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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

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DevanagariHindipublished322 pages

About this granth

Ek Omkar Satnam (एक ओंकार सतनाम) is a collection of Hindi talks by Osho (Acharya Rajneesh, 1931–1990) on Guru Nanak's Japji Sahib. The Japji is the foremost composition of the Sikh tradition, standing at the opening of the Guru Granth Sahib and recited each morning. It begins with the Mul Mantar, "Ik Onkar Satnam Karta Purakh", from which the book takes its title.

In these discourses Osho goes through the pauris of the Japji in order and speaks on remembrance of the Name, hukam (the divine order), the guru, meditation and surrender. He illustrates his points with episodes from Nanak's life, stories of saints and his own familiar parables, and presents Nanak's devotion as a path that can be lived in the midst of household life.

The book is arranged in a series of chapters with a table of contents and runs to about 322 pages. It suits readers who want to approach the Japji and the Sikh sant tradition through the eyes of a modern spiritual speaker.

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यह स्वाध्याय केवल मन को शान्त करनेकेलिए था, या यह बात व्यावहारिक रूपमें
जीवनभरके चरित पर प्रभाव डालेगी यह बात हम नहीं जानते, सम्भवतः यह केवल विचार करनेके
लिएथा? जो विवेक उत्पन्न हुआ, वह विवेक स्थायी होगा या केवल बात समाप्त होनेके
साथ ही वह विवेक समाप्त होजायगा यह बात हम नहीं कहसकते इस बात का निर्णय, सम्भवतः
उस स्वाध्यायके पश्चात् जो बात या इतिहास हमारे सम्मुख उपस्थित होताहै वह इस बात निर्णय
कर सकता है। केवल विचार तक निश्चय? या क्रियामें विवेक होगा, इसका निर्णय तो प्रत्येक का
जो काम आगे उपस्थित हुआ उससे होगा, उस समय देखना चाहिए कि विवेक प्रबल हुआ या अज्ञान
प्रबल रहा, इस बात तथापि स्पष्ट है कि धर्म-कर्म समझनेके पश्चात्के जीवनमें कुछ
लाभ होता है, कोई भी निश्चय कभी व्यर्थ तो जाता ही नहीं, परन्तु देखना चाहिएकि मनुष्य
केवल १ बार विचारकर, सदा स्थिर रहने समर्थ हो सकता नहीं तथा इसके विपरीत जो अनेक
बार बार यह स्वाध्याय करता रहेगा उसका विवेक अवश्य स्थिर हो सकता है। स्मरण रहे कि यह
क्रिया है, सदा स्वाध्याय करनेसेही यह परिणाम संभव है।
विचार तो उस समय निश्चय ही उत्पन्न हुआ, पर जब घर गए तब क्या विचार
स्थिर रहेगा अथवा विचार विलीन होगा? साधारणतया ऐसा देखा जाता हैकि जहां मनुष्य गया,
जहां संगति मिली, उस संग को देखकर विचार बदल जाता है। इसी बात का वर्णन आगेहै? या
प्रत्येक प्रसंगमें उसका विचार स्थिररहा, वह बात यहां है, सम्भवतः पहला विचार
जो चार ज्ञान-विभागों का विचार इस प्रकार का किया, उसका फल यह हुआ कि सब
तरह का निश्चय मन में उत्पन्न कर लेने पर भी चित्त का भ्रम मिटता नहीं! इस कारण और उपाय ढूंढने
तथा स्थिरता को ही प्राप्त होनेकेलिए दूसरा यत्न यहां किया गया प्रतीत होताहै।
पाठक यह देखें, स्वाध्याय का साधारण सा विचार प्रत्येक स्थिति में जो स्वाध्याय का
प्रभाव हुआ करता है, वह सब प्रभाव इस इतिहास में स्पष्ट दिखाया गयाहै। केवल एक बार, क्या
सब भ्रम दूर हुए? क्या सब प्रकार का निश्चय सदा रहा? क्या सब रंग स्थिर रूपमें उतरा?
इन सबका उत्तर पाठकको इस इतिहास में आगे चल कर देखना चाहिए। वास्तवमें यह बात ऐसी
विचार का प्रभाव था, पर जब घर पहुंचे तब माता, पिता सब साथ थे, पश्चात्का क्या
प्रभाव चित्त पर पड़ा इसका विचार भी, पाठकको ही, स्मरण रख कर विचार करना है।
केवल स्वाध्याय करनेका जो समय होता, स्वाध्याय का प्रभाव सदा ही एकरूप नहीं रहता
यह बात पाठक को अपने मन में ठीक तरह बिठानी चाहिए। जब एक विचार का प्रभाव चित्त
सदा एक सा रहना ही कठिन है तब अज्ञान का संग पाकर, वह पहला विचार नष्ट न होगा
इसका क्या भरोसा?
इस अध्याय में इस बात का विचार इस तरह का किया गया है; सब इतिहास लिखने वाले
भी भिन्न-भिन्न ढंग से वर्णन करतेहैं; प्रत्येक विचार का भिन्न प्रभाव होता,
जिसका प्रभाव पड़ता ही रहताहै; स्वाध्याय रूप जो विचार चला, उसका प्रभाव भी
मन स्थिर रहा, चित्त को शान्ति मिली ही--ऐसा इस का आशय! अब पाठक इसी पर
विचार करें तथा १ निश्चय पर पहुंचे कि, १ अध्याय का विचार ही, सब चिन्ता मिटाने
योग्य है तथा सब प्रकार का समाधान ही करनेका यह उत्तम साधनहै।
केवल इस विचार को, चित्त बार बार ध्यान में रखकर विचार करे, स्वाध्याय का ध्यान
रखे निष्ठा, सब प्रकार का लाभ स्वाध्याय का प्राप्त करनेके पश्चात् चित्त में भ्रम, यह
केवल भ्रम मात्रहै।
चित्त का समाधान हो ही तो गया होगा ही, पर यह केवल विचार के रूप स्वरूपमें था;
जब घर की चिन्ता का अवसर आ गया तथा अन्य संसार सम्बन्धी चिन्ता आ गई तब चित्त विचार
बदल गया।
प्रथम विचार गया, पुनः चिन्ता व्यापि।
प्रत्येक बात विचार द्वारा प्रकट की जा सकती है। पर जब तक मन सब तरह
निष्पक्ष भाव का न हो तबतक सत्य बातका प्रकाश मन में नहीं होसकता। चित्त में
केवल ज्ञानमात्र समझने का फल सब को सदा नहीं मिलता। स्वाध्याय करके स्वाध्याय को
भूल ही न जाना, प्रत्येक स्वाध्याय का असर मन पर रहकर सदा स्वाध्याय द्वारा प्राप्त
की हुई शिक्षाको जीवनमें लाने का यत्न सदा प्रत्येक को करते रहना सदा आवश्यक
"हे प्रभु तू सदा विवेक दे, तू सतत दया का दान दे; तू सतत शरण दे, तू सदा
निर्मल रख"
भिन्न-भिन्न स्वाध्याय का फल सदा भिन्न ही देखना चाहिए था, भिन्न-भिन्न ढंगके
ग्रन्थ का स्वाध्याय करने से सब, चित्त सदा स्वाध्याय द्वारा शुद्ध होही सकता।
इस प्रकार सब बात चित्त में रखने योग्य सब ज्ञान द्वारा मनुष्य स्थिर निश्चय पर
आ सके यह निश्चय सदा प्रत्येक को करना होगा, किसी पर विश्वास? पर विश्वास ठीक,
स्वयं पर विश्वास? विश्वास की बात पर ही प्रत्येक मनुष्य अपना निश्चय कर सकता
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फिर उनके केवल सखाभाव को, उन भगवान् श्रीकृष्ण के साथ केवल सखा के बर्ताव को, देखकर
कहेंगे? क्या यह उनका प्रेम? या यह उन दोनों परस्पर प्रीति? केवल सखाका बर्ताव-मात्र तो
ऐसा साधारण जन भी कर दिया करते हैं। इसमें सन्देह ही क्या है। हाँ, फिर जो वह प्रेम,
जो सखा समुदाय प्रेम करता था वह सब मिट गया होता
तो वह उनका अज्ञानपना ही कहलावेगा। जिस कारण श्रीकृष्ण का प्रभाव ही,
उनकी भगवत्ता मात्र ही, उनका प्रेम ही ऐसा था कि उन गोप बालकों को
ऐसा तो ज्ञान था कि हमारे यह प्राण ही हैं। उनका तो कोई ऐसा व्यवहार ही नहीं
होता जिससे वे न जान सकें कि हम सब कुछ हैं। इसी कारण से उन गोप
गोपों का प्रेम ही तो था? पर ऐसा तो, जैसा सखाका परस्पर प्रेम होता
ऐसा व्यवहार था, परन्तु उनका प्रेम तो सदा सर्वदा केवल श्रीभगवान्
ही, उनकी प्रत्येक क्रिया सर्वदा गोप बालकों के ही हित करने को ही,
इसलिए परस्पर श्रीकृष्ण भगवान् सदा अपने भक्तों के वश सदा रहते सदा
सबही पर कृपा करते
फिर केवल वे, जो भगवान् यह बर्ताव कर रहे थे। गोप भगवान् को,
भगवान् रूप में जानते? वे जानते तो, पर उनकी अपनी प्रीति के बल
करके ही, भगवान् सब कुछ हैं। अपने बल से कुछ न था, सब भगवान्
रूप सब कुछ ही सदा था।
सो उस गोप समुदाय को, गोपियों को सदा अपनी प्राणों का आधार
श्रीकृष्ण ही जान पड़ता। इसलिए वे अपने नित्य ही कृष्ण को देख रहे
इसलिए सदा ही, उनका प्रेम नित्य नया ही बना रहता था। उन्हें सदा
श्रीकृष्ण साक्षात् ही अपने ध्यान में नित्य ही विराजमान ही रहा करते
सो उन सब को यह बात सदा याद रहती थी। अहा, सखा समाज का ऐसा
ही, सर्वदा उनके मन में भगवान् नित्य स्वरूप विराजे! सो सखा का, गोप
कुमारों का? कैसा प्रेम था? कैसा रूप था? कैसा वह बर्ताव था! वे
तो सब कुछ छोड़ अपने प्राणों को भगवान् श्रीकृष्ण अर्पित थे, सो वे बड़े ही
भाग्यवान् थे! सो उनका प्रेम तो केवल प्रभु सखा, सखीजन सब का भगवान्
रूप न होता? भला उन सब गोपों बालकों के जो प्रभु से पूर्ण रूप सम्बन्ध
रहा था, इसलिए सब ही तो प्रभु के माता-पिता सब सदा ही श्री भगवान्
रूप सब कुछ जानते थे। इसलिए वे जानते थे कि उन पर सब प्रभु कृपा
सदा ही की गई थी सो सब पर उनकी कृपा, गोकुल सब पर ही सब पर
श्रीकृष्ण की थी ही, सब लोग पूर्ण रूप श्रीकृष्ण कृपा पात्र ही तो
थे।
उस समय में तो जो बात थी, उसका सब रूप भगवान् ही सब पर कर
रहे थे। उनके रूप का--जो रूप तो सब जन का सदा बना रहा, तो ऐसा मालूम
ही न था, कि सब ओर से कृष्ण ही का रूप उन पर सर्वथा ही सब
ही हो रहा, हाँ! केवल वे तो मन में कृष्ण ही का साक्षात्कार कर
ही भगवान् सदा सब कुछ बना रहे थे। सदा ही उन पर सब भगवान्
का अनुग्रह सदा सर्वदा ही हो रहा था। भगवान् सब ही को प्रेम में ही
तो मग्न थे ही, वे तो सब कुछ लीला ही
जब भगवान् गोकुल छोड़ मथुरा को चले तब सारा गोकुल रोने लगा
और सारा समाज व्यथित हो उठा था। सब कह रहे थे कि हाय हमारे गोपाल ही
तो सब कुछ थे, अब उन भगवान् बिना, हम क्या करेंगे? सो क्या वे केवल
मात्र ही सखा थे, या उन भगवान् बिना, सब ही व्यथित? उस बात को
ज्ञान स्वरूप से जानें, भगवान् तो वास्तव में उन सबके आत्मा,
अन्तर्यामी, परमात्मा स्वरूप ही तो उनके मन में थे।
केवल ऊपर ऊपर सखा रूप ही दीखता था, भीतर-भीतर तो ज्ञान भरा
था, वे भगवान् स्वरूप ही मानते थे! इस प्रकार भगवान् को सब लोग
नित्य सब ओर सदा सर्वदा एक ही रूप में सब ही सब ओर सदा ही देखते
ही रहते थे। इसी कारण से भगवान् सदा अपने भक्तों को सब कुछ अपना
रूप ही सब कुछ दे रहे थे।
भगवान् तो उन गोप बालकों साथ ही भगवान् रूप का स्वरूप दिखाते,
जिससे वे समझ लें न कि केवल मात्र ही सखापने का भाव ही सब कुछ
नहीं, वरन् स्वयं भगवान् उनके सम्मुख प्रत्यक्ष रूप बना हुआ है। सो, सब
लोग सदा ही सब पर ही, ऐसा ही वे भगवान् श्रीकृष्ण नित्य सर्वदा सब ही
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केवल नाम का जप कर ले और यह समझ लेकि मुक्ति मिल जायगी; उसका विचार गलत
होगा और उसकी आत्मा अधोगति को प्राप्त हो जायगी या मुक्ति का सुख तो वह क्या जाने
नित्य ही नरकीय यातना भोग कर जब तक सृष्टि रहेगी तब पर्यन्त रोवे, फिर भी मुक्ति का
सुख जन--म पर्यन्त नहीं! मुक्ति का तो फल ही ऐसा कि सुख ही सुख का नाम मुक्ति
जन--ममरण दुःख नहीं!
पर सो मुक्ति विना अष्टांग योग सिद्ध किये कभी नहीं हो या हो सक्ती कि जैसा कि
महर्षि पतंजल जी कृत अष्टांग योगदर्शन में भी लिखा गया किंवा बताया गया है, १ यम दूसरा
२ नियम, ३ आसन फिर आगे, ४ प्रत्या-हार के नाम से, ५ प्राण संयम या
प्रणा याम फिर आगे ७ धारणा या ध्यानावस्था या ध्यान का साधन ८ समाधि का
साधन जिस द्वारा कि मुक्ति मिले, पर बिना यम, नियम के यह सब सिद्ध नहीं, तो सब
व्यर्थ ही किया या कहा गया!
नियम जब तक साधन का आधार रूप सिद्ध नहीं हो सक्ता, तब तक अष्टांग
योग सब व्यर्थ या नाम मात्र रह जायगा किंवा, नाम मात्र जप व्यर्थ, विचार का
फल
सो तो सिद्ध ही है, ना भाई! तो सुनो सब भाई, जब तक मन, वचन और
कर्म शुद्ध होकर किसी का दिल बिना अपराध किसी प्रकार से तन मन धन से न सताया,
ना ही किसी प्रकार दिल को किसी का संशय या डर रखा ना किसी को मारा व ना मारा
ना किसी का धन या माल या रूप देखा या मन में भी ऐसा भाव कभी न मन में
लाया
फिर उसको तो सब सत्य ज्ञान प्राप्त हो कर ईश्वर रूप में अपने आप को
स्थिर वा लीनकर देता है या कर लेता भया, तब क्या मुक्ति प्राप्त जन को
कहा, सो अष्टांग का फल भी तो सिद्ध भया
इसमें तो क्या संशय है? पर ऐसा तो आज कल सब जन ही क्या जो कोई
ही विरला मनुष्य दिखाई देवे कि जिस के मन वचन कर्म से किसी का
दिल किसी प्रकार दुखाया नहीं जाता होगा, ना ही ऐसा देखा जाता कि सब को
रूप या धन से देख के नियत बदल जाती दिखाई न देवे वा दिल, विचार सब
दिल अपने वशीभूत कर के रखता हो, बल्कि तो आज ऐसा कलिकाल का
समय सब तरफ फैला हुआ है जिससे कि सब ही माया जाल में फँसे, पाप
करें! जिस कारण सब ही तो नरक रूप में दुःखमय भोगें!
अब आगे ऐसा भी तो विचार देखा जाता है कि जिस तरह से जो जन
उपदेश देता फिरता है उस उपदेश पर तो विचार किया जाय तो महापाप रूप
हो जाय, सो उपदेशक जन तन-मन धन को किसी के भी छीनने को ना तो
मन में संकोच करे ना पराई रूप वा स्त्री के मिलने का भय या पाप व डर
रखे, फिर क्या हो? केवल जप पाठ-पूजा निष्फल
जिस का ना भाव सत्य ना कर्म सत्य ना विचार सत्य है, फिर तो
केवल पाखंड कहा जा सक्ता है, जिस का फल क्या मुक्ति मिलेगा? तो
ना ही विचार का फल जन व समाज, सब उपदेश का उल्टा ही फल व
असर दिखाई दे रहा है
जिस का यह भी परिणाम होगा कि, आगे जा के सब समाज ही उलट
जाय, फिर सब विचार ही बदल कर जीव केवल ही पापों को ही सब कुछ
या पुण्य ही समझ बैठेंगे, फिर तो न कोई किसी की बहिन बेटी पर
नजर पवित्र रक्खेगा ना ही सब का दिल विश्वास योग्य रह जावेगा
ना ही गुरु चेले का भेद, ना ही सब धर्म का भेद ही रह जावेगा
सो हे भगवान, यह दशा आगे जा कर संसार की ना होवे, इस से सब को
ही रक्षा से बचा कर संसार भर को सत्य मार्ग पर लावे जिससे, कि सब
जन ही पवित्र बन कर अपनी रक्षा कर सकें और सुखी हों
ऐसा जान कर, "हे सत्य स्वरूप ॐ प्रभु जी, दया दृष्टि से सब जग
को इस पाप से वा पाखंड से बचा कर ऐसा ज्ञान दे जिससे सब जन तेरा
भजन-सिमरन कर के पार उतरें और आ-गे को सब प्राणी सुख पावें और
सब पाखंड नष्ट होवें, ना ही कोई इस तरह माया जाल रूपी दल दल में
तन मन वचन द्वारा कभी फँस पावे, जिस से जीव का सदा भला होय ना
किसी तरह से भी जन दुख पावे, सदा ही सुख प्राप्त कर सकें"
ॐ तत् सत् सर्व ब्रह्म मय
"सत्य ही सब कुछ सुख का रूप"

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कौन किस प्रकार ध्यान करेगा? स्मरण रहे, ध्यानसाधना का एक सरल और सीधा
उपाय यह बतलाया गया रहा कि साधक को घर से या ध्यानकक्षके उस एक कोने
को ही ही भगवान् का स्वरूप मान ले, जहाँ वह ध्यान पर बैठता रहा या जिस
कक्ष का ध्यान अभ्यास-सा करेगा या ध्यानसाधना उस भगवान् स्वरूप-
से ही स्वयं करता या करवाता रहेगा तब
प्रत्येक क्रिया चाहे वह मन से मन की बात क्यों न हो अथवा वाणी
द्वारा कही गई हो या फिर हाथ पाँव द्वारा किया गया कर्म या शरीर
सम्बन्धी कोई बात हो उसका फल या परिणाम या स्वरूप किसी और रूप में
प्रगट होने वाला ही नहीं।
ऐसा भाव, विचार लेकर मनुष्य जब, उस स्थान रूप ही भगवान् के उस
विशेष अधिकार का उस स्थान से ग्रहण करवाकर काम करेगा तब, जो जो
क्रिया उस द्वारा आगे चलकर होगी या घटती रहेगी वह सब प्रभु के स्वरूप
से उस को सम्बन्धित स्वरूप बनाती जायेगी या जो कुछ भी होगा उसका फल
भी प्रभु-कृपा द्वारा ही मिला हुआ अनुभव-स्वरूप होकर ही प्रगट हो रहा
हो या उसका कारण भी स्वरूप के द्वारा बना ही आ रहा होगा
साधक को तो अधिकार रूप में केवल यह निश्चय करना ही तो उसका या
अभ्यासका एक नियम या नियम का स्वरूप बन कर उस को साथ देगा, फिर
फिर जैसा जो भी ज्ञान का स्वरूप या प्रभु रूप अपने आप, कृपा करेगा!
उस को वह सब कुछ प्राप्त रूप में अपने आप स्वतः ही स्वाभावक रूप में
ही अपने स्वरूप से सम्बन्धित कर देगा अथवा बनता रहेगा या फिर, भगवान् रूप
कृपा, जिस भी रूप को वह रूप देना चाहेगा सो रूप अपने स्वरूप को ही
उस स्थान के रूप में, जो जो भी उस स्थान से ज्ञान स्वरूप होगा या उस
रूप स्वरूप को जो उस स्थान से प्रभु द्वारा अपने आप ही दिया जायेगा
अथवा जो अधिकार से आगे घट रहा होगा, सो उस द्वारा अपने ही
उस भगवान् रूप ज्ञान द्वारा या शक्ति के रूप में ही होगा, ना कि उस
शक्ति अथवा रूप को कोई और पा लेगा, ना उस से पृथक् ही स्वरूप बना
सकेगा। केवल भाव ही उस का ऐसा दृढ़ रूप ले चुका होगा जिसे कोई
और शक्ति या नाम से पुकारा नहीं जा सकता इसलिये उसका ध्यान रूप
ही भगवान् रूप स्वरूप का प्रकाश उस स्थान में जो उस के बैठने से सम्ब-
न्धित था, स्वाभावक प्रकाश बन भगवान् नाम-स्मरण से अपने आप प्रकाश
रूपी स्वरूप में उस को प्रकाश दे--देगा
जब नाम-स्मरण रूप से ही उस प्रभु रूप शक्ति उस को प्रकाश देगी,
जिसे वह ज्ञान स्वरूप के रूप में भगवान् का रूप समझ कर उस को
अपना आधार ही मान ले अथवा समझ ले उस का भाव या ध्यान का रूप
भी उसी प्रकार हो, जिस रूप, जिस नाम, या प्रभु-कृपा रूप से उसने
हर बात को या अपने कर्म को उस स्थान द्वारा सम्भालने का यत्न ही किया
हो सो ही भाव या उस रूप का भाव-स्मरण उस को अपने आप ही सहारा दे
कर उस को उस प्रभु रूप शक्ति का ज्ञान रूप ध्यान में ही आगे रूप
दे देगा जो उस ध्यान द्वारा उस को नाम-स्मरण द्वारा ही होगा
सो इस प्रकार ज्ञान के भाव, से उस प्रभु शक्ति द्वारा ही तो सब कुछ
हो रहा रहा या कहलाया गया रहा या हो रहा होगा सो उस सब को वह अपने
कर्म से पृथक् ज्ञान मान कर उस की ओर जब जब दृष्टि लगायेगा, तब
तब उस शक्ति द्वारा उस ज्ञान रूप भगवान् के ही तो वह सब कुछ कृपा ही
रूप ज्ञान रूप में ले कर भाव रूप शक्ति, जिस का उस स्वरूप द्वारा
प्रकाश
हो रहा होगा, प्राप्त होगा, अनुभव से, प्रकाश से, उस सब को ही
वह पा रहा या पा चुका होगा या उस--द्वारा भगवान् के प्रकाश को पा रहा
रहा या उस--द्वारा प्रकाश का स्वरूप बन पा रहा या प्रकाश का रूप बनता
होगा, सो भगवान् कृपा द्वारा ही, भगवान् के ज्ञान से ही सब कुछ,
ज्ञान स्वरूप ही बन रहा या हो रहा होगा, स्वरूप के द्वारा ही,
स्वरूप के ज्ञान रूप भाव से ज्ञान के रूप में नाम, स्वरूप से ही पा रहा,
सो सब कुछ भगवान् का, उस प्रभु का ज्ञान रहा
जिसे वह जान रहा होगा, या शक्ति स्वरूप द्वारा प्रकाश द्वारा ही
स्वाभावक शक्ति के रूप में पा रहा या प्राप्त कर रहा था।
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तब यह जीव अपना स्वरूप भूल कर देहादि पदार्थों को, जिस तरह एक मूढ़ अपने पहने वस्त्रों तथा शरीर को
देखकर खुश या दुःखी होता है, देहादि का सुख दुःख अपने ऊपर मान कर संसारीजनों समान सुखी और
कभी महा दुःखी होता हुआ जन्म और मर कर इस भव रूप महा दुःखदायी कुण्ड में ही, अपने किये कर्मों
द्वारा ही भ्रमण करता रहता हुआ कभी स्थावर कभी त्रस रूप चौरासी-लाख योनियों विषे अनादिकाल
से ही परि भ्रमण कर रहा है। सो यह जीव अनादि से अविद्या को, जो कि अपने स्वरूप तथा देहादि को
पृथकरूप से नहीं
बतलाती स्वरूप को, जो देहादि को आत्मा मान मिथ्यादृष्टी,
कर्मबन्धकपना जीव को करती है। सो अज्ञान जन्य देहादि का वासना रूपी अन्तःकरण रूप मलिन
दर्पण समान ज्ञान है, सो मिथ्या ज्ञान है। ऐसे अज्ञान रूपी अन्धकार द्वारा आच्छादित रूप यह देहादि
विषय को उत्पन्न कर के संसारिक सुख, जो केवल अज्ञान ही द्वारा सुख रूप भास होता
हुआ क्षण भर का ही सुख है। सो इस अज्ञान देहादि सुख की लालसा रूप पिपासा द्वारा
कि जिस तरह से कि कस्तूरी मृग अपनी नाभि में, जिसे स्वयं उसने धारण कर रक्खा
उस सुगन्धित द्रव्य, जिस का वह स्वयं ही स्वामी है, उस की सुगन्ध से मोहित होकर
उस सुगन्धित वस्तु को, जंगल में ढूंढता फिरता हुआ व्याकुल रहता है कि
जिसका अन्त में, अपने ही अज्ञानान्धकारवश शिकारी के हाथ मारा, जंगल विषे ही
समाप्त हो जाता
इस अज्ञानान्धकार रूपी अविद्या को नष्ट करने वाली विद्यारूपी जो कि आत्मारूपी ज्ञान का प्रकाश
कि जिसके उदय होने से अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट होकर जीव अपने स्वरूप को पहचान कर, अनादि
से ही जो यह जीव इस भव रूप कुण्ड विषे जन्म मरण के अनेक प्रकार दुःख भोगता चला आ रहा
उस दुःख रूपी कल्पित वासना के बन्धनों से छूट कर मोक्ष पद को प्राप्त हो जावे, जिसे प्राप्त
हो कर यह जीव, अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हो, अपने ही स्वरूप में आनन्द, जो कि
अतीन्द्रिय सुख कहा गया है। उस आत्मानन्दमयी पद को पावे, जिसके समान कि इस
जग, में दूसरा सुख अनुभव, जिस को सांसारिक सुख कहते हैं नहीं है, बल्कि उस
सुख को, आनन्द का अंश कहा गया है।
जिस तरह से कि सूर्य उदय होने पर अन्धकार जो कि प्रकाश के अभाव रूप
केवल अज्ञान, अन्धेरा होकर प्रकाश युक्त नहीं, स्वयं प्रकाश होकर प्रकाश युक्त
तेज पुञ्ज सर्व ओर फैल जाता है, तो सूर्य रूप प्रकाश के उदय होते ही स्वयं अंधकार
रूप अन्धेरा नष्ट होकर केवल प्रकाश ही प्रकाश हो, जाता है। उसी तरह से ज्ञान रूपी
सूर्य के उदय होने से अज्ञान रूपी अन्धकार जो इस जीव को जन्म मरण आदि अनेकों
प्रकार के दुःखों का कारण था सो अज्ञान रूपी अन्धकार स्वयं नष्ट हो जाता है।
जिस तरह एक ही दीप शिखा से अनेक दीप, प्रकाश के अभाव को
दूर करते हुए सब अपने अपने प्रकाश-द्वारा, प्रकाशमय उस गृह को करते हैं। उस
समय उस अन्धकार का लेश मात्र लेश भी नहीं रहता है। इसी तरह यह जीव जब उस
परम प्रकाश को, जो कि ज्ञान रूप, जिस ज्ञान से पूर्ण होकर अपने शुद्ध स्वरूप
रूप प्रकाश को धारण कर के स्वयं ही प्रकाशित
सो अज्ञान रूपी अन्धकार जो इस जीव का अनादि से संगी था, जिस करके
आत्मा को, देहादि का संगी मान कर आत्मा द्वारा कृत शुभाशुभ ही फल को भोग
कर रहा था, जिस अज्ञानान्धकार द्वारा ही जीव मोह के वशीभूत होकर, कर्मों का
बन्ध कर के इस ही भव रूप संसार रूपी कुण्ड में ही बार बार जन्मता व मरता रहा
हुआ नाना रूप से कष्ट भोगता हुआ, अनेक योनियों में भ्रमण कर रहा था।
सो इस ज्ञान रूपी सूर्य के उदय होने से अज्ञान का यह सब खेल ही समाप्त होकर
जीव, उस मोक्ष सुख को
प्राप्त होता हुआ, जिस सुख को प्राप्त हो आत्मा को फिर से इस संसार रूपी
कुण्ड में, ना तो जन्म धारण ही कर संसार रूपी अनेक प्रकार के दुःख ही भोगने
पड़ते हैं। उस पद को प्राप्त हो सदा काल के लिये अपनी शुद्ध अवस्था को प्राप्त
होता हुआ यह जीव, अपने शुद्ध स्वरूप में लीन हुआ रहता हुआ उस आनन्द, जो कि
सुख से भी परे सुख है, जिस सुख को न तो, मन या वाणी द्वारा वर्णन किया जा
कर सत्य स्वरूप में किसी के सामने ही दर्शाया जा, सकता है। उस अतीन्द्रिय
पद मोक्ष को प्राप्त हुआ सदा विराजता है।
इस संसार का जीवात्मा रूप सूर्य जो ज्ञान के बिना बादलों में, छिप कर
रह कर अपने पद को न पा कर अज्ञान रूपी बादल के उदय से जो कि अंधकार
स्वरूप, ज्ञान रूपी न होकर; मोह रूपी जल की वर्षा अन्धकार रूपी जल द्वारा
इस जीव रूपी पृथ्वी को सींचता हुआ जिस से संसार रूपी अनेक प्रकार के कर्मों
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ऐसा जान कर विचार करो कि केवल संन्यास लेने मात्रसे मोक्ष फल की प्राप्ति कभी नहीं
होगी
स्वामी समन्त भद्रने, "सरागौ ज्ञान गर्भात्मा सा भवेद् भवनाशिनी" राग सहित भी, जो भी ज्ञान
सहित मन रूपी ध्यान किया जाता संसारका नाशक हो सो तो ठीक ही परन्तु यहां तो भाव संन्यास
बिना द्रव्य मात्र, उस पर केवल काय-कलेवर धारण से, मोक्ष की कौन कहे, स्वर्ग तक
मिलना दूभर"
सो इस प्रकार केवल भाव ही से मुक्ति फल प्राप्तिके अर्थ रूप से द्रव्या-
नुप्रेक्षाकार भये, सोईया जी! जो संन्यास-कलेवर को मुख्य जानकर के, सो ही द्रव्य-
संन्यास का मुख्य अधिकार कर केवल संन्यास रूपी क्रिया मात्रसे स्वर्ग मुक्ति फल
विचारत भये
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, प्रमाद संन्यास-कलेवर अवस्था में रहे तब संन्यास क्रिया
फल तो निष्फल हुआ सो विचार नहिं किया। सो इस ग्रन्थ का कर्ता इस अधिकार
ग्रन्थ विषै जो सो यह बात कही प्रमाण न हो सकी, इस हेतु यह ग्रन्थ ही मिथ्यात्व भाव
का मूल हुआ, उस पर कर्ता ने सम्यक्त्व भेद रूप व्याख्या कही सो मिथ्या, ज्ञान
रूप भेद न प्रकाश, उस पर ज्ञानी संन्यास स्वरूप न कहा, इस हेतु ग्रन्थ ही को प्रमाण
कहे, उस पर स्वामी समन्त भद्र ने सम्यक्त्व भेद तथा महाव्रत का जो भेद स्वरूप
कहा तिस ज्ञान का प्रभाव
प्रभाव समन्त भद्र के वचनों का हुआ, ज्ञान, असंयम, जो भाव संन्यासी कहाया
तिसमें राग भाव का रूप संशय दूर सो न हुआ संन्यास रूपके विचारते हुआ भला, ज्ञान
संन्यास का सम्यक्त्व रूप भेद तथा प्रमाण स्वरूप से भेद न कहा, ज्ञान संन्यास को
सो उस समय ज्ञान का प्रकाश हुआ सो इस ग्रन्थका भी हुआ, ज्ञान संन्यास अवस्था
का सो भेद ग्रन्थका इस प्रकार से प्रगट हुआ निश्चय सम्यक्त्व का प्रकाश सो संशय
मिटाने को यह ग्रन्थ, स्वरूप के इस भेदको प्रगट कर भाव मोक्ष फलदायक भयो
सो इस ग्रन्थानुरूप यह संन्यास नाम सम्यक्त्व भेद को कहै सो मुक्ति का प्रकाश
जो सम्यक्त्व के प्रभावसे इस ग्रन्थ में सो भाव मोक्ष का तो ज्ञान हुआ सो यह ग्रन्थ
सम्यक्त्व का ही प्रकाशक ज्ञान रूप ग्रंथ सो इस ग्रन्थ को, उस पर भाव संन्यासी का जो
स्वरूप कहै सो इस भेद सो ज्ञान सम्यक्त्व भाव संन्यास रूप कहे सो ग्रन्थ मोक्ष फल
दायक भयो सो यह ग्रन्थका कथन सत्य जान संशय निवारण को सम्यक्त्व प्रकाश ज्ञान
ग्रन्थ भयो
सो संन्यास का स्वरूप सो या को या सो ग्रन्थ कहा, जो सो यह या सो ग्रन्थ सम्यक्त्व
ज्ञान-दाता स्वरूप प्रकाश ग्रन्थ न हो भाव रूप ग्रन्थ न हो यह सो सो सो सो सो,
सो सो सो रूप विचार सम्यक्त्व सो उस ग्रंथ को सर्वज्ञोक्त ही प्रमाण, संशयात्मा
को यह ही ग्रन्थका रूप सो सत्य जान, जो संशय निवार्य के भेद रूपको प्रकाश या
ग्रन्थ द्वारा सम्यक्त्व का भाव सो स्वरूप को प्रगट भयो
मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, यह भाव सो संन्यास के भेद सो ग्रन्थ विषै
प्रगट भये सो सम्यक्त्व, संन्यास, ज्ञान स्वरूप संन्यास विषै सो सम्यक्त्व प्रमाण भया
सम्यक्त्व संन्यास का भेद रूप जो सो ग्रन्थका स्वरूप सो संशय का नाश हुआ तिस
सो यह ग्रन्थ का प्रभाव भया, तब संशय को नष्ट कर ग्रन्थ प्रमाण हुआ, सो, जी, जब,
संन्यास सम्यक्त्वमय भया तब यह सब भेद ग्रन्थ ने प्रगट कर ज्ञानमय को जगाया
ताते भला ग्रन्थ कहा, संन्यास भये, संशय भ्रम सब सो मिट सो ग्रन्थ द्वारा
प्रकाशमान भया
सो जो संशय ग्रन्थ का निवारक भयो कहै सो, ज्ञान विचार प्रमाण सो संशय
रहित भये ग्रन्थका यह स्वरूप सो भेद रूप संशय मिटा तब ही सो संन्यास का प्रकाश या
ग्रन्थ से ज्ञान हुआ सो संशय को त्याग कर ग्रन्थ स्वरूप भया
ग्रन्थ कर्ता का तो यह भाव हुआ न जो इस पद को कहै ग्रन्थ का भेद ज्ञान को
प्रकाश कर ग्रन्थ नाम दिया सो भला ही किया, सो तो भला किया? सो तो न हुआ
या प्रकार सो भयो! सो भाव संन्यास हुआ, ग्रन्थ कर्ता का सो संशय सो, स्वरूप
ग्रन्थ का प्रगट भया सो! सो इस संन्यास का जो ज्ञानरूप सो, संशय का नाश
हुआ? सम्यक्त्व सो सो संन्यास, सो ग्रन्थ प्रमाण हुआ, संशय का नाश
किया? या प्रकार संन्यास संन्यासी का भेद ज्ञान न हो ज्ञान हुआ संन्यासी का
ग्रन्थ सो संन्यासी न भेद ज्ञान को सो ज्ञान विचार न हो, संशय न हो प्रमाण सो, या
सो ग्रन्थ कर्ता मिथ्या, या ग्रन्थ का प्रभाव कहा? संन्यास को प्रमाण सो ज्ञान का
प्रभाव सो तो ग्रन्थ द्वारा संशय भ्रम न रहा जान
164

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लेकिन सम्प्रदाय का प्रचार जितना तीव्र गति से उस समय संसार व्यापि हो सकेगा, उस
समय संसार में कोई भी धर्म-मत सम्प्रदाय ऐसा न रह जाय जो उसके सम्मुख टिक
सके सो, तुम यह विचार करो, कि उस समय उस नवीन धर्म-सम्प्रदाय द्वारा धर्म वृद्धि
हो सकेगी? सच तो ऐसा होगा, कि सम्प्रदाय का प्रचार धर्म का संहार होगा।
अतः सत्य सिद्धान्त प्रकाशीय व्यवस्था द्वारा जब धर्म-सम्प्रदाय का नाम मात्र
रहेगा और धर्म-सम्प्रदाय का संसार भर से सर्वथा लोप हो जायगा सो, यह सम्पूर्ण
का कल्याण होगा सो यह कल्याण ही सब धर्मों का, वा धर्म का सार और सब ही धर्मों
का मुख्य लक्ष्य है, सो जिस का यह लक्ष्य सत्य है सो प्रकाश स्वरूप परमेश्वर का
सब प्रजाओं को ही हो रहा है जिस उपाय द्वारा सब ही एक मत हों व सत्य ज्ञान को
प्राप्त हो सके जैसा सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश करने के लिये एक ही सूर्य सब का प्रकाश
करने वाला बनाया है॥
सोचो, नवीन धर्म-सम्प्रदाय तो तब बनता होता कि जब कि कोई नवीन धर्म
होता सो, यह स्वाभाविक धर्म सब काल रूप, वा सनातन सिद्ध स्वरूप का एक रूप
सब सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे है सो सब का कर्त्ता सब को ही दे रहा है, धर्म-
सम्प्रदाय तो धर्म की हानि के हेतु हैं, इससे सब काल व्यापि सनातन धर्म स्वरूप
सुख दायक सब काल रहने वाला सत्य धर्म स्वरूप है सब का रक्षक प्रकाशक दयाल
सो केवल प्रकाश ही सब पर दया का प्रकाश कर रहा है सब धर्मों सम्प्रदायों
द्वारा फैला हुआ जो अविद्या का घोर अन्धकार है उससे सर्वथा लोप, सब प्रजा मुक्त
हो, यह विचार करोगे?
ईश्वर सत्य ज्ञान रूप, धर्म का सत्य धर्म-सम्प्रदाय से परे सो, सम्पूर्ण
विश्व का प्रकाश प्रकाशक दयाल सबका परम कल्याण ही सोच कर ज्ञान रूप सत्य रूपी
प्रकाशक दयाल सबका जो नाश कर सकता सो ही रक्षा! सूर्य ही केवल है! धर्म
स्वरूप परमेश्वर दयाल सबका जो संहार करता सो ही रक्षक! प्रकाश ही केवल सब
का! जो सत्य न्याय पर चल कर व सत्य व्यवहारों को ही सब को सब देगा।
जो जिस पर निर्भर है सो केवल सम्पूर्ण विश्व का रक्षक दयाल सबका
केवल एक धर्म काम-धंधा, धन-दौलत सब कुछ संसार का नाश ही करता रहेगा॥
सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ संसारिक व्यवहार केवल करने के लिये दया
पूर्वक, विचार युक्त केवल कल्याण करने वाला बनाया है, केवल सत्य स्वरूप दयालु
प्रकाशक सब का यह प्रकाश सर्वत्र समान ही कर रहा है जो सब को ज्ञान व सब को सब
प्रकार सत्य सुख प्रकाशक की दया प्रकाशक सब पर सब का सब हो रहा है॥
विचार ही सब कुछ सत्य है सब कुछ व सब संसार व्यापि दया केवल दयालु व
केवल दया प्रकाशक दयालु का रूप ही दया का प्रकाश दयालु दयाल, दयाल सब
कल्याणकारी है॥
"सत्य ज्ञान प्राप्त रूप से समस्त माया का प्रभाव ही ज्ञान रूपी प्रकाश से ही
संपूर्ण विश्व सर्व प्रकार से सब काल में सर्वत्र व्यापि"
सो सब का ईश्वर सब प्रकार सब का सब काल में, केवल सर्वत्र व्यापि ही सब
व्यापि प्रकाश दयालु दयाल का रूप सब दया का प्रकाश हो रहा है सो सब काल
में स्वाभाविक रूप से ही सत्य प्रकाश रूप सब स्वाभाविक प्रकाशक का व सत्य
स्वरूप का, जो जो भी सम्प्रदाय-भाव सो सब सब माया के सब जाल रूप
केवल मिथ्या, अविद्यामय विचार॥
सो जिस प्रकार से सूर्य सब दिशाओं को सर्वदा, केवल ही सब काल व्यापि
ही सब प्रकार के अन्धकार को नाशवान कर देता हुआ सब समय सब व सब दिशाओं
का सब प्रकाश करता है, व जिस रूप द्वारा दिन-दुपहर सब प्रकाशक
ज्ञान सब व सब रूप सब कुछ सब का केवल ज्ञान ही सब का सब हो रहा है सब
सत्य ही समस्त सब सब का ज्ञान रूप, सब प्रकाशक केवल क्या? व सब का
सत्य, व ज्ञान रूप प्रकाश सो, जो सम्पूर्ण संसार में? सब ही सब का,
सब विश्व सब सब सत्य प्रकाश सब सब का सब काल रूप सब कल्याणकारी प्रकाश
विश्व का प्रकाशक रूप दया रूप, केवल सब रूप से प्रकाश सब का सब
प्रकाशक सब रूप रूप, सब सब का प्रकाशक रूप॥
केवल, सर्वशक्तिमान, प्रकाश ज्ञान का प्रकाशक केवल ही सब रूप से
स्वाभाविक है, सो प्रकाश केवल सब रूप सब का रूप सब का रूप ही सब का
स्वाभाविक रूप सब सब सब ज्ञान केवल सब का रूप व सब, केवल ही रूप॥
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□□□□□... □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□
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जब राजा सो, पाछे जाग उठ्यो, ताहि बख्त एक रीछ-सा को जीव आय उछल
कै बैठि गयो जा राजा पास, ताकौं सो राज देखिकै डर गयो पाछे वह रीछ
बोलि उठ्यो ता सों अरे राजा तू क्यों डरै डरपो मत ताके बादि राजा कहै तूं
कौन सो बताय हमकौ रीछ कहै ता सों, जो तू यह कहै मोकौ मारि, ताहि
पहिचानि कै कही सकौंगो
"जाकौ जस जस ही जानिये लोक, जो न जानै लोक तो, ता को जानि
सकै कौन"
तब राजा सो अचरज हो सोचन को लाग्यो कि यह जीव आय कैसे वचन बोलि
उठ्यो जो यह जीव-जन्त सब हो सो ईश्वर निमित्त उपजाये अपने अपने
विषय पायकै सब भोगत सोई भोगत ही रहै, भला मनुष्य? मनुष्य सो कौन,
भला मनुष्य? मनुष्य तो काम-क्रोधदिक के वश हो काम कै, भला मनुष्य? जानि
कै पराया धन लै कै घर भरे, अपना पेट भरै, पाप-पुण्य को जानै सो, मनुष्य
जाकौ नाम है सोई यह रीछ जीव कहै जो कि ईश्वर-निमित्त यह बनाया
सोई कहै
तबै राजा कहै, "जो मनुष्य जनम लै कै, जग में सब सुख लै कर लै सब
काम सिद्ध कै, पाछे ता ईश्वरकौ भजन करि लेय"
तब ही सो अचरज हो सोच बादि कहै जो हम सब बात को समझै ऐसा
कह कर के पाछे वह रीछ सो कहै अरे भाई तू सब बात को जाणनैहारा
हो सो कहो कि हमारे मन मों इच्छा है ईश्वर को मिलने की सो कैसे हो
जाय सकैगी सो बताओ सो तब ही सो रीछ बोलि उठा अरे राजा यह बात
कहिये क्यों कर कि तू तो अहङ्कार करिकै अहङ्कार सो भरी गयो है
ऐसा क्यों? तू सब को सब जानै है, यह बात किस प्रकार? भला जब यह
बात ही तब सब काम सिद्ध हो तो बात ही क्या मनुष्य जनम पायकै
मनुष्य? ता जनम पायकै भजन किया जाय?
ऐसा रीछ सों राजा कहै, भजन बिना तो जीव का कल्याण
नहिं होय सकै, राजा फिर कहै, ईश्वर सब निमित्त है परमात्मा
सर्वव्यापी है जो सब संसार सब को बनाय राखै पायकै मनुष्य देह को
परमात्मा को भजन करिकै सिद्ध होय तव काम परमात्मा ही से सब
सिद्ध होय यह बात सत्य कहै
यह बात सुनि, राजा सो रीछ कहै, अब तू सब कुछ जानि गयो है,
अब तो भजन करि
पाछे राजा के मन में आ गई कि रीछ को मारूं! मार, तलवार निकाल
कर हाथ में लेय कर जब वार करन लगा, तलवार हाथ से ही छूट गई
लटक गया हाथ-पाँव से फिर देखा--रीछ गायब हुआ! तब राजा को समझ आई
बात, राजा विचार कर मन में बैठ गया
ज्ञान उदय होने से वह सोचे, अब तो सब बात जान गया हूं
सब भ्रम छूट गया अब तो मैं फिर राज-पाट को नहिं जाऊंगा जब
तक परमात्मा का दर्शन नहिं हो जायगा तब तक राजा तपस्या कर
के वन में रहेगा, यह बात दृढ़ कर ली उस वक्त
"हे नाथ, तू ही मेरा सब कुछ"
वो रीछ कोई और न हो कर ईश्वर का भेजा हुआ दूत था जो राजा
को जगा कर चला गया, अब तो वह राजा, जो सब से सब कुछ
जानता समझता विचार कर अपने स्वरूप को समझ कर सब से परे होकर,
उस वन में रहकर भगवान नारायण का स्मरण करने लगा और एक
दिन ज्ञान उदय होकर मुक्ति को पा गया सदा, जो भजन सो करता
उस वक्त मुक्ति स्वरूप पद को प्राप्त हुआ जो परमात्मा के धाम
को पा गया फिर कभी वह संसार चक्र में नहिं आया ॥?
इस दृष्टान्त कथानुसार सार यह निकलता है कि मनुष्य अहङ्कार
वश हो कर सब कुछ अपने को ही सर्वशक्तिमान मान बैठता है जब
तक कि भगवान का अहसास उस व्यक्ति को न हो जाय, तब तक
मनुष्य का मन शांत नहिं हो सकता जो भजन से ही हो सकता है इस
बात को सदा याद रखो, सब से बात यह सार निकसी, मन को सदा प्रभु
स्मरण में लगाये रखो जब तक सांस रहे तब तक भगवान का
सुमिरन करते रहो तो जीवन का सब काम सिद्ध होकर मुक्ति मिलेगी
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विचार कर उसको अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसरित करना चाहिए अथवा संकट के निवारणार्थ कुछ
ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे कि वह उस उपस्थित आपदा विपति कष्ट शोक भय का सामना करने
योग्य बन सके। यदि ऐसा न हो सके तो उस समय उसको धीर, धर्म का उपदेश या नीतिपरक
विचार सब व्यर्थ सिद्ध हो जाते हैं। उस समय व्याकुल हृदय, तन मन में उपद्रवित मनुष्य
किसी भी बात को चाहे कितनी उत्तम विचारपूर्ण क्यों न हो, ग्रहण करने की स्थिति में
नहीं रहता और वह समझाने वाले को निर्दयी पाषाण हृदय समझ कर और भी अधिक
क्षुब्ध हो कर उस मार्ग का पथिक कभी नहीं बनता जिस पर उसे
पथप्रदर्शक ले जाना चाहता है।
लेकिन उसने ऐसा नह किया और वह "हे राम, हम तो मारे गये हमें बचाओ बचाओ नहीं
चिल्लाया सिर्फ सो गया। नह सो जाना चाहिए"
कर्तव्य उपदेशक या अन्य विचार उपदेशक को चाहिए कि वह संकट के समय उस मनुष्य
जिसे वह शिक्षा देना चाहता है, उसकी रक्षा के लिए आगे बढ़े और उसे धीर व सहायता दे।
उस संकट से बचाए, तो फिर वह मनुष्य सब कुछ सुनने को तैयार हो जाएगा। यदि कोई
व्याकुल हो कर नदी किनारे खड़ा हो, उस समय उसको यह शिक्षा न देकर कि तैरना सीख
लेना था पहले ही, तैराकीसीखनेके लाभोंका वर्णन करने लगे अथवा किनारे खड़े हो कर
हाथ-पाँव मार कर बच जाओ, उपदेशक का काम यह होना चाहिए कि वह
स्वयं कूदकर या, अन्य किसी प्रकार साधन सामग्री जुटाकर उस डूबते
हुए को पार लगा दे। यदि वह डूब गया, तो फिर उस शिक्षा का उपदेश का लाभ क्या
रहा और उस मूर्ख, जो उस समय उस को ज्ञान की बात बता रहा था उसके जैसी मूर्खता
कोई नहीं, इस पर भी यदि वह तैरना जानता हो, तैरना तो, दूर की, बात रही, तैरना सिखाने का
दावा करने लगा हो। तब तो, समझ ही लेना-चाहिए कि वह सब कुछ जान बूझ
जानकर भी कुछ नहीं कर रहा है। वह तो उस पानी में डूबने वाले का सच्चा
शत्रु हुआ जिसने समय व्यतीत कर दिया उस को बात-बात फंसा कर। उस डूबते
मनुष्य को चाहिए कि तत्काल, जो कोई ऐसा ज्ञान दे रहा हो उसका दो बात उल्टी
सुना कर कह दे कि भाई तू जा, मुझे न बचा और न उपदेश दे। तेरी उपदेश भरी
वाणी तथा तेरी विद्या तुझे मुबारक हो--उपदेशक जी, उपदेश उस समय जब
सब कुछ अनुकूल तथा शान्त हो उस समय तो सब कुछ कल्याणकारी हो सकता, लेकिन
संकट काल में नहीं! उपदेश पहले दिया जाता है अथवा बाद में दिया जाता है, न कि
विपदा काल में उस समय-समय ज्ञान न दे कर तत्काल जो बन पड़े सो कर जान बचाने का
यत्न किया जा सके।
क्या, समझे?
हां प्रभु, समझ गया। कृपा कीजिए।
उपदेश पहले दिया जा चुका होता है, तो वह मनुष्य उस आपदा का
धैर्य तथा साहस के साथ सामना कर सकता था। न करने पर संकट काल आने पर वह
व्याकुल तो हो जाएगा! अब उस व्याकुल हृदय वाले, को जब उपदेश दिया गया
उपदेश का उपहास बना दिया उसने और उस उपदेश दाता, को मूर्ख
कहा गया।
संकट सिर पर आ कर खड़ा हुआ-हो, जीवन-मरण का प्रश्न बन गया हो।
उस समय ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें करने लगो और कहो कि तुम ऐसा करो
तो यह संकट टल जाय तो यह अन्याय, यह निर्दयता, यह मूर्ख, ज्ञान-मद, विद्वत्ता,
पंडित, साधु, का पाखंड कहा जाय तो इस में किसी को संशय न होना
चाहिए। उपदेश का समय उस समय तक होता है जब तक कोई संकट न आया हो, अथवा
संकट आने से पहले ज्ञान दिया जाता है कि--इन से बचने के उपाय पहले सीख
लो--तो उसका लाभ हो? उपदेश ले कर जब संकट का सामना किया जाता तो सब
कुछ सामान्य ही रहता। पर विपदा आने पर उपदेश दिया जाता तो वह उपहास, हंसी
योग्य बन, उपहासास्पद बन जाता है। उपदेशक को सब मूर्ख जन उस समय
समझेंगे कि, अरे तू, पहले ही, जागता! उपदेश से पहले ज्ञान क्यों नहीं दिया?
उपदेश तो दिया, लेकिन उस पर विश्वास नहीं किया गया। तब संकट आया तो
व्याकुल हो उठा। पर उस समय तो सहायता की आवश्यकता थी उपदेश की तो नहीं थी।
ज्ञान का फल यही होता यदि अभ्यास में न लाया जाता तो संकट में, वह ज्ञान काम
नहीं आ सकता था, अर्जुन! उस समय सब कुछ अभ्यास काम देता है जो कि पहले
किया जा चुका हो।
विश्वासपूर्वक जो ज्ञान को अपनाता है उस--का संकट में भी मन विचलित
और भय--से ग्रस्त नहीं होता और संकट सब स्वयं हल होते जाते हैं।
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जिससे पराधीनता कभी नहीं मिटती थी सो राजा का जीवन व्यर्थ रहा वा कृतघ्न का
दोष उस पर आया।अकृतज्ञता यह ही कि जो अपने ऊपर उपकार वा नेकी करे उसका
बदला बुरा किया जावे अथवा, जो ऐसा करे निष्कपटता से उसको कपट किया जावे
महाराज ने बड़ा सोच किया पश्चात् सम्भ्रम से मन्त्री को कह भेजा, जो
मन्त्री का नाम था सो तो उस पुस्तक में नहीं था, और जो नाम दिया गया है
वह नाम मात्र कथा कहने के वास्ते ही रख--कर के दिया है, मन्त्री सू--झ बूझ का
राजा बड़ा ज्ञानी समझता था। राजा, स्वयं ज्ञानी था, इस वास्ते ही, उस मन्त्री को,
अपना सब हाल दिल समझाया सब ही प्रकार
मन्त्री ने उत्तर दिया कि, उस हाथी और महावत वाली बात है, सो
महाराजा आप तो सब कुछ समझते सम्हाल ही सकते।परन्तु महाराज की समझ में
राजा रूप में कुछ अन्तर आयाहै, बस्स! सो ही बात हो गई न? राजा रूप में जो
बात थी उसकी सम्भाल रखने के वास्ते राजा को हर समय तैयार रहना था सो राजा ने
बात को खोया और प्रजाजन के मन में दिल चाहा ख्याल होने लगा ॥ १० ॥
महाराज की बात का फैसला तो प्रजाजन कर नहीं सके पर मन्त्री कैसे करते?
मन्त्री कहने लगे, वा प्रजाजन और राजा का हाल सब ही प्रजाजन के
ही अन्दर से समझ लो, इस बात को सब कोई समझ सकतेहैं पर मालिक के
घर का भेद सब को नहीं मिल सकता और न ही सब को दिया जाता है, सो राजा
का भेद सब नहीं समझ सकते वा प्रजा, जो प्रजाजन राजा का विचार
ही न कर सके तो जो बात के समझने लायक बुद्धि नहीं रखते तो वह तो
प्रजाजन ही ठहरा और वह प्रजाजन ही कहे गये
प्रजा राजा के आधीन राजा के सुख का ध्यान रखे! पर राजा सब प्रजा
का सुख सम्भाल विचार प्रजा का सुख रखे सो प्रजा अपने सुख में आनन्द पावे
और जो चाहे सो ही करे!
अब राजा के सुख को तो हर एक प्रजा समझे किन्तु अपने सुख तरफ
ही, न कि सब कोई प्रजाजन ही उस पर चले वा, हर कोई राजा की ओर ध्यान करे
यह बात तो सब समझें वा, सब ही प्रजाजन सब ही प्रकार जाने, पर सब कोई
राजा की ही तरह विचार नहीं कर सकताऔर प्रजा--प्रबन्ध का कोई भेद नहीं
पा सके इससे ही प्रजाजन को हर बात समझ नहीं आतीकि राजा ने यह हुकम
क्यों किया और इस बात में प्रजाजन का भला, था कि सब का भला
महाराज! उस ही बात को सम्भाल कर दिल में लें, इस में ही प्रजा और
ही का भला, फैसला सब प्रकार प्रजाजन का सब प्रकार से राजा रूप में ही
प्रजाजन का ध्यान सुख का सम्भाल रूप होताथा।जब तक ही सब प्रजाजन
राजा रूप में सुखी रहे वा सुखी हो सके, सो हर बात का ध्यान तो राजा ही
सब का रखने वाला ठहरा और सब बात अपने जिम्मे ले करके रखता था जिस
बात का प्रजा पर कोई असर नहीं पड़ता वा प्रजा को कोई भी बात सोचना नहीं
पड़ता
सब बात का तो प्रजाजन को विचार रहा न ही अपने सुख तरफ ध्यान रहा
सिर्फ प्रजाजन प्रजाजन कहलाने ही पर सब कुछ ध्यान प्रजाजन का सुख
रूपी आनन्द ही प्रजाजन सम्हालता था, सो राजा अपने सुख का ध्यान भूल गया
फल-रूप में प्रजाजन अपने सुख से खाली रहा सो प्रजा को पराधीनता का दुख
व्यापा
प्रजाजन पराधीनता किसे न कहे जिस बात का प्रजाजन को ही सोचना हो
और प्रजा को ही हर बात का मन सू--झना पड़े और राजा प्रबन्ध सू--झ का विचार ही
प्रजाजन छोड़ कर प्रजाजन को ही प्रजा सम्हालना पड़े, प्रजाजन राजा हुआ?
सो ऐसा प्रजाजन हुआ! जिसे प्रजाजन का सुख वा लाभ कुछ नहीं
प्रजाजन का सुख, सब, प्रजा ही प्रजा रहा
तो राजा का क्या, लाभ रहा? जब तक यह न सूझे
प्रजाजन ही रहा, प्रजाजन का फैसला क्या?
राजा विचारने लगा, प्रजाजन को ही सब कुछ करना व सब सोचा, व
सब कुछ सोचा, राजा को, प्रजाजन ही राजा का सुख समझ कर अपना ही सोचा
वा सब प्रकार से हर एक को ही बात समझ प्रजाजन को राजा ही समझा और अपना
सब कुछ खोया, अब क्या उपाय हो सकता है? सो राजा विचार प्रजा की सब तरह
का फैसला करने लग गया
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यम का दूत उसका गला घोंट कर उसके प्राण हर ले गया और--इन्द्रियोंका सब व्यापार बन्द हो गया और
चेतन्य--आत्माविहीन उसका शरीर लकड़ी समान हो गया । वास्तव में विचार कर देखा जायतो जिसने
सब दिया, उस दाताको भूल? जिस दयालु प्रभुने, इस मानव देहको देकर प्रभु, भगवद भजन रूपी
विशाल महल दिया उस पर भी इस काज को न करके केवल संसार विषय भोगों का ही स्मरण किया।
विचारवान पुरुष इस नश्वर शरीराभिमानी मानव संसार को देखकर, उस मानव को धिक्-धिक्
कहकर उस पर क्या दया नहीं करेंगे? उस मानवपर दयाही करेंगे? विचार करो, जिस पर दयाका ही काम
हो? उस मानव जीवन पर!
विचारवान पुरुष कहेंगे, इस मानव जीवन निष्फल! इस जीने का क्या?
इस विचारवान पुरुष को इस बातका अभिप्राय यह नहीं कि संसार निर्वाह का काम छोड़कर
निकम्मे बन कर आलस्य करो, पर केवल उसका लक्ष्य क्या? भगवान्को भूल कर केवल सांसारिक
प्रपञ्च फैलाकर अन्त समय यमदूत द्वारा दण्डित होना ही?
शास्त्रकारों का मत यह भी नहीं कहा गया कि गृह त्याग कर भेष-धारी साधू बनकर
केवल माला फेर कर ही अपना समय समाप्त करो।
शास्त्रकारों का मत यह भी नहीं कहा गया कि गृह छोड़? फिर क्या करें? अपने काम छोड़ दें?
केवल एकाग्र बैठें?
शास्त्रोंका यह मत यह है। अपनी मर्यादा पूर्ण जीवन रूपी कर्म करते हुये अपने उस परमेश्वर
का नाम स्मरण आदरपूर्वक करो, उस परम दयालु परमात्माके चरण कमलों का गुण गान
अपने कल्याण की इच्छा करते हुये कभी-कभी समय निकाल कर एकाग्र होकर उस परम
पिता उस ईश्वर का नाम जप कर प्रभु की भक्ति रूपी नौका द्वारा इस संसार समुद्र को पारकर
लेवें।
भगवान् का भजन केवल सन्यासियों का काम नहींहै यह शास्त्र का वचन नहीं बल्कि भ्रम
पूर्ण! केवल परमात्मा का नाम स्मरण मात्र का शास्त्रोक्त या भक्तिशास्त्र का उपदेश ही ऐसा नहीं
मिलता है, जिस का निर्वाह गृह त्याग द्वारा हीहो। सत्य बाततो यहहै संसारी गृहस्थी को
ईश्वर स्मरण तथा भजन शास्त्रानुसार अति सुलभ, सहज, सरल एवं सत्य बात यहहै, कि ईश्वर
नाम स्मरण घर पर ही बैठ, अपने सब काम करते हुए मनन रूपी नौका द्वारा ही भव सागर पारकर
सकोगे।
हर मानव नाम का संशय समाप्त करने को केवल मन एकाग्र करके ईश्वरका ध्यान अपने हृदय
मन्दिर में ही दर्शन करवा देगा। भगवान् सर्वत्र सब जगह व्यापक रूप से हर समय विद्यमान रहता,
सन्यासीयों रूप में? केवल एकांतमें?
हर बात का विचार, हर कार्य अथवा विचार रूपी मनका एकाग्र ध्यान, शांत चित्त
प्रभु नाम का जप सब प्रकार सिद्ध करता है। इस में किसी को भी कोई संशय नहीं होना चाहिये।
केवल शांत रूप एकाग्र मन प्रभुके ध्यान हेतु सब बातों को त्याग कर हर कार्य को कर सकते हो।
उस एका-ग्रता भगवान के ही ही शरण केवल भगवत भजन अथवा ध्यान द्वारा पूर्ण फल प्राप्त हो
परमपिता की दया द्वारा ही।
हर मानवके मन रूपी घोड़े को लगामकी भांति नियम रूपी लगाम से नियंत्रण करके
उस पर विजय पा सकोगे। यह तो भगवान्के अनन्य भक्त कबीरदासजीने अपनी वाणी
उपदेशके रूप मेंकहा गयाहै; फिर भीमनुष्योंको सन्देह निवारण करने के लिये; जिस प्रकार
कि, किसी व्यक्ति को कोई विचार अथवा विषय चिन्ता सताती होवे अथवा अपने किसी मित्र
सम्बन्धीकी सम्मति से उस का निवारण सुगमता पूर्वक होजाय, तैसेही अज्ञानरूपी
का नाश ही नाम सत्संग रूपी प्रकाश में ही इस बातका निर्णय ज्ञान द्वारा होगा।
केवल विचार करो जिस प्रकार मनुष्य रात को घर पर बैठ कर एकांतमें या छत ऊपर,
आकाश-मण्डल की ओर दृष्टि लगा कर देखता रहताहै कि यह क्या है? उस समय उसको यह
कौतूहल ज्ञान न होकर कि यह सब रचना किसी बनाने वालेकी है। केवल तारे तो देखे, परन्तु
ज्ञान यह नहीं, कि चन्द्रमा की भांति प्रकाश को देने वाला ईश्वरका नाम प्रकाश ज्ञान से ही होगा।
हर मानव सब कुछ देखता हुआ, विषय के मद मस्त होकर यह सब कुछ भूल-भाल
कर केवल उस रचना देखकर केवल यह सो-चता रहा, अब क्या? फिर क्या हुआ, उस चन्द्रमा
अथवा उस तारे केवल रूप को ही देखा, परन्तु ईश्वर के उस व्यापक ज्ञान का दर्शन न कर
सका। जब वह सूर्य उदय हुआ, तो उस ज्ञान रूप प्रकाश से ही संसार भर का ज्ञान हुआ।
इस प्रकार ज्ञान, उस ज्ञान प्रभु की कृपा द्वारा
यह तो केवल विचार रूप में ज्ञान हुआ, परन्तु ज्ञान का मूल उस परमेश्वर की
प्राप्ति का ही तो शरण लेकर ही हो सका जो ज्ञान का मूल ज्ञान का सार रूप माना गया।
इस प्रकार भगवान् नाम जपना संसारी मनुष्य को संसार रूप से पार होने का साधन
बताया, जिस को सब शास्त्रकार एकमत होकर कह गयेहैं, कि यह सब कुछ सत्य है ।
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क्या हुआ, पर अब ब्रह्मज्ञान को साधन सम्पन्न संत जन उन सब बातों पर विचार
करें?
"जो सब कुछ त्यागना चाहे उसका विवेक तीव्र होना चाहिये, सब बातों ब्रह्मज्ञान
की बात तो बहुत सरल, पर त्याग होना या सब त्याग देना या तो सब छोड़ना या ना या ना
करना पड़े"
वैराग्यवान ही हो सकता है, पर यह त्याग संत समाज करता है, त्याग का काम
सब काम से कठिन कठोर साधन माना गया संत समाज द्वारा त्याग कठिन माना गया
त्याग कठिन सब त्यागना समाज त्याग कठिन माना त्याग करना त्याग का स्वरूप त्याग
त्याग सब कुछ त्याग कठिन मानना समाज त्याग यह ना कि सब त्याग त्याग या सब ना
त्याग स्वरूप व या ना त्याग से काम, व वैराग्यवान के द्वारा संत या या वैराग्य
त्याग का त्याग सब या ना या त्याग से, पर संत जन सब त्याग ज्ञान या संत या ज्ञान
का त्याग
ज्ञान साधन से वैराग्य त्याग ज्ञान ज्ञान से या ज्ञान या ज्ञान त्याग संत या
त्याग वैराग्य से संत या त्याग से या ज्ञान से या त्याग सब या ज्ञान या
या या या ज्ञान त्याग, सब ज्ञान संत या ज्ञान, या वैराग्य सब त्याग या
त्याग सब वैराग्य ज्ञान, वैराग्य ज्ञान से त्याग संत त्याग सब संत या ज्ञान
सब वैराग्य त्याग से ज्ञान सब त्याग सब, सब संत या ज्ञान त्याग
सब या सब या वैराग्य त्याग त्याग सब या ज्ञान संत त्याग या या
सब या ज्ञान सब त्याग त्याग त्याग त्याग सब या या संत सब या संत या सब
वैराग्य सब त्याग या त्याग या संत या त्याग सब संत या त्याग सब या! त्याग या
त्याग या वैराग्य त्याग त्याग त्याग से वैराग्य या संत त्याग सब संत त्याग
या सब, या ज्ञान या सब
या ज्ञान या सब त्याग त्याग सब या त्याग! त्याग वैराग्य त्याग सब सब
सब या वैराग्य या सब ज्ञान सब या संत या सब, या सब सब सब त्याग सब,
या ज्ञान? या त्याग ज्ञान?
सब संत ज्ञान या ज्ञान या ज्ञान सब संत या ज्ञान, वैराग्य सब
वैराग्य या त्याग त्याग सब ज्ञान या ज्ञान, त्याग सब व संत वैराग्य या
वैराग्य त्याग त्याग सब सब सब, या, या या सब, सब त्याग ज्ञान? सब सब,
सब, या या सब, या त्याग ज्ञान? सब या, सब सब सब त्याग सब ज्ञान-ज्ञान या
सब सब व व सब वैराग्य वैराग्य सब
या वैराग्य सब या सब त्याग या वैराग्य से, या या त्याग त्याग या, त्याग
त्याग ज्ञान? या वैराग्य त्याग ज्ञान? या या वैराग्य सब या या या सब सब या
या सब या ज्ञान त्याग
या सब वैराग्य या सब या या या सब सब या ज्ञान या सब ज्ञान सब
ज्ञान सब सब त्याग सब सब त्याग, या या सब सब ज्ञान? या या सब ज्ञान?
ज्ञान ज्ञान सब, "या या या त्याग या या या ज्ञान ज्ञान त्याग या त्याग
या ज्ञान सब या ज्ञान त्याग त्याग त्याग या सब वैराग्य या ज्ञान सब ज्ञान
ज्ञान सब, या वैराग्य या वैराग्य सब"
या या सब त्याग, या या त्याग सब ज्ञान त्याग सब
उप-संत या ज्ञान सब वैराग्य त्याग या या संत वैराग्य या वैराग्य सब,
या त्याग या ज्ञान त्याग वैराग्य या सब या त्याग ज्ञान या या ज्ञान त्याग
वैराग्य, त्याग ज्ञान या ज्ञान सब या सब त्याग त्याग व ज्ञान त्याग, या या ज्ञान
त्याग या व वैराग्य
ज्ञान सब या सब सब या या ज्ञान ज्ञान सब वैराग्य या सब वैराग्य या
ज्ञान सब
या या या या, सब सब त्याग या या वैराग्य या, या ज्ञान वैराग्य त्याग
या त्याग या सब सब ज्ञान या सब त्याग या ज्ञान वैराग्य? वैराग्य त्याग सब
या सब या ज्ञान ज्ञान? वैराग्य त्याग त्याग या ज्ञान त्याग? ज्ञान वैराग्य या
ज्ञान ज्ञान ज्ञान?
सब त्याग या सब या सब त्याग सब, सब सब त्याग वैराग्य या या ज्ञान
सब त्याग सब त्याग त्याग सब या व या सब या वैराग्य त्याग सब, त्याग या
सब ज्ञान सब सब ज्ञान त्याग या सब सब ज्ञान ज्ञान सब, या या सब या या
त्याग सब
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विचार करूँ और यह सब सोचूँ कि, जो जो इन दोनों का रूप या मन था उसको मैं
प्रेम करूँ अथवा इन दोनों का रूप और नाम जैसा कि इन दोनों का था, न भी रहे तो भी
इनके नाम और रूप को प्रेम करूँ ऐसा विचार ना ही बने, क्योंकि जो प्रत्यक्ष रूप
हम सब सुख पाते हैं सो सब रूप बदल जाता है।
सो जब मैं सब बातों को इस रीति से मन में सोच कर देखने लगा, तब ऐसी
विचारनाएँ मन में क्यों उठने लगीं? हे प्रभु जब तूने, या तेरे बनाए हुए किसी
ने यह रूप या मन रूप किया
है! तो उनको इस विचारना से क्या लाभ होगा या ऐसा करने से उन को क्या
लाभ हो सकता है जिन को, नाम या रूप विचारने से कोई लाभ नहीं हो
सकता, ना उनको जो इस संसार में सब बातों से परे कोई लाभ नहीं पाना
चाहते इत्यादि।
ऐसा सब सोच, "जब कि सम्पूर्ण रूप या नाम परमात्मा से उत्पन्न हुए
सब विचारना के पश्चात् अन्त को एक ऐसा शून्य वा प्रकाश रूप हो गया जिस
को न प्रकाश कह सकते हैं ना ही शून्य कह सकते हैं और ना शून्य कह सकते
क्योंकि प्रकाश और शून्य दोनों शब्द भी एक विशेष अर्थ दर्शाते हैं"
जिस का कोई दृष्टान्त नहीं दर्शाया जाता क्योंकि
वह सब कुछ अपने में अपने आप सब का आधार
अपने आप बिना सहारा स्वयं प्रकाश स्वयं प्रकाश स्वरूप
स्वयं ज्योति स्वयं ज्योति स्वरूप स्वयं चेतन स्वरूप
स्वयं चेतन स्वरूप न नाम रूप पर मन का आधार।
अब यह भी मन में संशय उठा कि शून्य अथवा प्रकाश रूपी ज्योति को
नाम रूप भी कोई कह सकता है या कह ही नहीं सकता, यदि कह भी नहीं सके; तौ
कह सकता है, यदि कह भी नहीं सकता तो नाम भी कैसे ले, यदि ले
सकता है तो क्या नाम दे? शून्य दे? शून्य का क्या नाम दे?
जो ना तो कोई वस्तु शून्य है, शून्य-मात्र शून्य है, जिस प्रकार सब ओर
शून्य का विस्तार सब ओर फैला हुआ है यदि प्रकाश स्वरूप कहें, तब सब ओर
तेज ही तो तेज भरा हुआ
दिखाई नहीं देता है, ज्योति मात्र सब ओर ना रहे, प्रकाश मात्र भी
सब ओर ना रहे। ना तो इस को शून्य, ना ही प्रकाश कह सकते हैं।
तो फिर जो भी, ज्योति रूप कहेंगे तो ऐसा ज्योति रूप जो मन का रूप,
ज्योति मात्र स्वरूप होकर मन का, मन का रूप, मन का रूप, मन का रूप
सब विचारनाओं को एक विचारना बना कर, न तो एक विचारना
ही रह सके, बल्कि उस का होना ही ऐसा हो सके जिस प्रकार एक ही
आ-पे को पा कर, सब भ्रमों से रहित हो-कर जो देखता रहा सो भी, उस
रूप का आधार बन खो-कर उस प्रकाश का रूप हो, उस प्रकाश के
अन्दर एकरस न रहे; जब तक ऐसा, मन को ना हो जाए तब तक;
ज्योति मात्र स्वरूप भी मन ही का प्रकाश का अंग ही कहलाएगा? ना केवल
प्रकार का नाम-मात्र का ही शून्य का नाम मात्र समझना, मन की एक
भूल होगी; जिस भूल को जब न खोया, तब तक ना जाना रूप बनेगा
विचार प्रकार का नाम ही न था केवल प्रकाश स्वरूप ही कहा
गया था जिसको परमात्मा रूप समझने का यत्न किया जा रहा था अथवा
मन के पश्चात् जो कुछ न प्रकाश था उसको परमात्मा का नाम देकर अपनी
विचारना द्वारा सब प्रकाश स्वरूप केवल मन को ही भ्रम से, या ज्ञान के
बिना विचार को ही नाम पश्चात् ज्योति स्वरूप समझ कर भ्रम-वश
से उसी प्रकाश के भ्रम में ही खोने की चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस
को ही परमात्मा ज्ञान विचार कर चेष्टाएं चेष्टाएं ही कहेंगे या उस को
ही परमात्मा का न जानना
रूप समझना अथवा कहना जैसा कि सब लोग केवल केवल कहते हैं? सब
का रूप ही अपने आप
ही रहा; जब तक, सब विचारनाओं का अन्त नहीं हो, परमात्मा का रूप
सब ओर सब बातों से परे, क्योंकि सब के पश्चात् ही नाम का जो ज्ञान है
उसका खो-कर मिलना, परमात्मा स्वरूप ही बन कर सब का विचारनाओं
रूप ही बनेगा।

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