मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
About this granth
Purva Mimamsa (मीमांसा दर्शन) is the school of Indian philosophy built on Maharshi Jaimini's Mimamsa Sutras, which set out how Vedic injunctions are to be interpreted and how ritual action is to be performed. The oldest surviving commentary on the sutras is the Shabara Bhashya of Shabaraswamin, and Kumarila Bhatta's Tantravartika on it became the foundation of the Bhatta school.
This is no. 16 of the Prachyabharati Series, first published by Tara Printing Works, Varanasi, in 1984. As its title page states, it gathers five commentaries: the Shabara Bhashya, Kumarila's Tantravartika, Someshvara Bhatta's Nyayasudha on it, the Bhashyavivarana of Govindamritamuni, and the Bhavaprakashika of the editor, Dr. Mahaprabhulal Goswami, then head of philosophy at Sampurnanand Sanskrit University. The foreword is by Pattabhirama Shastri.
The discussion proceeds sutra by sutra through the means of knowledge, the definition of dharma, injunction and arthavada, context and other rules of interpretation, with an introduction surveying the commentators. At about 804 pages, it is meant for serious students of Mimamsa.
१०८ मीमांसादर्शनम् [ सू०
स्वमतेन व्याख्यानम्
स्वमतेन व्याख्यातुं प्रतिजानीते—अत इति । सृष्ट्यादिविषयमेतदुपाख्यानं व्याख्यातुं
तदनङ्गीकारादनुपपत्तिमशङ्क्याह— मन्त्रेति । वस्तुवृत्त्या सृष्टिप्रलयाभावेऽपि मन्त्रादि-
व्याख्यालम्बनत्वेनोपायमात्रतया तदङ्गीकरणमिति भावः । व्याख्यानमाह - तत्रेति ।
आत्मनः पशुरूपनिर्माणशक्तिद्योतनार्थं योगिग्रहणं पुण्यकर्मणामेव मन्वादीनां सृष्ट्यादावु-
द्भवः पुराणादिष्वभ्युपगम्यते । यद्वा पुण्यस्यैव कर्म्मणः फलदानायोद्भवः ।
'अरोगः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः ।
चतुष्पात्सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे ॥'
इति स्मरणात् । ततोऽजस्तूपर उदगादित्यत्र तत इति पञ्चम्यानन्तर्यप्रदर्शनार्थेति
व्याचष्टे—तत इति । वपापुरोडाशाङ्गप्रचारात्मकत्वात्पशुयागस्य वपाप्रचारमात्रेणा-
समाप्तिः । आनन्तर्याभिधानस्य स्तुत्युपयोगमाह—ईदृशमिति । वपोत्खननाभिधानस्योप-
योगमाह—एवं चेति । सालम्बनत्वाभिप्रायः सत्यशब्दः । प्रसङ्गाद्वृत्तान्तान्वाख्यानेऽपि-
त्याद्यधस्तनभाष्यं दूषयति—प्रतिसृष्टि चेति ।
दिङ्मोहोदाहरणे देवशब्दालम्बनमाह-- कर्म्मस्थिति । के त इत्यपेक्षायामृतृत्विजस्त-
इत्युक्तम् । दिङ्मोहशब्दालम्बनाभिधानार्थमप्राकृतस्येति भाष्यं व्याचष्टे—देवयजनेति ।
देवयजनं यज्ञभूमिः । दृष्टश्च लोके व्याकुलीभावे दिग्भ्रमव्यपदेश इत्याह - तथा चेति ।
अदितेर्ज्ञापकत्वाभिधानस्यालम्बनप्रतिपादनार्थमवधारणेति भाष्यं व्याचष्टे—तत्रेति ।
कथमदितियागेनावधारणस्यावकाशो दीयते । अत आह— यावद्धीति । दर्शपूर्णमासाविद्वा
सोमेन यजेतेतिदर्शपूर्णमासानन्तरं सोमयागस्तस्य चापूर्वत्वाददर्शपूर्णमासयोरनभ्यस्तस्याङ्ग-
जातस्योपस्थापनाद्यामोहमात्रं प्रायणीयेष्टापनीयते । सा हि सोमस्याङ्गं दर्शपूर्णमास-
योश्च विकार इति पूर्वाभ्यस्तदर्शपूर्णमासिकर्त्तव्यतानुष्ठानेन करिष्यमाणेषु कर्म्मस्ववधानं
भवतीति भावः । पथ्यां स्वस्तिमयजम्प्राचीमेव तया दिशं प्राजानन्नग्निना दक्षिणाम्, सोमेन
प्रतीचीं, सवित्रोदीचीम्, अदित्योर्ध्वमिति मोहापनयेन स्तुतिः ॥ १० ॥
भा० प्र०-यदि पूर्वपक्षी यह कहें कि जिस स्थल में अन्य की विधेयता एवं अन्य
का प्राशस्त्य कहा जाता है, वहाँ व्यधिकरणता दोष प्राप्त होने से अर्थवाद वाक्य विधेय
विषय की परोचना नहीं कर सकता है । ऐसी स्थिति में विधि के साथ एकवाक्यता न
होने से अर्थवाद वाक्य का प्रामाण्य भी नहीं हो सकता है—इसी आशङ्का के उत्तर में
सूत्रकार ने “गुणवादस्तु” यह सूत्र कहा है । इस सूत्र में प्रयुक्त “तु” शब्द के द्वारा
पूर्वपक्षी की आशङ्का का निवारण किया गया है । इन स्थलों में गुण के समान ही
विवक्षा रहती है । जैसे “वेतसशाखया अवकाभिश्च अग्निं विकर्षति” इस वाक्य में बेतस
शाखा विधेय है । किन्तु, इसके परवर्ती “आपो वै शान्ताः” इस अर्थवाद वाक्य में जल
को शान्त कहकर प्रशंसा की गई है । जैसे कोई व्यक्ति काञ्ची देश में पूर्वजों की
१० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १०९
परम्परा क्रम से निवास कर रहा है, यह जानकर उसके सम्बन्ध में कुछ कहने के उद्देश्य
से यदि काञ्ची देश की प्रशंसा करता है, तब उस देश की प्रशंसा से उस व्यक्ति के
द्वारा उसकी ही प्रशंसा अवगत होती है, वैसे ही इस स्थल में भी जल का शान्तत्व
कथन जल में उत्पन्न वेतस शाखा की ही प्रशंसा की गई है। वेतस एवं अवका शान्त
स्वभाव जल से उत्पन्न होने से स्वयं शान्त स्वभाव है, इसीलिए वह यजमान के भी
अनिष्ट की शान्ति करने में समर्थ हैं—यही प्रकृत में अर्थवाद का तात्पर्य है।
इसी प्रकार “बर्हिषि रजतं न देयम्” (तै० सं० १।५।१।२) इस वाक्य में बर्हि
नामक यज्ञ में रजत के दान का निषेध किया गया है, इसी के बाद “सोऽरोदीत् यद-
रोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् । तस्य यदश्रु शीर्यन्ते” इत्यादि अर्थवाद में कहा गया है कि उसने
(रुद्र ने) रोदन किया, यही रुद्र का रुद्रत्व है, अर्थात् इसीलिए वह रुद्र है, रोदन काल
में जो अश्रुपात हुआ; वही रजत है। इसका आशय यह है कि जो व्यक्ति बर्हिः याग में
रजत दक्षिणा के रूप में देता है उसके घर पर वर्ष के भीतर ही ऐसा अनिष्ट होता है,
जिससे निश्चित रूप में उसको रोदन करना पड़ता है। इस प्रकार इसके द्वारा रजत के
दान की निन्दा कर रजत को दक्षिणा के रूप में न देने की प्रशंसा की गई है।
“यः प्रजायाकामः यः पशुकामः स्यात् स एतं प्राजापत्यमजं तूपरमालभेत”, (तै०
सं० २।१।१।४,५) यह विधिवाक्य कहा गया है “प्रजाकामी एवं पशुकामी व्यक्ति प्रजा-
पति देवता के उद्देश्य से तूपर अर्थात् शृङ्गहीन छाग के द्वारा यज्ञ करे”। इसी के बाद
श्रुति में कहा गया है—“प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्”। इससे पूर्व में पशु नहीं था,
अतः प्रजापति ने पशु के स्थानपर हृदय के मेदा को काटकर अग्नि में आहुति की और
इस कर्म का ऐसा सामर्थ्य है कि अग्नि में पशु की वपा की जगह पर अपने वपा की
आहुति देने के साथ ही साथ तूपर अज एवं अन्य पशु भी उत्पन्न हुए। यह घटना सत्य
हो या असत्य इससे कुछ होना नहीं है। क्योंकि, अत्यन्त काल्पनिक वस्तु के द्वारा भी
प्रशंसा या निन्दा करना आज भी लोक व्यवहार में प्रसिद्ध है। प्रकृत में इसके द्वारा
यहो कहा गया है कि कर्म शीघ्र फल देता है, अथवा इसका यह तात्पर्य है कि विशिष्ट
प्रयोजन की सिद्धि के लिए जब अपनी वपा का छेदनकर भी कर्म का अनुष्ठान किया
गया तब धन आदि बाह्य पदार्थों के व्यय से तो वह कर्तव्य ही है। लोकव्यवहार में
भी ऐसा कहा जाता है कि जीवन विसर्जन कर भी मानमर्यादा की रक्षा करूँगा तब
रुपये पैसे की क्या बात है, प्रकृत में भी यही समझना चाहिए।
इसी प्रकार “आदित्यः प्रायणीयश्चरुः” (तै० सं० ६।१।५।१) इत्यादि में आदित्य
देवता के उद्देश्य से जो प्रायणीय आदि नामक यज्ञ के चरु का विधान किया गया है,
उसी के साथ “देवा वै देवयजनकाले दिशो न प्रजानन्” यह श्रुति कही गई है। देवताओं
को भी देवयज्ञ करते समय दिङ्मोह हुआ था, किन्तु, अदिति देवता के सामर्थ्य से उन
देवताओं का मोह दूर हो गया, अतः, सोमयाग अनेक कर्मकलापों का सङ्कुल है। इसलिए
११० मीमांसादर्शनम् [ सू०
यजमान की इसमें भ्रान्ति या भूल होना स्वाभाविक है । किन्तु, अदिति देवता सम्बन्धी
प्रायणीय एवं उदयनीय याग के चरु करने पर अदिति देवता के प्रभाव से यजमान का
भ्रम दूर होगा । इस प्रकार इन स्थलों में गुणवाद ही विवक्षित है । जिस स्थल में कोई
गुण विशेषगत सादृश्य का उल्लेख कर अर्थविशेष का आरोप किया जाता है, उसको
वहाँ गुणवाद कहा जाता है । प्रथम अध्याय के चतुर्थ पाद के तत्सिद्धिजातिसारूप्य-
प्रशंसा भूमलिङ्गसमवाया इति गुणाश्रयाः (१।४।२३) इस सूत्र के विश्लेषण में गुणवाद
का व्याख्यान किया जायेगा ॥ १० ॥
रूपात् प्रायात् ॥ १.२.११ ॥
शा० भा०—हिरण्यं हस्ते भवति, अथ गृह्णातीति साकाङ्क्षत्वादस्य विधेः
शेषः—स्तेनं मनः, अनृतवादिनी वागिति । निन्दावचनं हिरण्यस्तुत्यर्थेन यथा-
किमृषिणा, देवदत्त एव भोजयितव्यः । कथं पुनरस्तेनं मनो निन्दितुमपि स्तेन-
शब्देनोच्यते, वाचं चाननृतवादिनीमप्यनृतवादिनीति ब्रूयात् । गुणवादस्तु
रूपात् । यथा स्तेनाः प्रच्छन्नरूपा । एवं च मन इति गौणः शब्दः । प्रायाच्चा-
नृतवादिनी वागिति ॥ ११ ॥
भा० वि०—यद्यप्यप्राप्ता चेत्यादिना सूत्रद्वयेनार्थभावनाङ्गत्वनिरासेनार्थ-
वादानां गुणवादेन शब्दभावनाङ्गत्वमुक्तम्, तथाप्युदाहृतेष्वेव केषुचिद्वाक्येषु
गौणतानिमित्तगुणविशेषदर्शनायोत्तरसूत्रसन्दर्भः, तत्र पूर्वोक्तदृष्टविरोधोदाहरणे
तावदाह—रूपात्प्रायादिति । तत्र स्तेयानृतार्थवादस्याकाङ्क्षत्वेन हिरण्यहस्त-
धारणपूर्वकत्वविशेषत्वं तावदाह—हिरण्यमिति ।
ननु स्तेयाद्यर्थवादेन वाङ्मनसयोः निन्दा क्रियते, कथं विधिशेषत्वं
तत्राह—निन्देति । सर्वक्रियाङ्गत्वेनात्यन्तान्तरङ्गभूतयोरपि अनयोः
स्तेयादि धर्मत्त्वेन दूर एव हिरण्यादूनत्वमिति निन्दावचनं स्तुत्यर्थत्वेन न
निषेधार्थतया सन्निहितविध्याकाङ्क्षितस्तुतिपरत्वेन तदेकवाक्यत्वे संभवति
निषेधकल्पनानुपपत्तेः । यथा अनाहुतिर्वैजर्तिलाश्च गवीधुकाश्चेत्यस्य सन्निहित-
पयोहोमस्तुत्यर्थत्वेन तदेकवाक्यत्वसंभवे न निषेधकल्पना तद्वदित्यर्थः, निन्दत्वेन
प्रतीयमानमपि न तत्परं, किं तु स्तुत्या विधिपरं दृष्टमित्युदाहरति—यथेति ।
ननु निन्दितमपि कथमस्तेनं मनः स्तेनशब्दो ब्रूयात्, ऋतवादिनीं च कथं
वाचमनृतवादिनीति ब्रूयात्, निरालम्बतवायत्तेरिति चोदयति—कथं पुनरिति ।
पूर्वसूत्रेणोत्तरमाह—गुणेति । कोऽसौ गुण इत्याशङ्क्य यथाक्रममुदाहरण-
द्वयेऽपि रूपातप्रायादिति च योजयति—यथेति वागिति । गौणइत्यनुषङ्गः स्तेन-
धर्मस्याप्रत्यक्षस्य मनसि भावात् गौणः स्तेनशब्दः, प्रायिकत्वेन च वाचोऽनृत-
वादिनीत्वोक्तिरित्यर्थः ॥ ११ ॥
११ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १११
त० वा०—इह सर्वं क्रियमाणं मनसा संकल्प्य वाचा चाभिधाय क्रियते
तदत्यन्तान्तरङ्गभूतयोरप्यनयोर्दूरेण हिरण्यादूनत्वं स्तेयानृतवादयोगादिति ।
या निन्दा तन्मात्रपर्यवसायिनी, सा निषेधफला भवति । विधिपरा तु स्तुत्यर्था
जायते । तदुपपादनस्य दृष्टार्थत्वात् । यथा वक्ष्यति 'न चेदन्यं प्रकल्पयेत्प्रक्लृप्ता-
र्थवादः स्याद्' जै० १०।८।४ इति ॥ ११ ॥
न्या० सू०—अत्र भाष्यकारेण स्तेनानृतवादाद्यर्थवादस्य हिरण्यहस्तधारणपूर्वकग्रहण-
विधिशेषत्वमुक्त्वा निन्दाया विधिशेषत्वानुपपत्तिमाशङ्कय निन्दावचनमित्याद्युक्तम् । तदुप-
पादयति—इहेति । ननु निन्दया निषेध एव कल्प्यतां किमित्यसावन्यस्तुतिपर्यन्तं नीयेतेत्यत
आह— या निन्देति । निषेधैकवाक्यत्वं विना निन्दात्वानवधारणाच्च तद्बलेन निषेधकल्पनं
युक्तम् । न चैवमानर्थक्यापत्तिः निन्दामात्रपर्यवसानाभावादिति भावः । कथमस्या विधि-
शेषतेत्याशङ्कयाह—तदुपपादनस्येति । वक्ष्यते च दशमे विधिसन्निधौ श्रुताया निन्दाया
निषेधाकल्पनेन विधेयस्तुत्यर्थत्वमित्याह—यथेति । जर्तिलयवाग्वा वा जुहुयाद् गवीधुकया-
वाग्वा वा जुहुयान्न ग्राम्यान्पशून् हिनस्ति, नारण्यानथो खल्वाहुरनाहुतिर्वैजर्तिलाश्च
गवीधुकाश्च पयसाऽग्निहोत्रं जुहुयादिति विधेः अनाहुतिरिति च निन्दया निषेधानुमाना-
द्विधिनिषेधाविति प्राप्ते सिद्धान्तयिष्यते । न चेदन्यं प्रकल्पयेत् प्रक्लृप्तावर्थवादः स्यादादर्थं-
क्यात्परसामर्थ्याच्चेति (१०-८) । शिष्टा तु प्रतिषेधः स्यात् इति पूर्वाधिकरणसूत्रानुषङ्गे-
णेदं योज्यम् । न चेदन्यं विधिं प्रकल्पयेद्यद्यत्र प्रत्यक्षो विधिः सन्निहितो न स्यात्, ततः
षोडशिग्रहणवाक्यवदेकेन शिष्टा परेण प्रतिषेधः स्यात् । इह तु पयसाऽग्निहोत्रं जुहुयादिति
विध्यन्तरस्य प्रक्लृप्तत्वात्तच्छेषभूतोऽयमर्थवादः स्यात्, अन्यथा निषेधैकवाक्यत्वं विना
निन्दात्वानवधारणेनानाहुतित्वकीर्त्तनस्य निषेधकल्पकत्वासम्भवादानर्थक्यापत्तेः । कथ-
ञ्चित्कल्पितस्यापि वा निषेधस्य षोडशिग्रहणनिषेधवद्विकल्पार्थत्वात् तस्य चात्र पयः
प्रभृतिद्रव्यान्तरविधानादेव सिद्धेरानर्थक्यापरिहारात् यवागूस्तुतिनिन्दयोः कथं पयः-
स्तुत्यर्थत्वमित्याशङ्कय परसामर्थ्याच्चेत्युक्तम् । ग्राम्यारण्यपशुहिंसानापादकत्वेन प्रशस्ता-
नामपि जर्त्तिलगवीधुकानां पयःप्रयोगापेक्षया दुष्टत्वात्पयः प्रशस्ततरमिति परेण पयोविधि-
नान् Derecho सामर्थ्यादित्यर्थः, एवं चैकवाक्यत्वे सम्भवत्यनेकादृष्टानुबन्धिवाक्यभेदापादकविधि-
त्वाङ्गीकरणायोगात् जुहुयादिति लिङोऽपि स्तुत्यर्थत्वसिद्धिः ॥ ११ ॥
भा० प्र०—पूर्वपक्षी ने शास्त्रदृष्ट प्रदर्शन के लिए 'स्तेनं मनः अनृतवादिनी वाक्'
इस अर्थवाद का उल्लेख किया है यह अर्थवाद "हिरण्यं हस्ते भवति अथ गृह्णाति"
(तै० सं० ४।८।२।३) इस विधिवाक्य से उपदिष्ट हाथ के द्वारा हिरण्य धारण की
कर्तव्यता की प्रशस्तता का ज्ञापन है । चोर जिस प्रकार प्रच्छन्न रूप से रहता है—
उसका स्वरूप गृहीत नहीं होता है, मन भी वैसा ही है एवं वाणी भी प्रायः अनृत-
वादिनी है, किन्तु, हाथ का न तो वैसा प्रच्छन्न रूप है और और न अनृतयुक्त है । इस-
११२ मीमांसादर्शनम् [ सू०
लिए हाथ में हिरण्य का धारण कर्तव्य है । मन की स्तेन स्वरूपता एवं अनृतभाषण में
प्रायिकता रूप सादृश्य के अनुसार गौणभाव से मन को स्तेन एवं वाणी को अनृत-
वादिनी कहा है, किन्तु, मन का स्तेनत्व या वाक्य की अनृतवादिता विवक्षित नहीं है ।
जैसे ऋषि से क्या काम है, यदु ही इसका विधान करेगा इस प्रकार के वाक्य में ऋषि
की अपटुता प्रकटित नहीं होती है किन्तु यदु का ही सामर्थ्याधिक्य विवक्षित होता है—
इस स्थल में भी इसो प्रकार है । "रूपात्" = समान रूप होने से "प्रायात्" प्रायिकता
रूप से । गुणवाद के अनुसार मन को स्तेन एवं वाणी को अनृतवादिनी कहा है ।
ऋग्वेदभाष्यभूमिका में भी कहा है—ऋषि की क्या आवश्यकता है, देवदत्त की
ही पूजा करे । इसमें देवदत्त की पूजा को स्तुति के लिए ही ऋषि के प्रति औदासीन्य
का प्रदर्शन है, ऋषि के पूज्यत्व का निषेध नहीं है ॥ ११ ॥
दूरभूयस्त्वात् ॥ १.२.१२ ॥
शा० भा०—दृष्टविरोध उदाहरणं तस्माद्धूम एवाग्नेर्दिवा ददृशे नार्चिः ।
तस्मादर्चिरेवाग्नेर्नक्तं ददृशे, न धूम इति अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति सायं
जुहोति; सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहेति प्रातरिति मिश्रलिङ्गमन्त्रयोर्विधा-
नस्याऽऽकाङ्क्षितत्वाच्छेषः । उभयोर्देवतयोः संविधाने होम इति स्तुतेरुपपत्तिः ।
दूरभूयस्त्वाद् धूमस्याग्नेश्चादर्शने गौणः शब्दः ॥ १२ ॥
भा० वि०—उक्तगुणवादनिमित्तस्योदाहरणान्तरेऽव्याप्तिमाशङ्क्य परिहरति—
दूरेति । उदाहरणान्तरमेवाह—दृष्टेति । अस्मिन्नुदाहरणे निमित्तान्तरं वक्तुं
विधिशेषत्वं तावद्धूमार्थवादस्य दर्शयति—अग्निरिति । प्रातर्जुहोतीति प्रक्रमे
सत्यपीति शेषः, अस्य मिश्रालिङ्गमन्त्रविधेश्शेषमिदमुदाहरणमिति सम्बन्धः ।
इदमिहाकूतम्, यदग्नये च प्रजापतये च सायं जुहोति, यत्सूर्याय प्रजापतये
च प्रातर्जुहोतीत्यग्निसूर्ययोः केवलयोर्देवतात्वेन विहितत्वादेव केवलदैवत्य-
मन्त्रयोः लिङ्गतोऽपि प्राप्तिसंभवात् मिश्रलिङ्गमन्त्रविधिपर्युदस्तप्रतिप्रसवन-
मात्रार्थत्वेन च केवलदैवत्यमन्त्रविधानस्य स्तुत्यनपेक्षत्वान्मिश्रलिङ्गमन्त्रविधान-
स्याग्निज्योतिर्ज्योतिस्सूर्यः स्वाहेति सायं होतव्यम्, सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिरग्निः
स्वाहेति प्रातरित्यस्यापूर्वत्वेन स्तुत्याकाङ्क्षत्वादस्य विधेश्शेषः । शेषत्वं च
तस्माद्धूम एवेत्यादेर्दिवाग्निरादित्यं गच्छतीत्यादिमिश्रताप्रतिपादनस्योपपत्ति-
त्वेनेति विधिशेषत्वमुक्त्वा गुणवादेन स्तुतित्वमाह—उभयोरिति । द्वयोरपि
सन्ध्ययोर्मिश्रदेवतासन्निधानाद्यथार्थाभ्यामेव मन्त्राभ्यां होम इति स्तुतेरपि
सम्भव इत्यर्थः ।
ननु तथापि धूम एवेत्याद्यवधारणा निरालम्बनेत्याशङ्क्य सूत्रं योजयति—
दूरेति । धूमस्य दूरभूयस्त्वादग्नेरदर्शने गौणः शब्दः अग्नेर्दूरभूयस्त्वादूमस्यादर्शने
१२ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ११३
गौणशब्द इत्यन्वयः। दृश्यमानधूमगते विषयतया दृशिसंबन्धे दृशिनालक्षिते
दूरभूयस्त्वे धूमे विधीयेते, अर्चिषी च निषिध्येते एवं च यथा दिवा दूरत्वबाहुल्ये
धूमे दृश्येते नैवमर्चिषि, रात्रौ यथार्चिषि नैवं धूम इत्यर्थः ॥ १२ ॥
त० वा०—तस्माद्धूम एवेति दिवाऽग्निरदित्यं गच्छतीत्यस्योपपत्तित्वेन ।
तदिदं किमर्थमुच्यते । मिश्रलिङ्गाग्निहोत्रमन्त्रविधिस्तुत्यर्थम् । कथं पुनरग्नि-
र्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा; सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहेत्यनयोर्मिश्रलिङ्ग-
त्वम् । यदा विविक्तावेवाग्निसूर्यो देवतात्वेनोपलभ्येते ।
केचिदाहुः । अग्निर्ज्योतिरित्युत्र ज्योतिःशब्दः सूर्यवाची सूर्यो ज्योतिरिति
पुनरग्निवाची तेनोभौ मिश्रलिङ्गाविति । तदयुक्तम् । ज्योतिःश्रुतेस्तेजःसामान्य-
वाचित्वेनोभयत्र सामानाधिकरण्येनोपपत्तेः । अन्यतरपर्यायश्च सन्नितरत्र न
प्रयुज्येत । न हि यो यत्पर्यायः, स तेनैव सह प्रयुज्यते । सूर्यवाची सन्प्रातर्मन्त्रे
न प्राप्नोति । अग्निवाची सायंमन्त्रे । तस्मादुदाहरणं भ्रान्तिलिखितमितीमावु-
दाहर्तव्यावग्निर्ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति ।
तद्विधेश्च स्तुतिः प्रथमविहितकेवलदेवत्यमन्त्रपर्युदासेन मिश्रलिङ्गविधानो-
पपत्तिरियमुच्यते । यदनयोर्मिश्रत्वं दिवाऽग्नेरनुप्रवेशान्नक्तं चाऽऽदित्यस्येति
केवलेड्या न युक्तेति ।
अस्मिन्नपि तु व्याख्याने पर्युदसनीयत्वेनैव पूर्वमन्त्रोदाहरणम् । इतरौ तु
स्तुतिभागिनौ मिश्रलिङ्गाभिधानादेव ज्ञायेते इति नोच्चारिताविति भाष्यं
नेयम् । अत वोभयोः केवलमिश्रलिङ्गयोर्मध्ये पठितोऽयमर्थवादः । तत्र उभय-
देवतयोरन्या प्रशंसा, इतरयोः पुनरियम्, यस्माद्दिवाऽग्निरदित्यं गच्छति,
तस्मात्सूर्य एव तदा ज्योतिः । एवं नक्तमग्निरतस्तौ व्यवस्थितावेव यष्टव्याविति
स्तुतिः । कथं तु धूम एवेत्यवधारणा । दूरस्थैर्भूम्रा दिवा धूम एव गृह्यते,
रात्रावर्चिरिति केनचिदंशेन स्तुत्यालम्बनम् ॥ १२ ॥
न्या० सू०—धूमार्थवादस्य भाष्यकृता मिश्रलिङ्गमन्त्रविधिशेषत्वमुक्तम् । तदुपपाद-
यति —तस्मादिति । उदाहृतयोर्मिश्रलिङ्गत्वं दूषयति —कथं पुनरिति ।
परमतेन समाधत्ते —केचिदाहुरिति । तद् दूषयति—तदयुक्तमिति । न केवलं प्रमाणो-
भावात् ज्योतिः शब्दस्याग्निसूर्यशव्दपर्यायत्वाभावः, किं तु बाधक सद्भावादपीत्याह—
अन्यतरेति । भाष्यानादरेण स्वयं मिश्रलिङ्गमन्त्रविधिशेषत्वमाह—तस्मादिति । अत्रैवार्थे
भाष्यं योजयति --अस्मिन्नपि त्विति । अनेन च प्रातरितीतिकरणः काकुत्वेनैव व्याख्यातः
सत्यप्यस्मिन्प्रक्रमे यदग्नये च प्रातर्जुहोतीत्यग्निसूर्ययोः केवलयोर्देवतात्वेन विहितत्वा-
त्केवलदेवत्यमन्त्रयोर्लिङ्गतोऽपि प्राप्तिसम्भवे मिश्रलिङ्गमन्त्रविधिपर्युदस्तप्रतिप्रसवमात्रार्थ-
८
११४ मीमांसादर्शनम् [ सू०
त्वेन केवलदेवत्यमन्त्रविधानस्य स्तुत्यनाकाङ्क्षत्वान्नास्य तच्छेषतेति, तत्पर्युदासेन मिश्रा-
लिङ्गयोरपूर्वस्य विधानस्याकाङ्क्षितत्वात्तच्छेष इति ।
एवं भाष्यकारमतेन ब्राह्मणेनाप्यग्निसूर्यविधिमङ्गीकृत्य केवललिङ्गमन्त्रविधेस्तदर्थ-
शास्त्रतादोषपरिहाराय प्रतिप्रसवमात्रार्थत्वात् स्तुत्यनाकाङ्क्षतोक्ता । इदानीमाधाराग्नि-
होत्राधिकरणे वाक्यभेदमयाद् ब्राह्मणे चाग्निसूर्यविधेर्निराकरिष्यमाणत्वाल्लिङ्गतः प्राप्त्य-
भावात् तदर्थशास्त्रत्वाभावेनापूर्वविधित्वात् स्तुत्याकाङ्क्षोपपत्तेरस्यैवायं शेष आह—
अथ वेति । यद्यप्यनयोर्विध्योर्मध्ये पठितः, तथापि मिश्रलिङ्गविधेयं दग्नये सायं जुहुयादा-
सूर्याय वृश्चेत् यत्सूर्याय प्रातर्जुहुयादासूर्याय वृश्चेत्, देवताभ्यः समदन्दध्यादग्निर्ज्योति-
र्ज्योतिः सूर्य्यः स्वाहेति सायं होतव्यं सूर्य्यो ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति प्रातस्तयोरुभाभ्यां
प्रातनं देवताभ्यः समदन्दधातीति देवताद्रोहापादकत्वेन केवलदेवत्यनिन्दापूर्वकम्ग देवता-
द्रोहानापादकत्वलक्षणप्रशंसान्तरसद्भावेन निराकाङ्क्षत्वात्केवलदेवत्यविध्योरेवायं प्रशंसे-
त्यर्थः । भाष्यं चैवमस्मिन्नर्थे योज्यम् । मिश्रलिङ्गयोरित्यनादरे षष्ठी सप्तमी वेयं सतोरपि
सन्निधौ मिश्रलिङ्गयोर्मन्त्रयोर्विहितयोः प्रशंसान्तरसद्भावेन तयोः स्तुत्यनाकाङ्क्षत्वादुदा-
हृतकेवललिङ्गमन्त्रविधानस्यैवेयमाकाङ्क्षितत्वाच्छेष इति । अस्मिन्पक्षे स्तुतिस्वरूपं
दर्शयति—यस्माद्धि्वेति । व्यवस्थितशब्देनोभयोरित्यादिभाष्यं नक्तमग्नेर्दिवा च सूर्यस्य
सन्निधाने व्यवस्थया होम इत्येवं व्याख्यातम् । जुहोतिचोदितस्याप्युद्देशांशे भागरूपे देवता-
न्वयमभिप्रेत्य यष्टव्यावित्युक़्तम् । पूर्वव्याख्याने तूभयशब्दो मिश्रवचनः ।
दूरभूयस्त्वादित्यदर्शनाभिधानालम्बनप्रतिपादनाथं भाष्यं प्रश्नपूर्वं व्याचष्टे—कथं
त्विति । दूरस्थस्य भूयस्त्वेन यद्दर्शनं नाम, दर्शनगतोऽतिशयो दृशिना लक्षितः स नञा
निषिध्यते पशुशब्दलक्षितमिव प्राशस्त्यमपशुशब्देन अपशवो वा अन्ये गो अश्वेभ्य इत्यनेन
नञेति भावः—केनचिदिति । दूरभूयस्त्वांशेनादर्शनं स्तुतेरालम्बनमित्यर्थः ॥ १२ ॥
भा० प्र०—दृष्टविरोध के उदाहरणस्वरूप "तस्माद्" धूम एवाग्नेर्दिवा ददृशे
नार्चिः । तस्मादर्चिरैवाग्नेर्नक्तं ददृशे न धूमः" इस अर्थवाद का उदाहरण दिया है।
यह अर्थवाद "अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति सायं जुहोत सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः
स्वाहेति प्रातः" । (ऐ० ब्रा० ५।५।६) सायंकाल अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' यह कह
कर अग्निहोत्र होम करे एवं प्रातःकाल "सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" यह कहकर
अग्निहोत्र होम करे—यह विधिद्वय का शेष या अङ्ग है। इसका कारण यह है कि दिन
में अग्नि की अर्चिः अर्थात् अग्निशिखा दिखाई नहीं देती है, केवल धूम ही दिखाई देता
है, इसीलिए दिन में अग्नि के अदृश्य होने से सूर्य का मन्त्र ही प्रशस्त है, और दिन में
अधिक दूर में स्थित अग्नि दृष्टिगोचर नहीं होती है, केवल धूम ही दृश्य होता है एवं रात
में धूम दृश्य नहीं रहता है, किन्तु अग्नि की शिखा दिखाई देती है—यह अनुभव सिद्ध
है। इसी प्रकार अधिक दूरी के कारण दिन में अग्नि का अदर्शन एवं धूम का दर्शन और
सूत्रव्याख्यानेनाह – स्त्र्यपराधेनेति । दुर्ज्ञानमिति सम्बन्धः । स्त्रीणां
१३ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ११५
अग्नि के दर्शन को लक्ष्य कर गुणवाद के अनुसार यह कहा गया है । अतः यह अर्थवाद
उक्त दोनों विधियों के प्राशस्त्य का बोधक होने से स्वरूप में तात्पर्य नहीं है ।
"दूरभूयत्वात्" अधिक दूरी होने से, अर्थात् दूरी का भूयस्त्व आधिक्य होने से दिन
में अग्नि की शिखा दृश्य नहीं होती है एवं रात में धूम दृश्य नहीं होता है। अतः इस
प्रकार गौण कथन है ॥ १२ ॥
स्त्र्यपराधात्कर्तुश्च पुत्रदर्शनम् ॥ १.२.१३ ॥
शा० भा०—दृष्टविरोध एवोदाहरणं 'न चैतद्विद्म' इति । तत् प्रवरे प्रक्रिय-
माणे देवाः पितर इति ब्रूयादित्याकाङ्क्षितत्वादस्य विधेः शेषः । अब्राह्मणोऽपि
ब्राह्मणः प्रवरानुमन्त्रणेन स्यादिति स्तुतिः । दुर्ज्ञानत्वादज्ञानवचनं गौणम् ।
स्त्र्यपराधेन कर्तुश्च पुत्रदर्शनेन । अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेनमित्यादिना
दुर्ज्ञानम् ॥ १३ ॥
भा० वि०—अस्याप्युदाहरणान्तरेऽव्याप्तिमाशङ्क्य निमित्तान्तरोपन्यासेन
परिहरति—स्त्र्यपराधादिति । प्रक्रियमाणे यजमानो ब्रूयात् देवाः पितर
इत्यादीति पूरणीयम् । प्रवरानुमन्त्रणविधिशेषत्वेऽपि कथं स्तुतिरित्याशङ्क्य
गुणवादादित्याह—अब्राह्मणोऽपीति । तत्र च प्रसिद्धब्राह्मण्यानां ब्राह्मणत्वलाभो
निष्प्रयोजन इति ब्राह्मण्याप्रसिद्धिप्रतिपादनेन स्तुत्युपपादकमेतद्वाक्यमित्यर्थः ।
तथापि ज्ञायमाने कथमज्ञानवचनमित्याशङ्क्य गुणवादादित्याह—दुर्ज्ञानत्वादिति ।
विदिना तद्गतं सौकर्यं लक्षयित्वा नञा निषिध्यत इत्यर्थः । दुर्ज्ञानत्वे कारणं
सूत्रव्याख्यानेनाह – स्त्र्यपराधेनेति । दुर्ज्ञानमिति सम्बन्धः । स्त्रीणां
स्वभर्तृव्यतिक्रमलक्षणापराधसम्भवेनेत्यर्थः ॥ १३ ॥
त० वा० —प्रवरे प्रक्रियमाणे यजमानो वदेद्देवाः पितर इत्यादि । तत्प्रशं-
सार्थमुक्तमब्राह्मणोऽपि ब्राह्मणो भवति प्रवरानुमन्त्रणेनेति । तत्र प्रसिद्धब्राह्मण-
त्वानामेव ब्राह्मण्यलाभो निष्प्रयोजन इति तदुपपत्त्यर्थमुक्तं न चैतद्विद्म इति ।
ज्ञायमाने त्वज्ञानवचनं दुर्ज्ञानत्वात् । यत्सुखेनाज्ञानम्, तदज्ञानमेव । तच्च स्त्र्य-
पराधनिमित्तम् । सत्यपि च स्त्र्यपराधे यदि मातुरेव क्षेत्रिणो वा पुत्रः स्यात्त-
तस्तयोः प्रसिद्धजातित्वान्नैव दुर्ज्ञानता भवेत् । तयोरप्येवमेवं तत्पूर्वजयोरित्य-
नादिन्यायेन जातिरवधार्येतैव । यतस्तु माता भस्त्रा पितुः पुत्र इति स्मर्तॄणां
दर्शनं जनयितुश्च नानाजातित्वोपपत्तिः, तेन वर्णसंकरः । वेदेऽपि चा प्रमत्ता
रक्षत तन्तुमेनमिति जातिविच्छेददर्शनं स्त्र्यपराधकर्तृपुत्रनिमित्तमेवोपपद्यते ।
अन्यथा ह्यपरिरक्ष्यमाणेऽपि नैव स्वजातितन्तुविच्छेदो भवेत् । तेनास्ति प्रशंसा-
वकाश इति । निरूढब्राह्मण्यप्रवरसंकीर्तनात्तत्प्रभवोऽयमिति ज्ञानाद् ब्राह्मणः
कृतो भवतीति स्तुतिः ॥ १३ ॥
११६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
न्या० सू०—'न चैतद्विद्म' इत्यस्य प्रवर प्रव्रियमाणे ब्रूयादित्येतद्विधिशेषत्वं भाष्य-
कृतोक्तम् । तत्र विध्यंशपूरणपूर्वकं स्तुत्युपयोगित्वमुपपादयति—प्रवर इति । अज्ञानवचना-
लम्बनमभिधानार्थं दुर्ज्ञानत्वादिति भाष्यं व्याचष्टे—ज्ञायमाने स्विति । दुर्ज्ञाने कथमज्ञान-
शब्दप्रवृत्तिरित्यपेक्षायामाह—यत्सुखेनेति । पूर्ववदत्रापि ज्ञानगतसौकर्यलक्षणो गुणो
विदितो विदितलक्षितो नञा निषिध्यत इत्यर्थः । स्त्र्यपराधेनेति दुर्ज्ञानत्वोपपादनार्थत्वेन
व्याचष्टे—तच्चेति ।
ननु स्त्र्यपराधेऽपि बीजाद्योनिर्बलीयसीत्यनेन न्यायेन मातृब्राह्मण्यमात्रेण क्षेत्रि-
ब्राह्मण्येन वा पुत्रे ब्राह्मण्यसिद्धेः कथं दुर्ज्ञानतेत्याशङ्कानिराकरणार्थतया कर्तुश्च पुत्रदर्शने-
नेति भाष्यं व्याचष्टे—सत्यपि चेति । किं तत्कर्तुः पुत्रदर्शनमित्यपेक्षायां येन जातः स
एव स माता भस्त्रा पितुः पुत्रो इत्याद्युदाहृतम् । जनकब्राह्मण्यनिमित्तेऽपि पुत्रब्राह्मण्ये
कथं दुर्ज्ञानत्वमत आह—जनयितुश्चेति । साक्षात्कर्तृपुत्रदर्शनं स्वयमुदाहृत्य भाष्यकारीय-
मुदाहरणं द्योतकत्वेन योजयेति—वेदेऽपि चेति । उपपादितं स्तुत्युपयोगमुपसंहरति—
तेनेति । दुर्ज्ञानत्वेनाब्राह्मण्यशङ्कासम्भवादब्राह्मणस्यापि प्रवरानुमन्त्रणाद् ब्राह्मण्यं भवती-
त्येवंरूपा प्रशंसा युक्तेत्यर्थः ।
ननु ब्राह्मण्यस्य मातापितृसंबन्धनिमित्तत्वात्प्रवरानुमन्त्रणजन्यत्वाभिधानं किमाल-
म्बनमत आह—निरूढेति । निरूढं=प्रसिद्धं ब्राह्मण्यं येषां प्रवराणां प्रव्रियमाणानां
सङ्कीर्त्त्यमानानां तेषां सङ्कीर्त्तनादित्यर्थः ॥ १३ ॥
मा० प्र०—"नचैतद्विद्मो वयं ब्राह्मणा वा स्मोऽब्राह्मणा वा" इस अर्थवाद में भी
दृष्टविरोध प्रदर्शित किया है, किन्तु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि "प्रव्रियमाणे ब्रूयात्
देवाः पितरः" (मै० सं० १।४।११) प्रवर के कथन के समय देवाः पितरः इत्यादि कहना
चाहिए यह इस विधि का शेष या अङ्ग होता है। आशय यह है कि यजमान यदि
देवाः पितरः पितरो देवा योऽस्मि सन् यजे योऽस्मि सन् करोमि" इस मन्त्र में प्रवर
अनुमन्त्रित करे, ऐसी स्थिति में अब्राह्मण भी ब्राह्मण हो जाता है। इस प्रकार इसके
द्वारा प्रवरअनुमन्त्रण की प्रशंसा की गई है। किन्तु ब्राह्मणत्वादि की अज्ञेयता विवक्षित
नहीं है, कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि प्रत्यक्ष सिद्ध है, ब्राह्मणत्वादि जाति जन्म के
अनुसार है, गुण के अनुसार नहीं है, यह प्रत्यक्ष सिद्ध है। शास्त्रकारों के अनुसार
गोत्व आदि जाति के समान ब्राह्मणत्वादि जाति भी प्रत्यक्षगम्य एवं जन्मगत है। यदि
ब्राह्मणत्वादि जाति को जन्मगत नहीं माना जाय तब दृष्टविरोध, शास्त्रविरोध, अन्यो-
न्याश्रय, अव्यवस्था एवं एक साथ वृत्तिद्वय-विरोध आदि अनेक दोषों की सम्भावना है।
ब्राह्मणत्वादि जाति जन्मगत है, यह प्रत्यक्षगम्य होने से उसका अपलाप करने पर दृष्ट-
विरोध होगा । "अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत" आठ वर्ष के ब्राह्मणपुत्र को ब्राह्मण कह
कर उल्लेख किया गया है। यदि जन्मगत जाति न मानी जाय तो इसकी असङ्गति होगी
१३ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ११७
कारण, आठ वर्ष के बालकों में साधारणतया ब्राह्मणोचित किसी भी गुण की अभिव्यक्ति
नहीं होती है । क्षत्रिय एवं वैश्य के प्रसङ्ग में भी इसी प्रकार उपनयन की अवस्था का
निर्णय किया गया है । यदि जाति को जन्मगत नहीं माना जाय तो इन शास्त्रवचनों के
साथ विरोध होगा । ब्राह्मणत्वादि जाति का आचार से जन्म मानने पर अन्योऽन्याश्रय
दोष होगा, क्योंकि, जहाँ चारों वर्णों के आचारके विषय में उपदेश दिया गया है, वहाँ
ब्राह्मणत्वादि जाति का परिचय देना शास्त्र का उद्देश्य नहीं था, किन्तु, आचार के
विधान में ही शास्त्र का तात्पर्य्य है । अतः, जो व्यक्ति ऐसे आचार से सम्पन्न है, वह
ब्राह्मण है, इसमें शास्त्र का तात्पर्य्य नहीं है । क्योंकि धर्म के प्रतिपादन करने में ही
शास्त्र का उद्देश्य है । ऐसी स्थिति में वैसा आचार करने पर ब्राह्मण होगा, और
ब्राह्मणत्व पूर्व से सिद्ध रहने पर ही वे आचार अनुष्ठेय होंगे, इस प्रकार ब्राह्मणत्व एवं
आचार दोनों की उत्पत्ति परस्पर सापेक्ष होने से अन्योऽन्याश्रय दोष है, क्योंकि,
ब्राह्मणत्व आदि पूर्व से सिद्ध न रहे तो उसको उद्देश्य कर किसी आचार का विधान
सम्भव ही नहीं है। जाति को जन्मगत न कहकर आचार जन्य मानने पर अव्यवस्था भी
होगी, क्योंकि, एक ही व्यक्ति कभी सदाचार करता है एवं कभी दुराचार या कदाचार
करता है, अतः, सदाचार के समय वह ब्राह्मण और दूसरे ही क्षण कदाचार करने के
समय शूद्र होगा । इस प्रकार एकही व्यक्ति में ब्राह्मणत्वादि कभी भी व्यवस्थित नहीं
रहेगा, पुनः पुनः जाति का परिवर्तन होगा । ऐसी स्थिति में वह ब्राह्मण है या ब्राह्मणेतर
इसका प्रमाण देना संसार में दुर्लभ हो जायगा । फलतः, शास्त्रीय विधि के अनुष्ठान का
लोप हो जायेगा । इस प्रकार युगपत् वृत्तिद्वयका विरोध भी होगा, कारण, एकही व्यक्ति
एकही प्रयत्न से ऐसा कर्म कर सकता है कि जिसके फल स्वरूप किसी का अनिष्ट और
किसी का इष्ट होगा ! इससे युगपत् परपीडा और परानुग्रह करने से उनमें शूद्रत्व एवं
ब्राह्मणत्व दो विरुद्ध जातियों का एक साथ समावेश होगा । इत्यादि ।
पूर्वप्रसङ्ग में जाति की दुर्ज्ञेयता को लक्ष्य कर "नचैतद् विद्मः" इत्यादि वाक्य में
उस विषय का अज्ञान कहा गया है । जाति दुर्ज्ञेय है, कारण, गोत्वादि जाति के प्रत्यक्ष
में जैसे अनेक इतिकर्तव्यता या सहकारी रहते है, वैसे ही ब्राह्मणत्वादि जाति के प्रत्यक्ष
में भी उत्पादन कर्ता की जाति का स्मरण करना इतिकर्त्तव्यता या सहकारी है ।
उत्पादक कौन है, इसको जननी को छोड़कर कोई भी नहीं कह सकता हैं । स्त्रियों में
दुश्चरित्रा भी रहती हैं । इसलिए, पति ही सभी पुत्रों का जनक है, यह भी नहीं कहा जा
सकता है । क्योंकि, जारज रमणी जार से पुत्र की उत्पत्ति कर सकती है । पिता एवं
माता की समान जातीयता ही जाति की विशुद्धि का कारण है, अन्यथा माता अन्य जाति
का और पिता दूसरा जाति का होने पर पुत्र की जाति अश्वतर के समान शङ्कर हो
जायेगी । इस प्रकार वर्णशङ्करता जिससे न हो इसी लिए श्रुति कह रही है कि
"अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेनम्" हे रमणियो ? तुम सब असावधान न होकर अर्थात् यत्न-
११८ मीमांसादर्शनम् [ सू०
पूर्वक इस जाति रूप तन्तु की रक्षा करो । क्योंकि, जाति का आश्रय स्वरूप व्यक्ति का
असाङ्कर्य या शुद्ध वर्णता तुम्हारे ही अधीन है । इस प्रकार श्रुतियां स्त्रियों को व्यभि-
चारिता रूप अपराध को जाति की उच्छेद का कारण कह रही है । अन्यथा जाति-तन्तु
पितृपरम्परा क्रम में सनातन होने से निश्चित ही है । अतः, किसी किसी स्त्री की ऐसी
दुश्चरित्रता का कारण एवं उत्पादक क्या है, यह जननी को ही प्रत्यक्षगम्य होने से
विशुद्ध जन्मा व्यक्ति को की उत्पत्ति के सम्बन्ध में संशय होना स्वाभाविक है । उत्पादक
का संशय होने पर जाति-प्रत्यक्ष में भी संशय होगा, क्योंकि, उत्पादक के जाति का
स्मरण भी जाति प्रत्यक्ष का सहकारी कारण है । इस प्रकार जाति प्रत्यक्षगम्य होने पर
भी जाति के विषय में संशय होना अस्वाभाविक नहीं है। इसी संशय को लक्ष्य कर इस
स्थल में मैं ब्राह्मण या अब्राह्मण, यह नहीं जानता हूँ, इस प्रकार कहा गया है, किन्तु,
यह प्रवरानुमन्त्रण विधि का शेष या अङ्ग होने से इसके द्वारा प्रवरानुमन्त्रण की इस
प्रकार प्रशंसा की गई है कि प्रवरानुमन्त्रण का ऐसा ही सामर्थ्य है कि ब्राह्मण या
अब्राह्मण यह अनिश्चित रहने पर भी इसके द्वारा वरणीय व्यक्ति ब्राह्मण के रूप में अव-
धारित होगा । अतः, इसमें प्रत्यक्ष विरोध दोष नहीं है ।
स्त्र्यपराधात्, स्त्रियों के अपराध से अर्थात् दोष से, 'कर्तुः' कर्ता = उत्पादक कर्ता
जार का 'च' - भी “पुत्रदर्शनम्” पुत्र होता है, ऐसा देखा जाता है। दुष्ट स्त्रियों के
दोष से उत्पादन कर्ता अर्थात् उपपति से भी पुत्र की उत्पत्ति होती है, अतः,
“नचैतद्विद्म” इत्यादि कथन में दृष्टविरोध नहीं है ।
भाष्यभूमिका में भी इस सूत्र के विश्लेषण में कोई नवीनता नहीं है । पति और
उपपति दोनों के पुत्र देखे जाते है, अतः, अपना जन्म कैसा है—यह दुर्विज्ञेय है । इसी
अभिप्राय से यह प्रयोग है, अतः, दृष्टविरोध नहीं है । अपने ब्राह्मण्य के सन्देह के
लिए यह प्रयोग नहीं है ॥१३॥
आकालिकेप्सा ॥ १.२.१४ ॥
शा० भा० - शास्त्रदृष्टविरोघे उदाहरणं को हि तद्वेदेति, दिक्ष्वतीकाशान्करो-
तीति साकाङ्क्षत्वादस्य विधेः शेषः । प्रत्यक्षफलत्वेन स्तुतिः । अनवक्लृप्तिवचनं
विप्रकृष्टफलत्वाद् गौणम् ॥ १४ ॥
भा० वि० - ननु सत्यपि स्त्र्यपराधे मातुः क्षेत्रिणो वा पुत्रः स्यात्, तयोश्च
निश्चितत्वात् ब्राह्मण्यस्य कथं दुर्ज्ञानं पुत्रस्य ब्राह्मण्यमत आह- कर्तुश्चेति ।
कर्तुर्नषेक्तुरेव पुत्रो, न मातुः क्षेत्रिणो वेत्यस्यार्थस्य "अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेतम्"
इत्यनेन वैदिकेन प्रजातन्तुरक्षणे प्रमादपरिहारविधानरूपेण लिङ्गेन “माता भस्त्रा
पितुः पुत्रो येन जातः स एव स" इति स्मृत्या च प्रदर्शनात् भर्तृव्यतिक्रमशङ्कायां
सूत्रं योजितम्। कामिनः काम्यमानफलाभिमतेरपि प्रत्यक्षत्वादलवकॢप्तिवचनानुपपत्ति-
१४ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ११९
दुर्ज्ञानमेव पुत्रस्य ब्राह्मण्यामित्यर्थः, दुर्ज्ञानत्वस्याप्युदाहरणान्तरेऽव्याप्तिपरिहार्थः
“आकालिकेप्सा” इति सूत्रम् तद्व्याख्यातुं को हि तद्वेदेत्यादिर्विधिशेषत्वं ताव-
दाह—शास्त्रेत्यादिना। प्रवर्ग्यसमये शालाया दिक्ष्वतीकाशान् छिद्राणि करोति
इत्यस्य विधेश्शेष इत्यर्थः। सम्प्रति गुणवादेन स्तुतित्वमाह—प्रत्यक्षेति।
अतीकाशकरणं हि धूमापगमहेतुत्वाद् दृष्टफलकम्, तेन प्रशस्तमिति स्तूयत इत्यर्थः।
तथापि कथं ज्ञायमानवचनेऽज्ञानवचनमित्याशङ्क्य सूत्रं योजयति –अनव-
कॢप्रोति। अतीकाशकरणफलं प्रत्यक्षम्, कर्मजन्यं तु विप्रकृष्टकालत्वात् परोक्षम्,
तेन विदिना लक्षितमपरोक्षत्वं को हीत्याक्षिप्य इत्यर्थः, तेन पूर्वसूत्रार्था-
निमित्तात्पञ्चमीमाकृष्यैव सूत्रं योजितम् तदानीमेवोत्पद्यमानमाकालिकं प्रत्यक्ष-
दृष्टफलम्, तत्रेप्सा=आप्तुमिच्छा, साऽज्ञानवचने निमित्तमिति ॥ १४ ॥
त० वा०–यत्तदानीमेवोत्पद्यते, तदाकालिकम्। तच्च सर्वलोकस्याभिमतम्,
न यच्चिरभावि। तस्मात्प्रावर्ग्यकाले दिक्ष्वतीकाशकरणं प्राग्वंशस्य प्रशस्यते।
तद्धि सद्यःफलं धूमक्लेशाननुभवात्। इतरत्तु कर्मजन्यं सत्कदाचिद्भविष्यति।
कस्तद्वेद, शास्त्रमात्रगम्यं हि तत्। इदं तु सर्वप्रत्यक्षम्। तदपेक्षया च ज्ञाय-
मानेऽप्यज्ञायमानवचनमितरप्रशंसार्थम्। पाठान्तरमाकालिके, डाद्यन्तवचन इति।
अकालिकमिति वा पाठः। काल इति लोके विप्रकर्ष उच्यते। तत्र भवं काला-
ठञिति ठञि कालिकं न कालिकमकालिकम् ॥ १४ ॥
न्या० सु०—सूत्रं व्याचष्टे—यत्तदानीमेवेति। ईप्सापदव्याख्यानार्थं तच्चेत्युक्तम्।
न यच्चिरभावीत्यनेनाकालिकस्यैवाप्तुमिच्छेति साधारणत्वं दर्शितम्। अनेन चानवकॢप्ति-
वचनमभिमतत्वेनामुष्मिकं निन्दितुमित्युक्तं भवति। आमुष्मिकनिन्दाया विधेः स्तुति-
पर्यवसानप्रतिपादनार्थं प्रत्यक्षफलत्वेन स्तुतिरिति भाष्यं व्याचष्टे—तस्मादिति। चिर-
भाव्यनभिमतत्वादित्यर्थः। अतीकाशाः-छिद्राणि प्राग्वंशः-पत्नीशाला। स्तुतिस्वरूप-
माह—तद्धीति। अनवकॢप्तिवचनालम्बनाभिधानार्थमनवकॢप्तिवचनमिति भाष्यं व्याचष्टे-
तदपेक्षया चेति। अत्रापि यदमुष्मिन् लोक इत्यामुष्मिकफलपरामशिना यच्छब्देन तद्गत-
मभिमतत्वं लक्षयित्वा, तस्यानवकॢप्तिः को वेदेत्यनेनोच्यते। भाष्ये च गौणग्रहणेन
रूपात्प्रायादिति पञ्चम्युपात्तगुणवादनिमित्तत्वमनुकृष्याकालिकेप्सा गुणवादनिमित्तमित्येवं
सूत्रं योजितम्। कामिनः काम्यमानफलाभिमतेरपि प्रत्यक्षत्वादलवकॢप्तिवचनानुपपत्ति-
माशङ्क्य तदपेक्षयेत्युक्तम्। यथा प्रत्यक्षफलं सर्वाभिमतम्, नैतत्त्येत्यर्थः। समानकाला-
वाद्यन्तावस्येत्यर्थविवक्षायामन्वाख्यानादाकालिकपदात्तदानीमुत्पत्त्याख्यार्थालाभमाशङ्क्य
विशिष्टेऽर्थे त्वाख्यातपदीदं पदमेककालक्षणया प्रत्यासत्योत्पत्त्याख्यैककाल्यवाचीति दर्श-
यितुमाह—पाठे त्विति। आद्यन्तवचन इतीतिकरणेनोपक्रमोक्ताकालिकपदार्थपरामर्शीहीदं-
पाठे तदानीमेवोत्पाद्यमानमनेन सूत्रेणाकालिकमनेन यातमित्यर्थः। पाठान्तरमिति क्व-
१२० मीमांसादर्शनम् [ सू०
चिद्वात्तिकपाठः । तत्र भाष्योपन्यस्तस्यापि दीर्घपाठस्य स्वानभिमतत्वसूचनार्थं पाठान्त-
रोक्तिः । पूर्वंविवक्षितार्थलाभोपपादनाय ह्रस्वपाठव्युत्पत्ति दर्शयितुमाह—अकालिकमिति
चेति । ठस्येकादेशात्कालिकपदसिद्धिः ॥ १४ ॥
भा० प्र०—शास्त्रीय दृष्टविरोध के दृष्टान्त में "को हि तद् वेद" (तै० सं०
६।१।१।१) इस वेद वाक्य का उल्लेख किया है। यह वाक्य "दिक्ष्वतीकाशान् करोति"
(तै० सं० ६।१।१।१) का अवशिष्ट अंश है। (दिशाओं में अवकाश या द्वार रखना
चाहिये) यह विधि प्राचीन वंश नामक यज्ञशाला में अवकाश या द्वार रखने के लिए
दिशा के नियम के लिए कहा गया है। श्रौतसूत्रकार महर्षि कात्यायन ने अग्निष्टोम
याग के स्थान निरूपण के प्रसङ्ग में अन्य श्रुतियों की प्रत्यालोचनापूर्वक प्रत्येक "प्रतिदिक्
द्वारम्" (का० सू० ७।३।१७) से पूर्वपक्ष कर "उदग्वर्जं वा" (७।३।१८) के द्वारा
सिद्धान्त प्रदर्शित किया है। उत्तर दिशा को छोड़ कर अन्य दिशाओं में द्वार रहेगा।
यज्ञशाला यज्ञाग्नि से उत्पन्न धुम से व्याप्त हो जाता है, यदि धुओं के निकलने का मार्ग
नहीं रहेगा तो ऋत्विजों को बहुत कष्ट होगा, अतः, "को नु तद् वेद" इत्यादि अर्थवाद
में सुदूर काल में होने वाले पारलौकिक सुख का निर्देश न कर उपस्थित धूम से उत्पन्न
दुःख से छुटकारा पाने के लिए अवकाश या धुआं के निकलने के मार्ग का रखना उचित
है—व्यक्त किया है। द्वार का निर्माण स्वतन्त्र रूप में अपनी इच्छा के अनुसार करना
ठीक नहीं है, अपितु विधि-विहित रूप में ही द्वार निर्माण करना चाहिए। अतः, यह
अर्थवाद आकालिकेप्सा = इस समय सुख प्राप्ति की इच्छा से उत्पन्न है। प्रकृत में दुःख
परिहार को ही औपचारिक रूप में सुखलाभ कहा गया है। काल = चिरकाल या
दूरवर्ती काल का बोधक है। कारण, इसी अर्थ में काल शब्द का प्रयोग देखा गया है।
जैसे बहुत दिनों के बाद होने वाले फल को लक्ष्य कर व्यवहार में लोग कहते हैं कि
समय पर इसका फल होगा। अतः, अकाल का अर्थ पूर्ववर्ती काल नहीं अपितु वर्तमान
या तत्काल होता है। अकाल अर्थात् तत्काल में उत्पन्न आकालिक होता है (अकाले भवः
आकालिकः) वर्तमान काल में उत्पन्न सुख की लिप्सा ही आकालिकेप्सा है। इस प्रकार
आकालिकेप्सा शब्द का अर्थ तात्कालिक सुख प्राप्ति की अभिलाषा होता है। अर्थात्
आकालिक = तात्कालिक = उसी समय, ईप्सा सुखलाभ या दुःखपरिहार की अभिलाषा
या इच्छा है । को हि तद् वेद" परलोक में कुछ है या नहीं, इसको कौन जानना है,
फलतः, तात्कालिक सुख प्राप्ति और दुःख के परिहार की इच्छा में प्रवृत्ति भी
स्वाभाविक है ॥ १४ ॥
विद्याप्रशंसा ॥ १.२.१५ ॥
शा० भा०—तथा फलाभावादित्यत्रोदाहृतं 'शोभतेऽस्य मुखमिति' । गर्गत्रि-
रात्रविधेराकाङ्क्षितत्वाच्छेषः । वेदानुमन्त्रणस्य च आङ्स्य प्रजायां वाजी
१५ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १२१
जायत इति शेषः । मुखशोभा वाजिसत्त्वं च गुणवचनत्वाद् गौणः शब्दः । शोभत
इव शिष्यैरुद्वीक्ष्यमाणम् । कुले संतताध्ययनश्रवणान्मेधावी जायते, स
प्रतिग्रहादन्नं प्राप्नोतीति ॥ १५ ॥
भा० वि०-फलाभावसूत्रोक्तमनुपलब्धिविरोधं निराकर्तुमाह-विद्येति । सूत्रं
व्याख्यातुं विधिशेषत्वमाह = तथेत्यादिना । आस्यप्रजायां वाजी जायत इति
वेदानुमन्त्रणस्य शेष इत्यन्वयः । अध्ययनविधिनैवार्थज्ञानफलत्वं दर्शयता ज्ञानस्य
स्वयमपुरुषार्थत्वात् कैमर्थ्याकाङ्क्षायामनुष्ठानयोग्यपुरुषकरणादनुष्ठानार्थत्वं
सूचयता पारार्थ्यं तस्य दर्शितम्, पारार्थ्ये च सिद्धे फलश्रुतेरर्थवादत्वाद्विद्या-
प्रशंसयानुष्ठानशेषता सिध्यतीति भावः । स्तुत्यर्थतयापि कथमसतोर्मुखशोभा-
वाजिमत्त्वयोरुक्तिस्तत्राह-मुखेति । गुणाद्वचनं यस्य तत् गुणवचनं = गौणमित्यर्थः,
एतेन गौणस्यैवाविद्यार्थस्य प्रशंसार्थत्वेनाभिधानान्नानुपलब्धिविरोध इति सूत्रार्थो
दर्शितः । गौणत्वमेवोपपादयति - गौण इति । गुणमाह-शिष्यैरिति भृशं शोभने
हि वस्तुनि पुनः पुनरुद्वीक्षणं भवति, विद्वद्वदनस्य च । शिष्यैरुद्वीक्ष्यमाणत्वात्
तत्र शोभत इति व्यपदेशः इत्यर्थः ।
सम्प्रति वाजिमत्त्वाभिधानस्य गौणत्वं गुणकथनपूर्वकमाह-कुलेति ।
कुलेऽस्य विदुषो गृहे यत्सन्ततमध्ययनं तस्य श्रवणादस्य वंशे मेधावी पुत्रो
जायत इत्यर्थः ।
यद्वा अस्य कुले वंशे मेधावी जायत इति सम्बन्धः । ततः किमत आह-
स इति । अवाप्नोतीति सम्भावितत्वगुणाद्वाजिमत्त्वं गौणमिति शेषः ।
पूर्णाहुत्यादिवाक्येष्वपि अनुपलब्धिविरोधं परिहरति-सर्वत्वमिति ।
आकाङ्क्षितत्वाच्छेष इति । अतः परं सर्वान् लोकान् पशुबन्धयाज्यभिजयति
इति पशुना यजेतेत्यस्य विधेःशेष इति पठितव्यम् । वेदेत्यस्य विधेरिति सम्बन्धः,
पूर्वसूत्रात् प्रशंसापदमादाय सर्वत्वमिति सूत्रांशं व्याकुर्वन्ननुपलब्धिविरोधं परि-
हरति-फलेति । पूर्णाहुतेरग्निसंस्कारार्थत्वात्, पशुबन्धस्य चारादुपकर्मकत्वात्,
अश्वमेधज्ञानस्य च पुरुषसंस्कारार्थत्वात्, संस्कारकर्मणां च फलश्रुतेरर्थवादत्वात्,
सर्वकामत्वादिरूपं फलं प्रशंसैवेति नानुपलब्धिविरोध इत्यर्थः ॥ १५ ॥
त० वा०-अध्ययनविधिशेषत्वादफलविधिः सन्यथाविज्ञातमुखशोभावाजि-
मत्त्वानुवादो विज्ञायते । न चैक एव प्रकारो मुखशोभायाः, संस्थानं रमणीयता
लावण्यं चेति । स्त्रीविषयं ह्येतत् । विदुषां पुनः पदवाक्यन्यायोद्गारि मुखं
शोभते तेनाऽऽत्मना मुख्ययैव वृत्त्या शीभते । पुत्रश्च वाजवान्ब्रह्मवर्चसद्वारेण ।
अथापि गौणता, तथाऽपि स्तुतिपरत्वाददोषः ॥ १५ ॥
१२२ मीमांसादर्शनम् [ सू०
न्या० सु०—अनेन सूत्रेण यासौ गर्गत्रिरात्र=वेदानुमन्त्रणविद्या मुखशोभा=वाजिजन्म-
हेतुत्वेनोक्ता, सा गर्गत्रिरात्रवेदानुमन्त्रणयोः प्रशंसेत्युच्यत इति गर्गत्रिरात्रविधेरित्यादिना
भाष्येणोक्तम् । तत्र विद्यायाः केनचित्पारार्थ्यानवगमात्तद्विषयफलश्रुतेः कथं प्रशंसार्थ-
तेत्याशङ्कानिराकरणपूर्वकं फलाभावसूत्रोक्तमनुपलब्धिविरोधं निराकरोति—अध्ययने-
नेति । अध्ययनविधिना ज्ञानस्याध्ययनफलत्वं वदता निष्प्रयोजनस्य फलत्वायोगात्
कैमध्यपेक्षायां सामर्थ्यात्कर्मानुष्ठानयोग्यपुरुषोपकरणार्थत्वेन तच्छेषावगमादित्यर्थः ।
स्वयं मुख्यया वृत्त्या मुखशोभा-वाजिमत्त्वानुवादमुपपाद्य, अधुना भाष्योक्तं गौणत्व-
मनुसरति—अथापीति । स्तुतिपरत्वादित्यनेन सूत्रोक्तस्य प्रशंसाथंत्वस्यानुपलब्धिविरोध-
परिहारार्थत्वं दर्शितम् । घृतवन्तं कुलायिनं रायस्पोषं सहस्रिणं वेदो ददातु वाजिन-
मित्यह । प्रसहस्रं पशूनामाप्नोति, प्रजायां वाजी जायते य एवं वेदेत्यत्र यज्ञपतिप्रथन-
वत् मन्त्राभिधानस्यार्थवादा लम्बनत्वसम्भवेऽपि मन्त्राभिधानेऽप्या लम्बनाकाङ्क्षानिवृत्त्यर्थं
कुले सन्तताध्ययनश्रवणादित्युकम् ॥ १५ ॥
भा० प्र०—पूर्वपक्षी दृष्टविरोध प्रदर्शन प्रसङ्ग में “शोभतेऽस्य मुखं य एवं वेद"
(ता० म० ब्रा० १।२।२५) इस अर्थवाद वाक्य को फलहीन सिद्ध किया है। इसकी
असङ्गति प्रदर्शित करते हुए जैमिनि ने “विद्याप्रशंसा” इस सूत्र को लिखा है। पूर्वोक्त
अर्थवाद की फलहीनता का प्रदर्शन सङ्गत नहीं है। क्योंकि, यह गर्गत्रिरात्र विधि का
शेष वाक्य है; इसके द्वारा उसी विधि की प्रशंसा की गई है। संसार में ऐसा देखा
जाता है कान के अलङ्कारों से मुख शोभायमान होता है। शिष्यगण विद्वान् व्यक्ति का
मुख उत्साह सम्पन्न होने से कर्नालङ्कार के विना केवल साधु पदों के उच्चारण से ही
शोभायमान देखते हैं। जिस विषय का ज्ञान ही शोभा का साधन होगा; उस विषय
का अनुष्ठान और भी शोभा का हेतु होगा। इस तरह विधि विहित कर्मों की ही प्रशंसा
इस अर्थवाद से की गई है।
इसी प्रकार “आस्य (आ अस्य) प्रजायां वाजी जायेत; य एवं वेद" यह अर्थवाद वाक्य
भी वेदानुमन्त्रण विधि का शेष है। जिस घर पर सदा अध्ययन आदि चलता रहता
है, उस घर में जिस पुत्र का जन्म होता है, वह भी बाल्यावस्था से शास्त्रालाप सुनकर
स्वभावतः मेधावी एवं विद्वान् हो जाता है, और विद्वान् होने पर सभी व्यक्ति उसको
सत्पात्र गुणी समझकर दान देता है। अधिक दान मिलने पर वह प्रचुर अन्न प्राप्त कर
लेता है। इस प्रकार गुण को लक्ष्य करके ही कहा गया है—“वाजी जायते"।
विद्याप्रशंसा = विद्या की प्रशंसा । इसका मुख शोभायमान होता है इत्यादि वाक्य
में जो कहा गया है, वह विद्या की प्रशंसा है ॥ १५ ॥
सूत्रवाक्यं योजयति—सर्वकामेति । सर्वे कामाः फलं यस्य कर्मणः, तन्निमित्ते
१६ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १२३
सर्वत्वमाधिकारिकम् ॥ १.२.१६॥
शा० भा०—अन्यान्नर्थक्यवाक्य उदाहरणं 'पूर्णाहुत्या सर्वान्कामानवाप्नो-
तीति' पूर्णाहुतिं जुहोतीत्याकाङ्क्षितत्वादस्य विधेः शेषः । य उ चैनमेवं वेदेति,
तरति मृत्युमित्यस्याऽऽकाङ्क्षितत्वाच्छेषः । फलवचनं स्तुतिः, सर्वकामफलस्य
निमित्ते सर्वकामावाप्तिवचनं गौणम् । असर्वेषु सर्ववचनमधिकृतापेक्षम् ॥ १६ ॥
भा०वि०—सम्प्रति सर्वकामावाप्तिवचसस्सालम्बनत्वं दर्शयन् सर्वत्वपदावृत्त्या
सूत्रवाक्यं योजयति—सर्वकामेति । सर्वे कामाः फलं यस्य कर्मणः, तन्निमित्ते
संस्कृताग्नौ विषये सर्वकामावाप्तिवचनं निमित्ते नैमित्तिकत्वोपचारात् गौण-
मित्यर्थः । सर्वत्वं=सर्वकामत्वम्, आधिकारिकं फलसम्बन्ध्येव तन्निमित्तेऽग्ना-
वुपचरितमिति वदता सूत्रकारेणोक्त इत्यर्थः ।
पशुबन्धवाक्येऽप्येकस्मै वा अन्ये यज्ञक्रतवः कामायाह्रियन्ते, सर्वेभ्यो
ज्योतिष्टोम इति अधिकृतस्य ज्योतिष्टोमस्य सर्वकामसाधनत्वात् तदङ्गभूतस्य
पशुबन्धस्य तद्द्वारा सर्वलोकसाधनत्वम् स्तुत्यर्थमुपचारादुक्तमिति सूत्रं योज्यम् ।
मृत्युतरणोदाहरणे तु पूर्वसूत्रगतविद्यापदानुषङ्गेन विद्याप्याधिकारिकीति
विपरिणामं कृत्वा अश्वमेधफलमपि मृत्युत्तरणादि तदुपकारिण्यां विद्यायामश्व-
मेधस्तुत्यर्थमुपचारेणोक्तमिति योज्यमित्याशयः ।
नन्वग्न्यादिद्वारेणापि न सर्वकामनिमित्तत्वमित्याशङ्क्यान्यथा सूत्रं
योजयति—असर्वेष्विति । यथा लोके सर्वमन्नं भुक्त इत्यादौ सर्वशब्दः प्रकृतापेक्षः,
तथात्रापि प्रकृताग्निसाध्यफलग्राही भविष्यतीत्यर्थः ॥ १६ ॥
त० वा०—संस्कारकर्मत्वान्न फलविधिः । स्तुतेस्त्वालम्बनं निमित्ते नैमि-
त्तिकवदुपचारात् । सर्वकामनिमित्तानां कर्मणां सामान्यसाधनभूतानग्नीनवाप्नो-
तीत्यर्थः । सूत्रं चैवं योज्यते—सर्वकामनिमित्तैः कर्मभिराहिताग्नित्वादिदानी-
मधिकृत इति वक्तव्ये सत्याधिकारिकं सर्वत्वं स्तोतुमवाप्तावुपचरितम् ।
ननु चाऽऽकाशगमनसुरकन्यालाभादयोऽत्यन्तासन्तः सर्वशब्देन वैदिकेषु
कर्मसु निमित्तद्वारेणापि न शक्यन्तेऽनुवदितुमतः पुनः सूत्रमुच्यते । यथैवौदनादिषु
सर्वशब्दोऽधिकृतापेक्षत्वान्न त्रैलोक्यं गृह्णाति, तथाऽत्राग्निकर्माधिकृतफलग्राही
भविष्यतीत्यदोषः ॥ १६ ॥
न्या० सु०—फलवचनं स्तुतिरिति भाष्येण पूर्णाहुति-पशुबन्धयोः सर्वकामलोकफल-
त्ववचनम्, अश्वमेधविद्यायाश्च मृत्युतरणादिफलत्ववचनं प्रशंसार्थत्वान्नानुपलब्धिविरुद्धमिति
सूत्रं योजयति—सूत्रं चेति।
१२४ मीमांसादर्शनम् [ सू०
पूर्वसूत्रानुषङ्गेण सर्वत्वमिति सूत्रावयवो व्याख्यातः। तत्सिद्धयर्थं पूर्वोक्तमप्यर्थवाद-
विषयत्वं स्मारयति—संस्कारेति। पूर्णाहुतिविद्ययोः संस्कारत्वात्पशुबन्धस्य चारादुप-
कारककर्मत्वादित्यर्थः। सर्वकामफलस्येति भाष्येण सर्वत्वमित्यवयवावृत्त्या सर्वकामा-
वाप्तिवचनालम्बनाभिधानार्थत्वेनैतत्सूत्रं व्याख्यातम्। तद्व्याचष्टे—स्तुतिस्त्विति। उक्तेऽर्थे
सूत्रं योजयति—सूत्रं चेति।
असर्वेष्वितिभाष्येण सर्वत्वानुपपत्तिपरिहारार्थत्वेन पुनरेतत्सूत्रं व्याख्यातम्। तदा-
शङ्कापूर्वं विवृणोति—ननु चेति। एकस्मै वा अन्ये यज्ञक्रतवः कामायाद्रियन्ते, सर्वेभ्यो
ज्योतिष्टोम इत्यधिकृतस्य ज्योतिष्टोमस्य सर्वकामसाधनत्वात्तदङ्गभूतस्य पशुबन्धस्य तद्-
द्वारा सर्वलोकसाधनत्वं स्तुत्यर्थमुपचारादुक्तमित्येवं सूत्रं योज्यम्। विद्योदाहरणे तु पूर्व-
सूत्रागतविद्याशब्दानुषङ्गेण विद्याप्याधिकारिकीति विपरिणामेनाधिकृताश्वमेधफलं मृत्यु-
तरणादि तदुपकारिण्यां विद्यायामश्वमेधस्तुत्यर्थमुपचारेणोक्तमिति योज्यम् ॥ १६ ॥
भा० प्र०—'अन्यानर्थक्यात्' इस सूत्र के व्याख्यान में "पूर्णाहुत्या सर्वान् कामाना-
प्नोति" इस अर्थवाद वाक्य का उल्लेख कर विध्यन्तर का आनर्थक्य समर्थित किया गया
गया है, किन्तु वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि, 'सभी ब्राह्मणों को भोजन कराया जाय'
यह कहने पर निमन्त्रित या घर पर आये हुए सभी ब्राह्मणों की अवगति होती है।
वैसे ही पूर्णाहुत्या सर्वान् कामाप्नोति' यह "पूर्णाहुतिं जुहुयात्" इस विधि का शेष है।
अतः; इस प्रकरण में उल्लिखित सभी कामनाओं का सर्वत्व विवक्षित है। पूर्णाहुति के
अभाव में आधानरूप कर्म अङ्ग-विकल होगा; उस अङ्गविकलता का पूर्णाहुति समाधान
होता है; यह एक काम है। उसका समाधान होने पर आहवनीय आदि अग्नियां अग्नि-
होत्र आदि कर्मों में योग्य होती हैं—यह दूसरा काम है। उन कर्मों से वे कर्म फल प्राप्त
होते हैं—यह अन्य काम है। इस तरह सभी कामनाओं की प्राप्ति अन्य आहुतियों से भी
कही गई है ? इसके उत्तर में कहा गया है कि इसमें हानि क्या है ? इससे पूर्णाहुति की
स्तुति से कोई हानि नहीं है। इस स्थल में अन्य अधिकार में भी कामना का प्रसङ्ग हो
सकता है। और इस प्रकार विद्यान्तर का भी आनर्थक्य नहीं हो सकता है। अन्य स्थल
में जहाँ "सभी कामनाएं सिद्ध होती है" इस प्रकार के वचन कहे गये है, वहाँ भी इसी
प्रकार समझना चाहिए ॥१६॥
फलस्य कर्मनिष्पत्तेस्तेषां लोकवत्परिमाणतः फलविशेषः
स्यात् ॥ १.२.१७ ॥
शा० भा०—अन्वारुह्य वचनमिदम्। यद्यपि विधिः, तथाऽप्यर्थवत्ता परि-
माणतः सारतो वा फलविशेषात् ॥ १७ ॥
सूत्रतात्पर्यमाह - अन्वारुह्येति । अभ्युपगम्यवादं विवृणोति = यद्यपीति । यद्यपि
१७ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १२५
भा० वि० - एवमर्थवादत्वेनानुपलब्धिविरोधं परिहरतान्यानर्थक्यदोषो
निराकृतः अधुना फलविधित्वमभ्युपगम्यापि निराकरोति - फलस्येति ।
सूत्रतात्पर्यमाह - अन्वारुह्येति । अभ्युपगम्यवादं विवृणोति = यद्यपीति । यद्यपि
पूर्णाहुत्यादिवाक्ये फलविधिः क्रियते, तथापि नाग्निहोत्रादीनामानर्थक्यम्,
किन्त्वर्थवत्तैव । तत्र हेतुः - परिमाणत इति । फलविशेषः स्यादिति सम्बन्धः ।
यत इति शेषः, लौकिकचन्दनकर्पूरकस्तूरिकाग्न्यादिजनितसुखेष्वपि विशेषानु-
मानात् कर्मपरिमाणतारतम्यानुसारेण फलतारतम्यसम्भवात् पूर्णाहुत्या
स्तोकस्तोकफलावाप्तावपि न महतां कर्मणामानर्थक्यमित्यर्थः । तदनेनैवं सूत्रं
योजितं फलस्य कर्मभ्यो निष्पत्तेः श्रुतत्वात्तेषां कर्मणां परिमाणं फलविशेषः;
फले विशेषः परिमाणविशेषः स्यात् - लोकवदिति ।
ननु दक्षिणादौ परिमाणसाम्येऽपि सारासारद्रव्यकृतफलवैषम्येण भवितव्यम्
अन्यथा सारद्रव्यदाने प्रवृत्त्यनुपपत्तेरित्याशङ्क्य परिमाणग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वं
मत्वाह - सारतो वेति ॥ १७ ॥
त० वा० - तच्चैतत्त्समानस्वर्गादिफलेष्वग्निहोत्रादिषूपयोक्ष्यत इत्युपन्यस्तम्,
साधनानुरूपत्वात्साध्यानाम् । सर्वे हि कामाः पूर्णाहुत्याऽवाप्यमानाः स्तोकस्तोकाः
प्राप्यन्ते । तत्र फलभूमाथिनः कर्मान्तरविधिरर्थवान्भविष्यतीति स्थिते चोद्यते -
युक्तं लोके कृष्यादिफलानां प्रत्यक्षावगतत्वात्साधनानुरूपं जन्म । पूर्णाहुत्यादिषु
त्वत्यन्तशास्त्राधीनत्वादविशेषश्रुते फले किम्मूला विशेषकल्पना । न ह्यग्निहोत्र-
ज्योतिष्टोमस्वर्गयोः कश्चिद्विशेषः श्रूयते । न चानुमानमीदृशे विषये समर्थम् ।
तदभिधीयते । विधिसामर्थ्यादिदं सिद्धम् । कथम् ? यदि ह्यल्पान्महतश्च कर्मणः
समं फलं जायेत, ततोऽर्के चेन्मधु विन्देतेत्यनेनैव न्यायेनाल्पेन सिद्धे महति न
कश्चित्प्रवर्तेत । तत्र विधिशक्तिबाधः स्यात् । अविहतशक्तिस्तु सन् 'अर्थाद्वा
कल्पनैकदेशत्वादित् (जै० १।४।२०) इति विधिरेव फलाधिक्यमङ्गीकरोति । अतो
यथा विश्वजिदादौ फलसद्भावः प्रमाणवान् एवमिह तद्विशेष इति ।
किञ्च कर्मणामल्पमहतां फलानां च स्वगोचरः ।
विभागः स्थानसामान्यादविशेषेऽपि चोदिते ॥ २ ॥
यथैव क्रमाम्नातानामङ्गाङ्गिनां प्रथमस्य प्रथमं द्वितीयस्य द्वितीयमिति
विनियोगव्यवस्था, तथैव कर्मगोचरेऽल्पस्य कर्मणः परिमाणसामान्येन फल-
गोचरेऽल्पमेवोपतिष्ठते । मध्यमस्य मध्यमम्, महतो महदिति स्थानमेव
विनियोजकम् ।
स्मरणमप्येवमेव । चातुर्मास्यसौमेषु च फलार्थवादो यदाऽग्निहोत्रं जुहोत्यथ
दश गृहमेधिन आप्नोत्येकया रात्रियेत्यारभ्य न्यूनाग्निहोत्रदशसंवत्सरप्रयो-
१२६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
गादिभिरेकदर्शपूर्णमासादिप्रयोगावासिवचनं कर्माल्पत्वमहत्त्वकृतं फलभेदं
दर्शयति ॥ १७ ॥
न्या० सु०—अन्वारुह्य वचनस्य प्रयोजनमाह—तच्चैतदिति । दक्षिणापरिमाण-
साम्येऽपि फलाधिक्यमन्तरेणासारद्रव्यदानेनापि क्रतुसिद्धौ सारद्रव्यदाने प्रवृत्त्ययोगात्सूत्रा-
तिरेकेण भाष्ये सारग्रहणम् । विशेषमुपपादयति—साधनेति । अत्राशङ्कते—इति स्थित
इति । परिहरति—तदभिधीयते इति । स्थानादपीयं व्यवस्था सिद्धयतीत्याह—किं चेति ।
श्लोकं व्याचष्टे—यथैवेति । कर्मगोचर इत्यादिना समुदायाभिप्रायः स्वगोचरशब्दः ।
निर्धारणे च सप्तमी व्यवस्थावचनश्च विभागशब्द इति व्याख्यातः ।
ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्यां न परं पुण्यपापयोः ।
आभूतसंप्लवान्तं च फलमिष्टं तयोर्द्विज ॥
इत्यादिसमरणादपि व्यवस्थाऽवसीयेत इत्याह—स्मरणादपीति । यदग्निहोत्रं जुहोति
अथ दशगृहमेधिन आप्नोत्येकया रात्र्या यदा दश संवत्सरानग्निहोत्रं जुहोत्यथ दर्शपूर्ण-
मासयाजिनामाप्नोति यदा दश, संवत्सरान् दर्शपूर्णमासाभ्यां यजतेऽथाग्निष्टोमयाजिनामा-
प्नोतीत्याद्यन्यार्थदर्शनादपि व्यवस्थासिद्धिरित्याह—चातुर्मास्यसोमेषु चेति । चातुर्मास्य-
वत्सोमेऽपीत्यर्थः ॥ १७ ॥
भा० प्र०-कर्म के परिमाण के अनुसार फल की अल्पता और आधिक्य होता है ।
निरूढ पशुबन्ध नामक यज्ञ से स्वर्ग की प्राप्ति होती है एवं ज्योतिष्टोम दर्शपूर्णमास आदि
कर्मों से भी स्वर्ग की प्राप्ति होती है इसी प्रकार अश्वमेध विषयक ज्ञान ब्रह्महत्या आदि
पापों से छुटकारा मिलता है एवं अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान से भी ब्रह्महत्या आदि पापों
की निवृत्ति होती है, किन्तु ये सभी एक प्रकार के नहीं हैं। अल्प परिश्रम साध्य कर्म से
किस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, वह भिन्न प्रकार एवं उसका स्थायित्व भिन्न जातीय
होता है, एवं अधिक परिश्रम से साध्य कर्म से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है वह उससे
भिन्न एवं उसका स्थायित्व भी भिन्न है । इसलिए तैत्तिरीयसंहिता "उच्चावचकर्म्मणा-
मेकविधफलासम्भवात् स्वर्गो बहुविधः", स्वल्प और महत् कर्म से एक प्रकार का
स्वर्गरूपी फल नहीं हो सकता है; अतः, स्वर्ग अनेक प्रकार का है, जो व्यक्ति जिस
प्रकार का कर्म करता है, उस कर्म के परिणाम के अनुसार स्वर्ग का भोग भिन्न प्रकार
का होता है । जैसे एक कपड़ा पाँच रुपये का खरीदा जा सकता है और एक रुपया का
भी कपड़ा खरीदा जा सकता है, किन्तु कपड़ा होने पर भी उनमें बहुत भेद है । इसी
तरह कर्म की स्वल्पता और महत्त्व के अनुसार स्वर्ग भोग अल्पकाल स्थायी एवं अधिक
काल स्थायी होता है । नरक के भोग का भी यही नियम है । इसी प्रकार कायिक
वाचिक एवं मानसिक भेद से ब्रह्महत्या अनेक प्रकार की है । मन में ब्रह्महत्या की
१८ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १२७
कल्पना करने वाले व्यक्ति को जो पाप होता है वह अश्वमेध विषयक ज्ञान से निवृत्त
होता है एवं ब्रह्महत्या का अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति के पाप का यज्ञ के अनुष्ठान से ही
मुक्ति होती है । समान फल का निर्देश रहने पर भी प्रकार में भेद रहता है । यह केवल
युक्ति के आधार पर नहीं है, वरन् चातुर्मास्य सोम प्रकरण में जो अर्थवाद कहा गया है,
उससे भी यही अर्थ सिद्ध होता है । "यदग्निहोत्रं जुहोत्यथ दश गृहमेधिनं आप्नोत्येकया
रात्रिया" इत्यादि क्रम में गृहमेधी अग्निहोत्रं दर्शपूर्णमास आदि एक-एक याग के समान
है, अतः स्वल्पायास अथवा बहु आयास साध्य अनेक कर्मों का एक प्रकार के फल का
श्रवण रहने पर भी असामञ्जस्य का अवकाश नहीं है ।
फलस्य = फल का, कर्मनिष्पत्तेः = कर्म के द्वारा निष्पत्ति होने से, तेषां = कर्म-
फलों का, परिणामतः = परिमाण के अनुसार, फल विशेषः = फल का अल्पता या आधिक्य,
स्यात् = होता है । लोकवत् = लौकिक दृष्टान्त के अनुसार लोक व्यवहार में । जैसे भूमि का
स्वल्पकर्षण एवं अधिक कर्षणरूप परिमाण के अनुसार कृषि आदि फल की अल्पता एवं
अधिकता रहती है, वैदिक धर्म का भी परिमाण के अनुसार फल का तारतम्य होता है,
क्योंकि कर्म के द्वारा ही फल की निष्पत्ति होती है ॥ १७ ॥
अन्त्ययोर्यथोक्तम् ॥ १.२.१८ ॥
शा० भा०—अभागिप्रतिषेधादित्यादावुदाहृतं—न पृथिव्यामग्निश्चेतव्यो
नान्तरिक्षे न दिवीति, हिरण्यं निधाय चेतव्यमित्याकाङ्क्षितत्वादस्य विधेः
शेषः । पृथिव्यादीनां निन्दा हिरण्यस्तुत्यर्था । असति प्रसङ्गे प्रतिषेधो नित्या-
नुवादः । यच्चानित्यदर्शनं 'बबरः प्रावाहणिरकामयत' इति । तत्परिहृतम् ।
अर्थवादाक्षेपेण पुनरुत्थितमिदानीमर्थवादप्रामाण्ये तेनैव परिहारेण परिहरिष्यत
इति ॥ १८ ॥
भा० वि०—एवं पूर्णाहूतिवाक्यस्य स्वार्थासत्यत्वादिनार्थक्यप्रसङ्गं
परिहृत्य, अधुना न पृथिव्यामित्यादौ नाभागिप्रतिषेधप्रसङ्गः नापि बबरः
प्रावाहणिरित्यादावनित्यसंयोगप्रसङ्ग इत्याह - अन्त्ययोरिति । अभागिप्रतिषेध-
निरासार्थं सूत्रं योजयति—अभागीति । निन्दायाः कथं विधिशेषत्वमित्याशङ्क्य
यथोक्तमितिपदं व्याकुर्वन् स्तेयानृतवादार्थवादन्यायमतिदिशति—पृथिव्यादीति ।
ननु शुद्धपृथिवीचयननिषेधस्य हिरण्यनिधानस्तुत्यर्थत्वेऽपि नान्तरिक्ष इत्यादेः
कथं तच्छेषत्वं तत्राह—असतीति । असत्यामपि प्राप्तौ प्रतिषेधो नित्यानुवादो
दृष्टान्तार्थः; यथान्तरिक्षे, दिवि वा चयनमनुमतम् । एवं शुद्धायामपि
पृथिव्यामित्यर्थः ।