रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
About this granth
Raghuvamsha (रघुवंशम्) is Kalidasa's mahakavya in nineteen cantos on the kings of the Solar dynasty, from Dilipa to the dissolute Agnivarna. It is counted among his most mature poems and has been a core text of Sanskrit education for centuries.
Its well-loved episodes include Dilipa's service of the cow Nandini, Raghu's conquest of the quarters and his gift to the student Kautsa, the svayamvara of Indumati and Aja's lament at her death, the story of Dasharatha and then of Rama, Kusha's resettling of Ayodhya and the decline of the line under Agnivarna.
This is No. 40 of the Chaukhamba Surbharati Granthamala, in its fifth edition of 1994. It prints the verses with Mallinatha's classic Sanskrit commentary Sanjivani and the Chandrakala Hindi commentary of Dr. Shrikrishnamani Tripathi, former head of the department of Purana-Itihasa, culture and geography at Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. With text, Mallinatha's analysis and plain Hindi together, the 735-page volume serves both students and lovers of poetry.
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एक दिन कुश की इच्छा हुई कि सरयू के जल में स्त्रियों के साथ विहार करें । अन्त में वे उनके साथ जलक्रीड़ा में लीन हो गये । स्त्रियों के साथ सरयू में जलक्रीडा करते हुए वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो देवराज इन्द्र आकाशगंगा में अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते हों । अगस्त्य ऋषि ने श्रीराम को जो जैत्र आभूषण दिया था उसे राम ने कुश को राज्य के समय ही दे दिया था । क्रीड़ा करते समय वह रत्न जल में गिर गया, किसी को पता तक नहीं चला । बाद कुश ने उसे ढूंढने के लिए धीवरों को आज्ञा दी, पर वह मिल न सका । तब धीवरों ने कहा—महाराज, मालूम पड़ता है कि इस जल में रहनेवाले कुमुद नामक नाग ने लोभ से उसे चुरा लिया है। तब कुश ने क्रोध कर तट पर खड़े होकर धनुष को ठीक किया ओर उसपर नागों को नाश करनेवाला अस्त्र चढ़ा लिया । उस धनुष के चढ़ाते ही उस जल से अचानक ही एक कन्या को आगे किये हुए नागराज कुमुद इस प्रकार निकले मानो लक्ष्मी को लेकर कल्पवृक्ष निकल रहा हो । वह प्रणाम करके बोला—राजन् ! यह मेरी कन्या गेंद खेल रही थी, उसकी थपकी से गेंद ऊपर उछल गया । उसे देखने के लिए जब आंखें ऊपर उठायीं तो देखा कि यह आपका आभूषण तारे के समान नीचे गिर रहा है। इसने झट उसे पकड़ लिया। आप इसे लीजिए और यह मेरी छोटी बहन कुमुद्वती जीवनभर आपकी सेवा करेगी, आप अपनी पत्नी के रूप में इसे स्वीकार करें। कुश ने आभूषण लेकर कहा कि आज से आप मेरे सम्बन्धी बन गये । बाद कुमुद ने अपने कुटुम्बियों को बुलाकर बड़े धूमधामसे कुमुद्वती का कुश से विवाह कर दिया । अनन्तर उसके साथ आनन्दपूर्वक कुश राज्य करने लगे ।
सप्तदश सर्ग
जैसे रात के ब्राह्म मुहूर्त में बुद्धि को नयापन मिल जाता है वैसे ही कुश को कुमुद्वती से अतिथि नामक पुत्र प्राप्त हुआ । जैसे सूर्य अपने प्रकाश से उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं को पवित्र कर देता है वैसे ही सुशिक्षित अतिथि ने माता और पिता के दोनों कुलों को पवित्र कर दिया । कुश ने चतुर्विध विद्याओं के अध्ययन के बाद राजकन्याओं से अतिथि का विवाह कर दिया । अतिथि भी कुश के समान ही कुलीन, शूर और जितेन्द्रिय थे । इसलिए कुश अपने पुत्र को अपना ही दूसरा रूप समझते थे । अपने कुल के अनुसार कुश भी एक बार युद्ध में इन्द्र की सहायता करने के लिए गये थे । वे शक्तिशाली दुर्जय राक्षस
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को मारकर स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए। जैसे कुमुदों को खिलानेवाले चन्द्रमा के अस्त होने पर चांदनी भी स्वयं अस्त हो जाती है वैसे ही कुमुद्वती भी कुश के साथ सती हो गयी। युद्ध में जाते समय कुश ने जो आज्ञा दी थी उसी के अनुसार मन्त्रियों ने उनके पुत्र अतिथि को राजा बनाया। उनके शिर पर गिरती हुई अभिषेक की धारा ऐसी सुन्दर लगती थी कि मानो शिवजी के शिर पर गंगाजी की धारा गिर रही हो। मन्त्रों से पवित्र जल से स्नान करते समय उनके शरीर का तेज अधिक बढ़ता जा रहा था। अभिषेक के बाद ब्राह्मणों को उन्होंने काफी धन दिया। अयोध्या के बड़े-बड़े मन्दिरों में देवताओं की पूजा की गयी और उन्होंने राजा अतिथि पर कृपा की। अभिषेक के समय बड़ा उत्सव मनाया गया। जैसे वृक्ष को फला-फूला देखकर जान लिया जाता है कि विशेष फल लगेंगे वैसे ही अतिथि के प्रसन्न मुख को देखकर सेवक जान जाते थे कि इनसे विशेष धन मिलेगा आलप छोड़कर अतिथि ने प्रजा का काम किया। राजा अतिथि ने जो मुँह से कहा उसे पूरा किया। जिसको कुछ दे दिया उससे लिया नहीं। यौवन, सौन्दर्य, ऐश्वर्य जिनके पास रहता है वे मतवाले हो जाते हैं, पर राजा अतिथि के पास सब थे फिर भी उनमें अभिमान नहीं था। वे बड़े राजनीतिज्ञ थे। उनकी बातें गुप्त रहती थी, कार्य होने पर ही मालूम पड़ता था। जैसे खुले आकाश में सूर्य की किरणों के फैल जाने से कुछ भी छिपा नहीं रहता वैसे ही अतिथि ने चारों ओर दूतों का ऐसा जाल बिछा दिया कि प्रजा की कोई बात उनसे छिपी नहीं थी। राजाओं के लिए शास्त्रों ने दिन और रात के जो कर्तव्य निर्धारित किये हैं उन सबको राजा अतिथि विश्वास के साथ करते थे। उनकी गुप्तचर व्यवस्था बड़ी सुन्दर थी, किसी को पता नहीं चलता था। जो भी कार्य वे करते थे वे सभी कल्याणकारी होते थे। उन्होंने काम और अर्थ के लिए धर्म को कभी नहीं छोड़ा। वे तीनों के साथ एक-सा व्यवहार करते थे। उन्होंने धन इकट्ठा इसलिए किया कि समय पर दीनों को दिया जाय और लोककल्याण का काम हो। कुश के प्रयत्न से बढ़ी हुई शस्त्रास्त्र चलाना जाननेवाली जो सेना थी उसे अतिथि अपने शरीर के समान प्यार करते थे। जैसे सर्प के शिर से मणि नहीं निकाली जा सकती वैसे ही शत्रु इनकी शक्तियों को अपनी ओर नहीं खींच सकते थे। उन्होंने विघ्नों से तपस्वियों की रक्षा की, चोरों से प्रजाओं की सम्पत्तियों को बचाया। जिस प्रकार वे रक्षा कर रहे थे पृथ्वी भी उसी प्रकार उन्हें ऐश्वर्य देती थी। खानों
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ने रत्न दिये, खेतों ने अन्न दिया और वनों ने उन्हें हाथी दिये। इस प्रकार सभी उपायों से राजनीति चलाते हुए मन्त्रियों की सहायता से उपायों का निर्विघ्न फल प्राप्त किया। युद्धक्षेत्र में अतिथि को देखकर शत्रुओं के छक्के छूट जाते थे और वे प्राण लेकर भाग जाते थे। जो अतिथि के पास जाते थे उन्हें वे पर्याप्त धन दे देते थे। जैसे देवता लोग इन्द्र की आज्ञा मानते हैं वैसे ही राजा लोग अतिथि की आज्ञा मानते थे। अश्वमेध के समय जिन ब्राह्मणों ने यज्ञ कराया उनका सत्कार अतिथि ने कुबेर के समान किया। इन्द्र ने उनके राज्य में वर्षा की, धर्मराज ने धर्मवृद्धि की, यमराज ने रोग बढ़ना रोक दिया और कुबेर ने इनका राजकोष भर दिया। इस प्रकार सभी लोकपालों ने इनके प्रताप से प्रसन्न होकर इनकी सहायता की।
अष्टादश सर्ग
शत्रुओं का नाश करनेवाले राजा अतिथि की रानी निषधराज की कुमारी थी। उससे अतिथि ने निषध पर्वत के समान बलवान् एक पुत्र उत्पन्न किया जिसका नाम निषध रखा। जैसे समय की वर्षा से खेतों को देखकर संसार के प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं वैसे ही अत्यन्त प्रतापी युवराज निषध को देखकर राजा अतिथि भी प्रसन्न हुए। कुमुद्वती के पुत्र अतिथि ने अधिक दिनों तक सुख भोगा, पुनः निषध को राजपाट सौंपकर अपने पुण्यों के बल से पाये हुए स्वर्ग लोक में सुख भोगने चले गये। कमल जैसे नेत्रवाले, समुद्र के समान गम्भीर चित्तवाले और नगर की अर्गला के समान बाहुवाले अद्वितीय वीर निषध ने भी सागर तक फैली हुई पृथ्वी का भोग किया। उनके पीछे अग्नि के समान तेजस्वी उनके पुत्र नल राजा हुए। उन्हें आकाश के समान सांवला नभ नामक पुत्र हुआ जो लोगों को वैसा ही प्यारा हुआ जैसे सावन का महीना। धर्मात्मा नल ने उस पुत्र को उत्तर कोशल का राज्य सौंपकर स्वयं जंगलों में जाकर मृगों के साथ रहने लगे। नभ को पुण्डरीक नामक पुत्र हुआ। पिता के स्वर्ग चले जाने के बाद कमल धारण करनेवाली लक्ष्मी ने उन्हें ही विष्णु मानकर वर लिया। उस पुण्डरीक ने प्रजा का कल्याण करने में समर्थ और शान्त स्वभाववाले अपने पुत्र क्षेमधन्वा को राज सौंप दिया और स्वयं शान्त होकर जंगल में तपस्या करने चले गये। उनको देवानीक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। बड़े-बड़े यज्ञ करने-वाले क्षेमधन्वा अपने ही समान पुत्र को राज्य सौंपकर स्वर्ग चले गये। देवानीक
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का सम्मान शत्रु और मित्र दोनों समान रूप से करते थे । देवानीक के पुत्र का नाम अहीनग था । उसने कभी नीचों का साथ नहीं किया इसलिए व्यसनों से दूर रहकर सारी पृथ्वी का शासन किया । उस शत्रुविजयी राजा के स्वर्गवास के अनन्तर उनके प्रतापी पुत्र अयोध्या के राजा बने । उनको शील नामक बलवान् पुत्र हुआ । शील के उन्नाभ नामक पुत्र हुआ जो सब राजाओं में श्रेष्ठ थे उनका पुत्र वज्रनाभ हुआ । वे अपने पुण्य से स्वर्ग के राजा बने । उनके पीछे शंखण नामक उनका पुत्र सारी पृथ्वी का राजा हुआ । उसके बाद अश्विनीकुमारों जैसा सुन्दर और सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र राजा हुए । उनका दूसरा नाम व्युषिताश्व भी था । उन्होंने काशी विश्वनाथ की आराधना कर विश्वसह नामक पुत्र प्राप्त किया । उनको हिरण्यनाभ उत्पन्न हुआ उनका पुत्र कौशल्य हुआ । उनके पुत्र का नाम वसिष्ठ था वसिष्ठ के पुत्र शिरोमणि हुए । उनको पुत्र नामक पुत्र हुआ । पुत्र की पत्नी से पुष्य नामक पुत्र हुआ उनके पुत्र ध्रुवसन्धि हुए उनके पुत्र सुदर्शन हुए जो बड़े प्रतापी और शक्तिशाली राजा हुए । मन्त्रियों ने चित्र मँगाकर सुन्दर राजकुमारियों से उनका शुभ विवाह कराया ।
ऊनविंश सर्ग
विद्वान् राजा सुदर्शन ने अग्नि के समान तेजस्वी अपने पुत्र अग्निवर्ण को राजा बना दिया और नैमिषारण्य में रहने लगे । वहां वे तीर्थजल पीते, भूमि पर बिछे कुश पर आसीन होते, फल कन्दमूल के आहार की इच्छा छोड़कर तप करने लगे । पिता से प्राप्त पृथ्वी के पालन में अग्निवर्ण को कुछ कठिनाई नहीं हुई । कुछदिनों तक तो उन्होंने स्वयं राजकार्य देखा पर पुनः मन्त्रियों पर भार डालकर कामुक के समान जीवन का रस लेने लगे । नित्य नये उत्सवों में संलग्न होकर क्षणभर भी भोगविलास के बिना नहीं रह सकते थे । हमेशा रनिवास में रहते थे । उनके दर्शन के लिए जनता अधीर रहती थी । वह पराक्रमी राजा सुन्दरी स्त्रियों के साथ हस्तिनी के साथ गजराज के समान क्रीड़ासक्त हो गया । उसकी गोद में बैठने योग्य दो ही वस्तुएँ थीं एक वीणा दूसरी सुन्दरी स्त्रियां । वह सदा नयी-नयी वस्तुओं को चाहता हुआ नित्य नाच, गान, वाद्य आदि में लीन हो गया । वह राजा राज-काज छोड़कर इन्द्रिय सुखों का रस लेता हुआ ऋतुएँ बिताता था । इतना व्यसन में लीन होने पर भी दूसरे राजा उसके राज्य पर
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आक्रमण नहीं करते थे। जैसे दक्ष के शाप से चन्द्रमा को क्षय हो गया था वैसे ही अधिक विलास में आसक्त रहने के कारण उसे भी क्षय हो गया और धीरे-धीरे बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उसका शरीर पीला पड़ गया, दुर्बलता के कारण उसने आभूषण पहनना भी छोड़ दिया। नौकरों के कन्धे का सहारा लेकर चलने लगा। बोली धीमी पड़ गयी यक्ष्मा रोग से सूखकर विरहियों के समान दिखाई देने लगा। राजा के क्षय रोग से पीड़ित होने पर सूर्य्यकुल ऐसा रह गया जैसे एक कलाभर बचा हुआ कृष्णपक्ष की चतुर्दशी का चन्द्रमा हो। जब प्रजा पूछती थी कि राजा को कोई भयानक रोग तो नहीं है। उस समय मन्त्री लोग यह कहकर समझाते कि राजा इस समय पुत्रोत्पत्ति के लिए व्रत आदि कर रहे हैं, इसीलिए दुर्बल होते जा रहे हैं। अनेक रानियों के रहते हुए भी वह राजा पुत्र का मुंह नहीं देख पाया। जैसे वायु के आगे दीपक का कुछ भी वश नहीं चलता वैसे ही राजा भी रोग से नहीं बचाया जा सका। पुरोहितों से मिलकर मन्त्रियों ने रोग-शान्ति के बहाने राजा के शव को राजभवन के उपवन में ही चुपचाप जलती आग में रख दिया और मन्त्रियों ने झट नेताओं को इकट्ठा कर सर्वसम्मति से उस पटरानी को राजसिंहासन पर बैठा दिया जिसमें गर्भ के शुभ चिह्न दिखाई देते थे। राजा की दुःखदमृत्यु से रानी की आँखों में गरम-गरम आँसुओं से तपे हुए गर्भ पर अभिषेक के शीतल जल पड़े तब वह गर्भ शीतल हो गया। इस प्रकार गर्भ ग्रहण किए वह महारानी प्रजा की भलाई के लिए मन्त्रियों की सलाह से भली भांति राजकार्य चलाती रही जिसकी आज्ञा को कोई टाल नहीं सकता था। रघुवंश के अनुसार इसी महारानी के गर्भ से उत्पन्न बालक रघुवंश का अन्तिम राजा माना गया है।
॥ श्रीः ॥
रघुवंशम्
'सञ्जीवनी'-'चन्द्रकला'-टीकाद्वयोपेतम्
—: ० :—
प्रथमः सर्गः
मातापितृभ्यां जगतो नमो वामार्धजानये ।
सद्यो दक्षिणदृक्पातसंकुचद्वामदृष्टये ॥ १ ॥
अन्तरायतिमिरोपशान्तये शान्तपावनमचिन्त्यवैभवम् ।
तन्नरं वपुषि कुञ्जरं मुखे मन्महे किमपि तुन्दिलं महः ॥ २ ॥
शरणं करवाणि शर्मदं ते चरणं वाणि ! चराचरोपजीव्यम् ।
करुणामसृणैः कटाक्षपातैः कुरु मामम्ब ! कृतार्थसार्थवाहम् ॥ ३ ॥
वाणीं काणभुजीमजीगणदवाशासीच्च वैयासिकी-
मन्तस्तन्त्रमरंस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् ।
वाचामाकलयद्रहस्यमखिलं यश्चाक्षपादस्फुरां
लोकेऽभूद्यदुपज्ञमेव विदुषां सौजन्यजन्यं यशः ॥ ४ ॥
मल्लिनाथकविः सोऽयं मन्दात्मानुजिघृक्षया ।
व्याचष्टे कालिदासीयं काव्यत्रयमनाकुलम् ॥ ५ ॥
कालिदासगिरां सारं कालिदासः सरस्वती ।
चतुर्मुखोऽथवा साक्षाद्विदुर्नान्ये तु मादृशाः ॥ ६ ॥
तथाऽपि दक्षिणावर्तनाथाद्यैः क्षुण्णवर्त्मसु ।
वयं च कालिदासोक्तिष्ववकाशं लभेमहि ॥ ७ ॥
भारती कालिदासस्य दुर्व्याख्याविषमूर्च्छिता ।
एषा सञ्जीवनी टीका तामद्योज्जीवयिष्यति ॥ ८ ॥
इहान्वयमुखेनैव सर्वं व्याख्यायते मया ।
नामूलं लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥ ९ ॥
| २ | रघुवंशमहाकाव्ये |
|---|
इह खलु सकलकविशिरोमणिः कालिदासः "काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे" इत्याद्यलङ्कारिकवचनप्रामाण्यात्काव्यस्यानेकश्रेयःसाधनतां, 'काव्यालापांश्च वर्जयेद्' इत्यस्य निषेधशास्त्रस्यासत्काव्यविषयतां च पश्यन् रघुवंशाख्यमहाकाव्यं चिकीर्षुः, चिकीर्षितार्थविघ्नपरिसमाप्तिसम्प्रदायाविच्छेदलक्षणफलसाधनभूतविशिष्टदेवतानमस्कारस्य शिष्टाचारपरिप्राप्तत्वाद् 'आशीर्नमस्क्रियावस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम्' इत्याशीर्वादाद्यन्यतमस्य प्रबन्धमुखलक्षणत्वात्, काव्यनिर्माणस्य विशिष्टशब्दार्थप्रतिपत्तिमूलकत्वेन विशिष्टशब्दार्थयोश्च 'शब्दजातमशेषं तु धत्ते शर्वस्य वल्लभा । अर्थरूपं यदखिलं धत्ते मुग्धेन्दुशेखरः' इति वायुपुराणसंहितावचनबलेन पार्वतीपरमेश्वरायत्तदर्शनात्तत्प्रतिपित्सया तावेवाभिवादयते—
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥ १ ॥
अन्वयः—( अहं ) वागर्थौ इव संपृक्तौ जगतः पितरौ पार्वतीपरमेश्वरौ वागर्थप्रतिपत्तये वन्दे ।
**सञ्जीवनी—**वागिति । वागर्थाविवेत्येकं पदम् । इवेन सह नित्यसमासो विभक्त्यलोपश्च । पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं चेति वक्तव्यम् । एवमन्यत्रापि द्रष्टव्यम् । वागर्थाविव शब्दार्थाविव सम्पृक्तौ नित्यसम्बद्धावित्यर्थः । नित्यसम्बद्धयोरुपमानत्वेनोपादानात् । 'नित्यः शब्दार्थसम्बन्धः' इति मीमांसकः । जगतो लोकस्य पितरौ । माता च पिता च पितरौ । 'पिता मात्रा' इति द्वन्द्वैकशेषः । 'मातापितरौ पितरौ मातरपितरौ प्रसूजनयितारौ' इत्यमरः । एतेन शर्वशर्वयोः सर्वजगज्जनकत्या वैशिष्टद्यमिष्टार्थप्रदानशक्तिः परमकारुणिकत्वं च सूच्यते । पर्वतस्यापत्यं स्त्री पार्वती 'तस्यापत्यम्' इत्यण् । 'टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्०' इत्यादिना ङीप् । पार्वती च परमेश्वरश्च पार्वतीपरमेश्वरौ । परमशब्दः सर्वोत्तमत्वद्योतनार्थः । मातुरभ्यर्हितत्वादल्पाक्षरत्वाच्च पार्वतीशब्दस्य पूर्वनिपातः । वागर्थप्रतिपत्तये शब्दार्थयोः सम्यग्ज्ञानार्थं वन्देऽभिवादये । अत्रोपमाऽलङ्कारः स्फुट एव । तथोक्तं—"स्वतः सिद्धेन भिन्नेन सम्पन्नेन च धर्मतः । साध्यमन्येन वर्णस्य वाच्यं चेदेकगोपमा" इति प्रायिकश्चोपमाऽलङ्कारः । कालिदासोक्तकाव्यादौ । भूदेवताकस्य सर्वगुरोर्मगणस्य प्रयोगाच्छुभलाभः सूच्यते । तदुक्तं—"शुभदो मो भूमिमयः" इति वकारस्यामृतबीजत्वप्रचयगमनादिसिद्धिः ।
जिस परात्पर ब्रह्म का संसार लेता नाम है ।
जिसने रचा यह विश्व अद्भुत ललित लीलाधाम है ॥
प्रथमः सर्गः ३
रघुवंश का आदर्श जो मानवशिरोमणि राम है।
उस ईश को श्रीकृष्णमणि का बार बार प्रणाम है ॥
**भाषार्थ—**शब्द और अर्थ के समान सदा सम्मिलित, संसार के माता-पिता भगवान् शिव और पार्वती को वाणी और अर्थ की सिद्धि के लिए नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
क्व ? सूर्यप्रभवो वंशः क्व ? चाल्पविषया मतिः ।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ॥ २ ॥
**अन्वयः—**सूर्यप्रभवः वंशः क्व, अल्पविषया मतिः च क्व, दुस्तरं सागरं मोहात् उडुपेन तितीर्षुः अस्मि ।
क्वेति । प्रभवत्यस्मादिति प्रभवः कारणम् । ‘ऋदोरप्’ । ‘अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्’ इति साधुः । सूर्यः प्रभवो यस्य सः सूर्यप्रभवो वंशः क्व ? अल्पो विषयो ज्ञेयोऽर्थो यस्या सा मे मतिः प्रज्ञा च क्व ? द्वौ क्वशब्दौ महदन्तरं सूचयतः । सूर्यवंशमाकलयितुं न शक्नोमीत्यर्थः । तथा च तद्विषयप्रबन्धनिरूपणं तु दूरापास्तमिति भावः । तथा हि दुस्तरं तरितुमशक्यम् । ‘ईषद्वुःसुषु०’ इत्यादिना खल्प्रत्ययः । सागरं मोहादज्ञानादुडुपेन प्लवेन । ‘उडुपं तु प्लवः कोलः’ इत्यमरः । अथवा चर्मावनद्धेन यानपात्रेण । ‘चर्मावनद्धमुडुपं प्लवः काष्ठं करण्डवत्’ इति सज्जनः । तितीर्षुस्तरीतुमिच्छुरस्मि भवामि । तरतेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । अल्पसाधनैरधिकारम्भो न सुकर इति भावः । इदं च वंशोत्कर्ष कथनं स्वप्रबन्धमहत्त्वार्थमेव । तदुक्तम्—‘प्रतिपाद्यमहिम्ना च प्रबन्धो हि महत्तरः’ इति ।
**भाषार्थ—**कहाँ सूर्य से उत्पन्न वंश और कहाँ अल्प विषय जानने वाली मेरी बुद्धि ! (मैं) दुस्तर समुद्र को अज्ञानता के कारण छोटी नाव से पार करना चाहता हूँ ॥ २ ॥
मन्दः सन् महाकाव्यं चिकीर्षुः कविः स्वासामर्थ्यं कथयति—
मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः ॥ ३ ॥
**अन्वयः—**मन्दः कवियशःप्रार्थी प्रांशुलभ्ये फले लोभात् उद्बाहुः वामन इव उपहास्यतां गमिष्यामि ।
मन्द इति । किं च मन्दो मूढः । ‘मूढाल्पापटुनिर्भाग्या मन्दाः स्युः’ इत्यमरः । तथाऽपि कवियशःप्रार्थी कवीनां यशः काव्यनिर्माणेण जातं तत्प्रार्थनशीलोऽहंप्रांशुनोन्नतपुरुषेण लभ्ये प्राप्ये फले फलविषये लोभादुद्बाहुः फलग्रहणायोच्छ्रितहस्तो
४ | रघुवंशमहाकाव्ये
वामनः खर्व इव । 'खर्वो ह्रस्वश्च वामनः' इत्यमरः । उपहास्यतामुपहासविषयताम् 'ऋहलोर्ण्यत्' इति ण्यत्प्रत्ययः गमिष्यामि प्राप्स्यामि ।
भावार्थ— कवियों की कीर्ति की अभिलाषी ( मैं ) लम्बे मनुष्यों के द्वारा पाने योग्य फल की ओर लोभ से ऊपर हाथ उठाये हुए बौने पुरुष के समान उपहासास्पद होऊँगा ॥ ३ ॥
मन्दश्चेत्तर्हि त्यज्यतामयमुद्योग इत्यत आह—
अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन्पूर्वसूरिभिः ।
मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः ॥ ४ ॥
अन्वयः— अथवा पूर्वसूरिभिः कृतवाग्द्वारे अस्मिन् वंशे वज्रसमुत्कीर्णे मणौ सूत्रस्य इव मे गतिः अस्ति ।
अथवेति । अथवा पक्षान्तरे पूर्वैः सूरिभिः कविभिर्वाल्मीक्यादिभिः कृतवाग्द्वारे कृतं रामायणादिप्रबन्धरूपा या वाक् सैव द्वारं प्रवेशो यस्य तस्मिन् । अस्मिन्सूर्यभवे वंशे कुले । जन्मनैकलक्षणः सन्तानो वंशः । वज्रेण मणिवेधकसूचीविशेषेण । 'वज्रं त्वची कुलिशशस्त्रयोः । मणिवेधे रत्नभेदे' इति केशवः । समुत्कीर्णे विद्धे मणौ रत्ने सूत्रस्येव मे मम गतिः सञ्चारोऽस्ति । वर्णनीये रघुवंशे मम वाक्प्रसरोऽस्तीत्यर्थः ।
भावार्थ— पूर्व में वर्तमान विद्वानों द्वारा वर्णन किये गये इस वंश में सूई से छेदे हुए मणि में सूत्र के समान मेरी गति है ॥ ४ ॥
एवं रघुवंशे लब्धप्रवेशस्तद्वर्णनां प्रतिजानानः 'सोऽहम्' इत्यादिभिः पञ्चभिः श्लोकैः कुलकेनाह—
सोऽहमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् ।
आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवर्त्मनाम् ॥ ५ ॥
यथाविधिहुताग्नीनां यथाकामाच्चितार्थिनाम् ।
यथाऽपराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ॥ ६ ॥
त्यागाय संभृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम् ।
यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ॥ ७ ॥
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् ।
वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥ ८ ॥
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन् ।
तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः ॥ ९ ॥
अन्वयः— आजन्मशुद्धानाम् आफलोदयकर्मणाम् आसमुद्रक्षितीशानाम् आनाकरथवर्त्मनाम् यथाविधिहुताग्नीनाम् यथाकामाच्चितार्थिनाम् यथापराधदण्डानाम्
प्रथमः सर्गः ५
यथाकालप्रबोधिनाम् त्यागाय संभृतार्थानाम् सत्याय मितभाषिणाम् यशसे विजगी-
षूणाम् प्रजायै गृहमेधिनाम् शैशवे अभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणां वार्द्धके
मुनिवृत्तीनां अन्ते योगेन तनुत्यजाम् रघूणाम् अन्वयम् तनुवाग्विभवः अपि तद्गुणैः
कर्णम् आगत्य चापलाय प्रचोदितः सन् अहम् वक्ष्ये ।
स इति । सोऽहं 'रघूणामान्वयं वक्ष्ये' इत्युत्तरेण सम्बन्धः । किविधानां
रघूणामित्यत्रोत्तराणि विशेषणानि योज्यानि । आजन्मनः । जन्मारभ्येत्यर्थः ।
'आङ् मर्यादाऽभिविध्योः' इत्यव्ययीभावः । शुद्धानाम् । सुप्सुपेति समासः । एव-
मुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम् । आजन्मशुद्धानाम् । निषेकादिसंस्कारसम्पन्नानामित्यर्थः ।
आफलोदयमाफलसिद्धेः कर्म येषां ते तथोक्तास्तेषाम् । प्रारब्धान्तर्गामिनामित्यर्थः ।
आसमुद्रं क्षितेरीशानाम् सार्वभौमानामित्यर्थः । आनाकं रथवर्त्म येषां तेषाम् ।
इन्द्रसहचारिणामित्यर्थः । अत्र सर्वत्राङोऽभिविध्यर्थत्वं द्रष्टव्यम् । अन्यथा
मर्यादाऽर्थत्वे जन्मादिषु शुद्धयभावप्रसङ्गात् । यथेति । विधिमनतिक्रम्य यथाविधि ।
'यथाऽसादृश्ये' इत्यव्ययीभावः । तथा हुतशब्देन सुप्सुपेति समासः । एवं 'यथा-
कामर्चित'—इत्यादीनामपि द्रष्टव्यम् । यथाविधि हुता अग्नयो यैस्तेषाम् ।
यथाकाममभिलाषमनतिक्रम्यार्चितार्थिनाम् । यथाऽपराधमपराधमनतिक्रम्य दण्डो
येषां तेषाम् । यथाकालं कालमनतिक्रम्य प्रबोधिनां प्रबोधनशीलानाम् । चतुर्भि-
र्विशेषणैर्देवतायजनातिथिसत्कारदण्डधरत्वप्रजापालनसमयजागरुकत्वादीनि विव-
क्षितानि । त्यागायेति । त्यागाय सत्पात्रे विनियोगस्त्यागस्तस्मै । 'त्यागो विहा-
पितं दानम्' इत्यमरः । संभृतार्थानां सञ्चितधनानाम् । न तु दुर्व्यापाराय ।
सत्याय मितभाषिणां मितभाषणशीलनाम् । न तु पराभवाय । यशसे कीर्तये ।
'यशः कीर्तिः समज्या च' इत्यमरः । विजिगीषूणां विजेतुमिच्छूनाम् । न त्वर्थ-
संग्रहाय । प्रजायै संतानाय गृहमेधिनां दारपरिग्रहाणाम् । न तु कामोपभोगाय ।
अत्र 'त्यागाय' इत्यादिषु 'चतुर्थी तदर्थार्थ—' इत्यादिना तादर्थ्ये चतुर्थीसमास-
विधानज्ञापकाच्चतुर्थी । गृहैर्दारैर्मेधन्ते सङ्गच्छन्त इति गृहमेधिनः । 'दारेष्वपि
गृहाः पुंसि' इत्यमरः । 'जाया च गृहिणी गृहम्' इति हलायुधः । 'मेधृ सङ्गमे' इति
धातोर्णिनिः । एभिर्विशेषणैः परोपकारित्वं सत्यवचनत्वं यशःपरत्वं पितॄणां शुद्धत्वं
च विवक्षितानि ॥ शैशव इति । शिशोर्भावः शैशवं बाल्यम् । 'प्राणभृज्जातिवयो-
वचनोद्गात्र—'इत्यञ्प्रत्ययः । 'शिशुत्वं शैशवं बाल्यम्' इत्यमरः । तस्मिन्
वयस्यभ्यस्तविद्यानाम् । एतेन ब्रह्मचर्याश्रमो विवक्षितः । यूनो भावो यौवनं
तारुण्यम् । युवादित्वादण्प्रत्ययः । 'तारुण्यं यौवनं समे' इत्यमरः । तस्मिन् वयसि
६ रघुवंशमहाकाव्ये
विषयैषिणां भोगाभिलाषिणाम् । एतेन गृहस्थाश्रमो विवक्षितः । वृद्धस्य भावो वार्धकं वृद्धत्वम् । 'द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च' इति वुञ्प्रत्ययः । 'वार्द्धकं वृद्धसंघाते वृद्धत्वे वृद्धकर्मणि' इति विश्वः । सङ्घातार्थे च 'वृद्धाच्च' इति वक्तव्यात्सामूहिको वुञ् । तस्मिन् वार्द्धके वयसि मुनीनां वृत्तिरिव वृत्तिर्येषां तेषाम् । एतेन वानप्रस्थाश्रमो विवक्षित अन्ते शरीरत्यागकाले योगेन परमात्मध्यानेन । 'योगः संनहनोपायध्यानसङ्गतियुक्तिषु' इत्यमरः । तनुं देहं त्यजन्तीति तनुत्यजां देहत्यागिनाम् । 'कायो देहः क्लीबपुंसोः स्त्रियां मूर्तिस्तनुस्तनूः' इत्यमरः । 'अन्येभ्योऽपि दृश्यते इति क्विप् । एतेन भिक्ष्वाश्रमो विवक्षितः ॥ रघूणामिति । सोऽहं लब्धप्रवेशः । तनुवाग्विभवोऽपि स्वल्पवाणीप्रसारोऽपि सन् । तेषां रघूणां गुणैस्तद्गुणैः । आजन्मशुद्ध्यादिभिः कर्तृभिः कर्णं मम श्रोत्रमागत्य चापलाय चापलं चपलकर्माविमृश्यकरणरूपं कर्तुम् । युवादित्वात्कर्मण्यण् । 'क्रियाऽर्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः' इत्यनेन चतुर्थी । प्रचोदितः प्रेरितः सन् । रघूणामन्वयं सद्विषयप्रबन्धं वक्ष्ये । कुलकम् ।
**भावार्थ—**जन्म से ही शुद्ध, फल की प्राप्ति तक कर्म करने वाले, समुद्र पर्यन्त पृथ्वी के मालिक, स्वर्गंतक रथ को ले जानेवाले, विधिपूर्वक यज्ञों से अग्नि को तृप्त करनेवाले, याचकों को मनोनुकूल दान देनेवाले, अपराध के अनुसार दण्ड देनेवाले, उचित समय पर जागरूक, दान के लिए धन का संग्रह करने वाले, सत्य के लिए कम बोलने वाले, यश की इच्छा से विजय चाहने वाले, सन्तान के लिए विवाह करनेवाले, बाल्यावस्था में विद्या पढ़ने वाले, युवावस्था में भोग की इच्छा रखने वाले, वृद्धावस्था में मुनियों की तरह जंगलों में रह कर तपस्या करने वाले और अन्त में योगाभ्यास के द्वारा शरीर त्यागने वाले, रघुवंशियों के गुणों से आकृष्ट होकर मैं ( अल्पमति होकर भी ) उनके वंश का वर्णन करूँगा ॥ ५–९ ॥
सम्प्रति स्वप्रबन्धपरीक्षार्थं सतः प्रार्थयते—
तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति सदसद्व्यक्तिहेतवः ।
हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकाऽपि वा ॥ १० ॥
**अन्वयः—**सदसद्व्यक्तिहेतवः सन्तः तं श्रोतुम् अर्हन्ति, हि हेम्नः विशुद्धिः श्यामिका अपि वा अग्नौ संलक्ष्यते ॥ १० ॥
तमिति । तं रघुवंशाख्यं प्रबन्धं सदसतोगुणदोषयोर्व्यक्तेर्हेतवः कर्तारः सन्तः श्रोतुमर्हन्ति । तथा हि । हेम्नो विशुद्धिर्निर्दोषस्वरूपं श्यामिकाऽपि लोहान्तर
प्रथमः सर्गः
संसर्गात्मको दोषोऽपि वाऽग्नौ संलक्ष्यते, नान्यत्र; तद्वदत्रापि सन्त एवं गुणदोषविवेकाधिकारिणः । नान्य इति भावः ।
भावार्थ—सत्यासत्य का विवेचन करनेवाले सज्जन लोग उसके सुनने के योग्य हैं, क्योंकि सोने की अच्छाई और बुराई की परीक्षा आग में ही होती है ॥१०॥
वर्ण्यं वस्तूपक्षिपति श्लोकद्वयेन—
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् ।
आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥ ११ ॥
अन्वयः—मनीषिणां माननीयः वैवस्वतः नाम मनुः छन्दसां प्रणवः इव महीक्षिताम् आद्यः आसीत् ।
वैवस्वत इति । मनस ईषिणो मनीषिणो धीराः । विद्वांस इति यावत् । पृषोदरादित्वात्साधुः । तेषां माननीयः पूज्यः । छन्दसां वेदानाम् । 'छन्दः पद्ये च वेदे च' इति विश्वः । प्रणवः ओंकार इव । महीं क्षियन्तीशत इति महीक्षितः क्षितीश्वराः । क्षिधातोरैश्वर्यार्थात्क्विप् तुगागमश्च । तेषामाद्य आदिभूतः । विवस्वतः सूर्यस्यापत्यं पुमान्वैवस्वतो नाम वैवस्वत इति प्रसिद्धो मनुरासीत् ।
भावार्थ—विद्वानों के सम्मान्य वैवस्वत मनु वेदों में ॐकार के समान राजाओं में प्रथम हुए ॥ ११ ॥
वर्ण्ये रघुवंशे प्रधानपुरुषस्य रघोः पितृनामकथनम्—
तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः ।
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दुः क्षीरनिधाविव ॥ १२ ॥
अन्वयः—शुद्धिमति तदन्वये शुद्धिमत्तरः दिलीप इति राजेन्दु क्षीरनिधौ इन्दुः इव प्रसूतः ।
तदिति । शुद्धिरस्यास्तीति शुद्धिमान् । तस्मिञ्छुद्धिमति तदन्वये तस्य मनोरन्वये वंशे । 'अन्ववायोऽन्वयो वंशो गोत्रं चाभिजनं कुलम्' इति हलायुधः । अतिशयेन शुद्धिमाञ्छुद्धिमत्तरः । 'द्विवचनविभज्योप' इत्यादिना तरप् । दिलीप इति प्रसिद्धो राजा इन्दुरिव राजेन्दू राजश्रेष्ठः । 'उपमितं व्याघ्रादिभिः' इत्यादिना समासः क्षीरनिधाविन्दुरिव प्रसूतो जातः ।
भावार्थ—वैवश्वत मनु के उस पवित्र वंश में अतिपवित्र दिलीप नामक श्रेष्ठ राजा क्षीरसागर में चन्द्रमा के समान उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥
:८ रघुवंशमहाकाव्ये
'व्यूढ' इत्यादिस्त्रिभिः श्लोकैर्दिलीपं विशिनष्टि—
व्यूढोरस्को वृषस्कन्धः शालप्रांशुर्महाभुजः ।
आत्मकर्मक्षमं देहं क्षात्रो धर्म इवाश्रितः ॥ १३ ॥
**अन्वयः—**व्यूढोरस्कः वृषस्कन्धः शालप्रांशुः महाभुजः ( स ) आत्मकर्मक्षमं देहम् आश्रितः क्षात्रः धर्म इव ( स्थितः ) ।
व्यूढेति । व्यूढं विपुलमुरो यस्य स व्यूढोरस्कः । 'उरःप्रभृतिभ्यः कप्' इति कप्प्रत्ययः । 'व्यूढं विपुलं भद्रं स्फारं समं वरिष्ठं च' इति यादवः । वृषस्य स्कन्धः इव स्कन्धो यस्य स तथा । 'सप्तम्युपमान—' इत्यादिनात्तरपदलोपी बहुव्रीहिः । शालो वृक्ष इव प्रांशुरुन्नतः शालप्रांशुः । 'प्राकारवृक्षयोः शालः शालः सर्जतरुः स्मृतः' इति यादवः । 'उच्चप्रांशून्नतोदग्रोच्छ्रितास्तुङ्गे' इत्यमरः । महाभुजो महाबाहुः । आत्मकर्मक्षमं स्वव्यापारानुरूपं देहमाश्रित प्राप्तः क्षात्रः क्षत्रसंबन्धो धर्म इव स्थितः । मूर्तिमान् पराक्रम इव स्थित इत्युत्प्रेक्षा ।
**भाषार्थ—**विशाल वक्षःस्थल वाले वृष के समान उन्नत स्कन्ध वाले सखुआ के वृक्ष के समान लम्बी २ भुजावाले ( वे दिलीप ) अपने कर्म के अनुसार देह धारण किये हुए थे । मालूम होता था कि वे क्षत्रियों के मूर्तिमान् धर्म हैं ॥१३॥
सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोऽभिभाविना ।
स्थितः सर्वोन्नतेनोर्वी क्रान्त्वा मेरुरिवात्मना ॥ १४ ॥
**अन्वयः—**सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोऽभिभाविना सर्वोन्नतेन आत्मना मेरुः इव उर्वी क्रान्त्वा स्थितः ।
सर्वेति । सर्वातिरिक्तसारेण सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽधिकबलेन । 'सारो बले स्थिरांशे च' इत्यमरः । सर्वाणि भूतानि तत्तेजसाऽभिभवतीति सर्वतेजोऽभिभावी तेन । सर्वेभ्यः उन्नतेनात्मना शरीरेण 'आत्मा देहे धृतौ जीवे स्वभावे परमात्मनि' इति विश्वः । मेरुरिव । उर्वी क्रान्त्वाऽऽक्रम्य स्थितः । मेरावपि विशेषणानि तुल्यानि । "अष्टाभिश्च सुरेन्द्राणां मात्राभिर्निर्मितो नृपः । तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा" इति मनुवचनाद्राज्ञः सर्वतेजोऽभिभावित्वं ज्ञेयम् ।
**भाषार्थ—**सभी प्राणियों से अधिक बलशाली सभी जीवों को अपने तेज से पराभूत करनेवाले सबसे उन्नतशील शरीर के द्वारा सुमेरु के समान पृथ्वी को आक्रान्त करके स्थित थे ॥ १४ ॥
आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः ।
आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः ॥ १५ ॥
प्रथमः सर्गः
९
**अन्वयः—**आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः आगमैः सदृशारम्भः आरम्भसदृशोदयः।
आकारेति। आकारेण मूर्त्या सदृशी प्रज्ञा यस्य सः। प्रज्ञया सदृशागमः प्रज्ञाऽनुरूपशास्त्रपरिश्रमः। आगमैः सदृश आरम्भः कर्म यस्य स तथोक्तः। आरभ्यते इत्यारम्भः कर्म। तत्सदृशः उदयः फलसिद्धिर्यस्य स तथोक्तः।
**भाषार्थ—**वे आकार के अनुरूप बुद्धिवाले, बुद्धि के समान शास्त्र का अभ्यास करनेवाले, शास्त्राभ्यास के अनुसार उद्योग करनेवाले और उद्योग के अनुसार फलको प्राप्त करनेवाले (थे) ॥ १५ ॥
तस्य भयङ्करत्वं मनोरमत्वञ्च दर्शयति—
भीमकान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् ।
अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः ॥ १६ ॥
**अन्वयः—**भीमकान्तैः नृपगुणैः च स उपजीविनां यादोरत्नैः अर्णव इव अधृष्यः अभिगम्यः च बभूव ।
भीमेति। भीमैश्च कान्तैश्च नृपगुणैः राजगुणैस्तेजःप्रतापादिभिः कुलशीलादाक्षिण्यादिभिश्च स दिलीप उपजीविनामाश्रितानाम्। यादोभिर्जलजीवैः 'यादांसि जलजन्तवः' इत्यमरः। रत्नैश्चार्णव इव। अधृष्योऽनभिभवनीयः अभिगम्य आश्रयणीयश्च बभूव।
**भाषार्थ—**भयंकर और मनोहर राजगुणों से वे आश्रितजनों को जलजन्तु और रत्नों से समुद्र के समान दूर रखनेवाले आश्रयदाता हुए ॥ १६ ॥
तस्य प्रजा राजनिशेवर्त्तिन्य इत्याह—
रेखामात्रमपि क्षुण्णादा मनोर्वर्त्मनः परम् ।
न व्यतीयुः प्रजास्तस्य नियन्तुर्नेमिवृत्तयः ॥ १७ ॥
**अन्वयः—**नियन्तुः तस्य नेमिवृत्तयः प्रजाः आत्मनोः क्षुण्णात् वर्त्मनः रेखामात्रमपि न व्यतीयुः।
रेखेति। नियन्तुः शिक्षकस्य सारथेश्च तस्य दिलीपस्य संबन्धिनो नेमीनां चक्रधाराणां वृत्तिरिव वृत्तिर्व्यापारो यासां ताः, 'चक्रधारा प्रधिर्नेमिः' इति यादवः। 'चक्रं रथाङ्गं तस्यान्ते नेमिः स्त्री स्यात्प्रधिः पुमान्' इत्यमरः। प्रजाः। आ मनोः, मनुमारभ्येत्यभिविधिः। पदद्वयं चैतत्। समासस्य विभाषितत्वात्। क्षुण्णादभ्यस्तात्प्रहताच वर्त्मन आचारपद्धतेरध्वनश्च परमधिकम्। इतस्तत इत्यर्थः। रेखा प्रमाणमस्येति रेखामात्रं रेखाप्रमाणम्। ईषदपीत्यर्थः। 'प्रमाणे द्वय-
१० रघुवंशमहाकाव्ये
स्रुजद्धनञ्मात्रचः' इत्यनेन मात्रच्प्रत्ययः । परशब्दविशेषणं चैतत् । न व्यतीयुर्ना-
तिक्रान्तवत्यः । कुशलसारथिप्रेरिता रथनेमय इव तस्या प्रजाः पूर्वक्षुण्णमार्गं
न जहुरिति भावः ।
भाषार्थ—नियामक उस दिलीप की प्रजा गाड़ी के पहिए के समान मनु-
काल से अभ्यस्त मार्ग से रेखामात्र भी बाहर न चली ॥ १७ ॥
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् ।
सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥ १८ ॥
अन्वयः—स प्रजानाम् एव भूत्यर्थं ताभ्यः बलिम अग्रहीत्, हि रविः सहस्र
गुणं उत्स्रष्टुं रसम् आदत्ते ।
प्रजानामिति । स राजा प्रजानां भूत्याय अर्थात् भूत्यर्थं वृद्धयर्थमेव । 'अर्थेन
सह नित्यसमासः, सर्वलिङ्गता च वक्तव्या' ग्रहणक्रियाविशेषणं चैतत् । ताभ्यः
प्रजाभ्यो बलिं षष्ठांशरूपं करमग्रहीत् । 'भागधेयः करो बलिः' इत्यमरः । तथाहि ।
रविःसहस्रं गुणा यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा सहस्रगुणं सहस्रधोत्स्रष्टुं दातुम् ।
उत्सर्जनक्रियाविशेषणं चैतत् । रसममादत्ते गृह्णाति । 'रसो गन्धे रसे स्वादे
तिक्तादौ विषरोगयोः । शृङ्गारादौ द्रवे वीर्ये देहधात्वम्बुपारदे' इति विश्वः ।
भाषार्थ—प्रजा के कल्याण के लिए ही वे उनसे कर लेते थे जैसे सूर्य
हजार गुना जल बरसाने के लिए ( पृथ्वी से ) रस खींचते हैं ॥ १८ ॥
सम्प्रति बुद्धिशौर्य्यसम्पन्नस्य तस्यार्थसाधनेषु परानपेक्षतत्वमाह—
सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् ।
शास्त्रेष्वकुण्ठिता बुद्धिर्मोर्वी धनुषि चातता ॥ १९ ॥
अन्वयः—तस्य सेना परिच्छदः ( बभूव ) । अर्थसाधनं द्वयम् एव
( आसीत् ) । शास्त्रेषु अकुण्ठिता बुद्धिः, धनुषि आतता मौर्वी च ।
सेनेति । तस्य राज्ञः सेना चातुरङ्गबलम् परिच्छाद्यतेऽनेनेति परिच्छद उप-
करणं । बभूव । छत्रचामरादितुल्यमभूदित्यर्थः । 'पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण' इति
घ-प्रत्ययः । छादेर्घेऽद्व्युपसर्गस्य' इत्युपधाह्रस्वः । अर्थस्य प्रयोजनस्य तु साधनं
द्वयमेव । शास्त्रेष्वकुण्ठिताऽव्याहता बुद्धिः । 'व्यापृतां' इत्यपि पाठः । धनुष्या-
तताऽऽरोपिता मौर्वी ज्या च । 'मौर्वी ज्या शिञ्जिनी गुणः' इत्यमरः । नीति-
पुरःसरमेव तस्य शौर्यमभूदित्यर्थः ।
भाषार्थ—दिलीप की सेना शोभामात्र थी । उनके साधन दो ही थे—एक
शास्त्रों में अप्रतिहत बुद्धि और दूसरी धनुष पर चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा ॥ १९ ॥
प्रथमः सर्गः ११
राज्यमूलं मन्त्रसंरक्षणं तस्यासीदित्याह—
तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेङ्गितस्य च ।
फलानुमेयाः प्रारम्भाः संस्काराः प्राक्तना इव ॥ २० ॥
अन्वयः—संवृतमन्त्रस्य गूढाकारोङ्गितस्य च तस्य प्रारम्भा प्राक्तनाः संस्कारा इव फलानुमेयाः ( आसन् ) ।
तस्येति । संवृतमन्त्रस्य गुप्तविचारस्य । ‘वेदभेदे गुप्तवादे मन्त्रः’ इत्यमरः । शोकहर्षादिसूचको भृकुटीमुखरागादिराकार इङ्गितं चेष्टितं हृदयगतविकारो वा । ‘इङ्गिते हृद्गतो भावो बहिराकार आकृतिः’ इति सज्जनः । गूढे आकारेङ्गिते तस्य स्वभावचापलाद् भ्रमपरम्परया मुखरागादिलिङ्गैर्वाऽतृतीयगामिमन्त्रस्य तस्य प्रारभ्यन्त इति प्रारम्भाः सामाद्युपायप्रयोगाः । प्रागित्यव्ययेन पूर्वजन्मोच्यते तत्र भवाः प्राक्तनाः ‘सायंचिरं’ इत्यनेन ट्युल्प्रत्ययः संस्काराः पूर्वकर्मवासना इव । फलेन कार्येणानुमेया अनुमातुं योग्या आसन् । अत्र याज्ञवल्क्यः—‘ मन्त्रमूलं यतो राज्यमतो मन्त्रं सुरक्षितम् । कुर्याद्यथा तन्न विदुः कर्मणामाफलोदयात्’ इति ।
भाषार्थ—अपना विचार गुप्त रखने वाले और आकार एवं चेष्टा को छिपाये रखने वाले उनके कार्य पूर्व जन्म के संस्कारों के समान फल द्वारा ही अनुमित किये जाते थे ॥ २० ॥
सम्प्रति सामाद्युपायान्विनेवात्मरक्षाऽऽदिकं कृतवानित्याह—
जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः ।
अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ॥ २१ ॥
अन्वयः—स अत्रस्तः ( सन् ) आत्मानं जुगोप, अनातुरः ( सन् ) धर्मं अगृध्नुः ( सन् ) अर्थम् आददे, असक्तः ( सन् ) सुखम् अन्वभूत् ।
जुगोपेति । अत्रस्तोऽभीतः सन् । ‘त्रस्तो, भीरुभीरुकभीलुकाः’ इत्यमरः । त्रासोपाधिमन्तरेणैव त्रिवर्गसिद्धेः प्रथमसाधनत्वादेवात्मानं शरीरं जुगोप रक्षितवान् । अनातुरोऽरुग्ण एव धर्मं सुकृतं भेजे । अचितवानित्यर्थः । अगृध्नुरगर्धनशील एवार्थमाददे स्वीकृतवान् । ‘गृध्नुस्तु गर्धनः । लुब्धोऽभिलाषुकस्तृष्णक्समौ लोलुपलोलुभौ’ इत्यमरः । ‘त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः’ इति क्नुप्रत्ययः । असक्त आसक्तिरहित एव सुखमन्वभूत् ।
भाषार्थ—वे निर्भीक होकर अपनी रक्षा करते थे, अरोग रहकर धर्म करते थे, लोभरहित होकर धनोपार्जन करते थे, आसक्तिरहित होकर सुख का अनुभव करते थे ॥ २१ ॥
| १२ | रघुवंशमहाकाव्ये |
|---|
परस्परविरुद्धानामपि गुणानां तत्र साहचर्य्यमासीदित्याह—
ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्य्ययः ।
गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ॥ २२ ॥
अन्वयः—ज्ञाने मौनम्, शक्तौ क्षमा, त्यागे श्लाघाविपर्ययः तस्य गुणाः गुणानुबन्धित्वात् सप्रसवा इव ( अभूवन् ) ।
ज्ञान इति । ज्ञाने परवृत्तान्तज्ञाने सत्यपि मौनं वाङ्नियमनम् । यथाऽऽह कामन्दकः—' 'नान्योपतापि वचनं मौनं व्रतचरिष्णुता' इति । शक्तौ प्रतीकारसामर्थ्येऽपि क्षमा अपकारसहनम् । अत्र चाणक्यः—'शक्तानां भूषणं क्षमा' इति। त्यागे वितरणे सत्यपि श्लाघाया विकत्थनस्य विपर्ययोऽभावः । अत्राह मनुः— 'न दत्वा परिकीर्त्तयेद्' इति । इत्थं तस्य गुणा ज्ञानादयो गुणैर्विरुद्धैर्मौनादिभिरनुबन्धित्वात्सहचारित्वात् सह प्रसवो जन्म येषां ते सप्रसवाः सोदरा इवाभूवन् । विरुद्धा अपि गुणास्तस्मिन्नविरोधेनैव स्थिता इत्यर्थः ।
भाषार्थ—ज्ञान में मौन, सामर्थ्य में क्षमा, दान में प्रशंसाराहित्य, ये गुण उस दिलीप में अनुरक्त होने के कारण सहोदर जैसे थे ॥ २२ ॥
द्विविधं वृद्धत्वं ज्ञानेन वयसा च । तत्र तस्य ज्ञानेन वृद्धत्वमाह—
अनाकृष्टस्य विषयैर्विद्यानां पारदृश्वनः ।
तस्य धर्मरतेरासीद् वृद्धत्वं जरसा विना ॥ २३ ॥
अन्वयः—विषयैः अनाकृष्टस्य विद्यानां पारदृश्वनः धर्मरतेः तस्य जरसा विना वृद्धत्वम् आसीत् ।
अनाकृष्टेति । विषयैः शब्दादिभिः । रूपं शब्दो गन्धरसस्पर्शाश्च विषया अमी' इत्यमरः । अनाकृष्टस्यावशीकृतस्य विद्यानां वेदवेदांगादीनां पारदृश्वनः पारमन्तं दृष्टवतः दृशेः क्वनिप् । धर्मे रतिर्यस्य तस्य राज्ञो जरसा जरया विना । 'विस्रसा जरा' इत्यमरः । 'भिद्भिदादिभ्योऽङ्' इत्यङ्प्रत्ययः । 'जराया जरसन्यतरस्याम्' इति जरसादेशः । वृद्धत्वं वार्धकमासीत् । तस्य यूनो विषयवैराग्यादिज्ञानगुणसम्पत्या ज्ञानतो वृद्धत्वमासीदित्यर्थः । नाथस्तु चतुर्विधं वृद्धत्वमिति ज्ञात्वा 'अनाकृष्टस्य' इत्यादिना विशेषणत्रयेण वैराग्यज्ञानशीलवृद्धत्वान्युक्तानीत्यवोचत् ।
भाषार्थ—विषयों के वश में न आने वाले समस्त विद्याओं में पारंगत धर्मपरायण उस राजा दिलीप में वृद्धावस्था के बिना बुढापा ज्ञात होता था ॥२३॥
द्विविधं पितृत्वं रक्षणेनोत्पादनेन च । तत्र तस्य रक्षणेन पितृत्वमाह—
प्रजानां विनयाधानाद्रक्षणाद्भरणादपि ।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः ॥ २४ ॥
प्रथमः सर्गः [१३]
अन्वयः— विनयाधानात् रक्षणात् भरणात् अपि सः प्रजानां पिता (अभूत्) तासां पितरः केवलं जन्महेतवः ।
प्रजानामिति । प्रजायन्त इति प्रजा जनाः ‘उपसर्गे च संज्ञायाम्’ इति डप्रत्ययः । ‘प्रजा स्यात्संततौ जने’ इत्यमरः । तासां विनयस्य शिक्षया आधानात्करणात् सन्मार्गप्रवर्तनादिति यावत् । रक्षणात् भयहेतुम्यस्त्राणाद् आपन्न्रिवारणादिति यावत् । भरणादन्नापानादिभिः पोषणादपि । अपिः समुच्चये । स राजा पिताऽभूत् । तासां पितरस्तु जन्महेतवो जन्ममात्रकर्तारः केवलमुत्पादका एवाभूवन् । जननमात्रम् एवं पितॄणां व्यापारः । सदा शिक्षारक्षणादिकं तु स एव करोतीति तस्मिन्पितृत्वव्यपदेशः । आहुश्च—‘स पिता यस्तु पोषकः’ इति ।
भाषार्थ— शिक्षा देने से, रक्षा करने से, पालन पोषण करने से वे प्रजा के पिता थे । उनके पिता तो केवल जन्मदाता थे ॥ २४ ॥
तस्यार्थकामावपि धर्म एवास्तामित्याह—
स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यान्परिणेतुः प्रसूतये ।
अप्यर्थकामौ तस्यास्तां धर्म एव मनीषिणः ॥ २५ ॥
अन्वयः— स्थित्यै दण्ड्यान् दण्डयतः प्रसूतये परिणेतुः मनीषिणः तस्य अर्थकामौ अपि धर्मं एव अस्ताम् ।
स्थिता इति । दण्डमर्हन्तीति दण्ड्याः ‘दण्डादिभ्यो यः’ इति यप्रत्ययः । ‘अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् । अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति’ इति शास्त्रवचनात् । तान् दण्ड्यानेव स्थित्यै लोकप्रतिष्ठायै दण्डयतः शिक्षयतः । प्रसूतये सन्तानार्थैव परिणेतुर्दांरां परिगृह्णतः मनीषिणो विदुषः दोषज्ञस्येति यावत् । ‘विद्वान्विपश्चिद्दोषज्ञः संसुधीः कोविदो बुधः । धीरो मनीषी’ इत्यमरः । तस्य दिलीपर्स्यार्थकामावपि धर्मं एवास्तां जातो । अस्तेर्लङ् । अर्थकामसाधनयोर्दण्डविवाहयोर्लोकस्थापनप्रजोत्पादनरूपधर्मार्थत्वेनानुष्ठानादर्थकामावपि धर्मशेषतामापादयन्स राजा धर्मोत्तरोऽभूदित्यर्थः । आह च गौतम—‘न पूर्वाह्नमध्यदिनापराह्नानफलान्कुर्याद् यथाशक्ति धर्मार्थकामेभ्यस्तेषु धर्मोत्तरः स्यात्’ इति ।
भाषार्थ— मर्यादा पालन के लिए अपराधियों को दण्ड देने वाले, सन्तान के लिए विवाह करनेवाले, उस विद्वान् राजा दिलीप के अर्थ और काम धर्मही थे ।
तस्य दिलीपस्येन्द्रेण सह परस्परविनिमयेन सख्यमाह—
दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् ।
संपद्विनिमयेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ॥ २६ ॥
| १४ | रघुवंशमहाकाव्ये |
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अन्वयः—स यज्ञाय गां दुदोह, मघवा सस्याय दिवं (दुदोह) सम्पद्विनिमयेन उभौ भुवनद्वयं दधतुः ।
दुदोहेति । स राजा यज्ञाय यज्ञं कर्तुं गां भुवं दुदोह । करग्रहणेन रिक्तां चकारेत्यर्थः । मघवा देवेन्द्रः सस्याय सस्यं वर्धयितुं दिवं स्वर्गं दुदोह । द्युलोकान्महीलोके वृष्टिमुत्पादयामासेत्यर्थः । 'क्रियार्थोपपद-' इत्यादिना यज्ञसस्याभ्यां चतुर्थी । एवमुभौ सम्पदो विनिमयेन परस्परमादानप्रतिदानाभ्यां भुवनद्वयं दधतुः पुपुषतुः । राजा यज्ञैरिन्द्रलोकमिन्द्रश्चोदकेन भूलोकं पुपोषेत्यर्थः । उक्तं च दण्डनीतौ—'राजात्वर्थान्समाहृत्य कुर्यादिन्द्रमहोत्सवम् । प्रीणितो मेघवाहस्तु महतीं वृष्टिमावहेत्' इति ॥
भावार्थ—दिलीप यज्ञ के लिए पृथिवी को दुहते थे और इन्द्र धान्य के लिए आकाश को दुहते थे । इस प्रकार परस्पर सहयोग से दोनों लोक का पालन करते थे ॥ २६ ॥
तस्य राज्ये तस्करभयं नासीदित्याह—
न किलानुययुस्तस्य राजानो रक्षितुर्यशः ।
व्यावृत्ता यत्परस्वेभ्यः श्रुतौ तस्करता स्थिता ॥ २७ ॥
अन्वयः—राजानः रक्षितुः तस्य यशः न अनुययुः किल यत् परस्वेभ्यः व्यावृत्ता तस्करता श्रुतौ स्थिता ।
नेति । राजानोऽन्ये नृपा रक्षितुर्भयेभ्यस्त्रातुस्तस्य राज्ञो यशो नानुययुः किल नानुचक्रुः खलु । कुतः । यद्यस्मात्कारणात्तस्करता चौर्यं परस्वेभ्यः परधनेभ्यः स्वविषयभूतेभ्यो व्यावृत्ता सती श्रुतौ वाचकशब्दे स्थिता प्रवृत्ता । अपहार्यान्तराभावात्तस्करशब्द एवापहृत इत्यर्थः । अथवा । 'अत्यन्तासत्यपि ह्यर्थे ज्ञानं शब्दः करोति हि' इति न्यायेन शब्दे स्थिता स्फुरिता न तु स्वरूपतोऽस्तीत्यर्थः ।
भावार्थ—अन्य राजा रक्षक उस दिलीप के यश का अनुकरण नहीं कर सके क्योंकि दूसरों के धन से व्यावृत चोरी केवल शब्द में सुनी जाती थी ॥ २७ ॥
तस्य शिष्ट एव प्रियो दुष्ट एवाप्रिय आसीदित्याह—
द्वेष्योऽपि संमतः शिष्टस्तस्यार्त्तस्य यथौषधम् ।
त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता ॥ २८ ॥
अन्वयः—शिष्टः द्वेष्यः अपि आर्तस्य औषधं यथा तस्य सम्मतः । दुष्टः प्रियः अपि उरगक्षता अंगुलि इव त्याज्य आसीत् ।
द्वेष्य इति । शिष्टो जनो द्वेष्य शत्रुरपि । आर्तस्य रोगिण औषधं यथौषधमिव तस्य संमतोऽनुमत आसीत् । दुष्टो जनः प्रियोऽपि प्रेमास्पदीभूतोऽपि । उरग-
प्रथमः सर्गः १५
क्षता सर्पदष्टाऽङ्गुलीव । 'छिन्द्याद्बाहुमपि दुष्टात्मनः' इति न्यायात् त्याज्यः आसीत् । तस्य शिष्ट एव बन्धुर्दुष्ट एव शत्रुरित्यर्थः ।
**भाषार्थ—**सज्जन शत्रु भी रोगी को औषध के समान उनको प्रिय था और दुष्ट प्रिय होने पर भी सांप से डसी हुई अंगुलि की तरह त्याज्य था ॥ २८ ॥
तस्य परोपकारित्वमाह—
तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना ।
तथा हि सर्वे तस्यासन्परार्थैकफला गुणाः ॥ २९ ॥
**अन्वयः—**वेधाः तं महाभूतसमाधिना नूनं विदधे; तथा हि तस्य सर्वे गुणाः परार्थैकफला आसन् ।
तमिति । वेधाः स्रष्टा । 'स्रष्टा प्रजापतिर्वेधाः' इत्यमरः । तं दिलीपम् । समाधीयतेऽनेनेति समाधिः कारणसामग्री । महाभूतानां यः समाधिस्तेन महाभूतसमाधिना विदधे ससर्ज । नूनं ध्रुवम् । इत्युत्प्रेक्षा । तथाहि तस्य राज्ञः सर्वे गुणा रूपरसादिमहाभूतगुणवदेव पदार्थः परप्रयोजनमेवैकं मुख्यं फलं येषां ते तथोक्ता आसन् । महाभूतगुणोपमानेन 'कारणगुणाः कार्यं संक्रामन्ती'ति न्यायः सूचितः ।
**भाषार्थ—**ब्रह्माजी ने उनको मानो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश की कारणसामग्री से बनाया था; क्योंकि उनके सभी गुण परोपकार के लिए थे ॥२९॥
तस्य चक्रवर्तित्वमाह—
स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् ।
अनन्यशासनामुर्वी शशासैकपुरीमिव ॥ ३० ॥
**अन्वयः—**स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागरमनन्यशासनमुर्वी एक पुरीम् इव शशास ।
स इति । स दिलीपः वेलाः समुद्रकूलानि । 'वेला कूलेऽपि वारिधेः' इति विश्वः । ता एव वप्रवलयाः प्राकारवेष्टनानि यस्यास्ताम् । 'स्याच्चयो वप्रमस्त्रियाम् । प्राकारो वरणः शालः प्राचीनं प्रान्ततो वृतिः' इत्यमरः । परितः खातं परिखा दुर्गवेष्टनम् । 'खातं खेयं तु परिखा' इत्यमरः । 'अन्येष्वपि दृश्यते' इत्यत्रापिशब्दात्खनेर्डप्रत्ययः । अपरिखाः परिखाः सम्पद्यमानाः कृताः परिखीकृताः सागराः यस्यास्ताम् । अभूततद्भावे च्विः । अविद्यमानमन्यस्य राज्ञः शासनं यस्यास्तामनन्यशासनामुर्वीमेकपुरीमिव शशास । अनायासेन शासितवानित्यर्थः ।