सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextतीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ६५ )
प्रयत्न, सुख, दुःख, द्वेष, तथा धर्म अधर्म साक्षात् सम्बन्ध से
स्वीकार न कर उसको शुद्ध स्फटिक पाषाण के समान स्वच्छ
या निर्गुण माना है, उस में ज्ञानादि गुणों का सम्बन्ध
ऐसा स्वीकार किया है, जैसा कि-लाल पुष्प पर काच या स्फ-
टिक धरनेसे उसमें साक्षात् जैसा लाल रङ्ग प्रतीत होने लगता
है, किन्तु वास्तविक नहीं, परमार्थतः- उनके मतमें अन्तःकरण
में ही उक्त सब गुण रहते हैं, उससे वह अन्य दोनों दर्शनों में
जो कई एक झंझट उपस्थित हो जाते हैं, उनसे बच जाता है
उनके मत में आत्मा में ज्ञानादि गुण मनके साथ इस प्रकार
चलते रहते हैं, जैसे-किसी सूत्र में कोई जलका बिन्दु हो, और
उस पर उसी सूत्र में मणिक या गोली पोई (प्रोत) हुई हो,
जिसके चलाने से सूत्र के भीतर रह करभी वह जलविन्दु गोली
के साथ सरकता रहे, किन्तु पीछे या अन्यत्र नहीं रहता, इस
चाल पर वह विन्दु सूत्र और गोली दोनों के ही भीतर रहा
हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि-गोली के भीतर सूत्र और सूत्र
में विन्दु है। परन्तु सांख्यवालों ने समझा कि-“जब गोली के
भी भीतर है, और उसके गमनके साथ ही वह चलता है तथा
उससे अतिरिक्त वह कहीं मिलता भी नहीं” तो उसको उस
सूत्र का धर्म न मानकर उस गोली का ही धर्म क्यों न माना
जावे? तथा जिस आत्म देश में पहिले किसी वस्तुका अनुभव
उत्पन्न होकर उससे उत्पन्न हुए भावना संस्कार के द्वारा जो
फिर उसी वस्तुका स्मरण होता है, वह आत्मा के देशान्तर में
ही होता है, जहां स्मरण काल में उसका लिङ्ग शरीर रहे, उसी
प्रकार लिङ्ग शरीर के देशमें आत्मा ज्ञानवान् है और अन्य
देश में ज्ञान शून्य, यह द्विविध भाव भी सांख्योंको मानना