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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 175 of 286

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Page 175

१६८ रसिकप्रिया
से गूंथकर त्रिवेणी (केश = यमुना, मोती = गंगा तथा लाल तागा = सरस्वती)
सी बनाई है जिसमें मेरे मनोरथ मुनियों की भाँति स्नान करते हैं, जिसके
नेत्र प्रेम में उलझे हुए और ( किसी प्रिय को ) देखने के लिए हठ करते
हुए जान पड़ते हैं, जिसकी भौहें किंचित् तनी हुई हैं और कुछ झाँकते हुए से
( उठे हुए ) हैं, नेत्र-कमलों पर पैर रखती हुई ( लक्ष्मी सी ) यह तेरे यहाँ
जो आई है कौन है और उसके आने का क्या कारण है।
अथ उन्माद-लक्षण—( दोहा )
(३२१) तरकि उठै पुनि उठि चलै, चितै रहै मुख देखि।
सो उन्माद जनावहीं, रोवै हँसै बिसेषि ॥४०॥
शब्दार्थ—तरकि = सोच-विचार करके। चितै० = मुख देखकर देखता
ही रह जाए। जनावहीं — बताते हैं, कहते हैं। बिसेषि = विशेष रूप से।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उन्माद, यथा—( सवैया )
(३२२) केसव सुधि बुधि हरित सु तुम बिन बिथा अगाध राधिकहि बाढ़ी ।
छूटी लट लटकति कटितट लौं चितवति नीठि नीठि करि ठाढ़ी ।
तरकति तकि तोरति तन तलफति अति अपार उपचारनि डाढ़ी ।
सकसकाति लै साँस अचेत सुचेतहु प्रेम-प्रेत गति गाढ़ी ॥४१॥
शब्दार्थ—सुधि बुधि = होश हवास। हरित = हर ली गई। बिथा =
( सं० व्यथा ) कष्ट, पीड़ा । अगाध = गहरी अत्यधिक । सुधि बुधि० =
आपके वियोग में राधिका की ऐसी गहरी व्यथा बढ़ी कि ( कुछ कहा नहीं जा
सकता ) उसकी सारी सुधबुध खो गई है। नीठि = कठिनता से। ठाढ़ी =
खड़ी। छूटी० = उसकी छूटी हुई केशों की लट कमर तक लटक रही है।
बड़ी कठिनाई से तो वह खड़ी रह पाती है और कठिनाई से ही वह देखती
भी रह सकती है। तरकति = सोच-विचार करती है। तोरति तन = शरीर
तोड़ रही है, शरीर ऐंठ रही है। उपचार = औषध का प्रयोग। डाढ़ी =
जली हुई। तरकति० = किसी की ओर देखकर न जाने वह किस सोच-
विचार में पड़ जाती है। वह अपना शरीर तोड़ने लगती है। वह विरहताप
के लिए किए गए औषधोपचार से बहुत अधिक जली हुई सी प्रतीत होती
है। सकसकाति = (कभी) साँस लेकर वह कुछ कुछ होश में आने का आभास
देती है। अचेत० = ( कभी ) भली भाँति चेत ( होश ) में रहते हुए भी वह
अचेत सी रहती है। प्रेत० = मानो प्रेम रूपी प्रेत ने उसे भली भाँति पकड़
लिया है।
४०—मुख-मुँह । जनावहीं—जु गावहीं, गनावहीं, मनावहीं । ४१—
सुधि०—सुबुद्धि सिद्ध हरि तुम । हरित०—रहे तुम्हें बिन । व्यथा-वृथा ।
राधिकहि—राधिहि । लौं-लहूँ । चितवनि—बिनवति । नीठि करि-दीठि करि ।
ठाढ़ी-गाढ़ी । तरकति०—तरकि तरकि । अचेत०—अचेतह मानह ।