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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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विचार कर उसको अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसरित करना चाहिए अथवा संकट के निवारणार्थ कुछ
ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे कि वह उस उपस्थित आपदा विपति कष्ट शोक भय का सामना करने
योग्य बन सके। यदि ऐसा न हो सके तो उस समय उसको धीर, धर्म का उपदेश या नीतिपरक
विचार सब व्यर्थ सिद्ध हो जाते हैं। उस समय व्याकुल हृदय, तन मन में उपद्रवित मनुष्य
किसी भी बात को चाहे कितनी उत्तम विचारपूर्ण क्यों न हो, ग्रहण करने की स्थिति में
नहीं रहता और वह समझाने वाले को निर्दयी पाषाण हृदय समझ कर और भी अधिक
क्षुब्ध हो कर उस मार्ग का पथिक कभी नहीं बनता जिस पर उसे
पथप्रदर्शक ले जाना चाहता है।
लेकिन उसने ऐसा नह किया और वह "हे राम, हम तो मारे गये हमें बचाओ बचाओ नहीं
चिल्लाया सिर्फ सो गया। नह सो जाना चाहिए"
कर्तव्य उपदेशक या अन्य विचार उपदेशक को चाहिए कि वह संकट के समय उस मनुष्य
जिसे वह शिक्षा देना चाहता है, उसकी रक्षा के लिए आगे बढ़े और उसे धीर व सहायता दे।
उस संकट से बचाए, तो फिर वह मनुष्य सब कुछ सुनने को तैयार हो जाएगा। यदि कोई
व्याकुल हो कर नदी किनारे खड़ा हो, उस समय उसको यह शिक्षा न देकर कि तैरना सीख
लेना था पहले ही, तैराकीसीखनेके लाभोंका वर्णन करने लगे अथवा किनारे खड़े हो कर
हाथ-पाँव मार कर बच जाओ, उपदेशक का काम यह होना चाहिए कि वह
स्वयं कूदकर या, अन्य किसी प्रकार साधन सामग्री जुटाकर उस डूबते
हुए को पार लगा दे। यदि वह डूब गया, तो फिर उस शिक्षा का उपदेश का लाभ क्या
रहा और उस मूर्ख, जो उस समय उस को ज्ञान की बात बता रहा था उसके जैसी मूर्खता
कोई नहीं, इस पर भी यदि वह तैरना जानता हो, तैरना तो, दूर की, बात रही, तैरना सिखाने का
दावा करने लगा हो। तब तो, समझ ही लेना-चाहिए कि वह सब कुछ जान बूझ
जानकर भी कुछ नहीं कर रहा है। वह तो उस पानी में डूबने वाले का सच्चा
शत्रु हुआ जिसने समय व्यतीत कर दिया उस को बात-बात फंसा कर। उस डूबते
मनुष्य को चाहिए कि तत्काल, जो कोई ऐसा ज्ञान दे रहा हो उसका दो बात उल्टी
सुना कर कह दे कि भाई तू जा, मुझे न बचा और न उपदेश दे। तेरी उपदेश भरी
वाणी तथा तेरी विद्या तुझे मुबारक हो--उपदेशक जी, उपदेश उस समय जब
सब कुछ अनुकूल तथा शान्त हो उस समय तो सब कुछ कल्याणकारी हो सकता, लेकिन
संकट काल में नहीं! उपदेश पहले दिया जाता है अथवा बाद में दिया जाता है, न कि
विपदा काल में उस समय-समय ज्ञान न दे कर तत्काल जो बन पड़े सो कर जान बचाने का
यत्न किया जा सके।
क्या, समझे?
हां प्रभु, समझ गया। कृपा कीजिए।
उपदेश पहले दिया जा चुका होता है, तो वह मनुष्य उस आपदा का
धैर्य तथा साहस के साथ सामना कर सकता था। न करने पर संकट काल आने पर वह
व्याकुल तो हो जाएगा! अब उस व्याकुल हृदय वाले, को जब उपदेश दिया गया
उपदेश का उपहास बना दिया उसने और उस उपदेश दाता, को मूर्ख
कहा गया।
संकट सिर पर आ कर खड़ा हुआ-हो, जीवन-मरण का प्रश्न बन गया हो।
उस समय ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें करने लगो और कहो कि तुम ऐसा करो
तो यह संकट टल जाय तो यह अन्याय, यह निर्दयता, यह मूर्ख, ज्ञान-मद, विद्वत्ता,
पंडित, साधु, का पाखंड कहा जाय तो इस में किसी को संशय न होना
चाहिए। उपदेश का समय उस समय तक होता है जब तक कोई संकट न आया हो, अथवा
संकट आने से पहले ज्ञान दिया जाता है कि--इन से बचने के उपाय पहले सीख
लो--तो उसका लाभ हो? उपदेश ले कर जब संकट का सामना किया जाता तो सब
कुछ सामान्य ही रहता। पर विपदा आने पर उपदेश दिया जाता तो वह उपहास, हंसी
योग्य बन, उपहासास्पद बन जाता है। उपदेशक को सब मूर्ख जन उस समय
समझेंगे कि, अरे तू, पहले ही, जागता! उपदेश से पहले ज्ञान क्यों नहीं दिया?
उपदेश तो दिया, लेकिन उस पर विश्वास नहीं किया गया। तब संकट आया तो
व्याकुल हो उठा। पर उस समय तो सहायता की आवश्यकता थी उपदेश की तो नहीं थी।
ज्ञान का फल यही होता यदि अभ्यास में न लाया जाता तो संकट में, वह ज्ञान काम
नहीं आ सकता था, अर्जुन! उस समय सब कुछ अभ्यास काम देता है जो कि पहले
किया जा चुका हो।
विश्वासपूर्वक जो ज्ञान को अपनाता है उस--का संकट में भी मन विचलित
और भय--से ग्रस्त नहीं होता और संकट सब स्वयं हल होते जाते हैं।
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