रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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निकली जान पड़ी । छर = लांछन, चिह्न । 'छर' का स्त्रीलिंग छुरी। लाज० =
लज्जा का चिह्न भी उनमें नहीं रह गया है । देखत० = मैं देखे चली आ रही
हूँ । देह० = शरीर चेतनाशून्य सा हो गया है । बाम = स्त्री । बाय = वायु,
बात । बाम की बाय = श्रीकृष्ण को किसी स्त्री की हवा लग गई है अथवा
काम की बातव्याधि हो गई है अथवा किसी ने,उनकी बुद्धि ही हरण कर ली है।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उन्माद, यथा--(कवित्त)
(३२५) सजल चकित चित चितवत चहूँ दिसि,
चाहि चाहि रहैं मुख चपल चलत धाइ ।
सोचत से मन मन कंपत तपत तन,
केसौदास रोवत हँसत उठै गाइ गाइ ।
चलहि दिखाऊँ तोहि देखत हीं भयो मोहिं,
भयो सो कहन आई तोसों अलि अकुलाइ ।
जैसें कछु आकबाक बकत हैं आजु हरि,
तैसैं जिन नाउँ मुख काहू को निकसि जाइ ।४४।
शब्दार्थ-( सखी की उक्ति राधिका या सखी से ) । सजल = अश्रुपूर्ण
नेत्रों से । चकित० = चकपकाए हुए चित्त से । चितवत० = चारो दिशाओं को
देखते हैं, चारो ओर (चकित हो) देखते हैं। चाहि चाहि रहैं = मुख को देख
देखकर रह जाते हैं, जो उनके पास जाता है उसका मुख ध्यान देकर देखने
लगते हैं तो देखते ही रह जाते हैं। चपल चलत० = फिर दौड़कर बड़ी तेजी
से चलने लगते हैं। सोचन० = मन में कुछ सोचते रहते हैं। मन कंपत = मन
ही मन, भीतर ही भीतर कांपते से रहते हैं। तपत तन = शरीर तपता रहता
है। चलहि = (हे सखी) चलो । दिखाऊँ० = उन्हें देखकर मेरी जो दशा हुई
तुझे दिखला दूँ (समझा दूँ, तेरी भी वही स्थिति हो जाएगी)। उनकी जैसी
कुछ दशा है उससे ही मैं व्याकुल होकर तुझसे कहने आई हूँ। आकवाक =
अंडबंड, बेसिर पैर की बातें। जैसें कछु० = आज श्रीकृष्ण जैसी बेठिकाने की
बातें कर रहे हैं वैसे में ( तो मुझे भय हो रहा है कि ) कहीं किसी का
( तेरा ) नाम न निकल जाए (प्रेम की बातें खुल न जायं ) ।
अथ व्याधि-लक्षण-( दोहा )
(३२६) अंग-बरन बिबरन जहाँ, अति ऊँचे उस्वास ।
नैननीर परिताप बहु, व्याधि सु केसवदास ।४५।
शब्दार्थ-अंग-बरन = शरीर का रंग । बिबरन = अपने सहज रंग से
भिन्न, कष्टसूचक पीला आदि रंग । उस्वास = उच्छ्वास । नैननीर = आँसू ।
४४-तन-गात । केसौदास-केसौराय । तैसे०-ऐसे माँझ नाउँ जनि ।
४५-ऊँचे-ऊँची ।