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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

पुरुष का बहुत्व सिद्ध करके अब विवेकज्ञान के लिये,

( १४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
भिन्न २ प्रकार से हैं। जैसे कोई अधिक सात्विक है, कोई
अधिक रजोगुणी है और कोई अधिक तमोगुणी है ।
पुरुष के धर्म ।
पुरुष का बहुत्व सिद्ध करके अब विवेकज्ञान के लिये,
उसके धर्मों को कहते हैं-
तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य ।
कैवल्यमाध्यस्थ्यं द्रष्टृत्व मकर्त्तृभावश्च ॥ १९ ॥
पुरुष का बहुत्व तो सिद्ध हो ही चुका है, किन्तु उस
विपर्यास या विपरीत भाव, जो गत ११ वीं कारिका में दि-
खाया गया है, उससे इसके साक्षित्व (साक्षीपना) कैवल्य
(दुःखत्रय से रहित होना) माध्यस्थ्य (उदासीनता) द्रष्टृत्व
(दर्शन) और अकर्त्तृत्व (अकर्त्तापन) ये पांच धर्म भी सिद्ध
होते हैं। उक्त ११ वीं कारिका में कहा गया है कि- व्यक्त-
और प्रधान,–'त्रिगुण, अविवेकी, विषय,सामान्य,अचेतन और
प्रसवधर्मी हैं, और पुरुष इन दोनों से विरुद्ध धर्म वाला है'।
इस से कहागया होता है, कि- पुरुष, अत्रिगुण (तीनों गुणों
से रहित) विवेकी, अविषय असामान्य, चेतन, और अप्रसव-
धर्मी है। यही वहां का विपर्यास है। अब ध्यान देंगे, तो,
प्रतीत होगा कि-सच मुच ही उस विपर्यास से पुरुष में साक्षित्व
आदि ५ धर्म सिद्ध होते हैं। अर्थात्--चेतन और अविषय
होने से वह साक्षी और द्रष्टा होता है। क्योंकि- चेतन हीं
साक्षी हो सकता है, किन्तु अचेतन वस्तु नहीं। अर्थात् साक्षी
वह होता है, जिसे कोई विषय दिखाया जावे । लोक में जिस
प्रकार वादी प्रतिवादी दोनों अपने विवाद की बात को साक्षी
के लिये दिखाते हैं, ऐसे ही प्रकृति भी अपने आचरण किये
हुवे विषय को पुरुष के प्रति दिखाती है, अतः पुरुष उसका

हिन्दी सांख्य दर्शन (१५)

साक्षी है। क्योंकि अचेतन विषय को विषय नहीं दिखाया
जासकता। इस कारण चेतन और अविषय होने से पुरुष सा-
क्षी औरद्रष्टा होता है। एवम् त्रिगुण रहित होने से ही वह
दुःखत्रय से रहित है। अर्थात् सत्व आदि गुण ही सुख दुःख
आदि रूप हैं, और वे उसमें हैं नहीं अतएव वह दुःखमात्र
से रहित है तथा दुःखत्रय का अभाव ही कैवल्य या
मोक्ष का स्वरूप है, अतः अत्रिगुण होने से उस का कैवल्य
सिद्ध होता है। इसी प्रकार अत्रिगुण होने से ही यह मध्यस्थ
या उदासीन है। क्योंकि सुखी सुख से तृप्त होता हुवा और
दुःखी दुःख से द्वेष करताहुआ मित्रशत्रु की कक्षा में आजाता है,
किन्तु.मध्यस्थ नहीं होता। सुतराम् आत्मा सत्व आदि गुणों से
रहित होने के कारण सुख दुःख से भी रहित है, और अतएव
वह मध्यस्थ या उदासीन है। ऐसे ही विवेकी और अप्रसव-
धर्मी होने से वह अकर्ता है। प्रयोजन यह है कि- क्रिया जिस
में होती है, वह कारक होता है, और क्रिया सब परिच्छिन्न
(परिमित) वस्तु में होती है। परिमित वस्तु महत्तत्व से
आरम्भ करके प्रकृति के सकल कार्य हैं। आत्मवस्तु व्यापक
(विभु) है, उसमें क्रिया का संभव नहीं, अतः वह अकर्ता है
अकर्ता पद से कर्त्ताके साथ करण, सम्प्रदान आदि अन्य का-
रकों का भी निषेध समझना चाहिये। कारण वे कारक भी
क्रिया के सम्बन्धसे ही होते हैं। यहां 'प्रसव' नाम कार्य मात्र
का है। कार्य पद में प्रकृति और पुरुष दोनों से अतिरिक्त
सकल जड़समूहं आता है, उन्हीं में चलन आदि क्रियायें भी हैं
जबकि आत्मा अप्रकृति है, तो उससे कोई कार्य होना संभव
नहीं, अतः वह अप्रसवधर्मी होने से अकर्ता है, इसी प्रकार
'विवेकी' विशेषण भी उसे अकर्त्ताही सिद्ध करता है। क्योकि
हमारी समझ में 'विवेकी' नाम यहां विविक्त या अलग रहने

( १६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
वालेका है। वह क्रिया तथा विकार (प्रसव) वालों से अलग
है, इससे वह अकर्त्ता है ॥ १८ ॥
लिङ्ग चेतन के समान और पुरुष कर्त्ता के समान ।
तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ।
गुणकर्त्तृत्वे च तथा कर्त्तेवभवत्युदासीनः ॥२०॥
यद्यपि पहिली कारिका में यह युक्तियों से सिद्ध होचुका
है कि-आत्मा अकर्त्ता है, किन्तु यह अनुभव के विरुद्ध है।
अर्थात् सर्व साधारण को ऐसा अनुभव होता है कि-'मैं चेतन
करने की इच्छा से क्रिया (कर्म) करता हूं' इस अनुभव में
चेतन और कर्त्ता एक ही प्रतीत होता है। इस से सांख्य के
उक्त मत में यह अनुभव नहीं घटता। क्योंकि-उसमें चेतनअकर्त्ता
और कर्त्ता अचेतन है। इसी प्रश्न का उत्तर यहां यह दिया
गया है, कि-उक्त अनुभव, जिसमें आत्मा अकर्त्ता प्रतीत होता है
भ्रान्ति रूप है। क्योंकि-आत्मा या पुरुष का अकर्त्तृत्व (अक-
र्त्तापन) युक्ति से सिद्ध होचुका। आत्मा में जो कर्त्तृत्व की
प्रतीति होती है, वह लिङ्ग शरीर, जो महत् तत्व आदि १८
तत्त्वों के संयोग से बताया जायगा, उसके सम्बन्ध से प्रतीत
होता है। अर्थात्-जैसे लाल पुष्प की लाली उसके संयोग से
काच में प्रतीत होती है, किन्तु वह लाली पुष्प ही की है,
काच की नहीं, ऐसे ही, लिङ्ग शरीरका कर्त्तृत्व पुरुष में प्रतीत
होता है, वह लिङ्ग शरीर का ही है, वास्तव में पुरुष का नहीं
अतः पुरुष कर्त्ता नहीं, कर्त्ता जैसा है। तथा कर्त्तृत्व का अनु-
भव भ्रान्तिरूप है। सर्वथा पुरुष उदासीन है।
जिस प्रकार लिङ्ग के संयोग से अकर्त्ता पुरुष कर्त्ता जैसा
प्रतीत होता है, वैसे ही पुरुष के संयोगसे अचेतन लिङ्ग चेतन
जैसा प्रतीत होता है, उस में भी चेतनत्व बुद्धि उसी प्रकार
भ्रान्ति है ॥ २० ॥

हिन्दी सांख्य दर्शन (१७)
पुरुष और लिङ्ग के संयोग का कारण ।
पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ।
पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतःसर्गः ॥२१॥
पहिली कारिका के व्याख्यान में यह बात समझी गई
कि- पुरुष और प्रधान या लिङ्ग के संयोग से उनमें परस्पर के
कर्त्तृत्व और चेतनत्व धर्म भ्रान्ति से प्रतीत होते हैं। किन्तु
अभी यह बात समझ में नहीं आई, कि- इनका संयोग ही
पहिले कैसे हुआ ? इस प्रश्न के उत्तरके लिये ही यह कारिका
आई है। इसमें कहा गया है कि- भोक्ता और भोग्य की
योग्यता से ही इन दोनों का किसी अनादि काल में संयोग
होगया था, और उनके संयोग से ही यह महत् आदि तत्वों
या संसार की सृष्टि हुई। अर्थात्-जैसे-किसी भूखे आदमी
को कोई फल मोदक आदि भक्ष्य वस्तु मिले और
वह उसे खाने लगे । इस बात को ध्यान में देने से प्रतीत
होगा कि-आदमी में भोजन करने की योग्यता है और फल
आदि में भोग्यता की, वृक्षों से उस के संयोग होते ही भोजन
रूप क्रिया की सृष्टि होने लगती है यदि उनका संयोग न हो
अथवा भोक्ता का भोक्ता के साथ तथा भोग्य का भोग्यके साथ
संयोग हो भी जावे तो उनकी योग्यता वहां सृष्टि को प्रवृत्त
नहीं कर सकती, बल कि- वह व्यर्थ ही रहेगी। ऐसे ही पुरुष
की भोक्तृत्व योग्यता और प्रधान की भोग्यत्व योग्यता से
उनका कभी संयोग हुआ,और उसी से सृष्टिका आरम्भ हुआ
ऐसे ही कारिका में पंगु और अन्ध का दृष्टान्त भी है। इस
की व्याख्या यों है कि- जैसे कोई पंगु और अन्ध दो मनुष्य हैं,
और वे दोनों ही अपने संघ के साथ बनमें जाते हुये डाकुओंके
उपद्रव से अपने साथियों से अलग होगये, तथा वनमें कहीं २

( १८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
टकराते हुये आपस में दैव योग से मिले और उनका परस्पर
में विश्वास हुआ । अन्धे में चलने की शक्ति है, और पंगु में
देखने की, इसीसे अब वे दोनों मिलकर गमन और दर्शन
क्रियाओं को कर सकते हैं, अतः पंगु अन्धे के कन्धे पर चढा,
तो अन्धा चला और पंगुने उसे राह बताई, सुखराम् वे अपने
घर पर पहुंचे और दोनों ने अपना सम्बन्ध छोड़ा अर्थात्
संयोग का त्याग किया । ऐसे ही चेतन पुरुष प्रकृति के साथ
मिलकर उसके संयोग से ज्ञान गुण को प्राप्त होकर उसे छोड़
देता है, और वह भी अपना कार्य पूरा करके उसे छोड़ देती
है । यही मोक्ष का स्थान है, तथा संयोग और उस से सृष्टि
क्रम है ॥ २१ ॥
सृष्टि का क्रम ।
प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्चषोडशकः ।
तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥२२॥
प्रकृति से महत् तत्व, उससे अहंकार, इस से १६ तत्त्व
( ५ ज्ञानेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें १ मन ५ तन्मात्र ) और उनमें
से भी ५ तन्मात्रों से ५ महाभूत ( पृथिवी, जल, अग्नि, वायु
और आकाश ) उत्पन्न होते हैं ॥ अर्थात् शब्द तन्मात्रसे शब्द
गुण वाला आकाश, (१) शब्द तन्मात्र से सहित; स्पर्श तन्मात्र
से शब्द और स्पर्शगुणवाला वायु, (२) शब्द और स्पर्श तन्मात्र से
सहित रूप तन्मात्र से शब्द स्पर्श और रूप गुण वाला अग्नि
( ३ ) शब्द, स्पर्श, रूप तन्मात्र से संयुक्त रस तन्मात्र से
शब्द, स्पर्श, रूप, और रस गुण वाला जल (४) और शब्द,
स्पर्श, रूप, तथा रस तन्मात्र से युक्त गन्ध तन्मात्र से शब्द,
स्पर्श, रूप, गन्धगुण वाली पृथिवी ( ५ ) उत्पन्न होती है ॥

हिन्दी सांख्य दर्शन ( १६ )
प्रकृति, प्रधान, ब्रह्म, अव्यक्त, बहुधानक, और माया, ये शब्द पर्याय
(समान अर्थ के वाचक) हैं। महान्, बुद्धि, आसुरी, मति,
ख्याति और ज्ञान ये सब पर्याय हैं । ऐसे ही अहंकार,
भूतादि, वैकृत, तैजस और अभिमान, ये पर्याय हैं ॥ २२ ॥
बुद्धि का लक्षण और उस का धर्म ।
अध्यवसायोबुद्धिर्धर्मोज्ञानं विरागऐश्वर्यम् ।
सात्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥२३॥
बुद्धि का लक्षण अध्यवसाय है। अर्थात् पुरुष मात्र ही
जब किसी कर्म में प्रवृत्त होता है, उस समय अन्तःकरण में
तीन वृत्तियें या क्रियाएं होती हैं, जैसे पहिले आलोचन
(वस्तु का ज्ञान) फिर ‘मैं इस में अधिकारी हूं’ ऐसा अभि-
मान, फिर ‘मुझे यह करना चाहिये’ ऐसा अध्यवसाय या
निश्चय ज्ञान होता है। इन में यह तीसरी वृत्ति या ज्ञान
जिस में होता है, वही बुद्धि है। बुद्धि में ( १ ) धर्म, ज्ञान,
वैराग्य और ऐश्वर्य्य ये चार सात्विक धर्म रहते हैं, और
अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य्य ये चार तामस
धर्म रहते हैं ।
वैराग्य की चार अवस्थाएं होती हैं, जिन के नाम—
( १ ) यतमानसंज्ज्ञा ( २ ) व्यतिरेकसंज्ज्ञा ( ३ ) एकेन्द्रिय-
संज्ज्ञा और ( ४ ) वशीकारसंज्ज्ञा हैं ॥ २३ ॥
अहंकार का लक्षण और उसका कार्य भेद ।
अभिमानोऽहंकारः तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः ।
एकादशकश्चगणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥
अभिमान (मैं हूं यह ज्ञान) अहंकार है। उस से दो
प्रकार की सृष्टि होती है, ( १ ) ग्यारह इन्द्रियें और ( २ )

( १० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
पांच तन्मात्र ( कुल १६ ) ॥ २४ ॥
एक अहंकार से जड़ और प्रकाश की उत्पत्ति
सात्विक एकादशकः प्रवर्त्ततेवैकृतादहंकारात् ।
भूतादेस्तन्मात्रः स तामसः, तैजसादुभयम् ॥२५॥
अहंकार में तीन गुण होते हैं-सत्व, रज, और तम ।
जब इन में सत्व गुण से रज और तम दब जाते हैं, उस
समय अहंकार की वैकृत संज्ञा (नाम) होती है । उस
वैकृत अहंकार से सत्वगुण की सहायता से ग्यारह इन्द्रियें
उत्पन्न होती हैं । इसी से ये इन्द्रियें सात्विक कही जाती हैं।
जिस समय तमोगुण से सत्व और रज तिरस्कृत हो जाते हैं,
उस समय जो अहंकार है, उस की भूतादि संज्ञा और तमो-
गुण के आधिक्य से 'तामस' संज्ञा भी हो जाती है, उस
भूतादि या तामस नाम अहंकार से उस के समान स्वभाव
वाले शब्द आदि ५ तन्मात्र उत्पन्न होते हैं । एवम्-जब रजो
गुण से सत्व और तम दब जाते हैं, या जित हो जाते हैं,
उस समय उस की तैजस संज्ञा हो जाती है । उस तैजस
अहंकार से दोनों ( इन्द्रियें और तन्मात्र ) उत्पन्न होते हैं ।
क्योंकि-वैकृत अहंकार विकृत हो कर जब ११ इन्द्रियों को
उत्पन्न करना चाहता है, तो वह निष्क्रिय होने के कारण
अपने कार्य को कर नहीं सकता, अतः वह तैजस अहंकार जो
क्रिया स्वभाव है, उस की सहायता लेता है, तथा तामस
अहंकार भी निष्क्रिय होने से तन्मात्र रूप अपने कार्य को
नहीं कर सकता अतः उसे भी तैजस अहंकार की सहायता
लेनी पड़ती है । इस प्रकार वैकृत और भूतादि दोनों अहं-
कारों के साथ उनके कार्य में सहायक होने के कारण यह
दोनों प्रकार के कार्यों का कारण बनता है ॥ २५ ॥