सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
पण्डित सीताराम शास्त्रि सम्पादित
हिन्दी-सांख्यदर्शन
मूलग्रन्थ सहित
श्रीहरियाणा-शेखावाटी ब्रह्मचर्याश्रमाध्यक्ष-
पण्डित सीताराम शास्त्रि सम्पादित
HINDI SANKHYADARSHANA.
EDITED AND ANNOTATED
VIDYAMARTANDA
Principal, Shrehariana shekhawati Brahmacharyashram
Printed by P. Magni Rama S. Dhrama Press Meerut.
भूमिका
“हिन्दोसांख्य”
लिये इसके
सांख्य के छः (६) दर्शनों में सांख्य दर्शन सब से प्राचीन
और गिना जाता है। इस दर्शन के आविष्कार के कर्त्ता महा-
मुनि कपिलदेव जी हुवे हैं, जो भगवान् के २४ अवतारों में
से अन्यतम अवतार हैं।
“पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् ।
प्रोवाचासुरये सांख्यं तत्वग्रामविनिर्णयम् ॥”
[ श्री० भा० १, ३, १० ]
अर्थात्-५ वां कपिल नाम सिद्धेश्वर अवतार हुआ,
जिसने काल से विलुप्त सांख्य शास्त्र को,-जिस में तत्वों के
समूह का निर्णय किया गया है, आसुरि नाम अपने शिष्य
को पढ़ाया।
इस वाक्य के “कालविप्लुतम्” इस पद से यह भी
निर्णय होता है, कि कपिल देव से पहिले भी सांख्य शास्त्र
था, किन्तु वह काल से विलुप्त हो गया था। तथा यह भी
कि आप का प्रथम शिष्य आंसुरि हुआ।
भगवान् कपिल देव सांख्य शास्त्र के आविष्कार या
पुनरुद्धार करने वाले, स्वायंभुव मनु के दौहित्र और कर्दम
महर्षि के पुत्र थे। स्वायंभुव मनु १४ मनुओं में आद्य मनु थे,-
“स्वायंभुवो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् ।
आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥”
( रघुवं० १, )
उन्हों ने अपनी कन्या देवहूति नाम की कर्दम ऋषि से
विवाही थी। स्वायंभुव मनु ब्रह्मावर्त्त देश में बाहिष्मती नाम
नगरी में रहते थे, और सप्तद्वीपा पृथिवी के सम्राट् थे। कर्दम
( २ )
महर्षि सरस्वती नदी के तीर पर बिन्दुसर
थे । उक्त मनु ने अपने स्थान से अपनी महारा
के साथ अपनी उक्त कन्या को रथ में बिठा कर व
के स्थान में ) जाकर ब्राह्म-विवाह-विधि से, जो सब ।
में प्रथम ( उत्तम ) कहा गया है, उस के साथ व्याह दी
फिर समय पाकर कर्दम के वीर्य से देवहूति में ६ कन्याएं
हुईं । पुनः देवहूति के प्रार्थनानुसार बहुत काल के पश्चात्
भगवान् के अंश से कपिल नाम पुत्र हुआ ।
“तस्यां बहुतिथेकाले भगवान्मधुसूदनः ।
कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिवदारुणि ॥”
( श्री० भा० ३, २४, ६ )
इस उपर्युक्त इतिहास के अनुसार कपिलदेव ब्राह्ममहा-
कल्प के आरम्भ में हुये और उसी समय इस सांख्य शास्त्र
का पुनरुद्भव ( पुनर्जन्म ) हुआ । इसी प्रकार यह शास्त्र
कपिलदेव से आसुरि को, उससे पञ्चशिख को और उस से
शिष्यपरम्परा के द्वारा ईश्वरकृष्ण को प्राप्त हुआ, तथा उन्हों-
ने उस सांख्य को प्रचलित कारिकाओं में, जो “दुःखत्रयाभि-
घातात्,, इस कारिका से आरम्भ होकर “परवादविवर्जि-
ताश्चापि,, इस कारिका पर समाप्त होती हैं, लिखा ।
“एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ ।
आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेनच बहुधाकृतं तन्त्रम् ॥
शिष्यपरम्परागतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्याभिः ।
संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥
( सां० का० ७०-७१ )
इसी ईश्वरकृष्णीय सांख्य के आधार पर यह हमारा
( ३ )
"हिन्दीसांख्य" है। पाठकों के सुखपूर्वक शास्त्र में प्रवेश के
लिये इसके आरम्भ में चित्रावली लगाई है, जिस के द्वारा
सांख्य के तत्वों को पाठक संक्षेप से अनायास समझ सकेंगे,
और फिर ग्रन्थ के पड़ने में भी उन्हें बहुत सुविधा होगी।
ग्रन्थ के भीतर जिस कारिका (श्लोक) का अर्थ आरम्भ होता
है, वहां पर भी सुख बोध के लिये विषयबोधक शीर्षक, उस
के नीचे कारिका और उस के नीचे उसी की व्याख्या है।
कहीं२ ग्रन्थ के भीतर भी समझाने के लिये चित्र लगाये गये
हैं। विषय के क्लिष्ट होने के कारण जहां सरलता नहीं हो
सकी है, उस के लिये विद्वानों से क्षमा प्रार्थनापूर्वक निवेदन
है, कि- वे उस की सूचना देवें, जिससे कि- वह सुधार दूसरी
आवृत्ति में कर दिया जावे।
भागवत सांख्य और यह सांख्य
भागवत पुराण के सांख्य में भी प्राकृतिक तत्व २४ ही हैं
"पञ्चभिः पञ्चभिर्ब्रह्मन् चतुर्भिर्दशभिस्तथा ।
एतच्चतुर्विंशतिकं गणं प्राधानिकं विदुः"
( श्री० भा० ३, २६; ११ )
अर्थात्- ५ महाभूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आका-
श) ५ तन्मात्र (गन्ध, रस, रूप, स्पर्श शब्द) ४ अन्तः करण
(मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त) ५ ज्ञानेन्द्रियें (श्रोत्र, त्वचा,
दृक्, रसन, नासिका) ५ कर्मेन्द्रियें (वाणी, कर, चरण,
लिङ्ग, गुद) यह प्रधान या प्रकृति का गण है।
ईश्वरकृष्णीय सांख्य में २५ वां तत्व पुरुष को बताया
गया है, उसके स्थान में भागवत में काल तत्व कहा है।
"एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य ह ।,
संनिवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः" ॥
( श्री० भा० ३, २६, १५ )
( ४ )
इस काल तत्व के संबन्ध में दो मत हैं । (१) कोई वि-
द्वान् मानते हैं कि-यह पुरुष का ही प्रभाव है, जिससे अज्ञा-
नी मनुष्य को भय होता है । (२) दूसरा सिद्धान्त मत यह है
कि यह भगवान् ही काल रूप से प्रतीत होता है, जिस के
सम्बन्ध से गुणों के साम्यरूप प्रधान (जड़) में भी चेष्टा हो
जाती है, तथा वही भगवान् शरीरों के भीतर पुरुष रूप से
है, और बाहर से वही कालरूप प्रतीत होता है ।
"प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतोभयम् ।
अहंकारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः" ॥
"प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि !
चेष्टा यतः स भगवान् कालइत्युपलक्षितः ॥"
"अन्तःपुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः ।
समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥"
( श्री० भा० ३, २६, १८ )
ईश्वरकृष्णीय सांख्य निरीश्वरवादी और भागवतसांख्य
ईश्वरवादी है-यही इन दोनों का मतभेद है, कोई कहते
हैं पूर्व सांख्य का प्रकृति और पुरुष के विवेक में ही तात्पर्य
है, किन्तु ईश्वर के खण्डन में नहीं, इसी से उतने को ही
दिखाया है, यह ठीक भी है । क्योंकि-वैदिक पुरुष का निरी-
श्वरवादी होना असंभव है ।
समर्पणम्
"येन शुक्लेन महता सर्वं शुक्लीकृतं जगत् ।
विद्यया मुनये तस्मै कृतिर्मेऽस्तुसमर्पणम् ॥"
कार्तिक शुक्ला १५ ⎬ विद्वद्वशंवद-
सं० १६७३ वि० ⎭ सीतारामशर्मा
हिन्दी-सांख्य दर्शन
( सांख्य-पदार्थ )
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( १ ) तत्वों का संक्षेप—(१) प्रकृति ( २ पुरुष )
व्याख्या-
(क) (१) अव्यक्त (२) व्यक्त (३) पुरुष ।
(ख) (१) प्रकृति (२) महत्तत्व (३) अहंकार (४) मन
(५) चक्षुः (६) श्रोत्र (७) घ्राण (८) रसन (६) त्वक्
(१०) वाक् (११) हस्त (१२) पाद् (१३) उपस्थ
(१४) गुद (१५) शब्द (१६) स्पर्श (१७) रूप
(१८) रस (१६) गन्ध (२०) आकाश (२१) वायु
(२२) तेज (२३) जल (२४) पृथ्वी (२५) पुरुष ।
( २ ) करण-(१) महत्तत्व (बुद्धि) (२) अहंकार (अभिमान)
(३) मन (४) चक्षुः ( नेत्र ) ( ५ ) श्रोत्र ( कान )
( ६ ) घ्राण ( नांक ) ( ७ ) रसन ( जिह्वा )
( ८ ). त्वक् ( चर्म ) ( ६ ) वाक् ( वाणी )
( १० ) पाणि ( हाथ ) ( ११ ) पाद् ( पैर )
( १२ ) पायु ( गुदा ) ( १३ ) उपस्थ ( लिङ्ग
या योनि ) ।
( ३ ) अन्तःकरणत्रय-( १ ) बुद्धि ( २ ) अहंकार ( ३ )
मन ।