रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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सूचना-यह छंद मात्रावृत्त है। मात्राएँ ३२ हैं। ऐसे मात्रावृत्त का
नाम भी 'सवैया ही होता है। १६, १६ के विश्राम से अर्थात् दो चौपाई के
चरणों के योग से यह छंद बनता है। इसे सवाई या समान सवैया कहते हैं।
यह एक प्रकार का ताटंक है।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश उन्माद, यथा- (सवैया )
(३२३) केसव चौंकति सी चितवै छतिया धरकै तरकै तकि छाँहीं ।
बूझियै और कहै मुख और सु और की और भई पल माँहीं ।
डीठि लगी किधौं बाय लगी मन भूलि पर्यो कै कर्यो कछु काँहीं।
घूँघट की घट की पट की हरि आजु कछू सुधि राधिकै नाँहीं ।४२।
शब्दार्थ-तरकै = सोच-विचार करती है, चकपकाती है। ताकि=देख-
कर। छाँहीं = छाया । चौंकति० = चौंकती हुई तो वह देखती है। उसकी
छाती धड़कती है और अपनी छाया तक को देखकर सोच-विचार में पड़
जाती है। बूझिये और = पूछा जाता है और कुछ । बूझियै० = उससे पूछा
कुछ जाता है और उत्तर में उसके मुख से कुछ और ही निकल पड़ता है।
वियोग के कारण पल भर में वह दूसरी की दूसरी ही हो गई। डीठि =
नजर। बाय = वायु, बात । मन० = मन में ही कोई गड़बड़ी हो गई है ।
काँहीं = किसी ने । डीठि० = उसे किसी की नजर लग गई अथवा उसे बाई ने
घर दबाया अथवा उसके अंतःकरण में ही विभ्रम हो गया है अथवा किसी ने
उस पर जादू-टोना कर दिया है, कुछ समझ में ही नहीं आता कि बात क्या
है । घट = घड़ा । पट = वस्त्र ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न उन्माद, यथा- (सवैया)
(३२४) गूढ़ अगूढ़ प्रकासत बातनि लोक अलोक की बात सरी सी ।
रोवत हैं कबहूँ हँसि गावत नाचत लाज की छाँडि छरी सी ।
काहू को सोच सँकोच न केसव देखत आवति देह मरी सी ।
बाम की बाय किं काम की बाय कि है हरि की मति काहू हरी सी ४३
शब्दार्थ-गूढ़ = अस्पष्ट । अगूढ = स्पष्ट । प्रकासत = कहते हैं । लोक
की बात=इस लोक में जैसी बातें होती हैं, साधारण बातें । अलोक की बातें
= जो बातें सामान्यतया लोक में नहीं होतीं । गूढ़० = कभी तो उनके मुख
से गूढ़ बातें निकलती हैं और कभी अगूढ़ । कभी वे संसार की सर्वसाधारण
बातें करते हैं कभी उनके मुख से अलौकिक बातें निकल पड़ती हैं । सरी सी=
४२-छतिया-छिति पैं । ताकि-छिति । मुख-कछु । और सु-औरई ।
और की-औरई । भई-कहै । पल-छन । हरि०-कछु माजु सबो सुधि ।
४३-अलोक की-अलौकिक । छांडि-छांह ।