एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
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Read in contextजिससे पराधीनता कभी नहीं मिटती थी सो राजा का जीवन व्यर्थ रहा वा कृतघ्न का
दोष उस पर आया।अकृतज्ञता यह ही कि जो अपने ऊपर उपकार वा नेकी करे उसका
बदला बुरा किया जावे अथवा, जो ऐसा करे निष्कपटता से उसको कपट किया जावे
महाराज ने बड़ा सोच किया पश्चात् सम्भ्रम से मन्त्री को कह भेजा, जो
मन्त्री का नाम था सो तो उस पुस्तक में नहीं था, और जो नाम दिया गया है
वह नाम मात्र कथा कहने के वास्ते ही रख--कर के दिया है, मन्त्री सू--झ बूझ का
राजा बड़ा ज्ञानी समझता था। राजा, स्वयं ज्ञानी था, इस वास्ते ही, उस मन्त्री को,
अपना सब हाल दिल समझाया सब ही प्रकार
मन्त्री ने उत्तर दिया कि, उस हाथी और महावत वाली बात है, सो
महाराजा आप तो सब कुछ समझते सम्हाल ही सकते।परन्तु महाराज की समझ में
राजा रूप में कुछ अन्तर आयाहै, बस्स! सो ही बात हो गई न? राजा रूप में जो
बात थी उसकी सम्भाल रखने के वास्ते राजा को हर समय तैयार रहना था सो राजा ने
बात को खोया और प्रजाजन के मन में दिल चाहा ख्याल होने लगा ॥ १० ॥
महाराज की बात का फैसला तो प्रजाजन कर नहीं सके पर मन्त्री कैसे करते?
मन्त्री कहने लगे, वा प्रजाजन और राजा का हाल सब ही प्रजाजन के
ही अन्दर से समझ लो, इस बात को सब कोई समझ सकतेहैं पर मालिक के
घर का भेद सब को नहीं मिल सकता और न ही सब को दिया जाता है, सो राजा
का भेद सब नहीं समझ सकते वा प्रजा, जो प्रजाजन राजा का विचार
ही न कर सके तो जो बात के समझने लायक बुद्धि नहीं रखते तो वह तो
प्रजाजन ही ठहरा और वह प्रजाजन ही कहे गये
प्रजा राजा के आधीन राजा के सुख का ध्यान रखे! पर राजा सब प्रजा
का सुख सम्भाल विचार प्रजा का सुख रखे सो प्रजा अपने सुख में आनन्द पावे
और जो चाहे सो ही करे!
अब राजा के सुख को तो हर एक प्रजा समझे किन्तु अपने सुख तरफ
ही, न कि सब कोई प्रजाजन ही उस पर चले वा, हर कोई राजा की ओर ध्यान करे
यह बात तो सब समझें वा, सब ही प्रजाजन सब ही प्रकार जाने, पर सब कोई
राजा की ही तरह विचार नहीं कर सकताऔर प्रजा--प्रबन्ध का कोई भेद नहीं
पा सके इससे ही प्रजाजन को हर बात समझ नहीं आतीकि राजा ने यह हुकम
क्यों किया और इस बात में प्रजाजन का भला, था कि सब का भला
महाराज! उस ही बात को सम्भाल कर दिल में लें, इस में ही प्रजा और
ही का भला, फैसला सब प्रकार प्रजाजन का सब प्रकार से राजा रूप में ही
प्रजाजन का ध्यान सुख का सम्भाल रूप होताथा।जब तक ही सब प्रजाजन
राजा रूप में सुखी रहे वा सुखी हो सके, सो हर बात का ध्यान तो राजा ही
सब का रखने वाला ठहरा और सब बात अपने जिम्मे ले करके रखता था जिस
बात का प्रजा पर कोई असर नहीं पड़ता वा प्रजा को कोई भी बात सोचना नहीं
पड़ता
सब बात का तो प्रजाजन को विचार रहा न ही अपने सुख तरफ ध्यान रहा
सिर्फ प्रजाजन प्रजाजन कहलाने ही पर सब कुछ ध्यान प्रजाजन का सुख
रूपी आनन्द ही प्रजाजन सम्हालता था, सो राजा अपने सुख का ध्यान भूल गया
फल-रूप में प्रजाजन अपने सुख से खाली रहा सो प्रजा को पराधीनता का दुख
व्यापा
प्रजाजन पराधीनता किसे न कहे जिस बात का प्रजाजन को ही सोचना हो
और प्रजा को ही हर बात का मन सू--झना पड़े और राजा प्रबन्ध सू--झ का विचार ही
प्रजाजन छोड़ कर प्रजाजन को ही प्रजा सम्हालना पड़े, प्रजाजन राजा हुआ?
सो ऐसा प्रजाजन हुआ! जिसे प्रजाजन का सुख वा लाभ कुछ नहीं
प्रजाजन का सुख, सब, प्रजा ही प्रजा रहा
तो राजा का क्या, लाभ रहा? जब तक यह न सूझे
प्रजाजन ही रहा, प्रजाजन का फैसला क्या?
राजा विचारने लगा, प्रजाजन को ही सब कुछ करना व सब सोचा, व
सब कुछ सोचा, राजा को, प्रजाजन ही राजा का सुख समझ कर अपना ही सोचा
वा सब प्रकार से हर एक को ही बात समझ प्रजाजन को राजा ही समझा और अपना
सब कुछ खोया, अब क्या उपाय हो सकता है? सो राजा विचार प्रजा की सब तरह
का फैसला करने लग गया
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