सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती
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सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती
है इसीसे मदालसा के पुत्र अति बालक होने पर भी माता के
उपदेश मात्र से ही विवेक-ख्यातिको प्राप्त हुये और मुक्त भी।
उस में भाग्य ही कारण था, किन्तु और कुछ नहीं। इस उप-
देश से जो भाग्य में तुष्टि है वह भाग्य (वृष्टि) कहलाती है।
जो तुष्टियें प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार आदि अनात्म
वस्तुओं को आत्मा समझ कर वैराग्य से होजाती हैं, वे सब
बाह्य तुष्टियें हैं। क्योंकि-आत्म-ज्ञान के न होने की अवस्था
ही में वे अनात्म ( बाह्य ) वस्तु के अवलम्बन से होती हैं।
इन तुष्टियों का कारण वैराग्य है, और वह वैराग्य ५ कारणों
से होता है, अतः वह पांच प्रकार का समझा जाता है; तथा
उसके कारण ही उस से होने वाली तुष्टियें भी ५ ही मानी
जाती हैं। अर्थात्-भोग्य विषय शब्द आदि ५ हैं, और उनके
उपरम (वैराग्य) भी ५ हैं। विषय की संख्या के समान इस
के कारण भी (१) अर्जन (२) रक्षण (३) क्षय (४) भोग
(५) हिंसा, ये पांच हैं, इससे भी वैराग्य या उपरम ५ हैं।
इनकी विशेष व्याख्या इस प्रकार है—
(क) [ अर्जन ] धनके अर्जन या संग्रह करनेके उपाय सेवा
आदि हैं, जो सेवक आदि को दुःखित करने वाले हैं। क्यों
कि-सेवा में क्रोधी स्वामी से कभी २ थप्पड़ या गर्दना
आदि भी खाना पड़ता है। सुतराम् इन दुःखों को अनुभव
करने वाले बुद्धिमान् उसमें प्रवृत्त नहीं होते। इसी प्रकार अन्य
उपायों में भी दोष हैं, इस प्रकार जो विषयसे उपरम तुष्टि है
वह 'पार' कहलाती है।
(ख) [ रक्षण ] धन किसी प्रकार इकट्ठा हो भी गया, तो
उसके राजा, चोर, अग्नि जलप्रवाह आदि से नांश होजाने की
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संभावना है, अतः उसकी रक्षा में महादुःख है, ऐसी भावना
वाले को जो विषय से उपरम में तुष्टि है, वह दूसरी 'सुपार'
'तुष्टि है।
(ग) [क्षय] ऐसे ही बड़े परिश्रम से इकट्ठा किया हुआ
धन भोग करने से क्षीण होजाता है, इस प्रकार उसके क्षय हो
जाने की भावना करने वाले को जो विषय के उपरम में तुष्टि
होती है, वह तीसरी 'पारापार' कहलाती है।
(घ) इसी प्रकार शब्द आदि विषयों के भोगाभ्यास से
काम (मनोरथ) बढ़ते हैं, और वे विषय की प्राप्ति न होने
पर कामी पुरुषको दुःखित करते हैं इससे भोग दोषको जानने
वालेको जो विषयसे उपरम में तुष्टि होती है, वह चौथी 'अनु-
त्तमाम्भ' कहलाती है।
(ङ) ऐसे ही दसरे प्राणियों की हानि किये बिना या
सताये बिना विषयों का उपभोग नहीं हो सकता, इस हिंसा
दोष को देख कर जो विषय से उपरम में तुष्टि होती है, वह
५ वीं 'उत्तमाम्भ' कहलाती है।
ऐसे चार आध्यात्मिकौ और ५ बाह्य तुष्टियों को
मिलाकर ६ तुष्टियें होती हैं ॥ ५० ॥
गौण और मुख्य सिद्धियें ॥
ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः ।
दानंचसिद्धयोऽष्टौसिद्धेपूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥५१॥
तीन दुःखों के नाश तीन मुख्य सिद्धियें हैं। और सब
(१) अध्ययन (२) शब्द (३) ऊह (४) सुहृत्प्राप्ति और
(५) दान ये ५ सिद्धियें गौण हैं।
सिद्धिके पूर्व जो विपर्यय अशक्ति और तुष्टि के भेद से
तीन प्रकार की बुद्धि की सृष्टि (का० ४६ में) देखी गई है,