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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

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DevanagariHindipublished322 pages

About this granth

Ek Omkar Satnam (एक ओंकार सतनाम) is a collection of Hindi talks by Osho (Acharya Rajneesh, 1931–1990) on Guru Nanak's Japji Sahib. The Japji is the foremost composition of the Sikh tradition, standing at the opening of the Guru Granth Sahib and recited each morning. It begins with the Mul Mantar, "Ik Onkar Satnam Karta Purakh", from which the book takes its title.

In these discourses Osho goes through the pauris of the Japji in order and speaks on remembrance of the Name, hukam (the divine order), the guru, meditation and surrender. He illustrates his points with episodes from Nanak's life, stories of saints and his own familiar parables, and presents Nanak's devotion as a path that can be lived in the midst of household life.

The book is arranged in a series of chapters with a table of contents and runs to about 322 pages. It suits readers who want to approach the Japji and the Sikh sant tradition through the eyes of a modern spiritual speaker.

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ऐसा जान कर विचार करो कि केवल संन्यास लेने मात्रसे मोक्ष फल की प्राप्ति कभी नहीं
होगी
स्वामी समन्त भद्रने, "सरागौ ज्ञान गर्भात्मा सा भवेद् भवनाशिनी" राग सहित भी, जो भी ज्ञान
सहित मन रूपी ध्यान किया जाता संसारका नाशक हो सो तो ठीक ही परन्तु यहां तो भाव संन्यास
बिना द्रव्य मात्र, उस पर केवल काय-कलेवर धारण से, मोक्ष की कौन कहे, स्वर्ग तक
मिलना दूभर"
सो इस प्रकार केवल भाव ही से मुक्ति फल प्राप्तिके अर्थ रूप से द्रव्या-
नुप्रेक्षाकार भये, सोईया जी! जो संन्यास-कलेवर को मुख्य जानकर के, सो ही द्रव्य-
संन्यास का मुख्य अधिकार कर केवल संन्यास रूपी क्रिया मात्रसे स्वर्ग मुक्ति फल
विचारत भये
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, प्रमाद संन्यास-कलेवर अवस्था में रहे तब संन्यास क्रिया
फल तो निष्फल हुआ सो विचार नहिं किया। सो इस ग्रन्थ का कर्ता इस अधिकार
ग्रन्थ विषै जो सो यह बात कही प्रमाण न हो सकी, इस हेतु यह ग्रन्थ ही मिथ्यात्व भाव
का मूल हुआ, उस पर कर्ता ने सम्यक्त्व भेद रूप व्याख्या कही सो मिथ्या, ज्ञान
रूप भेद न प्रकाश, उस पर ज्ञानी संन्यास स्वरूप न कहा, इस हेतु ग्रन्थ ही को प्रमाण
कहे, उस पर स्वामी समन्त भद्र ने सम्यक्त्व भेद तथा महाव्रत का जो भेद स्वरूप
कहा तिस ज्ञान का प्रभाव
प्रभाव समन्त भद्र के वचनों का हुआ, ज्ञान, असंयम, जो भाव संन्यासी कहाया
तिसमें राग भाव का रूप संशय दूर सो न हुआ संन्यास रूपके विचारते हुआ भला, ज्ञान
संन्यास का सम्यक्त्व रूप भेद तथा प्रमाण स्वरूप से भेद न कहा, ज्ञान संन्यास को
सो उस समय ज्ञान का प्रकाश हुआ सो इस ग्रन्थका भी हुआ, ज्ञान संन्यास अवस्था
का सो भेद ग्रन्थका इस प्रकार से प्रगट हुआ निश्चय सम्यक्त्व का प्रकाश सो संशय
मिटाने को यह ग्रन्थ, स्वरूप के इस भेदको प्रगट कर भाव मोक्ष फलदायक भयो
सो इस ग्रन्थानुरूप यह संन्यास नाम सम्यक्त्व भेद को कहै सो मुक्ति का प्रकाश
जो सम्यक्त्व के प्रभावसे इस ग्रन्थ में सो भाव मोक्ष का तो ज्ञान हुआ सो यह ग्रन्थ
सम्यक्त्व का ही प्रकाशक ज्ञान रूप ग्रंथ सो इस ग्रन्थ को, उस पर भाव संन्यासी का जो
स्वरूप कहै सो इस भेद सो ज्ञान सम्यक्त्व भाव संन्यास रूप कहे सो ग्रन्थ मोक्ष फल
दायक भयो सो यह ग्रन्थका कथन सत्य जान संशय निवारण को सम्यक्त्व प्रकाश ज्ञान
ग्रन्थ भयो
सो संन्यास का स्वरूप सो या को या सो ग्रन्थ कहा, जो सो यह या सो ग्रन्थ सम्यक्त्व
ज्ञान-दाता स्वरूप प्रकाश ग्रन्थ न हो भाव रूप ग्रन्थ न हो यह सो सो सो सो सो,
सो सो सो रूप विचार सम्यक्त्व सो उस ग्रंथ को सर्वज्ञोक्त ही प्रमाण, संशयात्मा
को यह ही ग्रन्थका रूप सो सत्य जान, जो संशय निवार्य के भेद रूपको प्रकाश या
ग्रन्थ द्वारा सम्यक्त्व का भाव सो स्वरूप को प्रगट भयो
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, यह भाव सो संन्यास के भेद सो ग्रन्थ विषै
प्रगट भये सो सम्यक्त्व, संन्यास, ज्ञान स्वरूप संन्यास विषै सो सम्यक्त्व प्रमाण भया
सम्यक्त्व संन्यास का भेद रूप जो सो ग्रन्थका स्वरूप सो संशय का नाश हुआ तिस
सो यह ग्रन्थ का प्रभाव भया, तब संशय को नष्ट कर ग्रन्थ प्रमाण हुआ, सो, जी, जब,
संन्यास सम्यक्त्वमय भया तब यह सब भेद ग्रन्थ ने प्रगट कर ज्ञानमय को जगाया
ताते भला ग्रन्थ कहा, संन्यास भये, संशय भ्रम सब सो मिट सो ग्रन्थ द्वारा
प्रकाशमान भया
सो जो संशय ग्रन्थ का निवारक भयो कहै सो, ज्ञान विचार प्रमाण सो संशय
रहित भये ग्रन्थका यह स्वरूप सो भेद रूप संशय मिटा तब ही सो संन्यास का प्रकाश या
ग्रन्थ से ज्ञान हुआ सो संशय को त्याग कर ग्रन्थ स्वरूप भया
ग्रन्थ कर्ता का तो यह भाव हुआ न जो इस पद को कहै ग्रन्थ का भेद ज्ञान को
प्रकाश कर ग्रन्थ नाम दिया सो भला ही किया, सो तो भला किया? सो तो न हुआ
या प्रकार सो भयो! सो भाव संन्यास हुआ, ग्रन्थ कर्ता का सो संशय सो, स्वरूप
ग्रन्थ का प्रगट भया सो! सो इस संन्यास का जो ज्ञानरूप सो, संशय का नाश
हुआ? सम्यक्त्व सो सो संन्यास, सो ग्रन्थ प्रमाण हुआ, संशय का नाश
किया? या प्रकार संन्यास संन्यासी का भेद ज्ञान न हो ज्ञान हुआ संन्यासी का
ग्रन्थ सो संन्यासी न भेद ज्ञान को सो ज्ञान विचार न हो, संशय न हो प्रमाण सो, या
सो ग्रन्थ कर्ता मिथ्या, या ग्रन्थ का प्रभाव कहा? संन्यास को प्रमाण सो ज्ञान का
प्रभाव सो तो ग्रन्थ द्वारा संशय भ्रम न रहा जान
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लेकिन सम्प्रदाय का प्रचार जितना तीव्र गति से उस समय संसार व्यापि हो सकेगा, उस
समय संसार में कोई भी धर्म-मत सम्प्रदाय ऐसा न रह जाय जो उसके सम्मुख टिक
सके सो, तुम यह विचार करो, कि उस समय उस नवीन धर्म-सम्प्रदाय द्वारा धर्म वृद्धि
हो सकेगी? सच तो ऐसा होगा, कि सम्प्रदाय का प्रचार धर्म का संहार होगा।
अतः सत्य सिद्धान्त प्रकाशीय व्यवस्था द्वारा जब धर्म-सम्प्रदाय का नाम मात्र
रहेगा और धर्म-सम्प्रदाय का संसार भर से सर्वथा लोप हो जायगा सो, यह सम्पूर्ण
का कल्याण होगा सो यह कल्याण ही सब धर्मों का, वा धर्म का सार और सब ही धर्मों
का मुख्य लक्ष्य है, सो जिस का यह लक्ष्य सत्य है सो प्रकाश स्वरूप परमेश्वर का
सब प्रजाओं को ही हो रहा है जिस उपाय द्वारा सब ही एक मत हों व सत्य ज्ञान को
प्राप्त हो सके जैसा सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश करने के लिये एक ही सूर्य सब का प्रकाश
करने वाला बनाया है॥
सोचो, नवीन धर्म-सम्प्रदाय तो तब बनता होता कि जब कि कोई नवीन धर्म
होता सो, यह स्वाभाविक धर्म सब काल रूप, वा सनातन सिद्ध स्वरूप का एक रूप
सब सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे है सो सब का कर्त्ता सब को ही दे रहा है, धर्म-
सम्प्रदाय तो धर्म की हानि के हेतु हैं, इससे सब काल व्यापि सनातन धर्म स्वरूप
सुख दायक सब काल रहने वाला सत्य धर्म स्वरूप है सब का रक्षक प्रकाशक दयाल
सो केवल प्रकाश ही सब पर दया का प्रकाश कर रहा है सब धर्मों सम्प्रदायों
द्वारा फैला हुआ जो अविद्या का घोर अन्धकार है उससे सर्वथा लोप, सब प्रजा मुक्त
हो, यह विचार करोगे?
ईश्वर सत्य ज्ञान रूप, धर्म का सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे सो, सम्पूर्ण
विश्व का प्रकाश प्रकाशक दयाल सबका परम कल्याण ही सोच कर ज्ञान रूप सत्य रूपी
प्रकाशक दयाल सबका जो नाश कर सकता सो ही रक्षा! सूर्य ही केवल है! धर्म
स्वरूप परमेश्वर दयाल सबका जो संहार करता सो ही रक्षक! प्रकाश ही केवल सब
का! जो सत्य न्याय पर चल कर व सत्य व्यवहारों को ही सब को सब देगा।
जो जिस पर निर्भर है सो केवल सम्पूर्ण विश्व का रक्षक दयाल सबका
केवल एक धर्म काम-धंधा, धन-दौलत सब कुछ संसार का नाश ही करता रहेगा॥
सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ संसारिक व्यवहार केवल करने के लिये दया
पूर्वक, विचार युक्त केवल कल्याण करने वाला बनाया है, केवल सत्य स्वरूप दयालु
प्रकाशक सब का यह प्रकाश सर्वत्र समान ही कर रहा है जो सब को ज्ञान व सब को सब
प्रकार सत्य सुख प्रकाशक की दया प्रकाशक सब पर सब का सब हो रहा है॥
विचार ही सब कुछ सत्य है सब कुछ व सब संसार व्यापि दया केवल दयालु व
केवल दया प्रकाशक दयालु का रूप ही दया का प्रकाश दयालु दयाल, दयाल सब
कल्याणकारी है॥
"सत्य ज्ञान प्राप्त रूप से समस्त माया का प्रभाव ही ज्ञान रूपी प्रकाश से ही
संपूर्ण विश्व सर्व प्रकार से सब काल में सर्वत्र व्यापि"
सो सब का ईश्वर सब प्रकार सब का सब काल में, केवल सर्वत्र व्यापि ही सब
व्यापि प्रकाश दयालु दयाल का रूप सब दया का प्रकाश हो रहा है सो सब काल
में स्वाभाविक रूप से ही सत्य प्रकाश रूप सब स्वाभाविक प्रकाशक का व सत्य
स्वरूप का, जो जो भी सम्प्रदाय-भाव सो सब सब माया के सब जाल रूप
केवल मिथ्या, अविद्यामय विचार॥
सो जिस प्रकार से सूर्य सब दिशाओं को सर्वदा, केवल ही सब काल व्यापि
ही सब प्रकार के अन्धकार को नाशवान कर देता हुआ सब समय सब व सब दिशाओं
का सब प्रकाश करता है, व जिस रूप द्वारा दिन-दुपहर सब प्रकाशक
ज्ञान सब व सब रूप सब कुछ सब का केवल ज्ञान ही सब का सब हो रहा है सब
सत्य ही समस्त सब सब का ज्ञान रूप, सब प्रकाशक केवल क्या? व सब का
सत्य, व ज्ञान रूप प्रकाश सो, जो सम्पूर्ण संसार में? सब ही सब का,
सब विश्व सब सब सत्य प्रकाश सब सब का सब काल रूप सब कल्याणकारी प्रकाश
विश्व का प्रकाशक रूप दया रूप, केवल सब रूप से प्रकाश सब का सब
प्रकाशक सब रूप रूप, सब सब का प्रकाशक रूप॥
केवल, सर्वशक्तिमान, प्रकाश ज्ञान का प्रकाशक केवल ही सब रूप से
स्वाभाविक है, सो प्रकाश केवल सब रूप सब का रूप सब का रूप ही सब का
स्वाभाविक रूप सब सब सब ज्ञान केवल सब का रूप व सब, केवल ही रूप॥
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जब राजा सो, पाछे जाग उठ्यो, ताहि बख्त एक रीछ-सा को जीव आय उछल
कै बैठि गयो जा राजा पास, ताकौं सो राज देखिकै डर गयो पाछे वह रीछ
बोलि उठ्यो ता सों अरे राजा तू क्यों डरै डरपो मत ताके बादि राजा कहै तूं
कौन सो बताय हमकौ रीछ कहै ता सों, जो तू यह कहै मोकौ मारि, ताहि
पहिचानि कै कही सकौंगो
"जाकौ जस जस ही जानिये लोक, जो न जानै लोक तो, ता को जानि
सकै कौन"
तब राजा सो अचरज हो सोचन को लाग्यो कि यह जीव आय कैसे वचन बोलि
उठ्यो जो यह जीव-जन्त सब हो सो ईश्वर निमित्त उपजाये अपने अपने
विषय पायकै सब भोगत सोई भोगत ही रहै, भला मनुष्य? मनुष्य सो कौन,
भला मनुष्य? मनुष्य तो काम-क्रोधदिक के वश हो काम कै, भला मनुष्य? जानि
कै पराया धन लै कै घर भरे, अपना पेट भरै, पाप-पुण्य को जानै सो, मनुष्य
जाकौ नाम है सोई यह रीछ जीव कहै जो कि ईश्वर-निमित्त यह बनाया
सोई कहै
तबै राजा कहै, "जो मनुष्य जनम लै कै, जग में सब सुख लै कर लै सब
काम सिद्ध कै, पाछे ता ईश्वरकौ भजन करि लेय"
तब ही सो अचरज हो सोच बादि कहै जो हम सब बात को समझै ऐसा
कह कर के पाछे वह रीछ सो कहै अरे भाई तू सब बात को जाणनैहारा
हो सो कहो कि हमारे मन मों इच्छा है ईश्वर को मिलने की सो कैसे हो
जाय सकैगी सो बताओ सो तब ही सो रीछ बोलि उठा अरे राजा यह बात
कहिये क्यों कर कि तू तो अहङ्कार करिकै अहङ्कार सो भरी गयो है
ऐसा क्यों? तू सब को सब जानै है, यह बात किस प्रकार? भला जब यह
बात ही तब सब काम सिद्ध हो तो बात ही क्या मनुष्य जनम पायकै
मनुष्य? ता जनम पायकै भजन किया जाय?
ऐसा रीछ सों राजा कहै, भजन बिना तो जीव का कल्याण
नहिं होय सकै, राजा फिर कहै, ईश्वर सब निमित्त है परमात्मा
सर्वव्यापी है जो सब संसार सब को बनाय राखै पायकै मनुष्य देह को
परमात्मा को भजन करिकै सिद्ध होय तव काम परमात्मा ही से सब
सिद्ध होय यह बात सत्य कहै
यह बात सुनि, राजा सो रीछ कहै, अब तू सब कुछ जानि गयो है,
अब तो भजन करि
पाछे राजा के मन में आ गई कि रीछ को मारूं! मार, तलवार निकाल
कर हाथ में लेय कर जब वार करन लगा, तलवार हाथ से ही छूट गई
लटक गया हाथ-पाँव से फिर देखा--रीछ गायब हुआ! तब राजा को समझ आई
बात, राजा विचार कर मन में बैठ गया
ज्ञान उदय होने से वह सोचे, अब तो सब बात जान गया हूं
सब भ्रम छूट गया अब तो मैं फिर राज-पाट को नहिं जाऊंगा जब
तक परमात्मा का दर्शन नहिं हो जायगा तब तक राजा तपस्या कर
के वन में रहेगा, यह बात दृढ़ कर ली उस वक्त
"हे नाथ, तू ही मेरा सब कुछ"
वो रीछ कोई और न हो कर ईश्वर का भेजा हुआ दूत था जो राजा
को जगा कर चला गया, अब तो वह राजा, जो सब से सब कुछ
जानता समझता विचार कर अपने स्वरूप को समझ कर सब से परे होकर,
उस वन में रहकर भगवान नारायण का स्मरण करने लगा और एक
दिन ज्ञान उदय होकर मुक्ति को पा गया सदा, जो भजन सो करता
उस वक्त मुक्ति स्वरूप पद को प्राप्त हुआ जो परमात्मा के धाम
को पा गया फिर कभी वह संसार चक्र में नहिं आया ॥?
इस दृष्टान्त कथानुसार सार यह निकलता है कि मनुष्य अहङ्कार
वश हो कर सब कुछ अपने को ही सर्वशक्तिमान मान बैठता है जब
तक कि भगवान का अहसास उस व्यक्ति को न हो जाय, तब तक
मनुष्य का मन शांत नहिं हो सकता जो भजन से ही हो सकता है इस
बात को सदा याद रखो, सब से बात यह सार निकसी, मन को सदा प्रभु
स्मरण में लगाये रखो जब तक सांस रहे तब तक भगवान का
सुमिरन करते रहो तो जीवन का सब काम सिद्ध होकर मुक्ति मिलेगी
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विचार कर उसको अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसरित करना चाहिए अथवा संकट के निवारणार्थ कुछ
ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे कि वह उस उपस्थित आपदा विपति कष्ट शोक भय का सामना करने
योग्य बन सके। यदि ऐसा न हो सके तो उस समय उसको धीर, धर्म का उपदेश या नीतिपरक
विचार सब व्यर्थ सिद्ध हो जाते हैं। उस समय व्याकुल हृदय, तन मन में उपद्रवित मनुष्य
किसी भी बात को चाहे कितनी उत्तम विचारपूर्ण क्यों न हो, ग्रहण करने की स्थिति में
नहीं रहता और वह समझाने वाले को निर्दयी पाषाण हृदय समझ कर और भी अधिक
क्षुब्ध हो कर उस मार्ग का पथिक कभी नहीं बनता जिस पर उसे
पथप्रदर्शक ले जाना चाहता है।
लेकिन उसने ऐसा नह किया और वह "हे राम, हम तो मारे गये हमें बचाओ बचाओ नहीं
चिल्लाया सिर्फ सो गया। नह सो जाना चाहिए"
कर्तव्य उपदेशक या अन्य विचार उपदेशक को चाहिए कि वह संकट के समय उस मनुष्य
जिसे वह शिक्षा देना चाहता है, उसकी रक्षा के लिए आगे बढ़े और उसे धीर व सहायता दे।
उस संकट से बचाए, तो फिर वह मनुष्य सब कुछ सुनने को तैयार हो जाएगा। यदि कोई
व्याकुल हो कर नदी किनारे खड़ा हो, उस समय उसको यह शिक्षा न देकर कि तैरना सीख
लेना था पहले ही, तैराकीसीखनेके लाभोंका वर्णन करने लगे अथवा किनारे खड़े हो कर
हाथ-पाँव मार कर बच जाओ, उपदेशक का काम यह होना चाहिए कि वह
स्वयं कूदकर या, अन्य किसी प्रकार साधन सामग्री जुटाकर उस डूबते
हुए को पार लगा दे। यदि वह डूब गया, तो फिर उस शिक्षा का उपदेश का लाभ क्या
रहा और उस मूर्ख, जो उस समय उस को ज्ञान की बात बता रहा था उसके जैसी मूर्खता
कोई नहीं, इस पर भी यदि वह तैरना जानता हो, तैरना तो, दूर की, बात रही, तैरना सिखाने का
दावा करने लगा हो। तब तो, समझ ही लेना-चाहिए कि वह सब कुछ जान बूझ
जानकर भी कुछ नहीं कर रहा है। वह तो उस पानी में डूबने वाले का सच्चा
शत्रु हुआ जिसने समय व्यतीत कर दिया उस को बात-बात फंसा कर। उस डूबते
मनुष्य को चाहिए कि तत्काल, जो कोई ऐसा ज्ञान दे रहा हो उसका दो बात उल्टी
सुना कर कह दे कि भाई तू जा, मुझे न बचा और न उपदेश दे। तेरी उपदेश भरी
वाणी तथा तेरी विद्या तुझे मुबारक हो--उपदेशक जी, उपदेश उस समय जब
सब कुछ अनुकूल तथा शान्त हो उस समय तो सब कुछ कल्याणकारी हो सकता, लेकिन
संकट काल में नहीं! उपदेश पहले दिया जाता है अथवा बाद में दिया जाता है, न कि
विपदा काल में उस समय-समय ज्ञान न दे कर तत्काल जो बन पड़े सो कर जान बचाने का
यत्न किया जा सके।
क्या, समझे?
हां प्रभु, समझ गया। कृपा कीजिए।
उपदेश पहले दिया जा चुका होता है, तो वह मनुष्य उस आपदा का
धैर्य तथा साहस के साथ सामना कर सकता था। न करने पर संकट काल आने पर वह
व्याकुल तो हो जाएगा! अब उस व्याकुल हृदय वाले, को जब उपदेश दिया गया
उपदेश का उपहास बना दिया उसने और उस उपदेश दाता, को मूर्ख
कहा गया।
संकट सिर पर आ कर खड़ा हुआ-हो, जीवन-मरण का प्रश्न बन गया हो।
उस समय ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें करने लगो और कहो कि तुम ऐसा करो
तो यह संकट टल जाय तो यह अन्याय, यह निर्दयता, यह मूर्ख, ज्ञान-मद, विद्वत्ता,
पंडित, साधु, का पाखंड कहा जाय तो इस में किसी को संशय न होना
चाहिए। उपदेश का समय उस समय तक होता है जब तक कोई संकट न आया हो, अथवा
संकट आने से पहले ज्ञान दिया जाता है कि--इन से बचने के उपाय पहले सीख
लो--तो उसका लाभ हो? उपदेश ले कर जब संकट का सामना किया जाता तो सब
कुछ सामान्य ही रहता। पर विपदा आने पर उपदेश दिया जाता तो वह उपहास, हंसी
योग्य बन, उपहासास्पद बन जाता है। उपदेशक को सब मूर्ख जन उस समय
समझेंगे कि, अरे तू, पहले ही, जागता! उपदेश से पहले ज्ञान क्यों नहीं दिया?
उपदेश तो दिया, लेकिन उस पर विश्वास नहीं किया गया। तब संकट आया तो
व्याकुल हो उठा। पर उस समय तो सहायता की आवश्यकता थी उपदेश की तो नहीं थी।
ज्ञान का फल यही होता यदि अभ्यास में न लाया जाता तो संकट में, वह ज्ञान काम
नहीं आ सकता था, अर्जुन! उस समय सब कुछ अभ्यास काम देता है जो कि पहले
किया जा चुका हो।
विश्वासपूर्वक जो ज्ञान को अपनाता है उस--का संकट में भी मन विचलित
और भय--से ग्रस्त नहीं होता और संकट सब स्वयं हल होते जाते हैं।
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The text in the provided image is entirely corrupted and rendered as unreadable font-missing glyphs (tofu boxes: $\square$), with only punctuation marks and the page number visible:

□□□□ □□ □□□□ □□□□, □□□□□□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□
...
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Because the original Devanagari font was not embedded or rendered when generating the image/PDF, the actual characters cannot be recovered visually.

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The provided image contains text where the Devanagari font glyphs have failed to render (rendered as missing glyph / "tofu" boxes □). Because the actual letterforms are completely replaced by placeholder squares, the underlying Hindi/Sanskrit words cannot be read directly from the visual text.

Below is the literal transcription of the visible characters and punctuation preserved on the page:

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जिससे पराधीनता कभी नहीं मिटती थी सो राजा का जीवन व्यर्थ रहा वा कृतघ्न का
दोष उस पर आया।अकृतज्ञता यह ही कि जो अपने ऊपर उपकार वा नेकी करे उसका
बदला बुरा किया जावे अथवा, जो ऐसा करे निष्कपटता से उसको कपट किया जावे
महाराज ने बड़ा सोच किया पश्चात् सम्भ्रम से मन्त्री को कह भेजा, जो
मन्त्री का नाम था सो तो उस पुस्तक में नहीं था, और जो नाम दिया गया है
वह नाम मात्र कथा कहने के वास्ते ही रख--कर के दिया है, मन्त्री सू--झ बूझ का
राजा बड़ा ज्ञानी समझता था। राजा, स्वयं ज्ञानी था, इस वास्ते ही, उस मन्त्री को,
अपना सब हाल दिल समझाया सब ही प्रकार
मन्त्री ने उत्तर दिया कि, उस हाथी और महावत वाली बात है, सो
महाराजा आप तो सब कुछ समझते सम्हाल ही सकते।परन्तु महाराज की समझ में
राजा रूप में कुछ अन्तर आयाहै, बस्स! सो ही बात हो गई न? राजा रूप में जो
बात थी उसकी सम्भाल रखने के वास्ते राजा को हर समय तैयार रहना था सो राजा ने
बात को खोया और प्रजाजन के मन में दिल चाहा ख्याल होने लगा ॥ १० ॥
महाराज की बात का फैसला तो प्रजाजन कर नहीं सके पर मन्त्री कैसे करते?
मन्त्री कहने लगे, वा प्रजाजन और राजा का हाल सब ही प्रजाजन के
ही अन्दर से समझ लो, इस बात को सब कोई समझ सकतेहैं पर मालिक के
घर का भेद सब को नहीं मिल सकता और न ही सब को दिया जाता है, सो राजा
का भेद सब नहीं समझ सकते वा प्रजा, जो प्रजाजन राजा का विचार
ही न कर सके तो जो बात के समझने लायक बुद्धि नहीं रखते तो वह तो
प्रजाजन ही ठहरा और वह प्रजाजन ही कहे गये
प्रजा राजा के आधीन राजा के सुख का ध्यान रखे! पर राजा सब प्रजा
का सुख सम्भाल विचार प्रजा का सुख रखे सो प्रजा अपने सुख में आनन्द पावे
और जो चाहे सो ही करे!
अब राजा के सुख को तो हर एक प्रजा समझे किन्तु अपने सुख तरफ
ही, न कि सब कोई प्रजाजन ही उस पर चले वा, हर कोई राजा की ओर ध्यान करे
यह बात तो सब समझें वा, सब ही प्रजाजन सब ही प्रकार जाने, पर सब कोई
राजा की ही तरह विचार नहीं कर सकताऔर प्रजा--प्रबन्ध का कोई भेद नहीं
पा सके इससे ही प्रजाजन को हर बात समझ नहीं आतीकि राजा ने यह हुकम
क्यों किया और इस बात में प्रजाजन का भला, था कि सब का भला
महाराज! उस ही बात को सम्भाल कर दिल में लें, इस में ही प्रजा और
ही का भला, फैसला सब प्रकार प्रजाजन का सब प्रकार से राजा रूप में ही
प्रजाजन का ध्यान सुख का सम्भाल रूप होताथा।जब तक ही सब प्रजाजन
राजा रूप में सुखी रहे वा सुखी हो सके, सो हर बात का ध्यान तो राजा ही
सब का रखने वाला ठहरा और सब बात अपने जिम्मे ले करके रखता था जिस
बात का प्रजा पर कोई असर नहीं पड़ता वा प्रजा को कोई भी बात सोचना नहीं
पड़ता
सब बात का तो प्रजाजन को विचार रहा न ही अपने सुख तरफ ध्यान रहा
सिर्फ प्रजाजन प्रजाजन कहलाने ही पर सब कुछ ध्यान प्रजाजन का सुख
रूपी आनन्द ही प्रजाजन सम्हालता था, सो राजा अपने सुख का ध्यान भूल गया
फल-रूप में प्रजाजन अपने सुख से खाली रहा सो प्रजा को पराधीनता का दुख
व्यापा
प्रजाजन पराधीनता किसे न कहे जिस बात का प्रजाजन को ही सोचना हो
और प्रजा को ही हर बात का मन सू--झना पड़े और राजा प्रबन्ध सू--झ का विचार ही
प्रजाजन छोड़ कर प्रजाजन को ही प्रजा सम्हालना पड़े, प्रजाजन राजा हुआ?
सो ऐसा प्रजाजन हुआ! जिसे प्रजाजन का सुख वा लाभ कुछ नहीं
प्रजाजन का सुख, सब, प्रजा ही प्रजा रहा
तो राजा का क्या, लाभ रहा? जब तक यह न सूझे
प्रजाजन ही रहा, प्रजाजन का फैसला क्या?
राजा विचारने लगा, प्रजाजन को ही सब कुछ करना व सब सोचा, व
सब कुछ सोचा, राजा को, प्रजाजन ही राजा का सुख समझ कर अपना ही सोचा
वा सब प्रकार से हर एक को ही बात समझ प्रजाजन को राजा ही समझा और अपना
सब कुछ खोया, अब क्या उपाय हो सकता है? सो राजा विचार प्रजा की सब तरह
का फैसला करने लग गया
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यम का दूत उसका गला घोंट कर उसके प्राण हर ले गया और--इन्द्रियोंका सब व्यापार बन्द हो गया और
चेतन्य--आत्माविहीन उसका शरीर लकड़ी समान हो गया । वास्तव में विचार कर देखा जायतो जिसने
सब दिया, उस दाताको भूल? जिस दयालु प्रभुने, इस मानव देहको देकर प्रभु, भगवद भजन रूपी
विशाल महल दिया उस पर भी इस काज को न करके केवल संसार विषय भोगों का ही स्मरण किया।
विचारवान पुरुष इस नश्वर शरीराभिमानी मानव संसार को देखकर, उस मानव को धिक्-धिक्
कहकर उस पर क्या दया नहीं करेंगे? उस मानवपर दयाही करेंगे? विचार करो, जिस पर दयाका ही काम
हो? उस मानव जीवन पर!
विचारवान पुरुष कहेंगे, इस मानव जीवन निष्फल! इस जीने का क्या?
इस विचारवान पुरुष को इस बातका अभिप्राय यह नहीं कि संसार निर्वाह का काम छोड़कर
निकम्मे बन कर आलस्य करो, पर केवल उसका लक्ष्य क्या? भगवान्को भूल कर केवल सांसारिक
प्रपञ्च फैलाकर अन्त समय यमदूत द्वारा दण्डित होना ही?
शास्त्रकारों का मत यह भी नहीं कहा गया कि गृह त्याग कर भेष-धारी साधू बनकर
केवल माला फेर कर ही अपना समय समाप्त करो।
शास्त्रकारों का मत यह भी नहीं कहा गया कि गृह छोड़? फिर क्या करें? अपने काम छोड़ दें?
केवल एकाग्र बैठें?
शास्त्रोंका यह मत यह है। अपनी मर्यादा पूर्ण जीवन रूपी कर्म करते हुये अपने उस परमेश्वर
का नाम स्मरण आदरपूर्वक करो, उस परम दयालु परमात्माके चरण कमलों का गुण गान
अपने कल्याण की इच्छा करते हुये कभी-कभी समय निकाल कर एकाग्र होकर उस परम
पिता उस ईश्वर का नाम जप कर प्रभु की भक्ति रूपी नौका द्वारा इस संसार समुद्र को पारकर
लेवें।
भगवान् का भजन केवल सन्यासियों का काम नहींहै यह शास्त्र का वचन नहीं बल्कि भ्रम
पूर्ण! केवल परमात्मा का नाम स्मरण मात्र का शास्त्रोक्त या भक्तिशास्त्र का उपदेश ही ऐसा नहीं
मिलता है, जिस का निर्वाह गृह त्याग द्वारा हीहो। सत्य बाततो यहहै संसारी गृहस्थी को
ईश्वर स्मरण तथा भजन शास्त्रानुसार अति सुलभ, सहज, सरल एवं सत्य बात यहहै, कि ईश्वर
नाम स्मरण घर पर ही बैठ, अपने सब काम करते हुए मनन रूपी नौका द्वारा ही भव सागर पारकर
सकोगे।
हर मानव नाम का संशय समाप्त करने को केवल मन एकाग्र करके ईश्वरका ध्यान अपने हृदय
मन्दिर में ही दर्शन करवा देगा। भगवान् सर्वत्र सब जगह व्यापक रूप से हर समय विद्यमान रहता,
सन्यासीयों रूप में? केवल एकांतमें?
हर बात का विचार, हर कार्य अथवा विचार रूपी मनका एकाग्र ध्यान, शांत चित्त
प्रभु नाम का जप सब प्रकार सिद्ध करता है। इस में किसी को भी कोई संशय नहीं होना चाहिये।
केवल शांत रूप एकाग्र मन प्रभुके ध्यान हेतु सब बातों को त्याग कर हर कार्य को कर सकते हो।
उस एका-ग्रता भगवान के ही ही शरण केवल भगवत भजन अथवा ध्यान द्वारा पूर्ण फल प्राप्त हो
परमपिता की दया द्वारा ही।
हर मानवके मन रूपी घोड़े को लगामकी भांति नियम रूपी लगाम से नियंत्रण करके
उस पर विजय पा सकोगे। यह तो भगवान्के अनन्य भक्त कबीरदासजीने अपनी वाणी
उपदेशके रूप मेंकहा गयाहै; फिर भीमनुष्योंको सन्देह निवारण करने के लिये; जिस प्रकार
कि, किसी व्यक्ति को कोई विचार अथवा विषय चिन्ता सताती होवे अथवा अपने किसी मित्र
सम्बन्धीकी सम्मति से उस का निवारण सुगमता पूर्वक होजाय, तैसेही अज्ञानरूपी
का नाश ही नाम सत्संग रूपी प्रकाश में ही इस बातका निर्णय ज्ञान द्वारा होगा।
केवल विचार करो जिस प्रकार मनुष्य रात को घर पर बैठ कर एकांतमें या छत ऊपर,
आकाश-मण्डल की ओर दृष्टि लगा कर देखता रहताहै कि यह क्या है? उस समय उसको यह
कौतूहल ज्ञान न होकर कि यह सब रचना किसी बनाने वालेकी है। केवल तारे तो देखे, परन्तु
ज्ञान यह नहीं, कि चन्द्रमा की भांति प्रकाश को देने वाला ईश्वरका नाम प्रकाश ज्ञान से ही होगा।
हर मानव सब कुछ देखता हुआ, विषय के मद मस्त होकर यह सब कुछ भूल-भाल
कर केवल उस रचना देखकर केवल यह सो-चता रहा, अब क्या? फिर क्या हुआ, उस चन्द्रमा
अथवा उस तारे केवल रूप को ही देखा, परन्तु ईश्वर के उस व्यापक ज्ञान का दर्शन न कर
सका। जब वह सूर्य उदय हुआ, तो उस ज्ञान रूप प्रकाश से ही संसार भर का ज्ञान हुआ।
इस प्रकार ज्ञान, उस ज्ञान प्रभु की कृपा द्वारा
यह तो केवल विचार रूप में ज्ञान हुआ, परन्तु ज्ञान का मूल उस परमेश्वर की
प्राप्ति का ही तो शरण लेकर ही हो सका जो ज्ञान का मूल ज्ञान का सार रूप माना गया।
इस प्रकार भगवान् नाम जपना संसारी मनुष्य को संसार रूप से पार होने का साधन
बताया, जिस को सब शास्त्रकार एकमत होकर कह गयेहैं, कि यह सब कुछ सत्य है ।
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क्या हुआ, पर अब ब्रह्मज्ञान को साधन सम्पन्न संत जन उन सब बातों पर विचार
करें?
"जो सब कुछ त्यागना चाहे उसका विवेक तीव्र होना चाहिये, सब बातों ब्रह्मज्ञान
की बात तो बहुत सरल, पर त्याग होना या सब त्याग देना या तो सब छोड़ना या ना या ना
करना पड़े"
वैराग्यवान ही हो सकता है, पर यह त्याग संत समाज करता है, त्याग का काम
सब काम से कठिन कठोर साधन माना गया संत समाज द्वारा त्याग कठिन माना गया
त्याग कठिन सब त्यागना समाज त्याग कठिन माना त्याग करना त्याग का स्वरूप त्याग
त्याग सब कुछ त्याग कठिन मानना समाज त्याग यह ना कि सब त्याग त्याग या सब ना
त्याग स्वरूप व या ना त्याग से काम, व वैराग्यवान के द्वारा संत या या वैराग्य
त्याग का त्याग सब या ना या त्याग से, पर संत जन सब त्याग ज्ञान या संत या ज्ञान
का त्याग
ज्ञान साधन से वैराग्य त्याग ज्ञान ज्ञान से या ज्ञान या ज्ञान त्याग संत या
त्याग वैराग्य से संत या त्याग से या ज्ञान से या त्याग सब या ज्ञान या
या या या ज्ञान त्याग, सब ज्ञान संत या ज्ञान, या वैराग्य सब त्याग या
त्याग सब वैराग्य ज्ञान, वैराग्य ज्ञान से त्याग संत त्याग सब संत या ज्ञान
सब वैराग्य त्याग से ज्ञान सब त्याग सब, सब संत या ज्ञान त्याग
सब या सब या वैराग्य त्याग त्याग सब या ज्ञान संत त्याग या या
सब या ज्ञान सब त्याग त्याग त्याग त्याग सब या या संत सब या संत या सब
वैराग्य सब त्याग या त्याग या संत या त्याग सब संत या त्याग सब या! त्याग या
त्याग या वैराग्य त्याग त्याग त्याग से वैराग्य या संत त्याग सब संत त्याग
या सब, या ज्ञान या सब
या ज्ञान या सब त्याग त्याग सब या त्याग! त्याग वैराग्य त्याग सब सब
सब या वैराग्य या सब ज्ञान सब या संत या सब, या सब सब सब त्याग सब,
या ज्ञान? या त्याग ज्ञान?
सब संत ज्ञान या ज्ञान या ज्ञान सब संत या ज्ञान, वैराग्य सब
वैराग्य या त्याग त्याग सब ज्ञान या ज्ञान, त्याग सब व संत वैराग्य या
वैराग्य त्याग त्याग सब सब सब, या, या या सब, सब त्याग ज्ञान? सब सब,
सब, या या सब, या त्याग ज्ञान? सब या, सब सब सब त्याग सब ज्ञान-ज्ञान या
सब सब व व सब वैराग्य वैराग्य सब
या वैराग्य सब या सब त्याग या वैराग्य से, या या त्याग त्याग या, त्याग
त्याग ज्ञान? या वैराग्य त्याग ज्ञान? या या वैराग्य सब या या या सब सब या
या सब या ज्ञान त्याग
या सब वैराग्य या सब या या या सब सब या ज्ञान या सब ज्ञान सब
ज्ञान सब सब त्याग सब सब त्याग, या या सब सब ज्ञान? या या सब ज्ञान?
ज्ञान ज्ञान सब, "या या या त्याग या या या ज्ञान ज्ञान त्याग या त्याग
या ज्ञान सब या ज्ञान त्याग त्याग त्याग या सब वैराग्य या ज्ञान सब ज्ञान
ज्ञान सब, या वैराग्य या वैराग्य सब"
या या सब त्याग, या या त्याग सब ज्ञान त्याग सब
उप-संत या ज्ञान सब वैराग्य त्याग या या संत वैराग्य या वैराग्य सब,
या त्याग या ज्ञान त्याग वैराग्य या सब या त्याग ज्ञान या या ज्ञान त्याग
वैराग्य, त्याग ज्ञान या ज्ञान सब या सब त्याग त्याग व ज्ञान त्याग, या या ज्ञान
त्याग या व वैराग्य
ज्ञान सब या सब सब या या ज्ञान ज्ञान सब वैराग्य या सब वैराग्य या
ज्ञान सब
या या या या, सब सब त्याग या या वैराग्य या, या ज्ञान वैराग्य त्याग
या त्याग या सब सब ज्ञान या सब त्याग या ज्ञान वैराग्य? वैराग्य त्याग सब
या सब या ज्ञान ज्ञान? वैराग्य त्याग त्याग या ज्ञान त्याग? ज्ञान वैराग्य या
ज्ञान ज्ञान ज्ञान?
सब त्याग या सब या सब त्याग सब, सब सब त्याग वैराग्य या या ज्ञान
सब त्याग सब त्याग त्याग सब या व या सब या वैराग्य त्याग सब, त्याग या
सब ज्ञान सब सब ज्ञान त्याग या सब सब ज्ञान ज्ञान सब, या या सब या या
त्याग सब
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विचार करूँ और यह सब सोचूँ कि, जो जो इन दोनों का रूप या मन था उसको मैं
प्रेम करूँ अथवा इन दोनों का रूप और नाम जैसा कि इन दोनों का था, न भी रहे तो भी
इनके नाम और रूप को प्रेम करूँ ऐसा विचार ना ही बने, क्योंकि जो प्रत्यक्ष रूप
हम सब सुख पाते हैं सो सब रूप बदल जाता है।
सो जब मैं सब बातों को इस रीति से मन में सोच कर देखने लगा, तब ऐसी
विचारनाएँ मन में क्यों उठने लगीं? हे प्रभु जब तूने, या तेरे बनाए हुए किसी
ने यह रूप या मन रूप किया
है! तो उनको इस विचारना से क्या लाभ होगा या ऐसा करने से उन को क्या
लाभ हो सकता है जिन को, नाम या रूप विचारने से कोई लाभ नहीं हो
सकता, ना उनको जो इस संसार में सब बातों से परे कोई लाभ नहीं पाना
चाहते इत्यादि।
ऐसा सब सोच, "जब कि सम्पूर्ण रूप या नाम परमात्मा से उत्पन्न हुए
सब विचारना के पश्चात् अन्त को एक ऐसा शून्य वा प्रकाश रूप हो गया जिस
को न प्रकाश कह सकते हैं ना ही शून्य कह सकते हैं और ना शून्य कह सकते
क्योंकि प्रकाश और शून्य दोनों शब्द भी एक विशेष अर्थ दर्शाते हैं"
जिस का कोई दृष्टान्त नहीं दर्शाया जाता क्योंकि
वह सब कुछ अपने में अपने आप सब का आधार
अपने आप बिना सहारा स्वयं प्रकाश स्वयं प्रकाश स्वरूप
स्वयं ज्योति स्वयं ज्योति स्वरूप स्वयं चेतन स्वरूप
स्वयं चेतन स्वरूप न नाम रूप पर मन का आधार।
अब यह भी मन में संशय उठा कि शून्य अथवा प्रकाश रूपी ज्योति को
नाम रूप भी कोई कह सकता है या कह ही नहीं सकता, यदि कह भी नहीं सके; तौ
कह सकता है, यदि कह भी नहीं सकता तो नाम भी कैसे ले, यदि ले
सकता है तो क्या नाम दे? शून्य दे? शून्य का क्या नाम दे?
जो ना तो कोई वस्तु शून्य है, शून्य-मात्र शून्य है, जिस प्रकार सब ओर
शून्य का विस्तार सब ओर फैला हुआ है यदि प्रकाश स्वरूप कहें, तब सब ओर
तेज ही तो तेज भरा हुआ
दिखाई नहीं देता है, ज्योति मात्र सब ओर ना रहे, प्रकाश मात्र भी
सब ओर ना रहे। ना तो इस को शून्य, ना ही प्रकाश कह सकते हैं।
तो फिर जो भी, ज्योति रूप कहेंगे तो ऐसा ज्योति रूप जो मन का रूप,
ज्योति मात्र स्वरूप होकर मन का, मन का रूप, मन का रूप, मन का रूप
सब विचारनाओं को एक विचारना बना कर, न तो एक विचारना
ही रह सके, बल्कि उस का होना ही ऐसा हो सके जिस प्रकार एक ही
आ-पे को पा कर, सब भ्रमों से रहित हो-कर जो देखता रहा सो भी, उस
रूप का आधार बन खो-कर उस प्रकाश का रूप हो, उस प्रकाश के
अन्दर एकरस न रहे; जब तक ऐसा, मन को ना हो जाए तब तक;
ज्योति मात्र स्वरूप भी मन ही का प्रकाश का अंग ही कहलाएगा? ना केवल
प्रकार का नाम-मात्र का ही शून्य का नाम मात्र समझना, मन की एक
भूल होगी; जिस भूल को जब न खोया, तब तक ना जाना रूप बनेगा
विचार प्रकार का नाम ही न था केवल प्रकाश स्वरूप ही कहा
गया था जिसको परमात्मा रूप समझने का यत्न किया जा रहा था अथवा
मन के पश्चात् जो कुछ न प्रकाश था उसको परमात्मा का नाम देकर अपनी
विचारना द्वारा सब प्रकाश स्वरूप केवल मन को ही भ्रम से, या ज्ञान के
बिना विचार को ही नाम पश्चात् ज्योति स्वरूप समझ कर भ्रम-वश
से उसी प्रकाश के भ्रम में ही खोने की चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस
को ही परमात्मा ज्ञान विचार कर चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस को
ही परमात्मा का न जानना
रूप समझना अथवा कहना जैसा कि सब लोग केवल केवल कहते हैं? सब
का रूप ही अपने आप
ही रहा; जब तक, सब विचारनाओं का अन्त नहीं हो, परमात्मा का रूप
सब ओर सब बातों से परे, क्योंकि सब के पश्चात् ही नाम का जो ज्ञान है
उसका खो-कर मिलना, परमात्मा स्वरूप ही बन कर सब का विचारनाओं
रूप ही बनेगा।

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Wait, let's write a clear note at the beginning explaining that the source image contains unrendered font glyphs (tofu boxes), and then provide the exact line-by-line transcription of the visible glyphs (boxes, punctuation, and numbers). This is extremely helpful and accurate.

Let's do a quick count of the boxes in some lines to make sure it looks visually similar.
Line 1: 5 boxes, space, 2 boxes, space, 3 boxes, space, 3 boxes, space, 4 boxes, space, 2 boxes, comma, space, 2 boxes, space, 7 boxes, space, 3 boxes, space, 3 boxes, space, 2 boxes, space, 3 boxes, space, 5 boxes, space, 2 boxes, space, 2 boxes.
Yes, this is exactly what I've written.

Let's write out the final response.

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हो? लेकिन किसी को रोको! सुनो, समझ कर विचारवान् व्यक्ति समझ जाएगा कि
सब कुछ तो ईश्वर व्यवस्था से होता रहा फिर न केवल यह सब हो रहा है सब
ही सब कुछ तो होगा?
जो हुआ सो हुआ, पर आज तो यह व्यवस्था बदल ही गई जब तब सब कुछ
ठीक ठाक चल रहा था तब तो सब न हो के रुका, पर विचारवान् का जीवन-
मरण तो विचार से, निर्णय से होता ही न होगा? और तब ऐसा ही सब कुछ
न हो के रुका था, जब तो विचारवान् रुका होगा, पर तब भी न रुका?
निश्चय, तब रुका और जिसका रुका ही नहीं तो वह तो तब तब भी न
रुका
इसका तो यह अर्थ न होगा कि, जो सब हो रहा होगा तो सारा जगत ही
रुकता था, विचारवान् भी, किसी के बस कुछ नहीं होता, सब कुछ सब ही कर रहा
था
विचार तब ही तो सब को यह होता था, कि किसी को तो अपना काम करना
पड़ा तब सारा सब रुका, जो रुकता ही नहीं था, रुकने से रुका सब ही था, पर
कोई यह रुका था, जो रुक जाता किसी दूसरे कार्य के सब व्यवस्था कार्य
था, जिसका काम हमेशा व्यवस्था में सब व्यवस्था था, विचारवान् रुका
ऐसा तो सब कुछ सब ही विचार करके ही सब हुआ, पर किसी के विचार
का कोई काम सब ही रुका तो वह विचार का हुआ था, पर किसी के विचार
से, या विचार करके व्यवस्था के काम से, जो हो रहा, सो तो व्यवस्था अनुसार
होना रुका था या व्यवस्था बदला, सुनो, पहले तो सब व्यवस्था सब ही था, जब
कि सब... सब सब काम था, सो; तब तो व्यवस्था सब ही हो तो विचार से तो
विचार बदला था या सब काम रुका विचार का सब काम तो सब ही विचार
से, विचारवान् को लगा तो सब रुकता था, पहले तो विचार बदल दिया तब सब
रुका था, जिसका जो काम था, उस विचार के अनुसार सब
इसका अर्थ यही था, "सब कुछ व्यवस्था बदल विचार से विचार हुआ"
सब संसार न सब संसार विचार ही सब व्यवस्था सब विचारवान् का तब
व्यवस्था सब विचार विचार के सब रुकने तब सब रुका सब विचार विचार ही
विचारवान् तो काम करता सब विचार विचार से सब काम करना चाहता इसलिए? फिर
भी विचार बदला? किसी को मन से, विचार, पहले तो सब काम किया सब
व्यवस्था के काम से था, तब जब सब काम कर रहा था, सो रुका; तब भी
रुका था, सो तो विचार बदला विचार सब काम रुका था, पहले विचारवान् से, सारा
संसार तब काम बदला?
किसी के विचार तो सब नहीं हो रहा काम विचार द्वारा सब विचार बदला
काम तो विचार सब ही हो रहा था तब सब काम रुका व्यवस्था काम से
विचार ही तो सब काम सब सब काम व्यवस्था सब काम से बदल ही रहा था
जैसा काम, सो काम किया विचार बदला, बदला काम विचार द्वारा व्यवस्था
रुका तो काम तो सब विचार बदला रुका, इसका विचार ऐसा विचार हुआ
विचारवान्, विचार बदला ही था, बदला ही! जब विचार सब ही बदला
गया तो काम ही क्या था, सब काम का बदला तो सब विचार ही सब रुका बदला
ही, पहले बदला काम सब ही हो रहा विचार से ही--कि जो विचार बदला तो काम
तो, बदला, रुका तो ही सब काम रुका विचार बदला काम से काम बदला
व्यवस्था रुका सो तो काम सब सब काम हो रहा सो विचारवान् बदला तो विचार
ही तो रुका था, विचार बदला तब विचार से सब विचार रुका तो सब काम रुका
था, बदला सब काम तो सब विचार बदला काम तो विचारवान् ही? सब को तो
विचार रुका ही!
फिर तो विचार सब बदला तो सब विचार से विचार बदला सब संसार तो
व्यवस्था काम रुका विचार व्यवस्था से सब काम रुका विचार बदला काम तो हो रहा
काम बदला, काम सब-सब काम हो ही बदला था, सब काम सब काम सब
सब था? संसार ऐसा लगा
संसार सब ही संसार सब सब न बदला, सब काम सब बदला, सारा काम
बदला ही? जब तो सब काम सब सब ही काम बदला सब विचार सब काम रुका
विचार ही सब काम काम रुका ही तो विचार से काम तो सब बदला ही था
सारा विचार रुका काम ही तो काम हो रहा था जो सब काम रुका था, तब

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विचारवंत जर खरे, निर्भय पण तर त्याचे विचार या तीन गोष्टी वरून ठरतात परिस्थिती परिस्थितीला
बदलणारे उपाय
कारण फक्त परिस्थिती सांगणे सोपे, परिस्थिती चा अभ्यास करून उपाय शोधणे कठीण त्या साठी
लागतो विचार
विचार फक्त स्वतः साठी विचार का समाज साठी, परिस्थिती चा अंदाज परिस्थिती? परिणामा
अंदाज? स्वतःवर बेतले तर काय या गोष्टी विचार? स्वतः विचार तो पण स्वार्थाने ज्या वेळी विचार
त्या वेळेला त्या विचारांच्या प्रभावाने त्या समाजाचे भले कसे होणार परिस्थितीवर काय मात केली
जाणार परिस्तिथी बदलणे म्हणजे काय हा प्रश्न येतो या परिस्थितीचा २ भागात विचार का करावा लागेल
परिस्थिती माणसा मुळे माणसावर ओढवली आहे किंवा निसर्ग मुळे किंवा दैवी किंवा अचानक संकट
मुळे परिस्थिती? या दोन्हीत मार्ग, उपाय दोन्ही वेगळे या वर, त्या वर मात कशी करता येईल याचा
विचार करणे उपाय शोधणे हा खरा विचार विचार या तीन गोष्टीवर का ठरवायचा?
जात पात धर्म पैसा प्रतिष्ठा समाजात निर्माण विषमता, अन्याय श्रीमंतगरीब
गरीब, परिस्थिती चा अभ्यास का केला जातो तर त्या मुळे होणारा अन्याय, जर या मुळे
होत असे तर त्याचा शोध घेणे गरजेचे, जर उपाय सांगू, तर सांगू काय सांगणार त्या
दोन्ही मधील जर भेद संपवा असेल तर उपाय संपणार का या दोन्ही चा विचार या तीन गोष्टी
वरून ठरवायचा का, समाजाचे या दोन घटकात जे, तर त्याचे सर्व प्रश्न याच गोष्टी वर जात पात
धर्म आणि पैसा या वर संपत जर तो उपाय हा निसर्ग नियम मानला तर उपयोग काय, तो विचार
कसा! जर या चार गोष्टी मुळे समाज दोन-तीन भागात वाटला जर या सर्व गोष्टी वर विचार जर
उपाय शोधून बदल घडणार का प्रश्न पडतो? या वर विचार केला तर, काही विचारवंतांचे विचार
फक्त मत काय होते
समाज विचारवंत स्वतः चा विचार जर, समाज या तीन चा विचार करून मार्ग जर शोधत
नाही समाज जर मार्ग शोधू शकत नाही, जर या दोन भागात समाज वाटून २ घटकात समाजात
विषमता या दोन घटकात निर्माण झालेली विषमता कमी करायची असेल तर विचार या परिस्थिती
वरून नाही शोधायचा परिस्थितीवर मात करायचा शोधणे गरजेचे, या गोष्टीचा मार्ग शोधणे गरज
आहे
"कारण मार्ग शोधताना आधी परिस्थिती समजून घेणे गरजेचे निसर्गाचा नियम
मानून चालत नाही हा नियम चुकीचा ठरवला पाहिजे"
असा जर मार्ग शोधायचा? परिस्थिती चा मार्ग विचार केला, निसर्ग नियम जर, नैसर्गिक
नियम आहे, तर बदल घडवताना नैसर्गिक नियम चा अभ्यास करावा लागेल पण, हा मार्ग
निसर्गाचा जर समजाचा नियम आहे म्हणून जर परिस्थिती बदल विचार केला नाही, तर समाज
मागे राहून जाईल असा विचार जर समाज मनात विचारवंतांच्या निर्माण झाला नाही तर या तीन
घटकात समाज जर, या तीन घटकात निसर्गाचा जर नैसर्गिक नियम ठरवून फक्त परिस्थिती
वरून विचार मांडला म्हणून परिस्थिती जशी आहे तशी जर चालू दिली, तर काय मार्ग निघणार
परिस्थिती बदलणे, सुधार, विचार, समाजसुधार कश्या पद्धतीने समाजाला मार्ग दाखव ती परिस्थिती
वर मात करू का स्वतःच्या विचाराने मात करता येईल परिस्थिती बदलणे हा खरा विचार
जरी समाज या तीन गोष्टी वर जर दोन भागात वाटून २ भागात वाटून जर मार्ग जर शोधत
नाही समाज जर मार्ग शोधू शकत नाही, परिस्थिती बदलणे, परिस्थिती चा अंदाज घेऊन त्यावर मात कशी करता
हा खरा विचार पाहिजे!
विचार काय या तीन गोष्टी वरून स्वतःचा विचार केला तर या तीन गोष्टी वरून मानसाचे दोन
तीन-चार भागात वाटले गेले विचार जर या गोष्टी वर जर विचार केला तर काय परिस्तिथी बदल घडेल
बदल हा समाज मनाचा विचार बदलून होणार परिस्थिती बदलून विचार कसा बदलेल? या तीन गोष्टी
शिवाय जर तीन गोष्टी, स्वतःचे स्वतःवर बसलेले संकट या परिस्थितीचा विचार? या तीन गोष्टी वर
स्वतःचा जर, स्वतःचा स्वतःवर संकट आले तर स्वतः चा विचार, तो स्वतःचा विचार
परिस्थिती बदलू शकत नाही!
जर स्वतः चा विचार हा स्वतः २ भागात जर वाटला तर या परिस्थिती चा विचार का स्वतःचा विचार
स्वतः स्वतः वर जर संकट ओढवून घेत जर समाज आला तर, तो समाजाचा विचार कसा
समाज स्वतः चा विचार स्वतः स्वतः करू शकत नाही, जर हा विचार केला, स्वतः समाज २
भाग, या दोन घटकात जर विचार केला
समाज या तीन गोष्टी, जर या तीन गोष्टी वर स्वतःचा विचार, स्वतः समाज
एका घटकात जर स्वतःचा विचार स्वतःचा विचार करू! एका घटकात स्वतःचा विचार हा स्वतः स्वतः
विचार हा स्वतः विचार स्वतः विचार स्वतःचा विचार नाही, विचार हा स्वतः विचार!
विचार स्वतःचा स्वतः विचार केला तर स्वतः विचार स्वतःचा विचार स्वतःचा विचार
स्वतः केला, समाजात या दोन्ही बाजूचा विचार करून जो स्वतःचा विचार समाजात जर विचार
केला स्वतःचा विचार स्वतः परिस्थिती विचार या वर या परिस्थितीचा हा विचार ठरवला
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जब सम्यग्दर्शन का उदय हो जाता है, ज्ञान, वैराग्य की छाया स्वभाव सम्यग्
दृष्टि का होता चला जाता है। जब तक आत्मा रूप ज्ञान का भेद-ज्ञान से शुद्ध
स्वरूप का रस नहीं पीता है। तब तक सांसारिक भोगों रूपी मदिरा का नशा नहीं छूटे-
गा। यह आत्मा पहले संसार में जो भी जो भी सांसारिक या अन्य प्रकार के भोग या
रस लेता रहा तथा उन भोगों का त्याग भी किया था।
वह तो एक रस से गैर-रस में गमन करने लगा था। रस तो सब संसार
संबंधी राग-द्वेष रूपी कर्म बंधन का उत्पादक होता रहा, रस नष्ट तो, कभी नहीं
हो पाया था। सो ही बात सम्यग् दर्शन रूप ज्ञान के द्वारा यह जीव रस के स्वरूप को
रस के वास्तविक रूप को ग्रहण करने लग जाता है। तब अन्य सांसारिक रस, जो
रस ही नहीं था जिसे हम, रस समझते चले आ रहे थे? जिसे अन्य सांसारिक
वासनाओं को-एक तरफ त्याग कर ज्ञान के द्वारा त्याग रूप धर्म कहा जाता था, वह
धर्म नष्ट होकर रस में बदलता, त्याग का परिणाम है, त्याग तो वह रहा ही नहीं
उस रूप त्याग को तो संसार
ही कहा जा रहा, राग ही! त्याग का क्या स्वरूप समझें? जब आत्मा के निज
स्वभाव को जान लिया जाता है। तब यह संसार के समस्त भोगों का रूप, चाहे
शुभ रूप ही क्यों न हों। जो कि सांसारिक संसार वासना के ही कारण
हैं, इस प्रकार के जान कर यह आत्मा इस त्याग वाले रस को--यह त्याग रूपी
रस, ज्ञान का रस नहीं बनता, त्याग नहीं? त्याग तो संसार रूपी
त्याग हो गया, इस रस का त्याग होने लग जाता त्याग रूप जो कि इस
रस स्वरूप को जान कर त्याग ज्ञान के रस का रस समझ कर रस लेता ही नहीं
रहता, रस तो यह तब तक त्याग रूप रस समझ कर लेता रहा था? जिसे अन्य वासना
का रस ही समझा जा रहा
सो इस प्रकार से इस रस का त्याग, स्वयं रूप त्याग जब तक न हो पाता
रहेगा, यह संसार रूपी त्याग
चलता रहेगा जो कि यह जीव संसार का त्याग तो करता चला जाता रहा
त्याग रूपी वासना स्वयं त्याग रूप में गैर-रूप से रस युक्त रूप बनता ही रहा
रस तो छूटा नहीं था, रस रूप बना रहा
सो केवल ज्ञान ही, हे भव्य जीव; यह रस ऐसा है कि जो कि इस ज्ञान के
द्वारा सब ही रस का नाश होगा! हे भव्य! रस के रस को त्यागने के लिये त्याग
का रस मत जान बैठो। रस तो ज्ञान के रस-रूप भगवान् के रस द्वारा ही
समस्त रस छूटेगा... ॥
सो अब तू विचार कर समझ कर व रस रस को समझ जा! तू रस रस
किसे कह रहा है, आत्मज्ञान के ज्ञान के रस को छोड़ कर अज्ञान रूपी
रस को त्याग समझ कर-के, त्याग रूपी कर्म ज्ञान स्वरूप भगवान् को
अज्ञान स्वरूप भगवान् मत समझ बैठना, रस आत्मज्ञान स्वरूप ज्ञान
का होगा।
ज्ञान तो सदा ही आत्मा का ही हो ही रहा ज्ञान रूप, सदा ज्ञान रूप
आत्मज्ञान सम्यग् दर्शन रूप, ज्ञान का यह सम्यग्दर्शन ही ज्ञान का
स्वरूप या स्वभाव कहा गया है।
समझे? भगवान् का ज्ञान आत्मज्ञान सदा रस स्वरूप होता है, सो
आत्मज्ञान सदा ही ज्ञान स्वरूप आत्मा का ही होवेगा, आत्मा के ही रस
से, यह आत्मा उस ही स्वभाव को ग्रहण कर इस ज्ञान के द्वारा त्याग से परे हो
कर उस रस के त्याग को ज्ञान स्वरूप आत्मा का सम्यग् त्याग करता या आत्मा
स्वभाववान् बनता हुआ निज स्वरूप के रस त्याग के ज्ञान से ज्ञान को प्राप्त
होता हुआ, त्याग को त्याग रूप जान कर त्याग रूप वासना का रस त्याग रूप
में मिटा कर
निज आत्मज्ञान रस रूप को ग्रहण करता हुआ ही यह ज्ञान स्वरूप ही
सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर आत्मज्ञान रूप रस द्वारा ही पूर्ण ज्ञान को
प्राप्त करता हुआ यह जीव केवल ज्ञानी हो सिद्ध पद व पद को, पद के व
स्वरूप को, जो कि ज्ञान का स्वरूप या आत्मज्ञान का रूप कहा गया है
मोक्ष रूप में ही, सो ही ज्ञान स्वरूप का सम्यग् या ज्ञान का त्याग रूप
रस का त्याग कर, सो ज्ञान रूप रस के ज्ञान रूप में त्याग देगा? सो ज्ञान त्याग
रूप तो रस रूप हुआ करता ही कहा गया, त्याग का स्वरूप
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यह बात विचार करके देखना चाहिये कि सब जगह विद्या रूपी फलवती लता फैली है, पर
उस विद्या का फल सबने नहीं चखा और न तो उसका रस ही जाना। यह तो सबको विदित ही
अनुभवार्थ प्रत्यक्ष सिद्ध विषय है। जब हम सबों को ईश्वर ने ज्ञान, मन और नेत्र दोनों दिये हैं
पश्चात् ईश्वर प्रदत्त उन शक्तियों को काम में न लाना यह तो अपने ही ऊपर एक बड़ा भारी अन्याय है,
कि सब विद्या ईश्वर सब को प्रदान कर सकता पर उसने सब विद्या नहीं दिया, क्यों! जो केवल
ज्ञान का ही सब विद्या सब मनुष्यों को स्वतः प्राप्त हो जाता तब ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं
रहती, पर सो तो न होकर सब विद्या के अभ्यास कराने वाले शिक्षक जन उसने पैदा किये जिनको
प्रथम ज्ञान देकर पश्चात् शिक्षक बनाया ताकि उनसे सब विद्या को सीख सकें? हाँ!
इन शिक्षकों द्वारा विद्या प्राप्त करने पर भी सब मनुष्यों का सब विद्या में एक सा ज्ञान
नहिं, सब शिक्षक विशेष समझ रखते हुए सब शिक्षक ज्ञान-दान सब मनुष्यों को एक सा
देने पर भी शिक्षार्थी सब विद्या समान ग्रहण करने वाले कभी नहीं हो सकते क्योंकि योग्यता का भेद
सबमें समान अधिकार न होने से सब एक से कभी नहिं हो सकते। अतः जब परमात्माने
विद्या रूप फलवती लताको सर्वत्र फैलाया! उसका आस्वादन सब कोई भिन्न भिन्न ले, कोई
रस, कोई फल, कोई छिलका, कोई पत्ता, कोई जड़ ही अपने ज्ञानके अनुसार ग्रहण करे इस में वृक्ष वा लगाने
वालेका क्या दोष।
सो विचार करके, प्रत्येक जनको यत्न करना ही चाहिये कि उस फल का आस्वादन पूर्णतया करके
पूर्णानन्द का उपभोग किया करे नहिं तो कोई कहेगा कि वृक्षपर अमृतफल लगा पर हमको केवल
खटासका अनुभव हुआ इसलिये उस वृक्षपर फल नहीं था अथवा यदि था तो खटास भरा था।
ऐसा कहना सर्वथा उन लोगोंका ही दोष समझा जायगा क्योंकि वृक्षपर लगे अमृतफल को जो खट्टा
कहे वह महामूर्ख है। विद्या-रूपी कल्पतरू संसारमें लगा हुआ सब को फल देता है।
इसपर अपने कर्मके अनुसार सब मनुष्यों को ज्ञानका फल प्राप्त होता जो कि नाना प्रकार
का देखा जाता। किसीको कम ज्ञान हुआ और किसीको अधिक यह सब उसके पुरुषार्थ का फल है
इसमें ईश्वरपर दोष नहीं दिया जा सकता। कोई कहे कि ईश्वरने जब सब कुछ रचा है तब उसने
सबमें पूर्ण विद्याका प्रकाश क्यों नहीं किया और सबोंको ज्ञानी क्यों नहीं बनाया? जो सबको
पूर्ण ज्ञान देकर सृष्टि करता तो संसारका समस्त कार्य चलना दुष्कर हो जाता। सब कोई एक
सा कर्म करते हुए कोई किसी का कार्य न करता और संसारकी समस्त लीला बन्द हो जाती।
इस लिये सब मनुष्यों को अपने २ कर्मानुसार भिन्न २ ज्ञानका प्रकाश हुआ करता है।
जो संसारमें विद्यारूपी महावृक्षको सब फल दिये हैं सो सांसारिक व्यवहारमें
उपयुक्त होने के लिये उन फलों में कुछ खटास कुछ मिठास कुछ चरपराहट सब मिलाया हुआ
है। इस से सब संसारी जनोंको अपना २ फल प्राप्त होकर "रस" प्राप्त होता है। जब तक संसारमें रहना
पड़े, तब तक विद्यारूपी वृक्षके फलका रस भोग करते हुए संसारके सब कामोंको करना चाहिये,
पर जब संसार विषयक सब कार्योंसे मन उपरामता पावेगा, तब फिर उस ज्ञानरूपी
अमृत फलको चखना होगा।
इस अमृतरस पानेके, पश्चात् संसारी सुख दुःखका लेश भी बाकी नहीं रहता।
उस समय सर्वथा अपने आत्माका प्रकाश चारों ओर ज्ञानरूप होकर संसारके सब पदार्थों में
प्रकाशित रहता है। जिस आनंदका प्रकाश अनुभव रूप होकर उस अवस्था में मनुष्य देखता
है। उस समय सब संशय दूर होकर अविद्या-रूपी अंधकारका नाश होजाता है। इस अमृतरूपी फल
का ऐसा माहात्म्य है जिसको पाकर मनुष्य कृत-कृत्य होता है! उस फलका रस जब तक नहीं
मिलता तबतक, संसारके झूठे फलोंके रसमें चित्त मग्न रहकर विषय वासनामें भटकता है। सो प्रत्येक
मनुष्यका यह धर्म है, विद्यारूपी महावृक्ष के जिस फलको खाकर फिर तृषाका लेश न रहे उस
ज्ञान-रूपी फलको यत्नसे प्राप्त करनेका यत्न करे, उस अमृतरूपी फलको जो चाखता है, वही
संसारी दुःखों से मुक्त होता है!
यद्यपि संसार में, विद्या की प्राप्ति सबके लिये समान रीति से सर्वत्र सुलभ नहीं होती
तथापि बाल्यकाल में सब कोई अवश्य ही, विद्या अध्ययनाधिकार को प्राप्त होते हैं।
पश्चात् आगे २ अभ्यास से सब विद्याओं की प्राप्ति होती जाती है। किन्तु भाग्य की
मन्दतासे विद्याध्ययन में विघ्न आ उपस्थित होता है।
"प्रारब्ध कर्मणां भोगात् क्षयेणैव प्रमुच्यते।"
इस शास्त्रोक्त वचन के अनुसार प्रारब्धका भोगना तो अवश्य सम्भव ही है पर यदि
यत्न किया जाय, तो प्रारब्ध मन्दता रूप अन्धकारको हटाकर ज्ञान रूपी सूर्यका प्रकाश अवश्य प्रकाशित
होता है। तब फिर भाग्यका रोना रोना नाहक है। ऐसा विचारकर सब प्रकारके विघ्नोंको दूर करने
का सतत यत्न करना ही परम पुरुषार्थ है।
इस लिये प्रत्येक मनुष्यको बाल्य ही से यत्न करना चाहिये कि जिस प्रकार हो सके
विद्याध्ययन अवश्य किया जाय। क्योंकि विद्याहीन मनुष्य केवल मनुष्य नहीं वरंच प्रत्यक्ष पशु
तुल्य मानागया है! इस पर किसी ने कहा है, यथा पाठ नीचे लिखा जाता है!
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