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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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विचार करूँ और यह सब सोचूँ कि, जो जो इन दोनों का रूप या मन था उसको मैं
प्रेम करूँ अथवा इन दोनों का रूप और नाम जैसा कि इन दोनों का था, न भी रहे तो भी
इनके नाम और रूप को प्रेम करूँ ऐसा विचार ना ही बने, क्योंकि जो प्रत्यक्ष रूप
हम सब सुख पाते हैं सो सब रूप बदल जाता है।
सो जब मैं सब बातों को इस रीति से मन में सोच कर देखने लगा, तब ऐसी
विचारनाएँ मन में क्यों उठने लगीं? हे प्रभु जब तूने, या तेरे बनाए हुए किसी
ने यह रूप या मन रूप किया
है! तो उनको इस विचारना से क्या लाभ होगा या ऐसा करने से उन को क्या
लाभ हो सकता है जिन को, नाम या रूप विचारने से कोई लाभ नहीं हो
सकता, ना उनको जो इस संसार में सब बातों से परे कोई लाभ नहीं पाना
चाहते इत्यादि।
ऐसा सब सोच, "जब कि सम्पूर्ण रूप या नाम परमात्मा से उत्पन्न हुए
सब विचारना के पश्चात् अन्त को एक ऐसा शून्य वा प्रकाश रूप हो गया जिस
को न प्रकाश कह सकते हैं ना ही शून्य कह सकते हैं और ना शून्य कह सकते
क्योंकि प्रकाश और शून्य दोनों शब्द भी एक विशेष अर्थ दर्शाते हैं"
जिस का कोई दृष्टान्त नहीं दर्शाया जाता क्योंकि
वह सब कुछ अपने में अपने आप सब का आधार
अपने आप बिना सहारा स्वयं प्रकाश स्वयं प्रकाश स्वरूप
स्वयं ज्योति स्वयं ज्योति स्वरूप स्वयं चेतन स्वरूप
स्वयं चेतन स्वरूप न नाम रूप पर मन का आधार।
अब यह भी मन में संशय उठा कि शून्य अथवा प्रकाश रूपी ज्योति को
नाम रूप भी कोई कह सकता है या कह ही नहीं सकता, यदि कह भी नहीं सके; तौ
कह सकता है, यदि कह भी नहीं सकता तो नाम भी कैसे ले, यदि ले
सकता है तो क्या नाम दे? शून्य दे? शून्य का क्या नाम दे?
जो ना तो कोई वस्तु शून्य है, शून्य-मात्र शून्य है, जिस प्रकार सब ओर
शून्य का विस्तार सब ओर फैला हुआ है यदि प्रकाश स्वरूप कहें, तब सब ओर
तेज ही तो तेज भरा हुआ
दिखाई नहीं देता है, ज्योति मात्र सब ओर ना रहे, प्रकाश मात्र भी
सब ओर ना रहे। ना तो इस को शून्य, ना ही प्रकाश कह सकते हैं।
तो फिर जो भी, ज्योति रूप कहेंगे तो ऐसा ज्योति रूप जो मन का रूप,
ज्योति मात्र स्वरूप होकर मन का, मन का रूप, मन का रूप, मन का रूप
सब विचारनाओं को एक विचारना बना कर, न तो एक विचारना
ही रह सके, बल्कि उस का होना ही ऐसा हो सके जिस प्रकार एक ही
आ-पे को पा कर, सब भ्रमों से रहित हो-कर जो देखता रहा सो भी, उस
रूप का आधार बन खो-कर उस प्रकाश का रूप हो, उस प्रकाश के
अन्दर एकरस न रहे; जब तक ऐसा, मन को ना हो जाए तब तक;
ज्योति मात्र स्वरूप भी मन ही का प्रकाश का अंग ही कहलाएगा? ना केवल
प्रकार का नाम-मात्र का ही शून्य का नाम मात्र समझना, मन की एक
भूल होगी; जिस भूल को जब न खोया, तब तक ना जाना रूप बनेगा
विचार प्रकार का नाम ही न था केवल प्रकाश स्वरूप ही कहा
गया था जिसको परमात्मा रूप समझने का यत्न किया जा रहा था अथवा
मन के पश्चात् जो कुछ न प्रकाश था उसको परमात्मा का नाम देकर अपनी
विचारना द्वारा सब प्रकाश स्वरूप केवल मन को ही भ्रम से, या ज्ञान के
बिना विचार को ही नाम पश्चात् ज्योति स्वरूप समझ कर भ्रम-वश
से उसी प्रकाश के भ्रम में ही खोने की चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस
को ही परमात्मा ज्ञान विचार कर चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस को
ही परमात्मा का न जानना
रूप समझना अथवा कहना जैसा कि सब लोग केवल केवल कहते हैं? सब
का रूप ही अपने आप
ही रहा; जब तक, सब विचारनाओं का अन्त नहीं हो, परमात्मा का रूप
सब ओर सब बातों से परे, क्योंकि सब के पश्चात् ही नाम का जो ज्ञान है
उसका खो-कर मिलना, परमात्मा स्वरूप ही बन कर सब का विचारनाओं
रूप ही बनेगा।

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