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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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यह बात विचार करके देखना चाहिये कि सब जगह विद्या रूपी फलवती लता फैली है, पर
उस विद्या का फल सबने नहीं चखा और न तो उसका रस ही जाना। यह तो सबको विदित ही
अनुभवार्थ प्रत्यक्ष सिद्ध विषय है। जब हम सबों को ईश्वर ने ज्ञान, मन और नेत्र दोनों दिये हैं
पश्चात् ईश्वर प्रदत्त उन शक्तियों को काम में न लाना यह तो अपने ही ऊपर एक बड़ा भारी अन्याय है,
कि सब विद्या ईश्वर सब को प्रदान कर सकता पर उसने सब विद्या नहीं दिया, क्यों! जो केवल
ज्ञान का ही सब विद्या सब मनुष्यों को स्वतः प्राप्त हो जाता तब ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं
रहती, पर सो तो न होकर सब विद्या के अभ्यास कराने वाले शिक्षक जन उसने पैदा किये जिनको
प्रथम ज्ञान देकर पश्चात् शिक्षक बनाया ताकि उनसे सब विद्या को सीख सकें? हाँ!
इन शिक्षकों द्वारा विद्या प्राप्त करने पर भी सब मनुष्यों का सब विद्या में एक सा ज्ञान
नहिं, सब शिक्षक विशेष समझ रखते हुए सब शिक्षक ज्ञान-दान सब मनुष्यों को एक सा
देने पर भी शिक्षार्थी सब विद्या समान ग्रहण करने वाले कभी नहीं हो सकते क्योंकि योग्यता का भेद
सबमें समान अधिकार न होने से सब एक से कभी नहिं हो सकते। अतः जब परमात्माने
विद्या रूप फलवती लताको सर्वत्र फैलाया! उसका आस्वादन सब कोई भिन्न भिन्न ले, कोई
रस, कोई फल, कोई छिलका, कोई पत्ता, कोई जड़ ही अपने ज्ञानके अनुसार ग्रहण करे इस में वृक्ष वा लगाने
वालेका क्या दोष।
सो विचार करके, प्रत्येक जनको यत्न करना ही चाहिये कि उस फल का आस्वादन पूर्णतया करके
पूर्णानन्द का उपभोग किया करे नहिं तो कोई कहेगा कि वृक्षपर अमृतफल लगा पर हमको केवल
खटासका अनुभव हुआ इसलिये उस वृक्षपर फल नहीं था अथवा यदि था तो खटास भरा था।
ऐसा कहना सर्वथा उन लोगोंका ही दोष समझा जायगा क्योंकि वृक्षपर लगे अमृतफल को जो खट्टा
कहे वह महामूर्ख है। विद्या-रूपी कल्पतरू संसारमें लगा हुआ सब को फल देता है।
इसपर अपने कर्मके अनुसार सब मनुष्यों को ज्ञानका फल प्राप्त होता जो कि नाना प्रकार
का देखा जाता। किसीको कम ज्ञान हुआ और किसीको अधिक यह सब उसके पुरुषार्थ का फल है
इसमें ईश्वरपर दोष नहीं दिया जा सकता। कोई कहे कि ईश्वरने जब सब कुछ रचा है तब उसने
सबमें पूर्ण विद्याका प्रकाश क्यों नहीं किया और सबोंको ज्ञानी क्यों नहीं बनाया? जो सबको
पूर्ण ज्ञान देकर सृष्टि करता तो संसारका समस्त कार्य चलना दुष्कर हो जाता। सब कोई एक
सा कर्म करते हुए कोई किसी का कार्य न करता और संसारकी समस्त लीला बन्द हो जाती।
इस लिये सब मनुष्यों को अपने २ कर्मानुसार भिन्न २ ज्ञानका प्रकाश हुआ करता है।
जो संसारमें विद्यारूपी महावृक्षको सब फल दिये हैं सो सांसारिक व्यवहारमें
उपयुक्त होने के लिये उन फलों में कुछ खटास कुछ मिठास कुछ चरपराहट सब मिलाया हुआ
है। इस से सब संसारी जनोंको अपना २ फल प्राप्त होकर "रस" प्राप्त होता है। जब तक संसारमें रहना
पड़े, तब तक विद्यारूपी वृक्षके फलका रस भोग करते हुए संसारके सब कामोंको करना चाहिये,
पर जब संसार विषयक सब कार्योंसे मन उपरामता पावेगा, तब फिर उस ज्ञानरूपी
अमृत फलको चखना होगा।
इस अमृतरस पानेके, पश्चात् संसारी सुख दुःखका लेश भी बाकी नहीं रहता।
उस समय सर्वथा अपने आत्माका प्रकाश चारों ओर ज्ञानरूप होकर संसारके सब पदार्थों में
प्रकाशित रहता है। जिस आनंदका प्रकाश अनुभव रूप होकर उस अवस्था में मनुष्य देखता
है। उस समय सब संशय दूर होकर अविद्या-रूपी अंधकारका नाश होजाता है। इस अमृतरूपी फल
का ऐसा माहात्म्य है जिसको पाकर मनुष्य कृत-कृत्य होता है! उस फलका रस जब तक नहीं
मिलता तबतक, संसारके झूठे फलोंके रसमें चित्त मग्न रहकर विषय वासनामें भटकता है। सो प्रत्येक
मनुष्यका यह धर्म है, विद्यारूपी महावृक्ष के जिस फलको खाकर फिर तृषाका लेश न रहे उस
ज्ञान-रूपी फलको यत्नसे प्राप्त करनेका यत्न करे, उस अमृतरूपी फलको जो चाखता है, वही
संसारी दुःखों से मुक्त होता है!
यद्यपि संसार में, विद्या की प्राप्ति सबके लिये समान रीति से सर्वत्र सुलभ नहीं होती
तथापि बाल्यकाल में सब कोई अवश्य ही, विद्या अध्ययनाधिकार को प्राप्त होते हैं।
पश्चात् आगे २ अभ्यास से सब विद्याओं की प्राप्ति होती जाती है। किन्तु भाग्य की
मन्दतासे विद्याध्ययन में विघ्न आ उपस्थित होता है।
"प्रारब्ध कर्मणां भोगात् क्षयेणैव प्रमुच्यते।"
इस शास्त्रोक्त वचन के अनुसार प्रारब्धका भोगना तो अवश्य सम्भव ही है पर यदि
यत्न किया जाय, तो प्रारब्ध मन्दता रूप अन्धकारको हटाकर ज्ञान रूपी सूर्यका प्रकाश अवश्य प्रकाशित
होता है। तब फिर भाग्यका रोना रोना नाहक है। ऐसा विचारकर सब प्रकारके विघ्नोंको दूर करने
का सतत यत्न करना ही परम पुरुषार्थ है।
इस लिये प्रत्येक मनुष्यको बाल्य ही से यत्न करना चाहिये कि जिस प्रकार हो सके
विद्याध्ययन अवश्य किया जाय। क्योंकि विद्याहीन मनुष्य केवल मनुष्य नहीं वरंच प्रत्यक्ष पशु
तुल्य मानागया है! इस पर किसी ने कहा है, यथा पाठ नीचे लिखा जाता है!
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