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पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)

Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad

सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished116 पृष्ठ

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पृष्ठ 10

४ कुंडलिया
सबर तखत पर बैठि तूर अठपहरा बाजै ॥
तम्बू है असमान जमीं का फरस बिछाया ।
छिमा किया छिड़काव खुसी का मुस्क लगाया ॥
नाम खजाना भरा जिकिर का नेजा चलता ।
साहिब चौकीदार देखि इबलीसहुँ १ डरता ॥
पलटू दुनिया दीन में उनसे बड़ा न कोय ।
साहिब वही फकीर है जो कोई पहुँचा होय ॥
( ९ )
रैयत कौन कहावै घर घर हाकिम होय ॥
घर घर हाकिम होय अदल फिर कौन चलावै ।
सब नायक होइ जाय बैल फिर कौन लदावै ॥
गदहा चलै हर बैल कौन फिर बेसहै तुरकी २ ।
मिलै कूप में मुक्ति गंग को देवै बुड़की ॥
काँच छुए होइ कनक पारस की रहै न इच्छा ।
घर घर सम्पति होइ कौन फिरि माँगै भिच्छा ॥
पलटू तैसे संत हैं भेष बनावै कोय ।
रैयत कौन कहावै घर घर हाकिम होय ॥
( १० )
जग खीझै तो का भया रीझै सतगुरु संत ॥
रीझै सतगुरु संत आस कुछ जग की नाहीं ।
एक द्वार को छोड़ और ना माँगन जाही ॥
जिउ मेरो बरु जाय जन्म बरु जाय नसाई ।
करौं न दूसर आस संत की करौं दुहाई ॥
तीन लोक रिसियाय ३ सकल सुर नर और नारी ।
मोर न बाँकै बार पठंगा पाया भारी ॥
पलटू सब रोवै पड़ा मोर भया सलतंत ।
(१) शैतान भी । (२) घोड़ा मोल ले । (३) रुष्ट हो ।