है, नैयायिक तथा वैशेषिक दर्शनके मतमें मन
नित्य है, और सब इन्द्रिय अनित्य हैं, इस कारण मोक्षके
अनन्तर मन निष्फलही उड़ता फिरता है, और अमुक्त आत्मा
बहुत हैं, किन्तु उनके प्रति नियत मन पृथक् २ हैं, इसलिए
उनके साथ उस अनाथ मनका उपयोग नहीं ।
उसका नाश इसलिए नहीं मानते कि-उनके मतमें पर-
माणु रूप सब द्रव्य नित्य हैं उनका नाश नहीं होता है । यही
सिद्धान्त मनके नाश माननेमें गले पड़कर उन्हें उसके नाश
मानने से हटा देता है ।
सांख्यने न्याय वैशेषिक के समान आत्मामें ऽज्ञान, इच्छा,

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तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ६५ )
प्रयत्न, सुख, दुःख, द्वेष, तथा धर्म अधर्म साक्षात् सम्बन्ध से
स्वीकार न कर उसको शुद्ध स्फटिक पाषाण के समान स्वच्छ
या निर्गुण माना है, उस में ज्ञानादि गुणों का सम्बन्ध
ऐसा स्वीकार किया है, जैसा कि-लाल पुष्प पर काच या स्फ-
टिक धरनेसे उसमें साक्षात् जैसा लाल रङ्ग प्रतीत होने लगता
है, किन्तु वास्तविक नहीं, परमार्थतः- उनके मतमें अन्तःकरण
में ही उक्त सब गुण रहते हैं, उससे वह अन्य दोनों दर्शनों में
जो कई एक झंझट उपस्थित हो जाते हैं, उनसे बच जाता है
उनके मत में आत्मा में ज्ञानादि गुण मनके साथ इस प्रकार
चलते रहते हैं, जैसे-किसी सूत्र में कोई जलका बिन्दु हो, और
उस पर उसी सूत्र में मणिक या गोली पोई (प्रोत) हुई हो,
जिसके चलाने से सूत्र के भीतर रह करभी वह जलविन्दु गोली
के साथ सरकता रहे, किन्तु पीछे या अन्यत्र नहीं रहता, इस
चाल पर वह विन्दु सूत्र और गोली दोनों के ही भीतर रहा
हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि-गोली के भीतर सूत्र और सूत्र
में विन्दु है। परन्तु सांख्यवालों ने समझा कि-“जब गोली के
भी भीतर है, और उसके गमनके साथ ही वह चलता है तथा
उससे अतिरिक्त वह कहीं मिलता भी नहीं” तो उसको उस
सूत्र का धर्म न मानकर उस गोली का ही धर्म क्यों न माना
जावे? तथा जिस आत्म देश में पहिले किसी वस्तुका अनुभव
उत्पन्न होकर उससे उत्पन्न हुए भावना संस्कार के द्वारा जो
फिर उसी वस्तुका स्मरण होता है, वह आत्मा के देशान्तर में
ही होता है, जहां स्मरण काल में उसका लिङ्ग शरीर रहे, उसी
प्रकार लिङ्ग शरीर के देशमें आत्मा ज्ञानवान् है और अन्य
देश में ज्ञान शून्य, यह द्विविध भाव भी सांख्योंको मानना

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( ६६ ) तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन
न होगा, क्यों कि-यह एकान्त रूपसे ज्ञानादि गुणोंको अन्तः-
करण सम्बन्धी मान कर आत्मा को निर्गुणमात्र कहते हैं, सब
देश में आत्मा एकसा होने से द्वैविध्य नहीं आता है।
(विद्यामार्तण्ड )
सीताराम शर्मा शास्त्री ।

यह निबन्ध "सारस्वत" अलीगढ़ के भाग ५ अङ्क २-३
में प्रकाशित हो चुका है।

The University Library,
ALLAHABAD
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Accession No. 57148
Section No. 120 / 5
(Form No. 30.)