रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
इति अयोध्याकाण्ड कथा ॥ औ पङ्क ज्यों कहे पङ्कके सदृश नीच ऐसा जो
विराध है ताको पेलिकै पातालको पठावत भये वाल्मीकीय रामायणमें लिख्यो है
कि काहूअस्त्रशस्त्रसों न मरै तब रामचंद्रजीवतही गाडि लियो ताही प्रकार
कलुष पापरूप जे खर दूषणादिहैं तिनहुँनको मारचो ॥ इति आरण्यकाण्ड
कथा ॥ औ कुलङ्कको हैं अङ्क चिह्नजाके ऐसा जो बंधुपत्नी भोगी वालि है
ताको दूरि करत मारत भये औ दास जो सुग्रीव है ताको भव महादेवके
शीशके शशिक सम राखत भये जैसे भवशीश शशिको राहुको भय नहीं रहत
तैसे शत्रुभय रहित सुग्रीवको कियो अथवा महादेवके माथेमें द्वितीयाको
चन्द्रमा है यासों या जनायो कि भवसंसारको राज्य पाइ सुग्रीव की और
बढती हैहै ॥ इति किष्किन्धाकाण्ड कथा ॥ तथा याही पदमें सुन्दरौकाण्ड है ॥
केशव जे रामचंद्र हैं तिनके दासजे सुग्रीवहैं तिनके दासजे हनुमान हैं ताके
वपुष शरीरको भवशीश शशिसम राखत भये कि लङ्कामें प्रकाशित करते भये कलङ्क
रूपजे सिंहिका अक्षकुमारादिहैं तिनको दूरि करिकैकहे मारिकै ॥ इति सुन्दरकाण्ड
कथा ॥ औ रामचंद्रके सन्मुख होत ही विभीषणके साँकर कष्टकी जो साँकर
जंजीर रही सो न कहे न रहत भई रामचंद्रके दर्शनहीं सो विभीषणको दुःख
दूरिभयो तब दशमुख जो ब्रह्मा विष्णु महेश हैं ते बिभीषणको मुख जोवत भये
कि धन्य हैं विभीषण जाको रामचन्द्र अंगीकार करचो औ गजमुखजे गणेश हैं
तिन मुख कहे आदि दै और देवता हैं ते को कहे कहाँ हैं अर्थ यह गणेशादि
देवता तौ जोवतही भये औ साँकर जे यमादिक हैं तिनको साँकर कहे कष्ट
देवैया ऐसा जो रावण है सो रामचंद्रके सन्मुख होतही न रहत भयो गजमुख
जे गणेश हैं तिनको मुख कहे श्रेष्ठ ऐसे जे रामचंद्र हैं तिनके मुखको जोवत
भयो अर्थ यह उनके लोकको प्राप्त भयो अथवा मुख जो वै कहे मुखमें लीन
होत भयो तुलसीकृत रामायणमें लिख्यो है कि “ तासुतेजप्रभुवदनसमाना ।
सुरनरसबनअचम्भौमाना” ॥ इति युद्धकाण्ड कथा ॥ औ साँकर जो रावण
है ताके साँकर जो रामचन्द्र हैं तिन्हें अयोध्याके सन्मुख होत ही
दशमुख जे ब्रह्मा विष्णु महेश हैं ते मुख कहे मुख्य औ गजमुख जे गणेश हैं ते
रामचन्द्रको मुख जोवै कहे स्तुति करतहें अथवा दशमुख कहे दशौंदिशाके मुख
औ गजमुख मुख कहे हाथिनमें मुख्य ते मुख जोवै कहे रामचन्द्रको मुख निहा-
रतहैं ॥ इति उत्तरकाण्ड कथा ॥ कोऊ कहै कि एक पदमें कैयो फेरि अर्थ कियो
सो संक्षेप कथा है तासों दूषण नहीं है याही विधि रामायणादिक तिलककारसे