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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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फिर उनके केवल सखाभाव को, उन भगवान् श्रीकृष्ण के साथ केवल सखा के बर्ताव को, देखकर
कहेंगे? क्या यह उनका प्रेम? या यह उन दोनों परस्पर प्रीति? केवल सखाका बर्ताव-मात्र तो
ऐसा साधारण जन भी कर दिया करते हैं। इसमें सन्देह ही क्या है। हाँ, फिर जो वह प्रेम,
जो सखा समुदाय प्रेम करता था वह सब मिट गया होता
तो वह उनका अज्ञानपना ही कहलावेगा। जिस कारण श्रीकृष्ण का प्रभाव ही,
उनकी भगवत्ता मात्र ही, उनका प्रेम ही ऐसा था कि उन गोप बालकों को
ऐसा तो ज्ञान था कि हमारे यह प्राण ही हैं। उनका तो कोई ऐसा व्यवहार ही नहीं
होता जिससे वे न जान सकें कि हम सब कुछ हैं। इसी कारण से उन गोप
गोपों का प्रेम ही तो था? पर ऐसा तो, जैसा सखाका परस्पर प्रेम होता
ऐसा व्यवहार था, परन्तु उनका प्रेम तो सदा सर्वदा केवल श्रीभगवान्
ही, उनकी प्रत्येक क्रिया सर्वदा गोप बालकों के ही हित करने को ही,
इसलिए परस्पर श्रीकृष्ण भगवान् सदा अपने भक्तों के वश सदा रहते सदा
सबही पर कृपा करते
फिर केवल वे, जो भगवान् यह बर्ताव कर रहे थे। गोप भगवान् को,
भगवान् रूप में जानते? वे जानते तो, पर उनकी अपनी प्रीति के बल
करके ही, भगवान् सब कुछ हैं। अपने बल से कुछ न था, सब भगवान्
रूप सब कुछ ही सदा था।
सो उस गोप समुदाय को, गोपियों को सदा अपनी प्राणों का आधार
श्रीकृष्ण ही जान पड़ता। इसलिए वे अपने नित्य ही कृष्ण को देख रहे
इसलिए सदा ही, उनका प्रेम नित्य नया ही बना रहता था। उन्हें सदा
श्रीकृष्ण साक्षात् ही अपने ध्यान में नित्य ही विराजमान ही रहा करते
सो उन सब को यह बात सदा याद रहती थी। अहा, सखा समाज का ऐसा
ही, सर्वदा उनके मन में भगवान् नित्य स्वरूप विराजे! सो सखा का, गोप
कुमारों का? कैसा प्रेम था? कैसा रूप था? कैसा वह बर्ताव था! वे
तो सब कुछ छोड़ अपने प्राणों को भगवान् श्रीकृष्ण अर्पित थे, सो वे बड़े ही
भाग्यवान् थे! सो उनका प्रेम तो केवल प्रभु सखा, सखीजन सब का भगवान्
रूप न होता? भला उन सब गोपों बालकों के जो प्रभु से पूर्ण रूप सम्बन्ध
रहा था, इसलिए सब ही तो प्रभु के माता-पिता सब सदा ही श्री भगवान्
रूप सब कुछ जानते थे। इसलिए वे जानते थे कि उन पर सब प्रभु कृपा
सदा ही की गई थी सो सब पर उनकी कृपा, गोकुल सब पर ही सब पर
श्रीकृष्ण की थी ही, सब लोग पूर्ण रूप श्रीकृष्ण कृपा पात्र ही तो
थे।
उस समय में तो जो बात थी, उसका सब रूप भगवान् ही सब पर कर
रहे थे। उनके रूप का--जो रूप तो सब जन का सदा बना रहा, तो ऐसा मालूम
ही न था, कि सब ओर से कृष्ण ही का रूप उन पर सर्वथा ही सब
ही हो रहा, हाँ! केवल वे तो मन में कृष्ण ही का साक्षात्कार कर
ही भगवान् सदा सब कुछ बना रहे थे। सदा ही उन पर सब भगवान्
का अनुग्रह सदा सर्वदा ही हो रहा था। भगवान् सब ही को प्रेम में ही
तो मग्न थे ही, वे तो सब कुछ लीला ही
जब भगवान् गोकुल छोड़ मथुरा को चले तब सारा गोकुल रोने लगा
और सारा समाज व्यथित हो उठा था। सब कह रहे थे कि हाय हमारे गोपाल ही
तो सब कुछ थे, अब उन भगवान् बिना, हम क्या करेंगे? सो क्या वे केवल
मात्र ही सखा थे, या उन भगवान् बिना, सब ही व्यथित? उस बात को
ज्ञान स्वरूप से जानें, भगवान् तो वास्तव में उन सबके आत्मा,
अन्तर्यामी, परमात्मा स्वरूप ही तो उनके मन में थे।
केवल ऊपर ऊपर सखा रूप ही दीखता था, भीतर-भीतर तो ज्ञान भरा
था, वे भगवान् स्वरूप ही मानते थे! इस प्रकार भगवान् को सब लोग
नित्य सब ओर सदा सर्वदा एक ही रूप में सब ही सब ओर सदा ही देखते
ही रहते थे। इसी कारण से भगवान् सदा अपने भक्तों को सब कुछ अपना
रूप ही सब कुछ दे रहे थे।
भगवान् तो उन गोप बालकों साथ ही भगवान् रूप का स्वरूप दिखाते,
जिससे वे समझ लें न कि केवल मात्र ही सखापने का भाव ही सब कुछ
नहीं, वरन् स्वयं भगवान् उनके सम्मुख प्रत्यक्ष रूप बना हुआ है। सो, सब
लोग सदा ही सब पर ही, ऐसा ही वे भगवान् श्रीकृष्ण नित्य सर्वदा सब ही
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